बुधवार, 25 जनवरी 2017

जनता के संपादक बलबीर दत्त / अनामी शरण बबल








अनामी शरण बबल




राजनीति के जंगल में आजकल ज्यादातर पुरस्कार और सरकारी सम्मान पांव पैसा पहुंच पौव्वा और जुगाड़ के चलते ही हासिल किया जाता है। पुरस्कार देने का जमाना और मान सम्मान अब कहां? मगर दिल्ली की चकाचौंध से 1500 किलोमीटर दूर रांची के अपर बाजार के एक साधारण से दफ्तर में बैठकर क्षेत्रीय पत्रकारिता के  मान ज्ञान सम्मान केऔर जनहितों के लिए संघर्ष का जो सत्ता विरोधी चेहरा समाज के सामने रखा, वह वंदनीय है। इन्होने रांची से प्रकाशित इस अखबार को जो प्रतिष्ठा दिलाई है इसके लिए इनको और इनकी साधनहीन पूरी टीम की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। ये इस तरह की फौज के कमांडर थे जहां पर बहुत सारी सुविधाओं की चूक हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की मान और शान के लिए सब एकजुट हो जाते थे।
आमतौर पर किसी सम्मान या पुरस्कार को अर्जित करके लोग महान और सम्मानित से हो जाते हैं। मगर क्षेत्रीय पत्रकारिता के इस पुरोधा संपादक बलवीर दत से ज्यादा पद्मश्री  का सम्मान सम्मानित होकर गौरव का सूचक बना है।
पिछले साल मुझे भी कुछ माह रांची एक्सप्रेस से संपादक का ऑफर आया। यह एक पत्रकार के रूप में मेरे मित्र सुधांशु सुमन ने दिया था। एक टेलीविजन पत्रकार के रूप मं मैंइनको 20 साल से जानता रहा हूं। हालांकि उन्होने मुझे दिल्ली संस्कतरण में संपादक का ऑफर दिया था।  रांची एक्सप्रेस और बलबीर दत के नाम का इतना तेज मेरे मन में था कि दिल्ली में रहते हुए 27 साल हो जाने के बाद भी मैने खुद रांची में पांच छह माह तक रहने की इच्छा जाहिर की। दो तीन किस्तों में दिल्ली रांची आते जाते करीब ढाई तीन माह तक मैं रांची में रहा।

नयी सत्ता नयी व्यवस्था और नए हालात में देखा जाए तो जिन सपनों और बदलाव की योजनाओं और इच्छाओं के साथ गया था,उसमें कुछ खास नहीं हो पाया। इस बीच पहाड़ी इलाके की कंपकंपी वाली ठंड को देखते हुए मैने दो तीन माह तक दिल्ली लौटने की इच्छा जाहिर की और तमाम कठिनाईयों दिक्कतों के बाद भी मेरे तमाम नखड़़ो को  प्रबंधन ने सिर माथे लिया और मुझे दिल्ली जाने का टिकट थमा दिया। हमलोग में कोई शिकायत नहीं है क्योंकि यह अखबार तो इनके पास अभी सामने आया है, मगर हमारा नाता इनसे 20 साल से एक पत्रकार वाला सबसे प्रमुख रहा था।

 रांची पहुंचते ही जब मैं अपने एक प्रिय सहकर्मी  नवनीत नंदन के साथ जब बलवीर जी के घर पर पहुंचा तो अवाक रह गया। उनके स्टड़ी रूम में चारों तरफ हजारों किताबों का अंबार लगा था। स्टडी कमरे में चारो तरफ किताबें ठूंसी पड़ी थी। सैकड़ों फाईलों और हजारों कतरनों को देखकर तो मैं दंग रह गया। मैने उनके पांव छूए और उस अखबाक की कमान थामने से पहले आशीष मांगा । मैने कहा कि सर आपके अनुभव लेखन और संपादकीय दक्षता के सामने तो मैं कहीं पासंग भर भी नहीं हूं। मगर यह मेरा सौभाग्य भरा संयोग है कि मैं भी उसी रांची एक्सप्रेस का चालक बन रहा हूं जिसको आपने बुलेट ट्रेन बना रखा था।

 पूरे झारखंड में बलबीर दत को बच्चा बच्चा (जो अखबार पढने वाला हो) जानता है। यह अखबार पूरे शहर समेत झारखंड का अपन अखबार सा है। हालांकि जमाने की चमक दमक और बाजारी मारामारी वाले इस राज्य के बलवीर दत्त यहां के  इकलौते संपादक हैं जिनको उपराज्यपाल से लेकर रांची शहर का एक एक रिक्शा वाला भी जानता और अपना मानता है। पत्रकारिता में ये यहां के इकलौते सोशल संपादक का सर्वमान्य चेहरा की तरह स्थापित है। संपादक का मुखौटा लगाकर तो मैं या मेरे जैसे ही दर्जनों लोग रांची में सक्रिय हैं, मगर किसी की भी धमक जनता में नहीं बनी है। और मैं तो अपर बाजार से फिरायालाल चौक के बीच रास्ते में ही सही राह की खोज में भटकता रह गया।  

इस समय रांची से दर्जन भर अखबार निकल रहे हैं मगर रविवार वाले हरिवंश जी के प्रभात खबर से अलग होने के बाद किस पेपर का संपादक कौन है यह सब मुझ समेत ज्यादतरसपादकभी संभवत नहीं जानते होंगे। मैं भी ढाई माह में यह नहीं जान पाया कि तमाम अखबारों के संपादक कौन है। या यों कहे कि पाठकों की नजर में मेरी तरह ही सब अनाम हैं ।

रांची एक्सप्रेस में बलवीर दत्त जी के साथ काम करने वाले आ. उदय वर्मा जी ने भी  इनकी वीरता धीरता और जनता के लिए अंगद की तरह अडिग हो जाने की दर्जनों किस्से कहानियोंको सामने रखा। रांची एक्सप्रेस में मेरी एक संक्षिप्त पारी रही। इसके बावजूद मुझे इस बात का हमेशा गौरवबोध रहेगा कि मैने भी उनको देखा और स्नेह प्यार का पात्र बना ।

एक पाठक के रूप में इनकी सजगता देखकर मैं दंग रह गया। यह इस तरह के दीर्घजीवी  संपादक हैं जो अपने रिपोर्टरों को अपनी संपति और अनमोल निधि की तरह सहेजते और संवारते थे। पीछे खड़ा होकर बिना कुछ कहें अपने सहकर्मियों को निखारते थे। इन पर मैं यही कहूंगा कि ये एक अनमोल संपादक पत्रकार हैं जो अपने साथ साथ एक पूरी पीढी को भी संवारते हुए सुरक्षित रखते थे। किसी भी पत्रकार की कोई रपट लेख या कॉलम के छपने पर  सुबह सुबह ये खुद फोन करके वाहवाही दे उसे और बेहतर करने का सुझाव देते। मुझे भी यह सुख कई बार मिला। इतना उदार और बड़े दिल का संपादक भला और कहां मिलेगा ?

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