मंगलवार, 14 जुलाई 2020

आपातकाल की कुछ कहीं अनकहीं यादें / गगन सेठी




बात ठीक 45 साल पहले की है। देश में इमरजेंसी लग चुकी थी। पापा के साथ कई लोगों की अदालत में पेशी हुई। जज साहब ने एक i व्यक्ति से पूछा- आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) किसे कहते हैं? सकपकाए व्यक्ति ने तुक्का मारा- रेलवे स्टेशन सहारनपुर।

वो मासूम था। राजनीति से उसका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था। जज हंसने लगे, बोले- 'जेल आए हो, थोड़ी तैयारी तो करके आए होते।' 45 साल पहले क्या ऐसे ही लोगों से इंदिरा गांधी को देश के अस्थिर होने का खतरा था?

1975 में पापा के साथ मेरठ जेल भेजे गए हजारों लोगों का जुर्म सिर्फ इतना था कि उनकी विचारधारा कांग्रेस से जुदा थी। किसी गैर सरकारी अभियान का हिस्सा नहीं थे, कोई कानून तोड़ने की कोशिश नहीं की थी, किसी तोड़फोड़ में शिरकत नहीं की थी। बस, कांग्रेसी नहीं थे। इसीलिए महीनों तक जेल की यातना सहनी पड़ी। परिवार ने दुख भोगे, सो अलग।

कई लोगों को तो ऐसी-ऐसी यातनाएं दी गईं कि आज भी याद कर रूह कांप उठती है। किसी को बर्फ की सिल्ली पर लिटाया गया तो किसी के नाखून ही खींच लिए गए। लोकतंत्र की हत्या का वह काला अध्याय कभी भुलाया नहीं जा सकता।

पापा जेल में केसी त्यागी और राजेंद्र चौधरी की बैरक में ही थे। आपातकाल से एक दिन पहले दिल्ली में आयोजित जयप्रकाश नारायण की विशाल सभा में मौजूद केसी त्यागी भी सत्याग्रही के रूप में जेल गए। इससे पहले उन्होंने प्रतिशोध पत्र के माध्यम से भूमिगत रहकर कार्य किया।

बचपन से उस दौर की कहानियां सुनता आया हूं। कुछ किस्से उसमें ऐसे जुड़ते चले गए जो आतंक के अहसास को कम करने का काम करते हैं और कड़वी यादों के बोझ को हल्का करने की कोशिश करते हैं।

जैसे गिरफ्तारी वाले उस दिन की यादें। गाजियाबाद के प्रथम मेयर रहे दिनेश चंद्र गर्ग को पुलिस पापा के साथ पकड़ कर कोतवाली में ले आई। शहर कोतवाल ने दोनों को सामने बिठा कर कहा, देखिए अब हमारे पास हथकड़ियां कम हैं। आप दोनों को एक ही हथकड़ी लगा दूं?

दोनों ने हंसकर कहा, अरे हम कहां भाग कर जाने वाले हैं। आखिरकार दोनों के एक-एक हाथ को मिलाकर एक ही हथकड़ी से काम चला लिया गया।

पत्रकार तेलूराम कांबोज की गिरफ्तारी तो लंबे समय तक हास्य का विषय बनी रही। उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस अधिकारी उनके निवास स्थान पर पहुंचे तो वह बिना चश्मा पहने बनियानधारी कांबोज जी को पहचान ही ना सके। पिलखुवा के बाबा चयन सुखदास के पीछे भी पुलिस हाथ धोकर पड़ी थी।

 वो रेलवे स्टेशन गए तो पीछे-पीछे पुलिस भी पहुंच गई। भाग कर वे स्टेशन मास्टर के कक्ष में पहुंचे और उनकी टोपी पहनकर ड्यूटी निभाने लगे। इस तरह पुलिस धोखा खा गई।

आपातकाल आज 45 साल पुराना हो गया। ढेरों बहस सुनी और पढ़ीं। लेकिन लगता है कि लोकतंत्र को लेकर इस देश की सबसे बड़ी बहस भी अब 'मोदी बनाम राहुल' में सिमट कर रह गई है। सोच और बहस का दायरा ना बढ़ा तो समस्याएं कब विकराल होकर आपातकाल में बदल जाएंगी, पता भी नहीं चलेगा।

नोट-किस्से कहानियां पुरानी हैं लेकिन तस्वीर आज की है। कोरोना के चलते कोई समारोह आयोजित नहीं हो सकता, लिहाजा शहर के कुछ लोग घर पर ही मिलने चले आए। आभार।

#Emergency

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