सोमवार, 4 मई 2020

सीमा मधुरिमा की तीन रचनाएं




लघुकथा

शीर्षक ...मंदिर का प्रसाद

आज  नेहा भी अपनी सासू माँ के साथ मंदिर गयी ... उसकी सासू माँ ने हमेशा की ही तरह एक छोटे बच्चे से प्रसाद और फूल लेकर मंदिर की सीढियाँ चढ़ना शुरू किया और रास्ते में आने वाले हर बच्चे को थोड़ी दूरी से ही राम राम कहते हुए हटाते बढ़ी ...और मंदिर में पूजा याचना करने के उपरांत उस बच्चे का हिसाब करने लगीं जिससे फूल और प्रसाद लिया था तभी एक थोड़ी दूर स्थित मस्जिद से अजान की अवाज़ सुनाई दी और दो तीन बच्चे एक साथ ही उठ खड़े हुए और उस बच्चे को भी बुलाने लगे , " चलो रहमान जल्दी से नमाज़ अदा कर आएं , " नेहा की सासू माँ का मुँह देखने वाला था |
    आज सासू माँ जान पायीं कि वो भोला सा बच्चा जिससे अमूमन रोज ही प्रसाद और फूल खरीदती थीं और ढेरों आशीर्वाद देती थीं असल में वो एक मुसलमान था .....नेहा सारा माज़रा समझ गयी और बोली  , माँ आपसे कहती हूँ न ये धर्मों के अलग अलग रास्ते केवल और केवल इंसान को सच्चाई और प्रेम की राह पर चलने के लिए बने ....अब आप ही देखिये आप अपना फूल और प्रसाद एक मुसलमान  रहमान के हाथों खरीदती थीं और जब आप किसी दरगाह में जायेंगी तो शायद वहां भी चढ़ाने वाली चादर किसी हिन्दू की आजीविका का साधन हो .....नेहा अपनी धुन में बोले जा थी थी और सासू माँ सोच में निमग्न .....मेरा प्रसाद और फूल तो रहमान की तरफ से ही चढ़ रहा था .....मैं तो अक्सर ही पैसे प्रसाद चढ़ाने के बाद ही देती हूँ ....यानि जब तक मैं पैसे का भुगतान नहीं कर देती तब तक ......ओह्ह्ह्हह ईश्वर तू भी कैसी लीला करता है .....हम इंसान छुवा छूत और जाने कितनी बुराईयाँ पाले रहते हैं .....घर पहुंचते ही सासू माँ ने जमीन पर बैठे नौकर को एक कुर्सी देते हुए बोलीं  ," इसपर बैठो , जमीन पर ठंड लग जायेगी , " |||
सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ !!"


लघुकथा


संवेदना ...

मानसी बहुत परेशान थी  , उसे समझ नहीं आ रहा था क्या करे ...चालीस दीन हो गए थे उसके पार्लर को बंद हुए ...और उसके यहाँ काम करने वाली लड़कियों की सैलरी भी देनी पड़ी इस बीच ...अब आगे कैसे और क्या हो जो उसके घर का खर्च चल सके उसे समझ नहीं आ रहा था ....उसके पति जो मुम्बई मेँ थे उन्हें अपनी फैक्ट्री से वेतन नहीं दिया गया था ....उनके साहब ने साफ कह दिया था की ज़ब उनकी खुद की आमदनी बंद हैँ तो वो कहाँ से वेतन दे पाएंगे ...जो थोड़े बहुत पैसे बचत के थे उससे अब तक का काम चला ....इधर तीन दिनों से उसके घर मेँ दाल नहीं बनी ..वो तो किसी तरह पेट भर लेती लेकिन उसके दोनों बच्चे रुखा सूखा न खा पाते ....वो इन्ही उधेड़ बुन मेँ थी की दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी ....उसने सोचा लॉकडाउन मेँ कौन होगा ..दरवाजा खोला तो सामने उसके पार्लर मेँ काम करने वाली रेनू थी उसके हाथ मेँ कुछ पैकेट थे जिन्हें पकड़ाया और जाने को हुयी तो मानसी से नहीं रहा गया पूछ ही बैठी  , " रेनू क्या हैँ पैकेट मेँ  ,"
रेनू  , " कुछ नहीं दी ....थोड़ा सा अनाज और कुछ सब्जिया हैं  ,"
मानसी , " पर रेनू ...तुम्हें किसने बताया मुझे इसकी जरूरत थी ,"
रेनू  , " बस दी यूँ समझिये ....आप हम सबके हर मुसीबत मेँ ख़डी रहती हैं ....मुझे पता हैं आपको इन सबकी जरूरत है ...आज मुन्ने से सुबह बात हुयी थी ...बोला तीन दिनों से ढंग से खाना नहीं खाया  ,"
मानसी  ," मगर रेनू ....तुमको भी तो वेतन नहीं दे पा रही तो ये सब ,"
रेनू , " दीदी ...आप वेतन नहीं दे रहीं लेकिन हम लोगों की कॉलोनी मेँ सरकारी मदद पहुंच जा रही ...समय समय पर लोग भोजन भी लाते है बन बनाया ...और कई ऐन  जी ओ वाले पैकेट दे गए जिनमे आटा चावल दाल सब्जिया और एक लीटर  तेल भी था .....मुझे पता था आप की तरफ वो लोग नहीं आएंगे ...जबकि इधर भी कई ऐसे परिवार होंगे जिन्हें उनकी जरूरत है पर वो लोग जो जीवन मेँ कभी किसी से कुछ न लिए हों किस मुँह से गुहार लगाएंगे  ......
आप परेशान मत हो दीदी .. आप हमसे बोलियेगा कोई भी जरूरत हो ....और हाँ दी ....हमारा खाता भी ज़ब धन वाला था तो उसमे भी कुछ पैसे आ गए हैं ....इस मुसीबत की घड़ी मेँ दी क्या आपके इस छोटे से काम भी नहीं आ सकती मै ,"
आगे  आँखों मेँ आंसू पोछते हुए बोली ...," दी मै चलती हूँ , "
मानसी अचरज से कभी रेनू के दिए पैकेट को जो वहीं मेज पर रखा था कभी रेनू को जाते हुए देखती रह गयी !""

सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ !!!





एक वर्ष पूर्व का व्यंग्य
एक व्यंग्य. .... . ....

पुरुष सशक्तिकरण का दौर ( वर्ष 2150 )

समय चल रहा है 2150 का ! समाज में बहुत कुछ बदलाव आ चुका है ! महिलाएं सशक्त नहीं बल्कि सुपर सशक्त हो चुकी हैं ! पर अमीरी ग़रीबी अभी भी हजारों वर्ष की तरह समाज में जैसी की तैसी है ! अमीर महिलाएं गरीब महिलाओं का अपने हिसाब से शोषण करती रहती हैं ! विवाह संस्था पर से बिस्वास लगभग उठ ही चुका हैं ! अमीर महिलाये गरीब महिलाओं को हायर करके सरोगेट मदर औऱ कृत्रिम गर्भाधान माध्यम से मायें बन रही हैं ! बच्चों को माँ का ही दूध मिले इसके लिए सुबह से शाम तक कई माओं को वेतन पर रखा जाता हैं जो समय समय पर आकर बच्चे को अपना दूध पिलाती रहती हैं ! दूध पिलाने वाली माँ की गैर हाजिरी में बाजार में मदर मिल्क का ऑप्शन भी हैं ,  लगभग हर चौराहे पर एक मदर मिल्क बैंक खुले हैं जो मात्र एक फोन कॉल पर पांच से सात मिनट में मिल्क लेकर हाजिर हो जाते हैं !
नारी सशक्त जैसी परिकल्पना सपने जैसी लगती हैं ,  अब नारी सुपर सशक्त हो चुकी हैं ! पुरुषों की दशा दिन पर दिन दयनीय होती जा रही हैं ! घरों में बेटों की पैदाइश पर अब मिठाईयां नहीं बंटती  औऱ न ही बेटों की पैदाइश गर्व का विषय हैं  ! कभी पुत्र घर का औऱ परिवार का चिराग हुआ करता था ऐसी बाते किस्से कहानी की तरह ही लगती ! लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की पैदाइश पर खुशियां मनाई जाती हैं ! लड़कों का समाज में रहना तक दूभर हो रहा हैं ! सीधे सादे लड़कों का सडक पर चलना दूभर हो रहा हैं  उनको लड़कियां आसानी से अपनी चंगुल में फंसा लेती हैं औऱ उनके भावनाओं से खेलकर किसी न किसी केस में फंसा कर उनका जीना दूभर कर देती हैं ! जगह जगह पर पुरुषों की सहायता के लिए सेवाश्रम खुले हुए हैं ,  पर वो भी पुरुषों को किसी भी प्रकार का राहत देने में नाकाम हैं !
   प्रत्येक अस्पताल में जगह जगह पर लड़का भ्रूण का परीक्षण कर समाप्त किया जा रहा हैं जबकि सरकार ने सख्त कानून बना रखा हैं औऱ हर जगह पर ऐसे लोगों को जो इन कामों में लिप्त हैं दण्डित करने की व्यवस्था हैं.. पर इस मुहीम का किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता ! हर अस्पताल में लोग मोटी फीस लेकर कोई भी गैर कानूनी काम करने को तैयार रहते हैं ! डॉक्टर से लेकर नर्स तक सभी महिला ही हैं औऱ पुरुषों के प्रति एक अजीब सा बैर दीखता हैं सबके दिलों में !
    जगह जगह गली कूचों में चौराहों पर अक्सर ही लड़का भ्रूण कचरों में पाया जा रहा हैं ! ज़ब भी कोई नया मामला सामने आता हैं खूब हो हल्ला मचता हैं पर जल्द ही सब भूल जाते हैं !माता पिता में एक अजीब सा डर व्याप्त हो गया हैं ! लड़कों को पैदा करने के बाद पालना भी मुश्किल ही हो गया है ! लड़कों का राह चलना मुश्किल हैं ! जगह जगह पर लड़कियां लड़कों को छेड़ने लगती हैं आगे बढ़कर हाथ तक पकड़ लेती हैं ! आजकल विवाह का अर्थ ही बदल चुका हैं ,  विवाह जन्मों जन्मों का बंधन न होकर ज़ब तक सुख से कट सके का बंधन हो गया हैं औऱ आज वो विवाहित जोड़ी ज्यादा सुखी समझी जाती हैं जिनके कोई औलाद नहीं हैं ! लड़किया अपना जीवन साथी लड़कियों को ही बनाना पसंद कर रही हैं औऱ ज्यादातर लडके भी यही कर रहे हैं  ! बांझपन आज शर्म का विषय न होकर पुरस्कृत होने का विषय हैं  !
   2150 का दौर हैं महिलाये शराब ,  सिगरेट ,  जुए ,  सभी में लिप्त हैं  !  पुरुषों के लिए ये सब वर्जित ही हैं  ! छुप छुपा कर कभी मिल जाय तो उनकी किस्मत जिसे वो चोरी चोरी ही घर की चारदीवारी के भीतर ही प्रयोग करते हैं !  पुरुषों का खुलेआम नशा करना शर्म की बात मानी जाती हैं !
  घर के मामले स्त्रियां ही निबटाती हैं ,  इसमें पुरुष की कोई राय नहीं ली जाती ,  उनको सीधे फैसला सुनाया जाता हैं  न ही पुरुषों को ज्यादा पढ़ाया जाता हैं ! लड़कियों की जिम्मेदारी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं  ! हर निर्णय औऱ फैसले स्त्रियां ही ले रहीं !
  2150 का राजनितिक परिदृश्य भी पूरी तरह से स्त्रीकरण हो चुका हैं ! महिला ही देश प्रमुख हैं औऱ पुरुष 30% का आरक्षण की मुहीम चला रहे हैं ! हालांकि पुरुषों की प्रतिशतता भी बहुत कम ही हैं !
पुरुषों की दयनीय स्थिति के लिए कई विभाग खोले जा चुके हैं पर सच्चाई से कोई विभाग काम नहीं कर रहा इसलिए उनकी स्थिति में कोई सुधार भी नहीं हो रहा ! डर तो इतना  बढ़ गया हैं कि  लगता हैं ये प्रजाति ही लुप्त हो जायेगी !
" पिंकू अरे ओ  पिंकू ,  घोड़ा बेचकर सो रहा पिछले चार घंटों से दिन में भी कोई इतना सोता हैं क्या  , "  पिंकू कि मम्मी चिल्लाई औऱ पिंकू पसीने में लथपथ उठ बैठा... औऱ हैरान होकर माँ को देखने लगा... अचानक उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान उभर आयी ,  औऱ धीरे से बुदबुदाया ,  शुक्र है ये सपना था  उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ !!!!!

सीमा "मधुरिमा"
लखनऊ !!!!

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