शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

मल्टी एडिशन युग के खतरे / अनामी शरण बबल









  अनामी शरण बबल




पिछले कई सालों से खबरिया और मनोरंजन चैनलों के अलावा धार्मिक चैनलों और क्षेत्रीय या लोकल खबरिया चैनलों का बढ़ता जलवा फिलहाल थमता-सा दिख रहा है। हालांकि अगले छह महीने के दौरान कमसे कम एक दर्जन चैनलों की योजना प्रस्तावित है। इन खबरिया चैनलों की वजह से हिन्दी के अखबारों के मल्टी एडिशन का खुमार भी थोड़ा खामोश सा दिखने लगा था।

खासकर एक दूसरे से आगे निकलने के अंधी प्रतियोगिता में लगे दैनिक भास्कर, अमर उजाला और दैनिक जागरण का मल्टी एडिशन कंपिटीशन फिलहाल रूका हुआ है। अलबता, दैनिक हिन्दुस्तान का मल्टी एडिशन कल्चर इस समय परवान पर है। इस समय थोड़ा अनजाना नाम होने के बावजूद बीपीएन टाइम्स और स्वाभिमान टाइम्स का एक ही साथ दो तीन माह के भीतर एक दर्जन से भी ज्यादा शहरों से प्रकाशन की योजना हैरानी के बावजूद स्वागत योग्य है। इनकी  भारी-भारी भरकम योजना निःसंदेह पत्रकारों और प्रिंट मीडिया के लिए काफी सुखद है। उतर भारत के खासकर हरियाणा, पंजाब इलाके में पिछले दो साल के दौरान आज समाज ने भी आठ दस एडिशन चालू करके हिन्दी प्रिंट मीडिया को नया बल प्रदान किया है।

हिन्दी में मल्टी एडिशन का दौर 1980 के आस-पास शुरू हुआ था, जब नवभारत टाइम्स के मालिकों ने पटना, लखनऊ, जयपुर आदि कई राजधानी से एनबीटी को आरंभ करके प्रिंट मीडिया में मल्टी कल्चर शुरू किया। मात्र पांच साल के भीतर ही एनबीटी के मल्टी कल्चर का जादू पूरी तरह उतर गया और धूम-धड़ाके से चालू एनबीटी के खात्मे से पूरा हिन्दी वर्ग सालों तक आहत भी रहा। हालांकि दैनिक जागरण और अमर उजाला से पहले दैनिक आज के दर्जन भर संस्करणों का गरमागरम बाजार खासकर उतरप्रदेश और बिहार में काफी धमाल मचा रखा था। सही मायने में 1989 और 1992 के दौरान दैनिक जागरण के बाद राष्ट्रीय सहारा का राजधानी दिल्ली से प्रकाशन आरंभ हुआ, और आज दोनों के बगैर मुख्यधारा की पत्रकारिता अधूरी है। हालांकि इसी दौरान हंगामे के साथ कुबेर टाइम्स और जेवीजी टाइम्स का भी प्रकाशन तो हुआ, मगर देखते ही देखते ये कब काल कलवित हो गए, इसका ज्यादातरों को पता ही नहीं चला।

1990 के बाद हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णकाल का दौर शुरू हुआ, जब दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दिव्य हिमाचल, हरिभूमि,  राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, नवभारत आदि कई अखबार एक साथ अलग-अलग इलाकों से प्रकाशन आरंभ करके हिन्दी प्रिंट मीडिया को सबसे ताकतवर बनाया। खासकर बिना शोर हंगामा के मुख्यधारा में शामिल होने या रहने की ललक दिखआए बगैर ही लोकमत और प्रभात कबर ने तो मध्य भारत छोड़कर पूर्वी भारत मैं अपनी बादशाहत अर्जित कर ली। वेस्ट बंगाल तकमें घुसकर प्रभात खबर ने अपनी जड़े इतनी मजबूत कर ली है कि पेपर वार में शायद इसके सामने टिकना हिसी भी बड़े पेपर के लिए सरल नहीं होगा। अपनी गुणवत्ता और भारी भरकम रोचक ज्ञानप्रद सामग्री से लबरेज प्रभात खबर किसी भी पेपर की सुबह की चाय खराब कर सकती है।
प्रभातखबर का मुख्यधारा से अलग उदय एक सुखदसंकेत है, तो नागपुर से निकला लोकमत भी गैरहिन्दी भाषी क्षेत्र से होने के बाद भी हिन्दी के किसी भी बेहतरीन अखबार से किसी भी मामले में 19 नहीं है। लगभग यही हाल दैनिक भास्कर की है। गैरभाषी गुजरात में जाकर हंगामा करने वाले इस भास्कर की गूंज भले ही राजधानी दिव्वी में नहीं है, मगर राजस्थान में शोर बरपाने के बाद बिहार झारखंड में भी इनका सफर हिन्दी पत्रकारिता को ही बल दे रहा है।

नयी सदी में खबरिया चैनलों के तूफानी दौर के सामने  सब कुछ  फीका सा दिखले लगा था। रोजाना एक नये चैनल की शुरुआत, मगर आम दर्शकों की नजर से ओझल इन चैनलों का संस्पेंस आज भी एक पहेली है। नए चैनल को चालू करने से ज्यादा उसको घरों में लगे इडियट बाक्स तक पहुंचाना आज भी एक बड़ा गोरखधंधा है। इसके बावजूद अभी तक खबरिया चैनलों के ग्लैमर को कम नहीं किया जा सका है। अलबता, धन और पगार के मामले में इनका जादू पूरी तरह खत्म-सा हो गया है मगर, फाइव सी के बूते इन चैनलों के बुखार को जनता ने थाम लिया है। व्यस्क होने की बजाय 16-17 साल में भी खबरिया चैनलों के अंदाज में अनाड़ीपन ही है। फिलहाल  जनता की पंसद क्रोसीन दवा बनकर अब इन भोकाल टीवी के लिए खतरे की घंटी नबनती जा रही है।

ठंडा-सा पड़ा प्रिंट मीडिया पिछले साल से एकाएक परवान पर है। हालांकि अमर उजाला से अलग होकर अग्रवाल बंधुओं के एक भाई ने अपने पिता डोरीलाल अग्रवाल के नाम पर ही मिड डे न्यूज पेपर डीएलए के लगभग एक दर्जन संस्करण चालू करके धमाल तो मचाया, मगर साल के भीतर ही आधा दर्जन संस्करणों पर ताला लग गया। हिन्दी प्रिंट मीडिया के साथ बंद होने और फिर से चालू होने का यह लूडो गेम  लगा रहता है।मगर डीएलए को भूल जाए तो जनसंदेश समेत आधा दर्जन अखबार हिन्दी की शोभा है. पंजाब केसरी समूहद्वारा नवोदय टाईम्स को दिल्ली से लाना और धूम धड़ाके से जमा देना यह साबित करता है कि हिन्दी के पाठक अंग्रेजी की चमक दमक ते बाद भी व्यग्र है। यही हिन्दी की ताकत है कि 54 साल पुराने अखबार रांची एक्सप्रेस को पुर्नजीवित करने के लिए एक पत्रकार सुधांशु सुमन ने अपनी पुश्तैनी संपति को इसमें झोक दिया। केवल अपने पाठकों पर यकीन करके सुधांशु सुमन रांची एक्सप्रेस को फिर से प्रतिष्ठित करने मे लगे है। हिन्दी का यही बल है कि फैजाबाद के शीतला सिंह पिछले 50 साल से जनमोर्चा अखबार को ऑक्सीजन दे रहे है. लगभग इसी हाल में बिहार के औरंगाबाद से कमल किशोर पिछले 27 साल से नव बिहार टाईम्स को चला रहे हैं तो इसी शहर से उदय हुए सोन वर्षा टाईम्स दैनिक अखबार भी हिन्दी की गरिमा को जीवित करने में जुटा है। तो केवल झारखंड में ही पिछले पांच साल के दौरान कमसे कम एक दर्जन अखबार उदित हुए । पलामू में राष्ट्रीय नवीन मेल भी हिन्दी के पताके को लहराने में लगा है।

यह भी हैरान करता है कि भले ही अंग्रेजी अखबारों का चलन . व्यापार और प्रभाव के साथ प्रसार भी बढ़ रहा हो मगर पिछले एक दशक में यदि 30 नए हिन्दी अखबार पैदा हुए तो अंग्रेजी में एक दर्जन अखबार भी पाठकों को नहीं मिले । फिर यह मल्टी एडिशन की क्रांति तो केवल हिन्दी में ही है। जिसका जादू उतरने वाला नहीं दिख रहा. अलबता लोकल से भी लोकलाईज हो गए इन पेपरों के कारण राष्ट्रीय अखबार की परिभाषा ही बदल गयी। सारे पेपर एक शहर तक सिमट कर रह गए। खबरों का बाजार बढ़ गया मगर हिन्दी में खबरों का संसार सिकुड़ गया। यही हिन्दी की सबसे कमजोर कड़ी है जिस पर ध्यान दिए बगैर सबसे ज्यादा सबसे अधिक और सबसे आगे रहने के दावे के सामने हिन्दी खुद से ही पिछड़ रही है। अपना आत्म मंथन करना इसको गवारा नही यही हिन्दी की कमी है जिस पर गौर किए बिना ही हिन्दी का अंधा रेस जारी है।  

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