शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

आतंकवाद के साए से बाहर निकलता पंजाब









अनामी शरण बबल


लगभग एक दशक (1980-1992) तक आतंकवाद से ग्रस्त पंजाब में लोकतंत्र की बहाली के 25 साल होने वाले है। पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का तापमान अभी से गरम है। 2017 में होने वाले चुनावी कसरत के बीच मेरा ध्यान हमेशा पंजाब में लोकतंत्र की बहाली के एक साल होने के बाद फरवरी 1993 में समय सूत्रधार (पाक्षिक) पत्रिका के कवर स्टोरी करने की तमाम दिक्कतों और मीठी यादों पर मन बार बार उड़ता पंजाब हो रहा है।
अपनी यादों को लिखने से पहले यह बता देना बहुत जरूरी है कि मैं न पंजाबी हूं और न पंजाबी भाषा पर कोई सामान्य ज्ञान ही है। इसके बावजूद नवभारत टाईम्स के अमृतसर और चंडीगढ़ के ब्यूरो प्रमुख रहे रमेश गौत्तम और मां मीरा गौत्तम ही प्रोत्साहन के बड़े सूत्रधार रहे। जिसके बूते ही एक सप्ताह तक पंजाब के दर्जनों शहर और 50 से भी ज्यादा गांवों की यात्रा करने के साथ पंजाब के छोटे बडे तमाम नेताओं से भी मिलने का मौका और सुख मिला।  बगैर गौत्तम जी की मदद या मेरे साथ लगे रहने की बाध्यत्ता से ही यह रपट करना संभव भी हो पाया अन्यथा भाषाई दिक्कत के साथ जान पहचान की कमी की वजह से भी मेरे लिए कवर स्टोरी करना नामुमकिन था । अजय गौत्तम मेरे लिए हर जगह दोभाषिए की तरह भी मौजूद रहता था । इन लोगों की उत्साह जनक सहयोग के बूते ही इस स्टोरी को मैं कर गया । इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि यदि इनलोगों से मेरा बहुत अच्छा रिश्ता नहीं होता तो समय सूत्रधार (पाक्षिक) के लिए मैं आगे ही नहीं बढ़ाता। मेरे लिए पंजाब जनसंपर्क विभाग की एक गाडी एक ससप्ताह तक साथ रही। दिवंगत मुख्यमंत्री बेअंत सिंह द्वारा बार बार यह पूछे जाने पर कि कहं ठहरे हो तो मेरे यह बताने पर कई जनसंपर्क अधिकारियों को कडी फटकार लगा दी कि सरकारी गेस्ट हाउस में जगह दो। इस पर मैने सभी लोगों का फौरन बचाव करते हुए मुख्यमंत्री को बताया कि इसमें इनकी कोई गलती नहीं है। ये लगातार दवाब डाल भी रहे हैं और एक कमरे की चाभी भी मेरे पास ही है, मगर मैं सरकारी दीवारों के मेहमान बनने की बजाय अपने पापा के साथ ठहरा हूं ताकि दिन रात पंजाब की जानकारी लेता रहूं। यहां पर यह बता दूं कि 1993 में गूगल नामक ज्ञान और जानकारी देने वाले खिलौने का अविष्कार या जन्म भी नहीं हुआ था, लिहाजा भारत के ही किसी एक राज्य को पूरी तरह जानना आज रेलवे में आरक्षण मिलने से कतई कम दुश्वार नहीं था। सीएम के सामने जनसपर्के अधिकारियों के बचाव करने और तारीफ कर देने से वे मुझ पर निहाल हो गए, और जब तक मैं चंड़ीगढ में रहा तो उन लोगों ने मेरे को अपने सिर पर रखा।

 पंजाब के आतंकवाद पर हिन्दी की सबसे प्रामाणिक और सटीक रिपोर्ट करने वाले रमेश गौत्तम जी से मेरा नाता भी बड़ा दिलचस्प है। अपने इतने लंबे रिपोर्टिंग काल में मैने हमेशा एक संयोग महसूस किया कि कोई भी बड़ी या खोजी स्टोरी करने के लिए मन बनाने से पहले ही कोई न कोई न कोई कहीं से भी एक सूत्र अनायास मेरे सामने इस तरह आ जाता है या अनायास टकराता रहा है कि औरों के लिए कठिन लगने वाली कोई भी रपट मेरे लिए एकदम सहज सरल और सामान्य सी हो जाती रही है। यह मेरे लिए एक संयोग या अजूबा से कम नहीं नहीं है या किसी उपर वाले की प्रेरणा कि जब कभी जहां कहीं भी भले ही कितनी बुरी तरह भी कई बार फंस जाने या गलती से अपह्रत हो जाने के बाद या जबरन हिरासत में डाल देने या एक गौसदन में दर्जनों लठैतों के बीच घिर जाने के बाद भी यह चमत्कार होता रहा। और हर संकट से पहले ही कोई न कोई बंदा इस तरह पहले से ही खड़ा रहता हो जिसकी वकालत या दबंग सिफारिश के कारण ही मैं पल दो पल में एकाएक मेहमान सा बन जाता था। इस तरह की लगभग 100 से ज्यादा संयोग निसंदेह मेरे आराध्य देव की असीम अनुकंपा की विशेष मौज है। तभी तो ज्यादातर रिपोर्टरो के पास एक या दो स्टोरी रहती थी, तो मेरे पास स्पेशल स्टोरी एक एक दिन में तीन चार से ज्यादा होती थी। इसी कारण मेरे नाम के साथ बबल को बैल भी मेरे मित्रों ने कर दिया था और डेस्क वाले भी रपटों की बहुलता से मेरी खबरों को अंडर प्ले कर देते थे और डेस्क से कई बार तो इस मुद्दे पर कहा सुनी हो जाती थी। 

खैर मैं भी कहां से कहां भटक गया। सहारनपुर में विश्वमानव अखबार मेरी पहली नौकरी थी। मार्च 1988 के आखिरी सप्ताह से  काम करते हुए मैं सहारनपुर के पत्रकारों से मेल जोल बढ़ाने लगा। मैं भी यहां के लिए एकदम नया था। तभी देखा कि नवभारत टाईम्स के स्थानीय पत्रकार वीरेन्द्र आजम के इर्द गिर्द एक 17-18 साल का लड़का खुद से नाराज और बौखलाया हुआ घूमता रहता थ। मैं भी उस समय 23 साल का ही था ,तो उससे बात की और कई दिनों तक कई मुद्दो पर तकरार होने के बाद उसको शांत किया और काम करने के लिए राजी कराया। इसकी सबसे बड़ी पीड़ा थी कि लोग मेरे को जानने की बजाय रमेश गौत्तम के बेटे के रूप में जानते है। इस पर मैने कहा कि तू है क्या और किया क्या है कि लोग तुमको जाने।  तुम्हारा बाप इतना बड़ा पत्रकार है तो इससे तुम प्रेरणा नहीं लेते हो कि मैं भी बाप या उनसे भी बड़ा पत्रकार बनूंगा। मेरे कई उलाहनों और फटकार के बाद वह शांत हुआ और एक दिन अपने घर ले गया। जहां पर इसकी छोटी बहन आकर मुझसे लिपट गयी बबल भैय्या आपने तो अजय भैय्या को एकदम शांत कर दिया। तभी उसकी मां यानी मीरा गौत्तम सामने आई । मैने उनको पैर छूकर प्रणाम किया तो वे एकदम विह्वल होकर मेरे चेहरे को कई मिनटों तक थामे रखी। एकदम तू मेरा बेटा है। मैंने हंसते हुए कहा कि मैं कब इंकार कर रहा हूं यह तो मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपके अलावा और भी कई मां का प्यार हासिल है। फिर बाद में  मेरी मदर स्टोरी सुनकर वे निहाल सी हो गयी। एक डिग्री कॉलेज में रीडर मीरा गौत्तम हमेशा कहती कि अनामी अजय को तुम अपने जैसा बना दो। मैं बार बार मां से यही कहता कि मैं तो दूर का ढोल हूं सुहावन लग रहा हूं। इस बात पर वे खुश होकर हंसती और लगातार बताती कि तेरे साथ रहते हुए अजय बहुत शांत के साथ पत्रकारिता पर होमवर्क भी करने लगा है। तब मैं उनको बताता कि आजकल मैं उसको गालियों की ट्रेनिंग दे रहा हूं ताकि वो हर हाल को डैमेज कंट्रोल कर सके। मेरी बातों को सुनकर वे यही कहती कि एकदम तुम गालियों में भी इसको मांज दोगे। खैर प्यार और स्नेह के इस रिश्ते पर फिर कभी लंबी स्टोरी लिखी जाएगी, मगर अजय को चंड़ीगढ में नवभरट टाईम्स के वरिष्ठ रिपोर्टर की तरह देखकर और दो दो स्टेट पर काम करने के अलावा हिमाचल प्रदेश पर भी उसके काम को मैं अक्सर देखकर चकित भी रह जाता हूं तो कभी फोन कर काम की कमी भी बताता हूं तो वह एकदम मस्त हो जाता है। एक पारिवारिक सदस्य सा मैं बन गया। और यही प्यार का रिश्ता आज तक कायम है।  सहारनपुर में कई बार गौत्तम जी से मिला और दोनों के प्यार और ललक ने मुझे मां और पापा कहने के लिए प्रेरित किया।

मैं चंडीगढ में था और सहारनपर से रोजाना कभी भी फोन कर मां पापाजी से पूछती रहती थी कि अनामी के लिए क्या कर रहे हो या आज क्या करना है या  कल क्य करोगे । मां की समय असमय देर रात के फोन आने पर कई बार पापा रमेश गौत्तम और मां की तकरार हो जाती।. दो एक बार तो रात में फोन मुझे देते हुए पापा कहते अनामी अपनी मां को समझाओं कि मैं तेरे लिए क्या क्या कर करा रहा हूं। वो सहारनपुर में पगलाई बैठी है उनको यहीं आने को लिए कहो या एक लिस्ट बनाकर उनको दे आना कि मै तेरे चक्कर में अपना कुछ नहीं कर रहा। पापा की बात फोन पर ही सुनकर मां हंसने लगी और मैने उनको कहा कि अनामी के रूप में पापा ही हर जगह है और पंजाब की नौकरशाही में यह मजाक बन गया है कि अपने बेटों को रमेश जी पत्रकारिता की ट्रेनिंग दिलवा रहे है। तब कहीं जाकर मां शांत हुई। आज करीब 24 साल के बाद इन लम्हों को याद कर रहा हूं तो मैं अपनी किस्मत पर ही कई बार मर मिटता हूं कि अनजान शहर और अनजाने लोग किस हद तक मेरे या मैं उनका हो गया था।

वरिष्ठ पत्रकार रमेश गौत्तम जी के पत्रकार बेटे अजय गौत्तम को लेकर मेरी पंजाब यात्रा बेहद रोमांचक रही। एक सप्ताह तक मुख्यमंत्री बेअंत सिंह से लेकर पुलिस महानिदेशक और सुपरकॉप की तरह जगत विख्यात केपीएस गिल के बीच मैं और अजय को पंजाब की नौकरशाही रमेश गौत्तम के बेटों के रूप में जानने लगी थी। रमेश गौत्तम जी कि रुचि और लगभग हर बार हमलोग के साथ रहने के कारण बहुत सारी दिक्कतें हमारे लिए हवा हवाई हो गयी। इस दौरान सीएम बेअंत सिंह की आतकवाद से जूझते पंजाब की त्रासदी को कौन नहीं जानता । एक लंबे समय के बाद 25 परवरी 1992 को केवल 18 फीसदी वोट पर कांग्रेस की सरकार बनी और  71 साल के जाट नेता बेअंत सिंह सूबे के 17 वे मुख्यमंत्री बने। जाट सीएम के राज में जाट पुलिस सुप्रीमों सुपरकॉप केपीएस गिल के साथ मुख्य सचिव अजीत सिंह के रूप में जाट तिकड़ी ने हालात को सुधारने की हर संभव पहल की।


विधानसभा चुनाव के दौरान लगभग शांत से हो गए आतंकवादियों ने मार्च 1992 से अगले छह माह तक पूरे पंजाब को हिलाए रखा। खूनी नरसंहरों की झड़ी सी लग गयी, और इस बार आतंकवादियों ने चुने हुए जन प्रतिनिधियों को टारगेट किया। इसके बाद पंजाब के शहरों में खूनी खेल का दहशत फैलाया। लुधियाना  मजीठा में तो एक ही दिन में अलग अलग समय मे दो दो बार नरसंहार कर 40से ज्यद मजदूरो की हत्य कर दी। संगरूर में 15 गैरजाट इंजीनियरो की हत्या से पूरा पंजाब दहल गया। आमतौर पर रोजाना 10-15 लोग हलाल होने लगे। पूरे देश को लगने लगा कि पंजाब में चुनव कराना गलत सबित होने लगा। इस बार आतंकवादियों ने अपनी रणनीति बार बार बदली। पंजाब के प्रमुख लोगों या उनके रिश्तेदारों को टारगेट करते हुए आधुनिक पंजाव के निर्माता की तरह मान्य प्रतप सिंह कैरो के सांसद बेटे सुरेन्द्र कैरो पर कातिलाना हमला किय, मगर संयोग से कैरो बच गए। संगरूर मजीठा  में नरसंहारों की झडी लग गयी। लुधियाना के पुलिस एसपी टिवणा मारे गए। वही अप्रैल में 100 से ज्यादा लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ गए।

आंकड़ो की बात करे तो 1992 में 1518 समान्य लोग मारे गए इसी साल 252 पुलिसकर्णी भी शहीद हुए। पुलिस आतंकवादी मुठभेड़ में 2113 आतंकी भी पुलिसिया गोली से हलाक हुए तो 1502 आतंकवादी पकड़े भी गए। समर्पण करने वाले 537 आतंकवादी हिरासत भेजे गए। साल भर में 1398 जो पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा 1399 मुठभेड़ हुए। इन तमाम उबाल के बाद भी केवल दो बैंको में डकैती पड़ी, जबकि पिछले दो साल में 133 बैंको से अरबों रूपए लूटे गए थे।

मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के शुरूआती छह माह के दौरान दर्जनों हिंदू पुजारियों की हत्या से भी एक बार फिर गैर पंजाबी समाज भयभीत हो गया। उधर पटियाला के आबकारी आयुक्त, मानसा के वृद्ध पूर्व कांगेसी नेता पटियाला आकाशवाणी के इंजीनियर समेत एक दर्जन से ज्यादा सरकारी अधिकारियो को मार डाला गया। 

एक तरफ पंजाब में खूनी खेल थम नहीं रहा था। एक रणनीति के तहत केपीएस गिल एंड कंपनी की यह रणणीति कारगर साबित हुई कि हर शहर जिले के सीमांत पर पुलिस की गश्ती से लगभग पंजाब के ज्यादातर इलाकों में पुलिस की नजर रहने लगी। इस मोर्चेबंदी से हालात पर काबू लाया गया और इसी दौरान पंजाब की ठप्प पड़ी नगर निगम नगर निकयों और ग्राम पंचायतों के चुनाव की घोषना कर  मुख्यमंत्री ने सितम्बर में चुनाव भी करवा डाला। एक ही झटके में पंजाब में हजारों जनप्रतिनिधियों का उदय हुआ और आंतकवाद के खिलफ इस सामूहिक मोर्चेबंदी और गुप्त सूचनाओं ने आतंकवाद की रीढ़ तोड़ने में कामयाबी अर्जित की।

मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के शासन के पहले छह माह में कही से भी हालात पर काबू नहीं हो रहा था। मगर बाद के छह माह में हालात मे सुधार हुआ। स्कूल कॉलेज से लेकर जीवन सामन्य होने लगी। सैकड़ो बंद सिनेमा हॉल फिर से गुलजार हो गए  तो देर रात तक पंजाबी मस्ती का दौर फिर से आरंभ हो गया।


एक साल में कितना बदल गया पंजाब या कितना बदल रहा है पंजाब । इस पर काम करने और पंजाब घूमने के इरादे के साथ फरवरी 1993 के दूसरे ही हफ्ते मे मैं चंड़ीगढ़ जा पहुंचा। अजय के साथ पापाजी समेत मीरा मां को मेरे कार्यक्रम की सूचना थी। लिहाजा पंजाब के ज्यादातर नेता मुख्यमंत्री समेत गिल और मुख्य सचिव से लेकर दर्जनो अकाली नेताओ से मेरे लिए समय लिया जा चुका था। कई नेता तो घूमते घामते मिल गए तो गांवों शहरों में बातचीत करते इस तरह की दर्जनों विधवाएं मिली जिनका सुहाग साल भरके अंदर उजड गया। इस तरह के भी दर्जनों लोग मिले जिनके अबोध बच्चे आतंकी गोलियों के शिकार बन गए, तो कहीं कहीं पर तो पूरे परिवार की मौत के बाद कोई चार साल का बच्चा करोड़ो की जमीन और संपटि का मालिक की तरह जिंदा बचा रह गय। यानी पंजाब के सीने में आंतकी बर्बरता के इतने घाव मिले और दिखे। खूनी खेल की अनगिनत कहानियां सुनी कि मेरे जैसा आमतौर पर आंसू निकलने के मामले में सख्त सा होकर भी बेसाख्ता कहानी सुनते या किसी अबोध बच्चे बच्चियो को देखकर मेरे नेत्रों से भी आंसू बह चले और मैं विह्वल होकर कई जगह लोगों की पीड़ा में शामिल होने से खुद को रोक नहीं पाया।  बहुत जगह भाषा एक बडी समस्या थी मगर प्रेम और पीडा की कोई भाषा नहीं होती केवल आंसू बह निकलने भर से वहां के चौपालों में एकत्रित सैकड़ों लोग द्रवित से हो जाते।

चंडीगढञ़ को सबसे आखिरी में कवर करने की नीयत से मैं तीन चार दिन तो आसपस के लगभग 150 किलोमीटर के दायरे में आने वाले गंवो सड़क किनारे के दुकानों बस्तियों दुकानों लाईन होटलों समेत गांवों में जाकर या कहीं रूककर या किसी पनघट पर ठहर कर पानी भर रही पनिहारिनों खेत में काम कर रहे किसानों स्कूल में जाकर शिक्षकों और बच्चों से बात करके एक साल के अंदर आ रहे बदलाव या पटरी पर लौट रही जिंदगी के बाबत पूछता सुनता और बातों की मस्ती लेता रहा। एकदम ठेठ पंजाबी मेरे पल्ले से बाहर होती मगर अजय के चलते पता लगने पर मैं भी उसी मजाक में जबाव देता जिसे अजय द्वारा कहे जाने पर वे लोग ठहाका लगाती।  कई जगह की पनिहारिनो या मजदूरिनों को मेरी बात समज में नहीं आती मगर हंसकर खुशी जरूर प्रकट करती। दो जगह पर बिहारी मजदूरिन मिल गयी तो वे लोग हिन्दी सुनते ही चहक पड़ी। मैं भी हाल चाल के साथ वहां के हालात पर पूछा तो सबने यही कहा कि पहले से बहुत सुधार है। मुजफ्परपुर की एक मजदूरिन एक लिट्टी निकालकर मुझे खाने की जिद्द करने लगी तो मैं भी गाड़ी में रखे बिस्कुट नमकीन निकाल कर सबों में बांटा और एक लिट्टी खाकर ही जाने की अनुमति मिली। मुजफ्परपुर  वाली औरत को हिन्दी बोलने के लिए स तरह लालयित रही कि थोड़ी दूर एक चाय की दुकान तक हमलोग पैदल ही उसके साथ चले और हिन्दी में गप्पियाते रहे। उसका नाम तो याद नहीं है पर वो बारबार बोल रही थी कि यहां पर हिन्दी बोलने के लिए तरस जाती हूं तो खुद ही अपने आप में ही जोर जोर से हिन्दी में बात करती हूं गीत गाती हूं। उसकी बात सुनकर हम सभी लोगों को बहुत अच्छा लगा। हमलोग के जीप खुलने तक वो खड़ी रही तब मैने दो चार और नमकीन और बिस्कुट के कई पैकेट दे दिए।  जिसे वो ना ना कहती हुई लेकर एकटक जाने तक खड़ी रही।

चंडीगढ में ही रहने के दौरान मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और केपीएस गिल समेत दर्जनो पुलिस अधिकरकी कई मंत्री और नौकरशाहों से मिला। सबो ने अपनी तरफ से जानकरी दी और हालात के सुधार की गति को तेज बताया। मैने मुख्यमंत्री बेअंत सिंह से रात में पंजाब की सुरक्षा पुलिस नेटवर्क समेत मोर्चेबंदी का जायजा लेने की इच्छा जाहिर की । हमलोग गिल से बात और इंटरव्यू भी पहले ही कर चुके  थे और उन्होने रात में पंजाव (पुलिस गाड़ी में ही बैठकर ) को दिखाने से साफ मना कर दिया था।  मेरी बात सुनता ही मुख्यमंत्री ने फोन करके गिल को अपने दफ्कर में बुलाया। हमलोग को बैठा देखकर उनकी आंखे तन गयी। मुख्यमंत्री द्वारा रात में पंजाब दिखानें के लिए कहा। इस पर श्रीगिल ने आपति की, मगर बेअंत सिंह के यह कहने -पर कि हर्ज क्य है मीडिया भी तो देखे कि गिल की सफलत के पीछे उसकी क्या रणनीति है। और अंत में मुख्यमंत्री ने फिर कहा अरे ये अपने गौत्तम जी के बेटे हैं भाई इनकी नफासत तो झेलनी ही पड़ेगी। मुख्यमंत्री  से हम सभी लोग विदाई ली। हमलोग के जाते समय वे अपनी कुर्सी से खड़े हो गए और रमेश जी से गले मिलते हुए हमलोग से बोले कभी कोई जरूरत या काम हो तो  आ सकते हो। तुमलोग गौत्तम जी के बेटे हो तो हमलोग का भी कुछ फर्ज बनता है। हाथ मिलाकर कमरे से बाहर निकले ही थे कि तब तक गिल साहब ने चार पांच  सीनियर पुलिस अधिकरियों को बुला लिया था। एक दूसरे कमरे में अपनी टीम के साथ दाखिल होते ही उन्होने हमें और अजय को रात में पुलिस गश्ती की किसी जीप या जिप्सी में बैठाकर ज्यादा से ज्यादा 50-60 किलोमीटर का चंड़ीगड़ के गोलंबर घूमाने का आदेश दिय। तब मैने गिल से कहा कि दो जिलों के बोर्डर तक तो घूमा दे ताकि किस तरह सुरक्षा का चक्रव्यूह एक दूसरे से जुडा है और कैसे दो जिले भी मिलकर इस व्यवस्था को संचालित कर रहे हैं इसका खाका मिले। मेरी बात पंजाब पुलिस आयुक्त गिल को बहुत पसंद आयी और स्वीकार किया कि रोजाना कम्यूनिकेशन नहीं है बड़ी घटना होन पर ही संपर्क बनता है मगर इस तरह दो जिलो का बोर्डर हमेशा संचार में रहे तो पूरे पंजाब पर ही पुलिस एक सूत्र में बंधी और संदेश का संचार बना रहेगा। मेरी बात सुनकर खिसियाए हपए से गिल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। उन्होने रमेश गौत्तम जी से कहा आपके बेटे ने बहुत सुदंर आईडिया दिया है। फिर उन्होने चाय के लिए कहा। और तय हुआ कि आज ही रात में 10 बजे घर से ही हमलोग को लेकर पुलिस पंजाब के मोर्चेबंदी को दिखाएगी।

मैं और अजय कड़ाके की ठंड़ में भी पूरी तरह रात के लिए तैयार थे। रमेश पापा जी हमलोग को बार बार यह सलाह दे रहे थे कि ज्यादा स्मार्ट नहीं बनना इलासे को देखना। कहां पर किस तरह का पुलिस बूथ या सुरक्षा के प्रबंध है। और सबसे ज्यादा ध्यान रखना कि पुलिस वालों से एक सीमा तक ही सवाल करना और जिद्द या उलझने की चेष्टा कतई नहीं करना। हमलोग पापा जी की सलाह को अपनी जेब में संभाल लिया और पुलिस वाहन में सवार हो गए। चंडडीगढ से निकलते निकलते रात के 11 बज गए थे और शहर छोड़ते ही हर 100 मीटर पर पुलिस गश्ती का आलम था।किसी चौराहे या सड़क वाले गांवो पर पुलिस बूथ एक्टिव हो गए थे। लगभग 500 मीट तक मोटरसाईकिल और इससे अधिक दूरी के लिए वाहन की व्यवस्था थी।


पंजाब के सुपर टेन सबसे सीनियर अधिकारी हमारे साथ थे। खांटी बनारसी मुंह में पान वाले पुलिसिया। एकदम मीठा बोलने वाले यह दूसरी बात कि गाली भी मीठेपन से ही किसी को लगे। हमलोग कई जगह रूके चाय पी। आस पास के लोगों से मिलाय़। इतने  सीनियर अधिकारी को राउण्ड पर देखकर पुलिस और सुरक्ष में लगे तमाम लोग पहले तो एकबारगी चौंक से जाते। मगर अपनी मिसरीनुम व्यवहार से वो ज्यादातर पोस्ट किसी कनेक्टिंग पोस्ट के बारे में हाल खबर लेते रहते। उनको मेरे नाम में बबव ज्यादा रास आया मगर वे हमं बबली ही पूरे सफर में कहते रहे और हर बार माफी भी मांग लेते। माहौल को मजेदार रखना है न। फिर मैं कौन सा बबली होने जा रहा हूं।  पंजाब मं गिल के साथ काम करने के अनुभव पर बोले कि पंजाब पुलिस, को एक तरह से गिल पुलिस में बदल गयी है।  गिल के अलाव 40 हजार लोग सुरक्षा में लगे है मगर रोजाना 5-7मारे पुलिस वाले मारे भी भी जा रहे हैं मगर मीडिया केवल गिल गिल गिलगिला रही होती है। मैने पूछा कि गिल से पहले पुलिस हेड कौन था ? क्या यह कोई एक रोमांचक अनुभव नहीं रहेगा आप उनकी टीम के साथ रहे है ? ........ एक गाली देकर इसे क्या होता है ? यह सब हरामीपन है। मगर यह सब छापना नहीं यार हमलोग तो छोरा गंगा किनारेवाले है न। मुंह से जबतक रोजाना पचास गो गाली न निकले तब तक साला पेट में आग लगी रहती है। पंजाब में होने का यही फायदा है कि भोजपुरी में गरिया दो तब भी सामने वाला बूझ नहीं पात। मैं हंसने लगा और पूछा कि गिल को कभी गाली दी है ?  तो गंगा किनारे वाला छोरा पुलिसिय हंस पड़ा। साले को पंजाबी और अंग्रेजी भी पंजाबीपन वाली आती है बाकी समझने में दिक्कत होती है । लोकप्रिय गाली तो समझ लेंगे लेकिन खांटी भोजपुरी मगही अवधी गाली देते रहो उनके पल्ले कहां पड़ेगी।

छोरा गंगा किनारे वाला कोई 44-45 साल के थे पर हमें कुछ बताने की बजाय इलाहाबाद और बनारस हिंदू विवि में अपने प्रेंम प्रसंगों और प्रेम कहानियों को सुनने के लिए आतुर थे। यार बहुत दिनों के बाद अपने इलाके के आदमी से इस तरह बात हो रही है तो क्या करे ? ज्यादातर गांवों  शहरों कस्बों या सड़क किनरे के लाइन होटलों की याद तो नहीं है मगर  रात में पुलिस मोर्चेबंदी की कड़ी दिखती थी। भागते हुए आतंकवादियों को पकड़ने या जगह जगह पर लगे बैरियर को स्वचालित ऑपरेशन की भी जानकारी दी। रात के कोई ढाई बज रहे थे तो पान की पीक फेंकते हुए कहा यार अब चलो घर जरा मैं भी घर में मस्ती करूं। तुमलोग को गाड़ी भेजकर सुबह 11 बजे बुलवाता हूं और चार पांच घंटे तक बैठकर पूरे पंजाब का पुलिस मैप दे दूंगा पर चलो अब बहुत रात हो गयी।  मुझसे पूछ क्या शादी हो गयी ? मैने कहा बस अगले माह ही कौमार्य्य खत्म हो जाएगी। तब वो हंस पड़े तब तू क्या जानेगा रात में घूमने का दर्द। खैर हमलोग छोरा गंगा किनारे वाले की पीड़ा समजकर लौटने लगे। और चार बजे से कुछ पहले कडाके की ठंड़ और कुहासे के बीच वापस चंड़ीगढ़ घर में था।  अगले दिन सुबह 11 बजे पुलिसिया वाहन गौतम पापाजी के घर के बाहर खड़ी थी। मैं और अजय एक बार फिर छोरा गंगा किनरे वाले पुलिसिया के घर पर थे। और पंजाब पुलिस से लेकर तमाम ज्यादतियों पर वे ऑफ द रिकॉर्ड बहुत कुछ कहा और बताय।

 अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल सुरजीत सिंह बरनाला से लेकर ज्यादातर  नेताओं का यही कहना था कि बेअंत सरकार फेल हो जाएगी । आतंकवाद फिर से खड़ा हो सकता है। गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के  दो दशक से भी अधिक समय से अध्यक्ष रहे गुरू चरण सिंह तोहड़ा  ने भी खालिस्तन का समर्थन तो नहीं किय मगर एक अलग तरह की आजदी की वकालत की। मगर इसके भावी स्वरूप पर बोलने से इंकार कर दिया।

बहरहाल आतंकवादियों से लोहा लेने वाले मुख्यमंत्री बेअंत सिंह भी अंतत आतंकवादियो के विस्फोट के शिकर बने। मगर 1997 से लेकर 10 साल तक कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह  मुख्यमंत्री रहे और अभी पिछले 10 सालों से प्रकाश सिंह बादल एंड संस का राज है। 2017 में होने वली विधानसभा चुनव की गोटियं बिछाने का काम चल रहा है। इस बीच बसपा के कांशीराम अब नहीं रहे तो एक नया सिरदर्द अरविंद केजरीवाल पंजाबी राजनीति पर असर डाल सकते हैं।
केजरीवाल प्रदेश राजनीति में सिरदर्द बन सकते हैं। मगर सबसे संतोष की बात यही रही कि वाकई पंजाब बदल गया और लोकतंत्र की कुचल दी गयी जड़ो को हरा भरा बनाकर आतंकवादियों को नेस्तनाबूद किया जा चुका है। जिसके लिए तमम शिकयतों के बाद भी केपीएस गिल के योगदान और बेअंत की जीवटता को कभी भी नकारा नहीं जा सकता ।      



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