बुधवार, 8 जुलाई 2020

नरपिचाश विकास दूबे का दायरा /शिवशंकर पाण्डेय





कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की जघन्य हत्या नेता, पुलिस और अपराधी के मजबूत बेशर्मी भरे काॅकटेल का नतीजा माना जा रहा है। और यह भी कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले जाॅबाज़ पुलिस कर्मचारी घुट-घुट कर ड्यूटी करने को मजबूर या फिर किसी अपनों की गद्दारी से बदमाशों की गोलियों की भेंट चढ़ जाते है। ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सवाल मुंह बाए सामने खड़ा है कि इसका खात्मा कैसे हो। विकास दुबे यूंही कोई एकाएक नहीं बन पाता। सत्ता के बाहर रहकर राजनीति के अपराधीकरण का विधवा प्रलाप करने वाले वही राजनेता सत्ता पाते ही माफिया बदमाशों के साथ मौसेरे भाई बन जाते हैं। और तब पूरी बेशर्मी से एक दूसरे का रिकॉर्ड तोड़ने की होड़ सभी राजनीतिक दलों में होने लगती है। यह भी तल्ख सच्चाई है कि माफिया दबंगों के तलवे चाटकर उनकी ड्यूटी बजाने वाले पवित्र खाकी को कलंकित करने का गुनाह करने वाले ये विभीषण भी हर जिलों के तकरीबन ज्यादातर थानों में बखूबी पाए जाते हैं। सैयां भए कोतवाल तो डर काहे का। ऐसे में छुट्टा सांड बन सरेआम घूमने वाले ये दबंग-बदमाश कोढ़ में खाज बन कानपुर कांड जैसी घटनाओं को अंजाम देने में थोड़ा भी नहीं हिचकते। असलियत बड़ी भयावह है। अभी भी वक्त है संभलने का। ज्यादातर थानों में इनकी होने वाली आमदरफ्त और आवभगत रोकी जाए। इलाकाई सांसद- विधायक की खास कृपा इन सैटिंगबाज पेशेवर बदमाशों के लिए खाद पानी का काम करती है, इसे भी सख़्ती से रोका जाए। यह आंख खोलने वाला वाकया है कि कानपुर में विकास दुबे नौ घंटे पहले खुला चैलेंज देकर आठ पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार देता है। यह हतप्रभ करता है कि नहीं? पुलिस ऑपरेशन की टेलीफोनिक सूचना देकर मुखबिरी करने का जघन्य अपराध थाने से ही किया गया। आखिर कौन रहा माफिया का शुभचिंतक? और अब सत्ता से लेकर विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं के घड़ियाली आंसू, क्या ये सब खीझ पैदा नहीं करते? थाने में घुसकर राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त भाजपा नेता को भून डालने वाला विकास दुबे थाने से बाहर सुरक्षित कैसे जा सका? ऑन ड्यूटी दरोगा को थप्पड़ मारने के बाद भी वो सीना ताने बाहर कैसे निकला और पुलिस वाले भीगी बिल्ली क्यों बने रहे? सवाल ये भी उठाया जा रहा है कि हर दल में नेताओं के बीच उसकी घुसपैठ कैसे हो जाती रही? कुछ पुलिसकर्मियों के सस्पेंड या हटा देने के चोचलेबाज़ी से काम नहीं चलने वाला, शहीद सीआे देवेन्द्र मिश्रा की 14 मार्च को लिखी चिट्ठी जो अब एसएसपी ऑफिस से गुम हुई बताई जा रही है, उस चिट्ठी पर अगर ऐक्शन हो जाता तो शायद कानपुर कांड न हो पाता। विकास दुबे से बड़ा गुनाहगार उसे सरपरस्ती देने वाले खादी और खाकीधारी वो घड़ियाल लोग हैं जो परदे के पीछे छिपे बैठे हैं।
                                            शिवा शंकर पाण्डेय
                                            उ.प्र. ब्यूरोचीफ
                                            सबलोग पत्रिका एवं न्यूज़ पोर्टल

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