शनिवार, 2 मई 2020

कभी नहीं सोचा था




*कभी सोचा नहीं था,*
*ऐसे भी दिन आएँगें।

*छुट्टियाँ तो होंगी पर,*
*मना नहीं पाएँगे ।*

*आइसक्रीम का मौसम होगा,*
*पर खा नहीं पाएँगे ।

*रास्ते खुले होंगे पर,*
*कहीं जा नहीं पाएँगे।*

*जो दूर रह गए उन्हें,*
*बुला भी नहीं पाएँगे।*

*और जो पास हैं उनसे,*
*हाथ मिला नहीं पाएँगे।*

*जो घर लौटने की राह देखते थे,*
*वो घर में ही बंद हो जाएँगे।*

*जिनके साथ वक़्त बिताने को*
*तरसते थे,उनसे ऊब जाएँगें।*

*क्या है तारीख़ कौन सा*
*वार,ये भी भूल जाएँगे।*

*कैलेंडर हो जाएँगें बेमानी,*
*बस यूँ ही दिन-रात बिताएँगे।*

*साफ़ हो जाएगी हवा पर,*
*चैन की साँस न ले पाएँगे।*
*नहीं दिखेगी कोई मुस्कराहट,*
*चेहरे मास्क से ढक जाएँगें।*

*ख़ुद को समझते थे बादशाह,*
*वो मदद को हाथ फैलाएँगे।*

*क्या सोचा था कभी,*
*ऐसे दिन भी आएंगे।।*
[02/05, 13:10] anami sharan: प्रस्तुति - अनुपमा

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