शुक्रवार, 27 मार्च 2020

सावधान सजग सतर्क और एकांतवास




प्रस्तुति - डा.  सुधीर तोमर


पुरानी कहावत है "Rome was not built in a day",
पर अब नयी आ गयी है  'But it collapsed in a week", ...

तो भैया कर ली तरक्की!! जीत लिए देश!! कर ली औध्योगिक क्रांति!! कमा लिए पेट्रो डॉलर!! बना लिए मॉल्टी नेशनल कारपोरेशन!! कर लिया जिहाद!! बन गए सुपर पावर या अब भी कुछ बाकीं है ?

एक सूक्षम से परजीवी ने आपको घुटनों पर ला दिया ? न एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनारी ? आपका सारा विकास एक छोटे से जीवाणु से सामना नहीं कर पा रहा ?? क्या हुआ?? निकल गयी हेकड़ी ?? बस इतना ही कमाया था इतने वर्षों में कि एक छोटे से जीव ने घरों में कैद कर दिया ???

मध्य युग में पूरे यूरोप पर राज करने वाला रोम ( इटली ) नष्ट होने के कगार पर आ गया , मध्य पूर्व को अपने कदमों से रौंदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य ( ईरान , टर्की ) अब घुटनों पर हैं , जिनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था , उस ब्रिटिश साम्राज्य के वारिश बर्मिंघम पैलेस में कैद हैं , जो स्वयं को आधुनिक युग की सबसे बड़ी शक्ति समझते थे , उस रूस के बॉर्डर सील हैं , जिनके एक इशारे पर दुनिया के नक़्शे बदल जाते हैं , जो पूरी दुनिया के अघोषित चौधरी हैं , उस अमेरिका में लॉक डाउन हैं और जो आने वाले समय में सबको निगल जाना चाहते थे , वो चीन , आज मुँह छिपाता फिर रहा है और सबकी गालियां खा रहा है।

और ये सब आशा भरी नज़रों से देख रहे हैं हमारे सबसे पुराने सनातनी नायक की तरफ , उस भारत की ओर जिसका सदियों अपमान करते रहे , रौंदते रहे , लूटते रहे

और ये सब किया है एक  छोटे से जीव ने जो दिखाई भी नहीं देता, मतलब ये कि एक मामूली से जीव ने आपको आपकी औकात बता दी।
वैसे बता दूँ , ये कोरोना अंत नहीं, आरम्भ है , एक नए युद्ध की , एक ऐसा युद्ध जिसमें आपके हारने की सम्भावना पूरी है।

जैसे जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगा , ग्लेशियरो के बर्फ पिघलेंगे और आज़ाद होंगे लाखों वर्षों से बर्फ की चादर में कैद दानवीय विषाणु जिनका न आपको परिचय है और न लड़ने की कोई तैयारी!! ये कोरोना तो झांकी है , चेतावनी है , उस आने वाली विपदा की , जिसे आपने जन्म दिया है।

मेनचेस्टर की औध्योगिक क्रांति और हारवर्ड की इकोनॉमिक्स संसार को अंत के मुहाने पे ले आयी ।।।बधाई ।

और जानते हैं, इस आपदा से लड़ने का तरीका कहाँ छुपा है ??

तक्षशिला के खंडहरो में , नालंदा की राख में , शारदा पीठ के अवशेषों में , मार्तण्डय के पत्थरों में ।।

 सूक्षम एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है। ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है और सदैव चलता रहेगा। इससे लड़ने के लिए के लिए हमने हर हथियार खोज भी लिया था , मगर आपके अहंकार, आपके लालच , स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठ धर्मिता ने सब नष्ट कर दिया ।

क्या चाहिए था आपको???? स्वर्ण एवं रत्नो के भंडार ?
यूँ ही मांग लेते। राजा बलि के वंशज और कर्ण के अनुयायी आपको यूँ ही दान में दे देते ।
सांसारिक वैभव को त्यागकर आंतरिक शांति की खोज करने वाले समाज के लिए वे सब यूँ भी मूल्यहीन हीं थे , ले जाते ।

मगर आपने ये क्या किया?? विश्व वंधुत्वा की बात करने वाले समाज को नष्ट कर दिया ?
जिसका मन आया वही अश्वों पर सवार होकर चला आया , रौंदने, लूटने , मारने , जीव में शिव को देखने वाले समाज को नष्ट करने।

कोई विश्व विजेता बनने के लिए तक्षशिला को तोड़ कर चला गया, कोई सोने की चमक में अँधा होकर सोमनाथ लूट कर ले गया , तो कोई किसी आसमानी किताब को ऊँचा दिखाने के लिए नालंदा की किताबों को जला गया , किसी ने उन्माद को जिताने के लिए शारदा पीठ टुकड़े टुकड़े कर दिया , तो किसी ने अपने झंडे को ऊंचा दिखाने के लिए विश्व कल्याण का केंद्र बने गुरुकुल परंपरा को ही नष्ट कर दिया ।

और आज करुण निगाहों से देख रहे हैं उसी पराजित, अपमानित , पद दलित , भारत भूमि की ओर , जिसने अभी अभी अपने घावों को भरके अंगड़ाई लेना आरम्भ किया है ।

किन्तु , हम फिर भी निराश नहीं करेंगे , फिर से माँ भारती का आँचल आपको इस संकट की घड़ी में छाँव देगा , श्रीराम के वंशज इस दानव से भी लड़ लेंगे , ऋषि दधीचि के पुत्र अपने शरीर का अस्थि मज्जा देकर भी आपको बचाएंगे ।

किन्तु...

किन्तु, मार्ग उन्हीं नष्ट हुए हवन कुंडो से निकलेगा , जिन्हें कभी आपने अपने पैरों की ठोकर से तोड़ा था ।
आपको उसी नीम और पीपल की छाँव में आना होगा , जिसके लिए आपने हमारा उपहास किया था ।
आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा , जिसे आपने अपने स्वाद का कारण बना लिया ।
उन्ही मंदिरो में जाके घंटा नाद करना होगा जिनको कभी आपने तोड़ा था,
उन्ही वेदों को पढ़ना होगा , जिन्हें कभी अट्टहास करते हुए नष्ट किया था,
उसी चन्दन तुलसी को मष्तक पर धारण करना होगा , जिसके लिए कभी हमारे मष्तक धड़ से अलग किये गए थे ।

ये प्रकृति का न्याय है और आपको स्वीकारना होगा।

फिर कहता हूँ इस दुनिया को अगर जीना है , तो सोमनाथ में सर झुकाने आना ही होगा , तक्षशिला के खंडहरों से माफ़ी मांगनी ही होगी , नालंदा की ख़ाक छाननी ही होगी ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामया ,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मां कश्चिद् दुःख भाग भवेत् ...🙏🙏🙏🕉🕉🕉

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