शनिवार, 11 जुलाई 2020

दिल्ली के नवाब और गोरो का बढ़ता प्रभुत्व /नलिन चौहान





पियरे फ्रांस्वा कुइलियर-पेरोन
फ्रांस में एक कपड़ा व्यापारी के रूप में जन्मा पियरे कुइलियर अपने उपनाम जनरल पेरोन के नाम से अधिक प्रसिद्व था। उसे अंग्रेज ग्वालियर के मराठा राज्य और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ प्रगाढ़ संबंधों के कारण अपने साम्राज्य विस्तार के लिए खतरा मानते थे।
भारत में वर्ष 1780 में पहुंचे पेरोन ने सबसे पहले गोहद के राणा के यहां नौकरी की। उसने वर्ष 1795 में कर्दला की लड़ाई में हैदराबाद राज्य के खिलाफ मराठा विजय में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 इसका परिणाम यह हुआ कि महादजी सिंधिया के उत्तराधिकारी दौलत राव शिंदे ने पेरोन को अपनी 24,000 पैदल सेना, 3,000 घुड़सवार सेना और 120 तोपों की लगाम देते हुए अपना सेनापति बना दिया। यह एक दुर्जेय तालमेल था जबकि पेरोन की विस्तारवादी नीति से अंग्रेज चिंता में आ गए।

 पेरोन ने धीरे-धीरे शिंदे की सेना में अंग्रेज अधिकारियों को हटाकर उनके स्थान पर फ्रांसिसी अधिकारियों को नियुक्त किया। यहां तक कि उसने यमुना नदी के दक्षिण में एक बड़ी समृद्ध जागीर पर शासन करते हुए विभिन्न पक्षों से संधियां कीं।
एक ऐसी ही संधि जनरल पेरोन ने दिल्ली में सिंधिया के रेसिडेंट के रूप में पटियाला के महाराजा साहिब सिंह से संधि की थी।

जिसमें दोनों पक्षों ने आवश्यकता के समय में आपसी सहायता की सहमति पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के कौलनामे की प्रति भी यहां प्रदर्शित है। अंत में शिंदे को धोखा देने के बाद पेरोन की सेनाओं को अंग्रेजों ने पटपड़गंज की लड़ाई (1803) में पराजित किया। फिर अंग्रेजों ने उसे वर्ष 1806 में फ्रांस लौटने से पहले दो साल बंगाल में नजरबंद रखा।

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