रविवार, 7 अगस्त 2016

नीर की पीर ?






प्रस्तुति-  स्वामी शरण  

देश की महत्त्वपूर्ण रेलों में ‘रेल नीर’ आपूर्ति से जुड़े भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में सीबीआई की छापेमारी के दौरान घोटाले में भी घोटाला सामने आया है। बरामद सत्ताईस करोड़ की नगद धनराशि में चार लाख रुपये नकली हैं। इसमें सीबीआई ने आरके एसोसिएट्स और वृंदावन फूड प्रोडक्ट के मालिक श्याम बिहारी अग्रवाल और उनके पुत्र अभिषेक अग्रवाल को हिरासत में लिया है। साथ ही, भारतीय रेल यातायात सेवा-आइआरसीटीसी के अधिकारी संदीप सिलास और एमएस चालिया को भी गिरफ्तार किया गया है। ये दोनों मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी थे। इन्होंने कैटरिंग ठेकेदार अग्रवाल से साठगाँठ करके राजधानी और शताब्दी जैसी प्रमुख रेलों में रेल नीर के बजाय अनधिकृत बोतलबन्द पानी और पाउच उपभोक्ताओं को बेचे। सीबीआई ने जाँच में पाया कि पहले तय था कि आइआरसीटीसी निजी कम्पनियों को रेल नीर 10.50 रुपये में प्रति बोतल की दर से देगी। उन्हें यह पानी रेलों में 15 रुपये में यात्रियों को देना होगा। लेकिन, ठेकेदार और रेल अधिकारियों की मिलीभगत से गुणवत्ता की परवाह किये बिना सस्ता बोतलबन्द पानी बेचा जाने लगा। इस बोतल की कीमत महज 5.70 रुपये थी। इस गोरखधन्धे के चलते दस साल के भीतर ठेकेदार को करीब पाँच करोड़ की काली कमाई हुई।

संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रत्येक नागरिक को जीने के अधिकार की मान्यता दी गई है। लेकिन जीने की मूलभूत सुविधाएँ क्या हों? इनके औचित्य को तय करने वाले न तो बिन्दु तय किये गये और न ही उन्हें बिन्दुवार परिभाषित किया गया। इसीलिए अब तक जल, भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जीने के लिये बुनियादी वस्तुएँ पूरी तरह सवैंधानिक अधिकार हासिल कर लेने से वंचित हैं। 2002 में अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने औद्योगिक हितों को लाभ पहुँचाने वाली ‘जल-नीति’ बनाई थी और पेयजल के दोहन का व्यापार करने की छूट देशी और विदेशी निजी कम्पनियों को दे दी गई। भारतीय रेल भी ‘रेल नीर’ नामक उत्पादक लेकर बाजार में आई। इस कारोबार की शुरुआत छत्तीसगढ़ से हुई। यहाँ शिवनाथ नदी पर देश का पहला बोतलबन्द पानी का संयन्त्र स्थापित किया गया। इस तरह एकतरफा कानून बनाकर मानव समूहों को जल के सामुदायिक अधिकार से अलग करने का सिलसिला चल निकला। यह सुविधा यूरोपीय संघ के दबाव में दी गई थी। पानी को विश्व व्यापार के दायरे में लाकर पिछले एक-डेढ़ दशक के भीतर एक-एक कर विकासशील देशों के जलस्रोतों को खुले दोहन के लिये इन कम्पनियों के हवाले कर दिये गये। विकसित पश्चिमी देशों के लिये इसी यूरोपीय संघ ने पक्षपाती मानदंड अपनाकर ऐसे नियम-कानून बनाये कि विश्व के दूसरे देश पश्चिमी देशों में आकर पानी का कारोबार न करने पाएँ।

यह संघ विकासशील देशों के जल का अधिकतम दोहन करना चाहता है, जिससे इन देशों की प्राकृतिक सम्पदा का जल्द से जल्द नकदीकरण कर लिया जाए। क्योंकि पानी अब केवल पेय और सिंचाई-जल मात्र नहीं रह गया है, बल्कि विश्व बाजार में ‘नीला सोना’ के तौर पर तब्दील हो चुका है। भारत समेत दुनिया में जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है और जलस्रोतों के घटने के साथ उनका निजीकरण हो रहा है, उतनी ही चालाकी से पानी के लाभ का बाजार तैयार किया जा रहा है, जिससे एक बड़ी आबादी को जीवनदायी जल से वंचित कर दिया जाए और आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति ही जलउपभोक्ता बन सकें।

यही कारण है कि दुनिया में पानी का कारोबार 37 हजार 500 अरब डॉलर का हो गया है। मसलन पानी की हर बूँद बिकने लगी है और हर घूँट पानी की कीमत वसूली जाने लगी है। भारत में पानी और पानी को शुद्ध करने के उपकरणों का बाजार लगातार फैल रहा है। देश में करीब पचासी लाख परिवार जल शोधित (प्यूरीफायर) उपकरणों का प्रयोग करने लगे हैं। इस बाजार पर यूरेका फोर्ब्स का कब्जा है। करीब 75 लाख घरों में इसी का इस्तेमाल किया जाता है। बीते चार साल में हिन्दुस्तान यूनीलीवर ने भी करीब 15 लाख प्यूरीफायर बेचे हैं। बोतल और थैली में बन्द पानी का भारत में एक हजार करोड़ का बाजार तैयार हो चुका है। इसमें हर साल 40 से 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। देश में इस पानी के करीब एक सौ ब्रांड देश व्यापी हैं और बारह सौ से भी ज्यादा बन्द पानी के संयन्त्र लगे हुए हैं। देश का हर बड़ा कारोबारी समूह इस व्यापार में उतरने की तैयारी में है। दिग्गज कम्प्यूटर कम्पनी माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भारत में ओमनी प्रोसेसर संयन्त्र लगाना चाहते हैं। इस संयन्त्र से दूषित मलमूत्र से पेयजल बनाया जाएगा। फिलहाल इस क्षेत्र में भारतीय उद्योगपतियों का ही बोलबाला है।

भारतीय रेल भी बोतल बन्द पानी के कारोबार में शामिल है। इसकी सहायक संस्था ‘इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन’ (आइआरसीटीसी) रेल नीर नाम से पानी का उत्पादन करती है। इसके लिये दिल्ली, पटना, चेन्नई और अमेठी सहित कई जगह संयन्त्र लगे हैं। उत्तम गुणवत्ता और कीमत में कमी के कारण रेल यात्रियों के बीच यह पानी लोकप्रिय है। रेल यात्री इस पेय के प्रमुख उपभोक्ता हैं। इसके बावजूद रेल नीर घाटे में है, क्योंकि बड़े पैमाने पर घोटाले का जाल बुन दिया गया है। सीबीआई इस घाटे को एक सुनियोजित साजिश के रूप में देख रही है। दरअसल, रेल नीर के रेल यात्री ही सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। उन्हें भी पानी की आपूर्ति नहीं कर पाता है। इसीलिए रेलवे ने महाराष्ट्र के अंबरनाथ और तमिलनाडु के पालूर में नए जल उत्पादन संयन्त्र लगाये हैं। लिहाजा निजी कम्पनियों की कुटिल मंशा है कि रेल नीर को ऐन-केन-प्रकारेण घाटे के सौदे में तब्दील कराकर सरकारी क्षेत्र के इस उपक्रम को बाजार से बेदखल कर दिया जाए। ऐसा सम्भव होता है तो कम्पनियों को रेल यात्रियों के रूप में नए उपभोक्ता मिल जाएँगे।। पानी की गुणवत्ता बनाए रखने की शर्त खत्म हो जाएगी। और तुलनात्मक दृष्टि से मूल्य सन्तुलित रखने के झंझट से भी छूट मिल जाएगी।

भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहाँ हर साल 230 घन किलोलीटर पानी धरती के गर्भ से खींचा जाता है, जो विश्व की कुल खपत के एक चौथाई से भी ज्यादा है। इस पानी की खपत साठ फीसद खेतों की सिंचाई और चालीस प्रतिशत पेयजल के रूप में होती है। इस कारण उनतीस फीसद भूजल के स्रोत अधिकतम दोहन की श्रेणी में आकर सूखने के कगार पर हैं। औद्योगिक इकाइयों के लिये पानी का बढ़ता दोहन इन स्रोतों से हालात और नाजुक बना रहा है। कई कारणों से पानी की बर्बादी भी खूब होती है। आधुनिक विकास और रहन-सहन की पश्चिमी शैली अपनाने से भी पानी बर्बाद हो रहा है। 25 से 30 लीटर पानी सुबह मंजन करते वक्त नल खुला छोड़ देने से व्यर्थ चला जाता है। 300 से 500 लीटर पानी बाथ टब में नहाने से खर्च होता है। जबकि परम्परागत तरीके से किये स्नान में महज 25-30 लीटर पानी खर्च होता है। एक शौचालय में एक बार मल विसर्जन करने पर कम से कम दस लीटर पानी खर्च होता है। 50 से 60 लाख लीटर पानी मुम्बई जैसे महानगरों में रोजाना वाहन धोने में खर्च हो जाता है। जबकि मुम्बई पेयजल का संकट झेल रहा है। सत्रह से चौवालीस प्रतिशत पानी दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में जल प्रदायक लाइनों के वॉल्वों की खराबी से बर्बाद हो जाता है।

पेयजल की इस तरह से हो रही बर्बादी और पानी के निजीकरण पर अंकुश लगाने की बजाय योजना आयोग के पूर्व अध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने केन्द्र और राज्य सरकारों को सलाह दी थी कि पानी की बर्बादी रोकने के लिये नये कानूनी उपाय जरूरी हैं, ताकि हर बूँद का दुरुपयोग रोका जा सके। लगभग इसी समय संयुक्त राष्ट्र ने पानी और स्वच्छता को बुनियादी मानवाधिकार घोषित करने की पहली वर्षगाँठ पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा कि लोगों को पानी और स्वच्छता के अधिकार मिल जाने का अर्थ यह नहीं है कि सबको पानी मुफ्त मिले। बल्कि इसका मतलब यह है कि ये सेवाएँ सबको सस्ती दर पर हासिल हों। साफ है, पानी को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बाजार के हवाले कर दिये जाने की साजिश रची जा रही है। आम लोगों को गैर जागरूक ठहराकर पानी की बर्बादी का जिम्मेवार ठहराया जा रहा है। जिससे कानून बनाकर पानी के उपयोग और आपूर्ति को नियन्त्रित किया जा सके। जबकि पानी की बर्बादी के लुटेरे तो कोई और ही है।
जनसत्ता, 1 नवम्बर 2015
 

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