बुधवार, 6 मई 2020

चुनांचे / रवि अरोड़ा की नजर में



ये धरती, ये नदिया, ये रैना और हम

रवि अरोड़ा

परसों तड़के आसमान में ग़ज़ब नज़ारा था । दक्षिणी पूर्व दिशा में हमारे सौर मंडल के तीन प्रमुख ग्रह वृहस्पति, शनि और मंगल एक ही सीध में घर की छत से दिखाई दे रहे थे और वह भी नंगी आँखों से । उससे कुछ घंटा पहले तक आसमान में शुक्र ग्रह भी एसे चमक रहा था जैसे उसने चाँद की रौशनी से प्रतियोगिता करने का ही मन बना लिया हो । याद नहीं पड़ता कि होश सम्भालने के बाद कभी एसा नजारा आकाश में देखा था । बच्चों को भी ले देकर हम केवल सप्तऋषि तारामंडल की ही पहचान धुँधले आकाश में अब तक करवा सके । कुछ नया और अद्भुत होता भी कैसे , इतना साफ़ और नीला आसमान पहले कभी होता भी कहाँ था । बेशक कोरोना वायरस ने देश-दुनिया में भूचाल सा ला दिया है मगर कहते हैं न कि हर शय के दो पहलू होते हैं । इस महामारी का भी दूसरा पहलू है जो हर किसी को लुभा रहा है । इनदिनो प्रकृति के सौंदर्य के वह दर्शन हो रहे हैं जिन्हें हम लगभग भूल ही चुके थे । बेशक अब लॉकडाउन में रियायत मिलने की हमारी इच्छा पूरी हो रही है और हम अपनी पुरानी दुनिया में लौटने की तैयारी भी कर रहे हैं मगर काश एसा हो कि हम अपनी तमाम गतिविधियों में कहीं प्रकृति के इस रूप को भी हमेशा के लिए संजो कर रख सकें ।

पिछले एक माह से अख़बारों व टीवी चैनल्स पर कोरोना के आतंक की ख़बरें छाई हुई हैं । हालाँकि छुटपुट ख़बरें प्रकृति में आये बदलाव से सम्बंधित भी होती हैं मगर उन पर विस्तार से चर्चा नहीं हो पाती। समाचार जगत से जुड़े लोग शायद इस बात से डरते हैं कि प्रकृति की बात की तो लोग बाग़ चढ़ दौड़ेंगे कि इतने लोग मर रहे हैं तथा चहुँओर तबाही मची है और तुम्हें साफ़ हवा-पानी की पड़ी है । बेशक समाचार जगत का यह भय बेमानी नहीं है मगर फिर भी इस अभूतपूर्व स्थिति पर भी बात तो होनी ही चाहिये । ले देकर सोशल मीडिया ही है जिस पर इस तरह के समाचार दिन भर आते रहते हैं मगर अविश्वसनीयता के चलते इन ख़बरों को कोई गम्भीरता से नहीं लेता। फ़ोटोशॉप के ज़माने में एसी तस्वीरों पर आसानी से कोई विश्वास भी कैसे करे कि पहाड़ों से सैकड़ों किलोमीटर दूर काशीपुर व रुड़की जैसी जगहों से भी आजकल बर्फ़ से लदी हिमालय की चोटियाँ नज़र आ रही हैं । जंगलों से बहुत दूर की सड़कों पर भी जंगली जानवर भ्रमण कर रहे हैं अथवा हरिद्वार व ऋषिकेश में गंगा इतनी साफ़ हो गई है कि नदी की तलहटी तक दिख रही है । अपने घर के आँगन में जब कोई मोर अथवा अनदेखी सी चिड़िया की आमद की तस्वीरें शेयर करता है तब भी यही लगता कि सामने वाला झूठ बोल रहा होगा। बेशक साफ़ सुथरी हवा और सड़क किनारे के धूल रहित फूल देख कर हम सबका मन प्रसन्न हो जाता है मगर फिर भी ध्यान इस ओर पूरी तरह नहीं जाता कि इस बार मई के महीने में भी हवा इतनी शीतल कैसे है ?

प्रकृति में आये बदलाव से सरकारी तंत्र और उद्योग जगत की साँठगाँठ से भी पर्दा उठा है । अब तक कहा जाता था कि नदियाँ प्रदूषित करने में उद्योगों की भूमिका 10 से 18 फ़ीसदी ही है और 70 परसेंट नदियाँ घरों से निकलने वाले कचरे से प्रदूषित होती हैं । हाल ही की सरकारी रिपोर्ट्स बता रही हैं कि गंगा और यमुना जैसी नदियाँ लॉकडाउन के बाद अब 40 से लेकर 50 परसेंट तक साफ़ हो गई हैं । ज़ाहिर है कि लॉकडाउन में केवल उद्योग बंद हुए हैं घर नहीं । साफ़ दिख रहा कि उद्योगों के वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट केवल काग़ज़ों में चल रहे हैं और उद्योगों का पाप भी आम लोगों के मत्थे मढ़ा जा रहा है । दुआ कीजिये कि कोरोना का आतंक जल्द ही ख़त्म हो मगर क्या ही अच्छा हो कि यदि हम तोहफ़े में मिली प्रकृति की यह निर्मलता भी बरक़रार रख सकें । देखिये इस कोरोना से इतना तो तय हो ही गया है कि हमारी दुनिया का काम उन तमाम उठापटक के बिना भी चल सकता है जिन्हें अब तक हम बेहद ज़रूरी समझते थे ।

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