सोमवार, 22 अगस्त 2016

मेरे जीवन के थ्री इडियट-2 / अनामी शरण बबल









अनामी शरण बबल 


(मेरे तमाम सज्जनों और कभी दोस्त रहे (भूत) पूर्व मित्रों इसका केवल शीर्षक थ्री इडियट है, ताकि लोगों का ध्यान एकाएक जाए। इससे आहत ना हो यह मेरी करबद्द प्रार्थना है। जो सही जीवन में इढिुयटहोंगे वो कोई भी हो इस श्रृंखला में जगह नहीं पा सकते । आपलोग शीर्षक को लेकर माफ करें तो मैं पूरी रफ्तार से इडियट एक्सप्रेस को गतिमान करूंगा।) 
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विजय गोयल के पाले में गेंद

अनामी शरण बबल

उम्र के 62 बसंत में भी दिल्ली के सबसे तेजतर्रार और आप के लिए खिलाफ सबसे बड़े योद्धा साबित हुए भाजपा नेता विजय गोयल को अंतत:मोदी सरकार में शामिल कर ही लिया गया। दिल्ली में खुश होने वाले से कहीं ज्यादा बड़े जन समुदाय को यह रास नहीं आया होगा। हालांकि आप के खिलाफ भाजपा के विद्रोही तेवर के चलते का ही इनको यह पुरस्कार मिला है। वाजपेयी आडवाणी कैंप के हनुमान होने के कारण ही गोयल को मोदी कैंप में अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। मगर गोयल की निष्ठा पर किसी को संदेह नहीं। मोदी के बारे में श्री गोयल का यह बयान काफी लोकप्रिय रहा जब मोदी को भी महात्मा गांधी की तरह ही सावरमती का संत घोषित कर डाला। इसकी बड़ी चर्चा हुई। मगर मोदी जी को यह टिप्पणी जरूर रास आयी होगी। इसी तरह दिल्ली से पार्टी का एक आक्रामक चेहरे को प्रमोट करके श्री गोयल के काम को मोदी ने नवाजा है।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रहे चरती लाल गोयल के पुत्र विजय गोयल को भले ही राजनीति विरासत में मिली हो मगर उन्होने अपने संघर्ष और योद्धापन के चलते ही लंबे सफर के राही बने। 1995-96 दिल्ली की राजनीति में एक साथ तीन नेताओं का उदय हुआ। कांग्रेस खेमे से महाबल मिस्र ( पार्षद और सांसद) और रमाकांत गोस्वमी (हिन्दुस्तान अखबार के चीफ रिपोर्टर से कांग्रेस विधायक और मंत्री) तथा भाजपा खेमे से विजय गोयल ।
लॉटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले युवा नेता ( 40-42की उम्र होगी) विजय गोयल की सफलता की कहानी को सामने रखना तो और भी जरूरी है । और देश में लॉटरी का धंधा चौपट हो गया तो इसके पीछे भी गोयल की ही भूमिका रही है। महज 10 साल के भीतर लॉटरी नेता से सांसद और कैबिनेट मंत्री तक बनने वाले विजय गोयल की परियों जैसी सफलता की कहानी के पीछे दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की हर प्रकार की भूमिका रही है। दिवंगत प्रमोद महाजन की वजह से भी आसमानी सफलता हासिल करने वाले गोयल कभी दिल्ली विवि डीयू के तेजतर्रार नेता भी रहे हैं।
अखबार के दफ्तरों में अपने प्रेस नोट्स लेकर ठीक से छापने के लिए अक्सर अनुनय विनय और प्रार्थना करने वाले गोयल का रिश्ता हम पत्रकारों से सांसद बनने तक तो ठीक रहा । वे हम पत्रकारों के संपर्क में भी लगातार रहे, मगर पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में मंत्री बनते ही गोयल भाजपा के वरिष्ठ मंत्री बनकर हम पत्रकारों से ही परहेज करने लगे। शायद वे यह भूल गए कि हम पत्रकार तो चींटी की तरह होते है काम भला हो या बुरा हर जगह बेरोकटोक चींटी आ ही जाता है। चींटी किसी का सगा नहीं होता।
मंत्री पद से उतर जाने के करीब 12 साल तक श्री गोयल ने दिल्ली में की सड़कों पर धमाल चौकड़ी की, तब कहीं जाकर वे प्रधानमंत्री के गुडबुक में दाखिल हुए। दो एक बार श्री गोयल को इस बात को लेकर मुझसे बड़ी आपति हुई कि क्यों मैं उनके बारे मे बार बार कहीं कभी कुछ लिखा तो लॉटरीनेता जरूर जोड़ा। जब मेरी उनसे तकरर सी होते होते बची यह कहने पर कि सहारा आज भी 2000 से 20 हजर करोड़ की संपति का उल्लेख क्यों करती है ताकि इससे लोगों के दिमाग में मैप उभरे कि किस छोटे से आरंभ सफऱ किस तरह बड़ी मंजिल तक गयी है। यदि मैं चरती लल गोयल के बेटे को फोकस करूंगा तो लोग बाग यही समझेंगे कि यह बाप बेटे का पुश्तैनी खेल है। मग मैं लॉटती नेता लिखकर तो तुम्हारी ही छवि में चांद लगा देता हूं । अब चांद को चार चांद बनाना लगाना साबित करना विजय गोयल का काम है। और रही बात चीखने चिल्लाने की तो एक पत्रकार ही तो आईना दिखाता है। हमलोग तो एक रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह होते है । जो भी जितन भी बड़ा हुआ है और बड़ी दूर तक गया तो भी वो सब पत्रकारों के घुटने के नीचे होकर ही। मेरी बात सुनकर गोयल शांत हुए और बात खत्म हो गयी। एक लंबे अंतराल के बाद केंद्रीय मंत्री बने गोयल के सामने यह एक नायाब मौका है कि वो दूसरों से बेहतर साहित करे, क्योंकि जिन उम्मीदों के साथ मोदी ने दिल्ली के सांसदों को मंत्री बनाया था उसमें कोई भी दो साल में जनता के साथ साथ मोदी की कसौटी पर भी खऱे नहीं उतरे है। चतुर प्रधानमंत्री ने श्री गोयल के पाले में गेंद डाल दी है। अब देखना यह है कि वे किस तरह खुद को औरों से बेहतर साबित करते हैं या....


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शांत नहीं रह सकते गोस्वामी या गोस्वामी के स्वामी


पत्रकारिता से राजनीति में आने वाले पत्रकारों की कोई कमी नहीं रही है। बल्कि एक समय के बाद तो ज्यादातर पत्रकार इस तरह हवा में उड़ने लगते हैं कि बगैर जमीनी आधार और जनप्रतिबद्धता के ही चुनाव लड़ जाते हैं। बुरी तरह परास्त होकर वे अपनी साख इज्जत छवि और पत्रकारीय ईमानदरी को मटियामेट कर बैठते है। मगर दिल्ली की राजनीति में पिछले 15 साल के दौरान एकाएक (भाग्य) से अधिक चमकने वाले राजनीतिज्ञों में कम से कम तीन नामों पर तो चर्चा जरूर होनी चाहिए। जिनकी कुणडली को कभी बाद में खंगाला जाएगा,। (उधर दिल्ली में आप के उदय के बाद तो सड़क कमसे एकदम एक दर्जन प्रोपर्टी डीलर से लेकर न जाने किस किस तरह के लोग एकाएक राजनीति में पैठ बना ली। इन नवांगुतकों पर भी जरूर रामयण गाथा लिखनी होगी, भले ही तेजतर्रार दिखने वाले मुख्यमंत्री इसके बाद पता नहीं मेरे खिलाफ क्या क्या कर या कराके ही दम लेंगे। मगर यहां पर हम बात तो करेंगे केवल दिल्ली की शीला सरकार में जगह पाने वाले (भूत) पूर्व पत्रकार रमाकांत गोस्वामी की। एक पत्रकार होने के नाते लिखने के प्रसंग में अपने इस सीनियर गोस्वामी के बहाने कमसे कम दो और नेताओं का भी कोई न कोई जिक्र ना करना भी एक बड़ा अपराध सा होगा। हालांकि अपराध तो यह भी लग रहा है कि जब शीला सरकार के पत्तन के दो साल होने वाले है। यानी अत्तीत के गड़े मुर्दे को निकालने का समय तो अब चला नहीं गया बल्कि इन फूदकने वाले नेताओं के बारे में लोगों को असली चेहरा दिखाना बताना आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है। और इस मायने में कि हमलोगों की याद्दाश्त इतनी कमजोर जो होती है कि जिसके खिलाफ सड़कों पर उतर जाने वाली जनता उसी दुष्ट को दुष्यंत मानकर अपने सिर पर बैठा लेती है।
तीनों से मेरा साबका पड़ा है। लिहाजा पार्षद से विधायक और ( जनता के वोट से ज्यादा) किस्मत के धनी महाबलि निकले महबल मिश्रा और लॉटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले विजय गोयल की सफलता की कहानी भी संघर्ष करने वालों को उपर तक पहुचंने के सपने दिखाती है और मन में आस जगाती है कि उपर तक पहुंचना असंभव नहीं है। गोयल पर एक स्टोरी पोस्ट की है जिसमें गोयल गाथा कित है।
यही हाल लगभग, पार्षद से सांसद बनने वाले महाबल मिश्रा की रही। पत्रकारों को देखते ही हाथ जोड़ने (इस मामले में सपा नेता मुलायम को भी शर्मसार करने वाले) के लिए मशहूर महाबल में छपास रोग इतना था कि अपने प्रेस रिलीज को लेकर अखबार के दफ्तर तक खुद पहुंचने में कोई गुरेज नहीं होता था। अपनी मासूमियत और इनोसेंट फेस की वजह से महाबल पत्रकारों में काफी लोकप्रिय हो गए और उम्मीद से ज्यादा प्रेस में जगह पाने में हमेशा कामयाब रहे। हालांकि विधायक बनने के बाद महाबल में थोड़ा गरूर आ गया और सांसद बनने के बाद तो थोड़ा बौद्धिक होने का घंमड़ सिर चढ़कर बोलने लगा। यही वजह है कि अब महाबल दिल्ली की राजनीति में महा होने के बाद भी बली बनने का सपना देखते देखते 1994 लोकसभा के पराजय के बाद फिलहाल बेरोजगार है।
हां तो अभी बात हो रही थी, पत्रकार रमाकांत गोस्वामी की। अपनी पत्रकारीय प्रतिभा से ज्यादा बिरला मंदिर में अपने पुजारी रिश्तेदारों की सिफारिश से दैनिक हिन्दुस्तान में रिपोर्टर की नौकरी पाने वाले रमाकांत गोस्वामी दैनिक हिन्दुस्तान में चीफ रिपोर्टर भी बनने में कामयाब रहे। हालंकि पत्रकरित कौशल और बातचीत कौशल से एक सक्षम जानदार और लोगों को अपना बनने में माहिर थे, मगर अपने कौशल को व्यावसायिकइस्तेमाल से ज्यादा नेताओं की चाटूकारिता पर खर्च किया।
बात 1996 लोकसभा चुनाव की है। मैं गोस्वामी को जानता तो था, मगर कभी मिला नहीं था। कई तरह से बदनाम होने के बावजूद खासकर पत्रकारों में खासे लोकप्रिय भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार की जेब में रहने के लिए गोस्वामी ज्यादा बदनाम थे। तालकटोरा रोड़ वाले प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में सज्जन की चुनावी प्रेस कांफ्रेस थी। हिन्दुस्तान की तरफ से संतोष तिवारी हमलोग के साथ ही बैठे थे, मगर सज्जन के बगल में एक मोटा सा आदमी कुर्सी लगकर बैठा था। प्रेस कांफ्रेस के दौरान कई बार सज्जन उससे सलाह लेते तो कई बार अपना मुंह आगे बढ़ाकर वह आदमी भी सज्जन गोस्वामी वार्ता जारी रही। आधे घंटे की प्रेस कांफ्रेस के दौरान सज्जन को आठ-दस बार अनमोल सलाह देने वाले के प्रति मेरे मन में कोई खास उत्कंठा नहीं जगी।
प्रेस वार्ता खत्म होने के बाद मैं और ज्ञानेन्द्र सिंह (दैनिक जागरण कानपुर से दिल्ली आए चंद माह भी तब नहीं हुआ था) डीपीसीसी के बाहर खड़े होकर बातचीत में मशगूल थे। तभी मेरी नजर सज्जन कुमार के उसी चम्मबचे की तरफ गई, जो अब तक दो बार डीपीसीसी के अंदर से निकल कर बाहर खड़ी अपनी कार तक जाता और कोई सामान लेकर अंदर जा चुका था। चंद मिनटों में ही एक बार फिर वही चम्म चा फिर बाहर निकल कर अपनी कार की तरफ जाता हुआ दिखा। मैने ज्ञानेन्द्र से कहा चलो जरा देखे चमच्चे का माजरा क्या है ? अपनी कार से कुछ सामान निकाल कर फिर वापस लौट रहे मोटे सज्जन को देखकर हाथ जोड़ते हुए मैंने कहा, सर आप कौन, पहचाना नहीं? तब तपाक से वह बोला तुम लोग कौन ? तुम सुनक भी अपना आपा खोए बगैर धीरज के साथ मैंने जवाब दिया मैं राष्ट्री य सहारा से अनामी और ये दैनिक जागरण से ज्ञानेन्द्र। तब थोड़ा सहज होकर सज्जन के चम्मचे ने कहा अरे, तुमने मुझे नहीं पहचाना? मैं एचटी से गोस्वामी। तब पूरी विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर मैंने फिर कहा नहीं सर नहीं पहचाना। तब सज्जन के चमच्चे ने कहा कमाल है, अरे भाई मैं रमाकांत गोस्वामी हिन्दुस्तान से। अब चौंकने की बारी मेरी थी। मेरी आंखे विस्मय से फैल गयी। मैंने कहा कमाल है, सर आप और सज्जन के साथ, तो फिर संतोष तिवारी जी? लगभग सफाई देते हुए गोस्वामी ने कहा अरे सज्जन तो अपने भाई हैं, साथ देना पड़ता है। संतोष कवरेज के लिए आया था। इस सफाई के बाद भी मेरी हैरानी कम नहीं हो रही थी। बात को मोड़ने के लिए गोस्वामी ने शराब की कुछ बोतल और लिफाफे में रखे पकौड़े को दिखाते हुए पूछा खाओगे? जबाव देने की बजाय तपाक से मैंने पूछा क्या आप खाते है? इस पर जोर देते हुए गोस्वामी ने कहा, नहीं मैं तो पंड़ित हूं। तब मैंने पलटवार किया। नहीं सर, मैं तो महापंड़ित हूं, इसे छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे लगभग झेंप से गए। इसके बावजूद अपने दफ्तर में कभी आने का न्यौता देकर अपनी पिंड़ छुड़ाई।
लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मतगणना से एक दिन पहले तालकटोरा स्टेडियम में मतगणना की हो रही तैयारियों का जायजा लेने गया था। वहां पर एक बार फिर गोस्वामी से टक्कर हो गई। इस बार हम दोनों एक दूसरे को पहचान गए। मैंने गोस्वामी से पूछा- सर, परिणाम में क्या होने वाला है? एकदम बेफ्रिक होकर गोस्वामी ने कहा होने वाला क्या है? बस देखते रहो सज्जन भाईसाहब किस तरह जीतते है। इस पर मैंने आपत्ति की और बोला कि मामला कुछ दूसरा ही होने वाला है। तब ठठाकर हंसते हुए गोस्वामी ने कहा, 'तुम अनुभवहीन लोग पोलिटिकल एयर को नहीं जानते।' खैर बात को तूल देने की बजाय मैं दफ्तर लौटा और अगले ही दिन बीजेपी के कृष्णलाल शर्मा ने सज्जन कुमार को एक लाख 98 हजार मतों से हरा कर सज्जन कुमार एंड़ कंपनी की बोलती ही बंद कर दी थी। हालांकि इसे शर्मा की जीत की बजाय इसे तत्कालीन सीएम साहिब सिंह वर्मा या पूरी बीजेपी की जीत कहें तो भी कोई हैरानी नहीं।
हिन्दुस्तान में नौकरी करने के बावजूद बिरला से ज्यादा सज्जन की वफादारी के लिए (कु) ख्यात गोस्वामी को सज्जन सेवा का पूरा फल मिला और दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सज्जन की पैरवी से रमाकांत 1998 में पत्रकारिता से अलग होकर अपने चेहरे पर पोलिटिकल मुखौटा लगाने में कामयाब रहे। दिल्ली नगर निगम विधायक सदस्य होने के नाते गोस्वामी से मेरी एक और मुठभेड़ 2001 में हुई। जब वे निगम की एक बैठक में बतौर विधायक एमसीडी सदन में आए। हम पत्रकारों को देखते ही गोस्वामी ने सबों को बेटा- बेटा कहकर प्यार दुलार दिखाना शुरू कर दिया। अपने पिता के रूप में थोड़ी देर तक बर्दाश्त करने के बाद अंततः मैने टोका गोस्वामीजी नेता का चेहरा तो ठीक है, मगर हम पत्रकारों के बाप बनने की चेष्टा ना करें। कई और पत्रकारों ने भी जब आपत्ति की तो फिर गोस्वामी खिसक लिए।
सज्जन की वफादारी निभाते हुए ही गोस्वामी ने शीला दीक्षित के भी वफादार साबित हुए। जिसके ईनाम के रूप में गोस्वामी को मंत्री होने का परम या चरम सुख भी हासिल हो गया है। हालंकि परिवहन मंत्री थे तो मुझे बड़ी उम्मीद थी कि घाटे से लस्त पस्त और करप्शन कारर्पोरेशन के रूप में जगत कुख्यात डीटीसी को वे एक पत्रकार की तरह देखेंग,मगर एक कंग्रेसी नेती की तरह तमाम घोटालों और गाठे की फाईलों को वे दबाकर अपना कार्यकाल समाप्त किया।
अलबता बीजेपी शासन में खुले 10 गौसदनो के नाम पर घपले घोटाले की जांच के लिए गठित गोस्वामी आयोग की अध्यक्षता करके हुए रमाकांत गोस्वामी की भूमिका बेमिशाल रही। गौसदनों की जांच रिपोर्ट में बतौर सबूत गौसदनों की अनियमितता पर कम से कम दो दर्जन से अधिक मेरी रिपोर्ट संलग्न है। जिनके आधर पर ही कई गौसदनों को निरस्त कर दिया गया। श्री गोस्वामी से कोई मेरा कोई शिकवा शिकायत वाला रिश्ता भी कभी नहीं रहा, इसके बावजूद मंत्री बनने की खबर से मुझे खुशी खुशी हुई। पर एक नेता की भूमिका से मुझे दुख भी हुआ कि परिवहन के नाम पर जो काम गोस्वामी नहीं कर सके उसी कम को अरविंद केजरीवाल भी कहां कर पा रहे है। पत्रकार से जब नेता बन ही गए हैं तो गोस्वामी से मैं अपील करना चाहूंगा किवे फिर से खड़ा हो और अपनी तेजतर्रार वाचाल इमेज से आप को भी बेनकाब करते हुए दिल्ली की शांत या खामोश पड़ी राजनीति या केजरी जंग के खिलाफ एक योद्दा वाली पारी खेले। और केवल पत्रकार होने के नाते ही एक पत्रकार नेता मंत्री से ही मैं अपील कर सकता हूं कि कलम छोड़ने के बाद भी एक पत्रकार नेता के सामाजिक दायित्व और जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड सकता है।

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मीडिया मैनेजमेंट के (बेताज) सज्जन बादशाह सज्जन कुमार

अनामी शरण बबल

दिल्ली के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को दुर्ज्जन मानने या साबित करने का मेरे पास कोई ठोस तर्क सबूत या पुख्ता आधार नहीं है। सज्जन कुमार से मेरा कोई गहरा या घनिष्ठ सा रिश्ता भी नहीं रहा है। पिछले कई सालों से हमारी मुलाकात भी नहीं है। हो सकता है कि रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने वाले
सज्जन कुमार को मेरा चेहरा या नाम भी अब याद ना हो। इसके बावजूद मीडिया मैनेजमेंट की वजह माने या इनके सहायक कैलाश का कमाल की सज्जन कुमार को सामने
फोकस किए बगैर वह मीडिया के सैकड़ों लोगों की उम्मीदों पर हमेशा खरा उतरते है।
अदालत और सिक्ख समुदाय के बीच चाहे इनको छवि को लेकर जो कुछ भी कहा जाए माना जाए, जाना जाए और मीडिया में छापा जाए इन तमाम विरोधाभास के बाद भी मीडिया और अपने आस पास के लोगों में सज्जन कुमार अपनी सज्जन छवि को कायम रखने में हमेशा क्या आज तक सफल रहे है।
मीडिया से परहेज करने वाले सज्जन अमूमन मीडिया में काफी लोकप्रिय है। फिर भी क्या मजाल कि सज्जन कुमार को कोई इंटरव्यू लेकर दिखा दे। लगतार विदेशों में ही रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू भी हाल ही में छप गया है, मगर 1984 के बाद सज्जन का कहीं भी कोई इंटरव्यू नही आया। इसके बावजूद मीडिया में हमेशा रहने वाले सज्जन कुमार सही मायने में मीडिया के लिए दुर्लभ प्राणी है। मीडिया में कब कहां कितना और किस तरह छपना है इसका पूरा जिम्मा सज्जन कुमार के मीडिया प्रभारी इसी कैलाश का हाथ रहा है।
आमतौर पर सज्जन के मन में मीडिया को लेकर ना कोई आदर है ना ही पत्रकारों से बड़ा प्यार दुलार है। इसके बावजूद दिल्ली के समस्त पत्रकारों में सज्जन कुमार के प्रति सद्भावना का ही रिश्ता है कि 1984 दंगे का मामले में कोई भी करवट बदले, मगर
अखबरों में सज्जन को लेकर हमेशा सहानुभूतिपूर्ण नजरिया ही रहा है।
हम बात सज्जन को लेकर 1996 के लोकसभा चुनाव से शुरू करते है। पहली बार लोकसभा चुनाव कवर करने की वजह से मैं भी काफी उतेजित और उत्साहित भी था। सज्जन को लेकर मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी। करीब एक माह तक लगातार खबरें देने की योजना के तहत मैने उन इलाकों को चुना, जहां पिछले पांच साल में सज्जन कभी दोबारा ताकने भी नहीं गए थे।
सज्जन के सामने बीजेपी ने वरिष्ठ नेता कृष्ण लाल शर्मा को मैदान में थे। आमतौर पर माना जा रहा था कि शर्मा को बलि का बकरा बनाकर चुनाव से पहले ही बीजेपी ने घुटने टेक दिए। मगर मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा एंड पूरी पार्टी ने चुनावी
तस्वीर को ही दिन रात की मेहनत और लगन से बदल दिया।
एक तरफ चुनावी धूम तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सहारा में एंटी सज्जन खबरों का दौर चालू हो गया। इन खबरों से इलाके में क्या असर पड़ रहा था, यह तो मैं नहीं जानता, मगर सज्जन एंड कंपनी खेमे में जरूर बैचेनी थी। दिन में कैलाश तो कभी भी बेसमय सज्जन कुमार ने भी तीन चार बार फोन करके यह जरूर
पूछा कि अनामी भाई क्या दुश्मनी है। मैंने पलटते ही कहा, 'सज्जन भाई दोस्ती कब थी ? ' एंटी खबरों पर हैरानी प्रकट की। इसकी सफाई में मुझे कहना पड़ा, 'भाईसाब, यदि खबर गलत है, तो बताइए? चारा डालते हुए सज्जन ने कहा था अरे अनामी जी खबर चाहे जैसी भी हो, मगर असर तो पड़ता ही है।
मानना पड़ेगा कि पूरे चुनाव के दौरान एंटी खबरों के बावजूद फिर दोबारा सज्जन या कैलाश ने फिर ना कभी टोका और ना शिकायत ही की। चुनाव खत्म हो गया और एक लाख 98 हजार वोट से सज्जन कुमार पराजित हो गए। चुनाव के बाद सबकुछ सामान्य सा हो गया था, मगर दो साल के भीतर ही एक बार फिर लोकसभा चुनाव सिर पर आ गया। चुनावी सिलसिला शुरू होने से काफी पहले ही एक बार फिर पत्रकारों को पटाने का खेल चालू हो गया। उस समय तक मोबाइल नामक खिलौने का इजाद इंडिया में नहीं हुआ था। सज्जन खेमे की तरफ से हर चार छह दिन के बाद कभी रेवाड़ी का गजक, तो सोनीपत का हलवा, तो कभी किसी और शहर की धमाल मिठाई का डिब्बा सज्जन कुमार की तरफ से मेरे घर पर आने लगा। कैलाश के इस गेम को मैं समझ रहा था। फोन पर तो मैंने मिठाई ना भेजने की गुजारिश की, फिर भी मेरे घर पर कम से कम सात आठ मिठाई के डिब्बे आ चुके थे। एक दिन दफ्तर में कैलाश से मुलाकात हो गई, तो मैंने इसका विरोध जताया कि सज्जन से मेरा होली दीवाली का भी कोई नाता कभी नहीं रहा है, लिहाजा
सबसे पहले मिठाईयों के डिब्बे भेजना बंद करो। इस पर कैलाश ने दो टूक कहा, 'अनामीजी भाईसाहब ने मुझे बस आपको मैनेज करने के लिए कहा है।' बकौल कैलाश, 'भाईसाहब ने कहा है कि तू केवल अनामी को फिक्स कर ले, मैं पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज कर लूंगा।' एक सांसद का यह दावा कि मैं पूरी दिल्ली
की मीडिया को मैनेज कर लूंगा। यह बात मुझे चुभ गई। फौरन इसका प्रतिवाद करते किया, 'कैलाश भाई, सज्जन भले ही पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज कर लें, मगर वे अनामी शरण बबल को मैनेज नहीं कर सकते। मीडिया मेरे गरूर और गुमान का संबल है। मैं तो मीडिया को एक साधारण सा सिपाही भर हूं, मगर बात जब मीडिया को अपनी रखैल बनाने पर आ गई है, तब तो मुझे मीडिया की लाज रखनी ही होगी ।' एकदम साफ लहजे में कैलाश को फिर मिठाई ना भेजने के लिए आगाह
किया। इसके बावजूद अगले चार पांच दिनों के भीतर ही सज्जन की मिठाई का डिब्बा फिर से आ धमका। इस बार हमने बंजारा कालम में मिठाईयों से पत्रकारों को पटाने का मजाक उड़ाते हुए टिकट मिलने पर ही संदेह जताया। 1984 के भूत की वजह से 1998 के लोकसभा चुनाव में सज्जन का टिकट एक बार फिर कट गया। यानी सज्जन के नाम पर कैलाश की पूरी कसरत ज फालतू और मेरे घर भेजे गए तमाम डिब्बे बेकार हो गए।
चुनाव हारने के बावजूद शोर शराबा या हंगामा खड़ा करने की बजाय सज्जन इलाके में सक्रिय रहते हैं। जनता से इनका नाता रहे या ना रहे, मगर जिसे इन्होंने अपना बनाया है, वह हमेशा सज्जन के लिए काम करते हुए दिख जाते हैं। सही मायने में सज्जन की असली ताकत यही लोग हैं, जो दिखावे के
बगैर सज्जन के लिए जान देने के लिए भी तैयार रहते हैं। हर साल पत्रकारों को सज्जन कुमार अपने सरकारी आवास (सांसद नहीं रहने पर भी किसी और सांसद के आवास पर) पत्रकारों को सालाना पार्टी देना कभी नहीं भूलते। पार्टी के दिन सैकड़ों पत्रकारों को लाने और वापस पहुंचाने के वास्ते दर्जनों गाड़ी
हमेशा खड़ी रहती हैं। ठेठ देहाती अंदाज में सज्जन की पार्टी में गंवई अंदाज में लिट्टी-चोखा से लेकर गन्ना, मकई भूंजा समेत लजीज खाने का मजमा सा लग जाता है। दो या तीन बार मुझे भी इसमें शामिल होने का अवसर मिला है। शायद यह इकलौता पत्रकार पार्टी होता है जिसमें नवोदित से लेकर संपादकों को भी आना रास आता है। संपादकों में सर्वसुलभ आलोक मेहता के दर्शन भी यहां पर होना परम आवश्यक है।
सज्जन में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। यही शराफत मीडिया को भाता है। मीडिया से नाता होने के बावजूद क्या कमाल है अगर कोई सज्जन का इंटरव्यू
बेशक सज्जन के साथ यदि 1984 का दाग लगा नहीं होता तो दिल्ली की राजनीति ही कुछ और दिशा लेती। इनका पोलटिकल सफर कुछ और होता। संभव है कि वे दिल्ली के सीएम भी हो जाते। या सज्जन के सूरज के साथ साथ कांग्रेस का भी सूरज दिल्ली में कभी नहीं डूबता।(वैसे सज्जन का सूरज आज भी चमक रहा है)। अपने पराजित विधायक भाई रमेश को सांसद बनवा देना दिल्ली में केवल और केवल सज्जन कुमार के बूते में ही था। इसके ठोस आधार भी है कि पिछले 15 साल में केवल एक बार सांसद होने के बाद भी जनता से भले ही इनका साथ कम हो गया हो, मगर साथ देने वाले अपनों से सज्जन का साथ कभी कम नहीं हुआ है, जिसके बूते ही सज्जन को दुर्ज्जन कहने का
साहस आज किसी में नहीं है। भले ही परिसीमन के बाद राजधानी के राजनीतिक क्षेत्रों में भौगोलिक बदलाव आ गया, मगर विभिन्न आरोपों के बाद भी मादीपुर गांव के मूल निवासी भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार को आज भी बाहरी दिल्ली और मीडिया को मैनेज करने में बेताज बादशाह ही माना जाता है।

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