रविवार, 7 अगस्त 2016

देश की अधिकांश नदियों की एक कहानी


नागधम्मन नदी की आत्मकथा

मनीष वैद्य 
प्रस्तुति-  रीना शरण
. मैं आज बहुत उदास और दुखी हूँ। कभी अपनी किस्मत को कोसती हूँ तो कभी इस नए जमाने के लोगों को। पर क्या होता है इससे भी। कुछ भी तो नहीं बदलता कभी इससे। सौ साल पहले तक इस इलाके में मेरा बड़ा नाम हुआ करता था। दर्जनों गाँवों के लोग मेरे किनारे पानी पी-पीकर बड़े हुए हैं। हजारों एकड़ जमीन को मैंने सींचा है अपने पानी से। मैं बारिश के पानी को वापस बारिश आने तक पूरे साल सहेजकर अपने आंचल में सहेज रखती ताकि किसी को पानी की कमी महसूस न हो सके पर इन कुछ सालों में इस इलाके के लोगों ने जिस तरह मेरी उपेक्षा की है। उससे लगता है कि मैंने तो हमेशा अपना काम पूरी मुस्तैदी से किया फिर भूल कहाँ हो गई। ये लोग मुझे इस तरह उपेक्षित क्यों कर रहे हैं पर दूसरी नदियों की बात सुनती हूँ तो लगता है जमाना ही बदल गया अब। सभी नदियों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। कई नदियाँ खत्म हो रही हैं तो कई खत्म होने की कगार तक पहुँच गई है। कुछ नालों में बदलती जा रही है तो कुछ अमृत से पानी की जगह अब फैक्ट्रियों का बाकी बचा हुआ जहर ढ़ोने को मजबूर है।

दरअसल मैं अपनी जो कहानी सुनाना चाहती हूँ, उसकी शुरुआत होती है करीब एक हजार साल पहले या शायद उससे भी पहले। बूढ़ी हो रही हूँ न तो बराबर याद नहीं आता पर हाँ हजार साल से तो ज्यादा ही हो गए होंगे मुझे इसी तरह बहते हुए। मेरा नाम है नागधम्मन नदी। मध्यप्रदेश के देवास जिले से ही मैं निकलती हूँ और करीब 25 कि.मी. का सफर तय करते हुए पश्चिम की ओर बहकर जा रही क्षिप्रा को मैं सहेज कर लाई सारा पानी सौंपकर उसी में विलीन हो जाती हूँ। मैं निकलती हूँ देवास के पास नागदा कस्बे के ऊपर पहाड़ों से। यहाँ से जंगल का सारा पानी लेकर मैं चलती हूँ थोड़ी दूरी पर एक छोटे से गाँव हवनखेड़ी के पास से। यहाँ मेरा संगम एक और छोटी नदी से होता है। सैकड़ों सालों से देवास के राजा हर साल बरसात के समय हवनखेड़ी आते थे और आस-पास के हजारों लोगों की मौजूदगी में मेरा स्वागत सत्कार करते थे। राजा की सवारी आती, ढोल बजते, औरतें गीत गाती, पूजन-पाठ होता, मन्दिरों में घंटियाँ बजती, मन्त्र पढ़े जाते–सर्वे भवन्तु सुखिनः, अच्छी खेती के लिए मन्नतें माँगी जाती, मेला भरता मेरे किनारे, सब खुशी–खुशी रहते। मैं भी यह सब देखकर बाग–बाग हो जाती। वे सब मुझे अपने लगते, अपने बेटों की तरह प्यार करती मैं भी उन्हें, उनके दुःख जैसे मेरे दुःख थे और उनकी खुशियाँ जैसी मेरी खुशियाँ बन गई थी।

आज भी मेरे किनारे के गाँवों में मेरी कहानी सुनाने वाले बुजुर्ग मिल ही जाते हैं। वे तो मेरी कहानी और भी पहले से बताते हैं, इतनी पुरानी कि बस...पुराणों के वक्त से जोड़ते हैं मेरी कहानी को। वे बताते हैं कि नागदा वही जगह है जहाँ कभी पुराणों में वर्णित नाग–दाह यज्ञ हुआ था। कहते हैं आज जहाँ हवनखेड़ी गाँव हैं, यहीं उन दिनों हवनकुंड बनाया गया था। इसमें धरती के तमाम साँपों की बलि यज्ञकुंड में दी गई थी। बताते हैं कि मेरा जन्म तभी से हुआ। मुझे लेकर कई–कई कहानियाँ हैं इस अंचल में। कभी आप फुर्सत में आओगे तो सुनाऊँगी वे भी। पता नहीं इनमें कितनी सच्चाई है और कितनी कोरी कल्पना। यह बात कौन जाने पर जनश्रुति में कही सुनी जाती है अब भी।

सैकड़ों सालों से हर बार मैं इसी तरह उफनती रही। मुझे इस बात की खुशी होती कि मेरा सहेजा हुआ पानी हर बाढ़ साल में एक बार भरने वाले धार्मिक महत्व के सिंहस्थ मेले में आए लाखों श्रद्धालुओं के उपयोग में आता। कोई इसका आचमन करता तो कोई इसमें डुबकी लगाता। दूर-दूर देश और प्रदेशों के लोगों का स्वागत करते हुए क्षिप्रा और मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। देश की आजादी की लड़ाई में मेरे किनारे के गाँवों के लोगों ने भी कुर्बानियाँ दी। मुझे फक्र होता उनकी देश सेवा पर। देश को आजादी भी मिली। मुझे लगने लगा था कि अब तो हमारी ही सरकारें होंगी, जिनके लिए लोगों के हित ही सबसे ऊपर होंगे। अब नदियों के लिए भी अच्छा दौर आएगा पर हुआ इससे ठीक उल्टा। हमारे बुरे दिनों की शुरुआत हो गई। देश तेजी से विकास के रास्ते पर दौड़ने लगा लेकिन नदियाँ उस विकास से बहुत पीछे ही रह गई। बहुत पीछे। सत्तर के दशक में देवास को औद्योगिक क्षेत्र बनाया गया। कभी मेरे शांत रहने वाले किनारों पर फैक्ट्रियाँ लगना शुरू हुई। फैक्ट्रियाँ शुरू हुई तो पहले की तरह हवा नहीं रह गई। अब हवा में कुछ भारी सा रहने लगा। साँस लेने में जोर देना पड़ता और साँस के साथ ही कोई दुर्गन्ध सी भी लगती। फिर भी लोगों को नौकरियाँ मिल रही थी और मैं खुश थी। लोगों को इसी दौर में अचानक जमीन का लालच बढ़ा और लोगों ने अतिक्रमण करना शुरू कर दिया। खेती की जमीनें अनायास बढ़ने लगी। मेरे बहने के रास्ते में भी लोगों ने खेती करना शुरू कर दिया। मेरा आकार धीरे–धीरे घटना शुरू हुआ। अब पानी के लिए कम जगह बचती फिर भी जैसे–तैसे काम चल ही जाता।

फैक्टरियों को यहाँ लगे कुछ ही दिन बीते थे कि उन्होंने पाइप डालकर मेरे ही साफ–सुथरे पानी में घातक रसायन मिलाना शुरू कर दिए। यह रसायन इतने जहरीले हैं कि इन्होंने मेरे पूरे पानी को ही किसी काम का नहीं बचने दिया। उन्हीं दिनों लोगों ने भी अपना कचरा मुझमें डालना शुरू कर दिया। प्रदूषण नियन्त्रण मंडल की रिपोर्ट बताती है कि रसूलपुर के पास मेरे पानी में नायट्रेट के कंटेंट 700 तथा सल्फेट के कंटेंट 225 पाए गए, जो निर्धारित मात्रा से काफी ज्यादा हैं। इसी तरह यहाँ के पानी की केमिकल ऑक्सीजन डिमांड सीओडी भी बहुत अधिक 700 मिली है। इससे साफ है कि पानी किस बुरी तरह से जहरीला हो गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब मैं नदी नहीं बल्कि एक गंदले नाले में तब्दील होती जा रही हूँ।

हालत इतने बुरे हैं कि अब तो मेरे किनारे गाँवों में लगने वाले हैंडपम्प भी जहर उगलने को मजबूर हैं। मेरे आस-पास आधा कि.मी. तक के क्षेत्र में कोई भी जल स्रोत मेरी हालत की वजह से साफ पानी नहीं दे पा रहा है। किनारे के गाँव जो नदी होने से कभी अपनी किस्मत पर इठलाते थे, अब वे परेशान हैं मेरे कारण ही। मेरे पानी से लोगों को तरह–तरह की बीमारियाँ हो रही है। किसी को फोड़े–फुँसी तो किसी को खुजली चलती है। किसी को कुछ तो किसी को कुछ। लोगों ने कई बार अफसरों को लिखा कई बार अखबारनवीसों ने लिखा। विधान सभाओं से लेकर नेताओं तक को बताया पर अब तक कुछ नहीं हुआ, कुछ नहीं बदला। मैं तो फिर भी सब कुछ सहन कर रही हूँ पर क्षिप्रा के बारे में सोच–सोचकर दिल बैठा जाता है। मेरा पानी जाकर क्षिप्रा के पानी को भी दूषित और जहरीला कर रहा है। मेरी चिन्ता अब यह है कि अगले साल उज्जैन में सिंहस्थ भरेगा और देश–दुनिया के लोग यहाँ जमेंगे तो वे मेरे पानी को देखकर क्या कहेंगे। मुझे यही बात सोच–सोचकर बेचैनी हो रही है।

सोचती हूँ ऐसा कब तक चलेगा...? एक न एक दिन तो खत्म होना ही पड़ेगा। अब तो आखिरी दिन गिन रही हूँ। एक–एक दिन अपने पर ही भारी पड़ रहा है। कुछ ही दिनों में मेरी यह हजारों सालों पुरानी कहानी अब शायद कहानी बनकर कागजों में ही

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें