सोमवार, 26 दिसंबर 2016

मीडिया का भविष्य (vs) भविष्य का मीडिया







अनामी शरण बबल

(लेख कोई 8 माह पुराना है पर हालात एक से हैं। लिहाजा अब हाजिर है )

कल दिवंगत पत्रकार आलोक तोमर की चौथी पुण्यतिथि में शामिल होने का मौका मिला । आलोक तोमर औरअखिल अनूप दिल्ली के मेरे सब से पहले मित्र रहे है। यह एक संयोग है कि आलोक अब जमाने में नहींहैं तो अखिल अब दिल्ली छोड़ यूपी मे कहीं रहता है। वरिष्ठ पत्रकार आलोक को केवल पत्रकारकहना बेमानी है। जनसत्ता के उदय के साथ ही आलोक तोमर हिन्दी पत्रकारिता में एक स्टार की तरह उभरे और करीब 7-8 साल में बेहतरीन रिपोर्टिंग की। उनकी रपटे ही आज तक उनकी पहचान को और धारदार बनाती है। आलोक तोमर मेरा परिचय तब हुआ था जब मैं सही मायने में पत्रकार भी नहीं बन पाया था। जनसत्ता की खबरों का मेरे उपर अईसा जादू था कि में आलोक जी को पहला पोस्टकार्ड 1994 में डाला, जिसमें बगैर जाने ही भाभी को भी प्रणाम लिख डाला। मगर. लौटती डाक से ही उनका पत्र मिला, जिसमें यह कहकर भाभी को भेजा गया प्रणाम लौटा दिया कि अभी तेरी कोई भाभी नहीं है ।

यादों में आलोक के इस कार्यक्रम में संगोष्ठी का विषय था भविष्य की मीडिया की चुनौतियां.। हालांकि इसपर कोई जोरदार हंगामा सा तो नहीं बरपा। मगर मुझे लग रहा है किसी मीडिया के सामने तो कोई चुनौती है ही नहीं। चुनौती तो तब होती है, जब संघर्ष हो रस्सा कस्सी हो चुनौती से बचने के लिए दम लगाया जा रहा हो। मीडिया तो पहले ही बाजारू धनकुबेरों के सामने घुटने टेक दी है। बाजार और मनी पावर के सामने तो मीडिया ने अपना रंग रूप चेहरा मोहरा आकार प्रकार शक्ल चरित्र चाल चलन तक सब बदल सा लिया है। एड के सामने तो पेपर का पहला पेज कितना भीतर घुस गया है यह अब तलाशना पडता है।

कुछ दिन पहले ही हाथी निशान पर बाहरी दिल्ली से एकाएक एक लफंगा प्रोपर्टी डीलर डीडीए और जमीलोंका दलाल कुबेरपति चुनावी मैदान में उतरा। बसपा मुखिया मायावती द्वारा टिकट दिए जाने के बाद राजधानी की हर तरह की मीडिया पेपर टीवी वेबसाईट से लेकर लोकल चैनल तक के पत्रकार और एड मैनेजरों ने मानों बसपाई नेता के घर पर ही डेरा डालकर विज्ञापन के लिए चाकरी करने लगे। .भविष्य की मीडिया का कल क्या होगा यह मीडिया मालिकों और चाकर संपादकों पर निर्भर नहीं है।
सबकुछ मनी पावक धन दस्युओं की हैसियत और इच्छा पर संभव है कि वो मीडिया को रखैल की तरह रखे या सखा की तरह या औजार की तरह अपने हित में यूज करे।

24 घंटे तक चीखने चिल्लाने वाले भोंपू भोकाल चैनलों को देखकर तो अब शर्म आने लगी है। खबरिया चैनलों में खबक किधर है यह खोजी पत्रकारिता का एक शोधपत्र सा बन गया है। खबरिया चैनलों में तो अपना देश हंसता खेलता मुस्कुराता खुशहाल देश दिखता है। जब तक सौ पचास निर्बल निर्धन लोगों की मौत नहीं होती या आपदा न आ जाए तब तक तो वे इस इडियट बॉक्स के भीतर बतौर एक समाचार तक घुस नहीं पाते। . मीडिया के भविष्य या भविष्य की मीडिया पर चिंता करने का समय नहीं रह गया है। करोड़ों रूपए लगाकर कोई काला पीला धंधा करके अखबार निकालने वाला कुबेर में इतना कहां जिगरा होता है कि वो घाटे के साथ साथ अपने रिश्तों को भी खराब करे। पेपर या दिन रात बजने वाला भोंपू निकाल कर तो वह रातो रात अरबपति बनने या राज्यसभा में घुसने का सपना देखा जाने लगा है। संसदके पीछले दरवाजे से घुसने का यह चोर रास्ता जो बन सा गया है। अपन जेनरल नॉलेज जरा कमजोर है मगर इसी संसद मेंआधादर्जन से ज्यादा अखबार मालिक संपादक पत्रकार केवल चाकरी और चापलूसी के बूते ही सांसद बनर सत्ता सुख ले रहे हैं। , जिसमें अमूमन ज्यादातर कुबेर राज्यसभा में आ ही जाते है।

एक समय था कि अपने काले धंधे को सफेद बनाने के लिए माफिया बिल्डर जैसे लोग मीडिया को एक कवच की तरह अपनाते थे, मगर अब दौर बदल सा गया है अब तो तेजी से बढते हुए मीडिया के धंधे से होने वाली काली कमाई को गति और दिशा देने के लिए मीडिया मालिक बिल्डर प्रोपर्टी डीलर का धंधा बडे पैमाने परअपना कर अपने कारोबार के पॉव को फैला रहे है। मधैशी इलाके का सबसे तेजी से बढ़ता भागता या फैलता पेपर तोगुजराती यात्रा के बाद राजस्थान में जाते ही अखबारी नकाब के उपर बिल्डर प्रोपर्टी डीलर वाला जमीनी दलाल का चेहरा धारण कर लिया। मजे में सत्ता है सरकार है और अपना अखबार है ।

भविष्य की पत्रकारिता या मीडिया पर चिंता करके अपना रक्तचाप बढाना अब बेकार है, क्योंकि तमाम धंधेबाज मीडिया मालिक तो खुद को बाजार के सामने नतमस्तक हो गए है। यह साधारण बिषय नहीं है इस पर अभी बहुत काम होना बाकी है , मगर मैं भाजपा के शिखर नेता लाल कृष्ण आडवाणी की आपातकाल के समय मीडिया पर की गयी एक टिप्पणी के के साथ कलम को विराम दूंगा कि मीडिया की क्यों चिंता करते हो इसे अगर झुकने के लिए कहोगे तो यह नतमस्तक होकर रेंगने लगेगा।

शायद 41 साल पहले लालजी कि यह बात सुनकर ज्यादातर पत्रकार लाल हो गए होंगे मगर आज के माहौल को देखकर तो ज्यादातर पत्रकार मारे शर्म के पानी पानी हो जाएंगे,। क्योंकि पत्रकारों का कोई फ्यूचर नहीं रह गया है मगर एक धंध बनकर पत्रकारिता मीडिया पेपर या भोकाल टीवी का तो शानदार फ्यूचर दिख रहा हैै। बस बाजार और सत्ता के लिहाज से जो भला होगा वही पत्रकारिता होगी। जनता जाएभाड़ में , मगर पबिलक सब कुछ जानती है इसीविए पब्लिक की पसंद की कसौटी पर खरा रहने के लिए तमाम भोकाल मीडिया टीआरपी में फेल हो रहे हैं।
और यही है भविष्य की पत्रकारिता कि कई देशों की कई चैनलों की न्यूजएंकर खबरों की गरमी के साथ साथ अपने तन को उघाडती हुई अपने कपड़ों को फेकती हैं ताकि लोग खबर देखे या न देखे मगर एंकर की गोरांग तन बदन को देखने के लिए न्यूज की वैसाखी पर टिके रहे।

अपन भारत जरा आदर्शवादी देश है। नंगई पसंद इसको भी है मगर संकोच के साथ । एकदम बेशरमी का परदा भी खुल रहाहै, मगर शहरी आधुनिकता अभी उपर ही उपर है, लिहाजा इंडियन भोकालियों में इसे आने में जरासमय लगेगा , मगर यकीन मानिए कि वह दिन भी दूर नहीं कि एड गर्ल की तरह ही न्यूज गर्ल का भी इंडिया में इडियट अवतार होगा और होना ही है। मगर तब तक हम रहे ना रहे मगर यकीनन आंखे इतना पाप अब तक देख चुकी है कि तब मारे शरम कहे या बेशरमी की इंतहा कि तब आंखे भी तन का साथ नहीं देंगी। यही है फ्यूचरकी मीडिया जिसमें जेनरल पब्लिक से बेहतर है कि मैंगो मैन कहकर संबोधित करे क्योंकि मैन की हैसियत भले ही जीरो हो जाए या रह जाए मगर मैंगो की हैसियत उस समय हजारों में तो जरूर होगी या रहेगी।

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