सोमवार, 11 जुलाई 2016

मेरे जीवन के थ्री इडियट-3 / अनामी शरण बबल






अनामी शरण बबल



(दोस्तों इस बार मैं दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे दो सुपर नेता श्री मदनलाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा के अलावा दिल्ली के खाद्य मंत्री रहे लाल बिहारी तिवारी के साथ के अपने अनुभव लिख रहा हूं। 1998 से भाजपा का जो सितारा पस्त हुआ वह 18 साल के बाद भी ग्रहण काल में ही है। दिल्ली के चौथे और 40 साल के बाद 1993 में विधानसभा गठन होने के बाद पहले मुख्यमंत्री बने मदनलाल खुराना और उसके बाद भाजपा के गंवई चेहरे को परिभाषित करने वाले जाट नेता साहिब सिंह वर्मा आज भी खुद को बेहतर सीएम साबित किय। दिल्ली के पचासो काम आज भले ही कांग्रेस की उपलब्धि बनी मगर उन तमाम कार्यो का शिलान्यास 1994-1998 के बीच में ही किया गया। दिल्ली के सदाबहार सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों की कतार से इनको कभी बाहर किया नहीं जा सकता। और इसी मंत्रीमंडल में खाद्य मंत्री रहे लाल बिहारी तिवारी से बीट पत्रकार के रूप में मेरा बहुत खारा संबंध रहा, मगर यह कहते हुए मुझे कोई संकोच नहीं कि बाद में तिवारी जैसा सर्किय और जंग लगी व्यवस्था को सुधारने वाला फिर कोई दूसरा खाद्य मंत्री आज तक दिल्ली को नहीं मिला। )

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इस तरह मैं बना उनका चहेता


एक लंबे अर्से के बाद कई पत्रिकाओं में काम करने के बाद 1993 दिसम्बर से मैं राष्ट्रीय सहारा के साथ जुड़ा। दिसम्बर 1993 माह के पहले ही सप्ताह में विधानसाभा चुनाव में बहुमत से विजयी भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना को अपने मंत्रीमंडल के साथ शपथ लेना था। चार दशक के बाद दिल्ली सरकार के गठन को लेकर भाजपा के विधायकों से भी ज्यादा उमंग उत्साह और उतावलापन मीडिया में था। शपथ ग्रहण समारोह में देश विदेश की सैकड़ों मीडिया और 500 से भी ज्यादा पत्रकारों का जमाव़ड़ा लगा। सारी मीडिया खुराना को लेकर पगलाई जा रही थी। खींचतान धक्कमपेल और आपाधापी के बीच  पूरे माहौल में एक अजीब तरह की उन्मादी खुशी और उतेजना थी। पत्रकारों के इसी मेले में मैं भी था। पगलाए से पत्रकारों की भीड़ और मंत्रियों को देखने की ललक को देखकर मैं बाहर जाने के लिए उठकर खड़ा हो गया। मेरे मन में यही भाव उठा कि यहां पर तो बहुत भीड़ है भाई अपनी दाल गलने वाली नहीं है।

दिल्ली के सभी 70 विधायकों की सूची मेरे पास थी। इस बार चुनाव के इकलौते निर्दलीय विधायक जितेन्द्र कुमार उर्फ कालू भैय्या और एकदम गांव देहात के गंवई विधायकों को खोजने में लगा। संयोग से कालू भैय्या मिल गए और जब मैने अपना परिचय दिया तो वो बेचारा मेरे सामने दंडवत सा हो गया भईया यहां पर हमलोग को तो कोई पूछ ही नहीं है। आप पहले पत्रकार हो जो मुझे खोजते हुए आए। मैने कहा यार दिल्ली में दो ही इकलौते हैं एक तुम और दूसरा सीएम। पर तुम मेरे लिए खुराना से भी ज्यादा बड़े हीरो हो कि अपने बूते जीते हो। मेरी बात सुनकर वह मेरे गले लग गया। मैने कहा कि मीडिया में मैं तुमको खुराना से ज्यदा कवर करूंगा पर इसके लिए अपने इलाके की तमाम विसंगति पूर्ण स्टोरी बतानी होगी, मेहनत करनी होगी।  हम दोनों ने फोन नंबरो का लेनदेन किया। कालू भैय्या ने ही आस पास के बैठे चार पांच विधायकों से मिलवाया। सबों से नंबर लेकर मे मैने सबों को हीरो बनाने का जाल फेंका। एक तरफ खुरान एंड़ कंपनी का समारोह पूरा हुआ तो मेरे पास भी अनाम अज्ञात  करीब 13 विधायकों की जन्मकुंडली आ चुकी थी। और मैने उसी समय तय किया कि विधानसभा के गठन से क्या दिल्ली का दुख कम होगा? इस पर काम करना है। सभी विधानसभा क्षेत्रों की सबसे बड़ी समस्या और कठिनाईयों को फोकस करते हुए स्पेशल स्टोरी पर काम करना है।

आमतौर पर जहां मीडिया की भीड़ लगी रहती है तो मैं वहां से परहेज करता हूं। अमूमन लोग एबीसीडी से ...जेड तक की यात्रा करते हैं मगर मैं हमेशा  अपना
सफर एक्स वाई जेड से शुरू करता हूं क्योंकि इधर भीड मारामारी और लोगों का ध्यान नहीं जाता।  एक सप्ताह के अंदर 30 से ज्यादा विधायकों से बात भी हो गयी और एक ही दिन में कई कई बार फोन कर करके मैने अपना नाम इनलोंगों को रटवा दिया। और कई जगह पर पेपर में  कोई टिप्पणी या सामयिक मुद्दों पर अपने प्यारे विधायको के नाम डालकर और सुबह सुबह फोन करके बताते हुए नए विधायकों को अपने मोहजाल में बांध लिया। दिसम्बर 1993 के अंत तक मेरे खबरों के खजाने में खबरे ही खबरें आने लगी। और 70 नंबर के जहंगीरपुरी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक से मेरा न्यूज रेल चालू हुआ। मेरे न्यूज बैंक में लगातर खबरें बढ़ रही थी । और मैने दिल्ली पर उल्टा पिरामीड की तरह काम आरंभ कर दिया।

एक लंबे समय के बाद दैनिक पेपर से जुडाव के बाद मुझे खबर लिखने में बहुत दिक्कत हो रही थी, पर खबरों की बौछार को देखते हुए संपादक राजीव सक्सेना और चीफ रिपोर्टर डा. रवीन्द्र अग्रवाल ने इस कमी को जल्द से जल्द दूर करने का अल्टीमेटम दिय।  खैर न्यूज बैंक में इतनी तरह की बेशुमार खबरें जमा होने लगी । उधर एक माह के अंदर मैं 25-30 विधायकों को अपना बना कर दोस्ती गांठ ली। और एक से बढकर एक दिल्ली की नाक काटने वाली बदनाम कहानियां लिखी। जिससे मेरे अखबार नें मुझे प्रतिष्ठा के साथ मेरी एक दिल्ली की मीडिया में पहचान दिलाई। और मैं अपने तमम बीट पर सक्रिय रहते हुए जेड टू ए का आहिस्ता आहिस्ता काम करते हुए अपने संपंर्क मजबूत करता रहा।

अप्रैल 1994 के मध्य तक दफ्तर में एक दिन एकाएक मुख्यमंत्री कार्यालय से मेरे लिए फोन आया। बात करने पर बताया कि मुख्यमंत्री खुराना मुझसे मिलना चाहते है। मैने फौरन कहा केवल चौथे ही माह में,  मैं तो इस साल के अंत तक मेल मिलाप की उम्मीद कर रहा था। उधर से पूछा कि कब आएंगे ?  मैं अगले ही दिन मिलने का समय ले लिया। सचिवालय में उनके सहयोगियों के कमरे में जा पहुंचा। मै आ गया हूं यह बात अंदर जाकर खुराना जी को बतायी गयी, और मुझे अंदर जाने के लिए कहा गया। मैं हॉल में ज्योंहि प्रवेश किया तो देखा कि मुझे देखते ही खुराना जी अपनी कुर्सी से उठे और मुस्कान बिखेरते हुए दरवाजे की ओर तेजी से लपक कर आने लगे। बीच में ही मुस्कान और थूक के भरपूर छींटों के बीच मुझे गले से लगा लिया। उलाहना और शिकायती लहजे में कहा कि मैं रोजना अनामी को अखबर में देख रहा हूं पर सचिवालय में कभी नहीं। मैं तुमसे मिलना चाह रहा था। अब जाकर फोन करके ही मुझे बुलाना पड़ा।  तब मैने हंसते हुए कहा कि मेरी लिस्ट मे तो आप नंबर 70 थे, और मैं तो इस साल के अंत तक मिलने की उम्मीद कर रहा था। और शपथ ग्रहण समरोह की अपार भीड़ के बाद अपनी बदली हुई न्यूज रणनीति की पूरी स्टोरी खुराना जी को सुना दी। मेरी कहानी सुनकर वे हंसते हुए लोटपोट हो गएय़ हॉल के अंदर वाले निजी कमरे में उन्होने अपने साथ ही लंच भी किया, और अपने घर के बेडरूम का एकदम पर्सनल नंबर दिया। इस सलाह के साथ रात 10 बजे से सुबह 10 बजे तक मैं इसी नंबर पर रहता हूं। मेरी जेड न्यूज प्लान की तारीफ की और यह भी कहा कि तुम्हारी रिपोर्ट के बाद मैने अपने सभी 70 विधायकों को अपने इलाके की समस्याओं संकटों और जरूरतों की सूची मांगी है। तुम्हारी रिपोर्ट की भी एक फाईल बनवा रहा हूं। तब मैंने  चहक कर कहा तो उसकी फोटोकॉपी मुझे भी चाहिए।   

इस मुलाकात के बाद खुराना जी से अक्सर फोन पर बातें हो जाती थी।  दो तीन दफा बात हुई । कभी उनकी तरफ से भी रात में मेरे पास कई बार फोन आया और उसी दिन की छपी किसी रपट पर उन्होने मेरी तारीफ की तो कई बार उलहना किया।  मगर सरकर द्वारा आवंटित गौसदन योजना पर मेरी धुआंधार खबरों पर पहले तो काफी आपति की और बाद में मेरी बहुत सारी खबरों पर सहमति भी प्रकट की। और अंत में मेनका गांधी समेत दिल्ली के तमाम असरदार लोगों के गौसदन निरस्त कर दिए गए। मुलाकात की बजाय फोन पर मेरा रिश्ता ज्यादा घनिष्ठ चलता रहा। ।         

1994 के बारिश के मौसम में ही दिल्ली की समस्त सड़कों को ठीक कराने और उद्यान विभाग के कार्यो में वृक्षारोपण हरियाली के लिए पेड़ पौधे लगाने की पूरी जानकरी  देने के लिए एक प्रेस टूर रख गया। पत्रकारों को लेकर बस चली नहीं कि मुख्यमंत्री खुराना का रूप बदल गया।  वे एक टूरिस्ट गाईड बन गए। सधे हुए तेजतर्रार गाईड की तरह करीब चार घंटे तक दिल्ली की सैकड़ो सड़कों की पूरी लंबाई के साथ विकास निर्माण और हरियाली का खाका रखा। कितने कितने करोड़ में सड़क और बागवानी के काम हुए हैं इसका ब्यौरा भी दिया। लगभग सारे पत्रकारों ने गाईड की भूमिक की सराहना की। उत्कृष्ट अगवानी मेहमानबाजी के उपरांत शाम तक हम सारे पत्रकार अपने अपने दफ्तर पहुंचे। मैने भी तीन चार खबरों की पूरी पैकेज बना दी और मेन स्टोरी सीएम बन गाईड को फोकस कर दिया। अगले दिन इस खबर के लिए अपने अखबार की खूब चर्चा रही ,तो रात में फोन करके खिलखिलाते हुए श्री खुराना भी इस खबर पर बार बार मोहित होकर  सराहना की।

सीएम बीट नहीं होने के कारण मेरा रोजाना उनसे सामना नहीं होता था पर वे मेरे नाम को इस कदर रट गए थे कि कहीं दूर से भी देखने पर भी अनामी...अनामी का जाप करने लगते। और जब भाजपा की अंदरूनी राजनीति के वे शिकार बन कर उनको अपना पद छोड़ना पडा तो सचिवालय के उनके निजी कक्ष में मैं भी था। मुख्यमंत्री बनने से पहले विकास मंत्री साहिब सिंह का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय हो गया था। वर्मा के यहां आने पर सब हंसते मुस्कुराते रहे। और अंत में मेरा हाथ पकड़कर वर्मा को थमाते हुए श्री खुराना ने कहा पत्रकारों  में यह  मेरा सबसे अच्छा और प्यारा दोस्त है। मगर लिखने में खाल नोंच लेता है । इसका ख्याल भी रखिएगा और इससे सावधान भी रहिएगा। विकासमंत्री वर्मा मुझे पहले से भी जानते थे श्री खुराना के सामने गले लगाते हुए तुरंत कहा बबल तो मेरा पहले से ही प्यारा मित्र है। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी मैं काफी समय तक संपंर्को मे रहा। यदा कदा हाल चाल पूछ भी लेता था। मगर इधर काफी साल हो गए जब मैं इस जिंददिल और उन्मुक्त हंसी के लिए जगत विख्यात ईमानदर मगर अपनी ही पार्टी में या (से)  उपेक्षित श्री खुराना से फिर नहीं मिला। 



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शहरी पार्टी का देहाती चेहरा


 जनाधार और लोकप्रियता के मामले में दिल्ली के ज्यादातर शहरी  नेताओं को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा एक झटके में परास्त कर देते थे। विधायक से मंत्री और मुख्यमंत्री के बाद सांसद और कैबिनेट मंत्री बनने वाले बाहरी दिल्ली के मुंडका गांव के साहिब सिंह वर्मा शहरी पार्टी के रूप में मान्य भाजपा के एक देहाती गंवई चेहरा थे। इनके भाई और बेटे ने भी इनकी विरासत को थामा है, मगर आज भी इनरी पहचान भाई या पिता के कारण ही है। अगले साल इनके निधन के 10 साल पूरे हो जाएंगे। मगर पार्टी को इन जैसा खेवनहार देहाती चेहरा आज तक दूसरा नहीं मिल पाया। और भाजपा को आज भी पार्टी में एक दो दलित और गंवई नेताओं की कमी महसूस की जा रही हैं।  
 दिल्ली के सीएम मदनलाल खुराना के बाद नंबर टू वर्मा ही थे। रोजाना इनके कमरे के बाहर 400-500 लोगों का मजमा लगा रहता था। बेरोकटोक भीतर आने जाने की इजाजत के कारण दफ्त में मेला की बजाय मेला में एक दफ्तर सा लगता था। जनता और प्रेस के सामने भले ही मनभावन सुकोमल सह्रदय और मानवीय दिखने या दिखाने की श्री वर्मा चेष्टा करें, मगर उन्हें अपने खिलाफ कोई खबर कभी भाता नहीं था। जान पहचान तो सारे पत्रकारों के होते है, इसका मतलब यह नहीं कि हम पत्रकार लिखना ही छोड़ दे।

विकास और शिक्षा मंत्री बने थे तो अपने  बच्चों के नामांकन के लिए रोजाना इनके दफ्तर से सैकड़ों पत्र संबंधित स्कूल के प्रिंसपल के नाम लिखा जाता था, मगर पत्र के बाद भी नामांकन कहीं नहीं होता तो लोगों की भीड़ कम होने लगी। वर्मा की घटती लोकप्रियता और लोगों में बढता गुस्सा कुछ इसी तरह की एक खबर अखबार में मैने बनाकर छाप दी, तो वर्मा जी सिरे से उखड़ गए। कई दिनो के बाद जब मेरा सचिवालय जाना हुआ तो वर्मा बहुतों के बीच खबर पर गुस्सा निकाला। क्या फायदा है तुमलोग का जब एंटी न्टूज लगाना ही है तो मेरे दफ्तर में क्यों आते हो ? मैने तुरंत वर्मा को कहा मैं किसी वर्मा के अखबार में काम नहीं करता कि आप जो चाहो वहीं खबर छपेगी। किसी खबर पर कभी आपने मन में मनन किया या सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा है या हुआ। और सही मायने में तो नेताओं के साथ लगातार रहने पर हम पत्रकार भी मान मर्यादा में बंध जाते हैं और चाहकर भी खबर नहीं लिख पाते या बचाकर लिखनी पड़ती है। मेरे तर्क के बाद भी वर्मा की नाराजगी बनी रही। मैंने फिर कहा कि आपके दफ्तर के बाहर का मेला लगभग लापता हो गया इस पर नहीं सोचते ? मगर हम पत्रकार तो खाएंगे भी स्वाद कसैला है यह बता भी देंगे। और रही आपके दफ्तर में नहीं आने की बात तो कौन आना चाह रहा है, मंत्री हो तो आ गए नहीं तो इस भूत बंगले में आने के लिए सबसे फालतू हम ही थोड़े है। अपनी कुर्सी से उठकर मेरे पास आकर गले लगाते हुए बोले नाराज हो गए क्या ?  मैने तुरंत कहा अरे मैं कोई साहिब सिंह वर्मा थोड़े हूं जो इस उम्र में भी बच्चों की तरह बात बात पर नाराज हो जाउंगा। इससे वर्मा सहित हॉल में बैठे करीब 30-35 लोग भी ठहका लगा कर हंसने लगे। और कमरे का पूरा तनाव काफूर हो गया। वर्मा जी ने शिकायती लहजे में कहा यदि तुमसे दिक्कत होगी तो क्या नहीं कह सकता। यही तो हैं कि मुझे भी जब भडास निकलनी होगी तो मुडंका( वर्माजी का पुश्तैनी गांव)  न जाकर यहीं पर तो कहूंगा भी। इस तरह की कई झड़पें हमलोग के बीच हो चुकी थी, फिर भी हम अपनापन और उलाहनों के बंधन में थे। कई बार तो सामने मिलने पर एकदम बच्चों की तरह स्नेह भी करते या दिखाते और की बार तो हूं हां कहकर हमलोगों से कन्नी काट निकल जाते। सबकुछ होने के बाद भी स्वभाव में यह असंतुलन था।         

बाहरी दिल्ली के तमाम गांव और विकास संबंधी बीट होने के नाते श्री वर्मा से लगातार मिलना और फोन पर बातें होती रहती थी। बहुत बार तो कमेंट्स लेने के लिए भी बात करता तो बहुधा हुआ कि मेरी खबर में कुछ नयी और जानकारी देकर खबरो को और बेहतर करवा देते। हमारा इनके साथ इस तरह का नाता हो गया था कि एक मंत्री होने के बाद भी बहुत सारी विसंगतियों वाले इलाके की सूचना देकर काम करने का सूत्र दे देते थे।

मुख्यमंत्री बन जाने के बाद मेरा  पहले  जैसा मेल जोल नहीं रहा। फोन पर भी बातें कम हो गयी। और इनका कोई पर्सनल नंबर मेरे पस नहीं था कि सोते हुए में भी कभी भूत की तरह जगाकर कुछ सूचना या जानकारी ले ही लूं। इस बीच गौसदनों में अनियमितता और 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत दलितों के जमीन आवंटन में हेराफेरी की बहुत सारी खबरों के बाबत वर्मा जी ने कई बार दो तीन दिन इसलिए खबर रोकने का आग्रह किया कि मैं इसकी मौजूदा हाल देखकरही कोई  टिप्पणी और जानकारी दोनों दूंगा। हमारे बीच खबरों को लेकर इतना विश्वास जम गया था कि मैं करीब एक दर्जन खबरें छपने से पहले इनकी नजर में लाया और लेटेस्ट अपटूडेट के बाद ही खबर को छापा। मेरे पास करोड़ों की जमीन को अवैध कब्जें से मुक्त कराने की खबर आयी। जिसको संबंधित विभाग नें माफियाओं के कब्जे से वापस ली थी। तब मैने वर्मा से बात की तो वे चहक गए और विभागीय कर्मचारियों को सम्मानित करते हुए इस खबर को सलाम किया।

लोकसभा चुनाव 1996 में भाजपा के सबसे वरिष्ठतम नेताओं मे एक कृष्ण लाल शर्मा को पार्टी ने बाहरी दिल्ली से उम्मीदवर बनाया। कह सकते हैं कि यह भी पार्टी की एक चाल थी कि शर्मा के बहाने मुख्यमंत्री का पोस्टमॉर्टम भी हो जाएगा।
मगर वर्मा एंड पूरी पार्टी की नियोजित रणनीति के चलते कांग्रेस के दिग्गज नेता सज्जन कुमार को हार का सामना करना पड़ा। श्री शर्मा को विजयी बनवाने के बाद इनका रास्ता निष्कंटक हुआ। चुनाव के दौरान करीब छह सात बार इलाके का दौरा करते हुए कार के पीछे मेरे दोनों तरफ शर्मा एंड वर्मा होते और बीच में मैं । इस दौरान सीएम ने मुझे एक दर्जन से भी अधिक गांवों की जानकरी दी जो बाद में मेरी अच्छी रपट वनी। कह सकते हैं कि वर्माजी से मेरा बहुत बढ़िया तालमेल हो गया था।

श्री शर्मा जी की जीत के बाद पत्रकार पार्टी थी। ( यह वही पार्टी थी जिसमें पंचायत निदेशक के साथ गरमागरमी हुई थी।) उस समय दिल्ली विघुत बोर्ड का निजीकरण नहीं हुआ था। दिल्ली में उस समय आईएएस सागर दपंति की बड़ी धाक थी। दिल्ली विघुत बोर्ड के जीएम जगदीश सागर थे और इनकी पत्नी गीता सागर भी किसी मालदार विभाग की प्रमुख थी। पत्रकार लंच समापन के बाद दिल्ली विघुत बोर्ड के चेयरमैन के नाते मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने हम पत्रकरों के सामने बड़ी अजीब घोषणा की। सीएम के अनुसार आज और अभी तक दिल्ली में एक भी पेडिंग कनेक्शन नहीं है। सीएम ने विभाग की तारीफ करते हुए कहा कि यह एक बड़ी उपलब्धि है कि दिल्ली में बिजली कनेक्शन 100 फीसदी है। और अब दिल्ली में एक भी ऐसा कंज्यूमर नही है जिसने पावर के लिए फॉर्म डाला हो  और उसका कनेक्शन बकाया है।  अब मैं भी क्या करूं अपनी आदत से लाचार कि मेरी जानकरी रहते तो मेरे सामने कोई झूठ बोलकर निकल नहीं सकता। इस घोषणा के बाद मैने ताली बजाकर सीएम से पूछा कि यह आंकड़ा सीएम की है या सागर की है या विभाग की ?  सीएम ने मेरी तरफ ताव से देखा अब क्या दिक्कत है ?  मैने कहा कि वर्मा जी आप तो जमीनी आदमी हो इन अधिकारियों के चक्कर में रहेंगे तो सागर आपको सागर में ही डूबो देंगे।  मैने कहा कि मेरा डीडीए फ्लैट 1991 का है और उसी समय कनेक्शन के लिए पैसा भी जमा किया गया था। पांच साल हो गए आज तक तो मेरा कनेक्शन नहीं हुआ और मेरी तरह ही केवल मयूर विहर फेज-3 इलाके में सैकड़ो फ्लैट हैं जिनके पैसा जमा होने के बाद भी आज सुबह तक तो कनेक्शन नहीं मिला है। मेरी बात सुनकर सीएम की आंखें चौड़ी हो गयी और बोले तो क्या अंधेरे में रहते हो?  फिर मैने हंसकर कहा कि आप मुझे बिजली चोर भी मान सकते है। आपके विजली विभाग के कर्मचारी हर घर से 50-100 रूपये हर माह वसूलते है । मेरे से तो बेचारा पैसा भी यदा कदा जब मैं घर पर नहीं होता हूं तब ले जाता है।  यह हाल तो केवल एक डीडीए कॉलोनी की है। वर्माजी दिल्ली में इस तरह तो लाखों लोग होंगे जिनको कनेक्शन ही नहीं दिया जा रहा है। वर्माजी दिल्ली आपसे ज्यादा कौन घूमा है । इन नौकरशाहों के चक्कर में रहेंगे न तो सागर साहब आपको सागर में ले डूबेंगे। सागर एंड कंपनी की पोल जो खुल गयी तो यह समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री का उग्र स्वरूप कैसा रहा होगा। एक माह के अंदर सही रिपोर्ट की मांग की और मेरे घर पर बिजली कनेक्शन लगवाने के लिए खुद आने को कहा। मैने फौरन कहा इससे गलत संदेश जाता है पर मेरा कनेक्शन कल आप जरूर लगवा दे। अगले दिन सुबह सुबह मेरे घर पर बिजली विभाग के दर्जनों अधिकरी से लेकर मिस्त्री तक आ गए, और  अभी दोपहर तक सही मायने में बिजली का वैध कनेक्शन लग गया।
प्यार मुहब्बत शिकवे शिकायतों के बीच आखिरकार एक दिल 1998 में ठीक दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले बगैर किसी ठोस कारण के साहिब सिंह वर्मा को भी शहीद कर दिया गया। और दिल्ली की नयी मुख्यमंत्री बनी भाजपा की कोकिला सुषमा स्वराज। मगर वे नैय्या को किस तरह पार लगाती। 1998 में प्याज के नाम पर भाजपा सरकार की बलि बेदी के 18 साल हो जाने के बाद भी फिर कभी सत्ता में नहीं पा सकी।
तुनक मिजाजी ही सही मगर हमेशा कॉमन मैन से जुड़े रहने के लिए आतुर साहिब सिंह वर्मा  जीवन भर जनता और पार्टी के लिए भागते रहे। और इसी भागदौड़  के दौरान ही 2007 में राजस्थान से दिल्ली लौटते एक सड़क हादसे के वे शिकार बन गए



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हमेशा रही उनको मुझसे शिकायत
          


1993 दिसंबर में दिल्ली सरकार के गठन के बाद मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के मंत्रिमंडल में खाद्य और आपूर्ति मंत्री यमुनापार के विधायक लाल बिहारी तिवारी को बनाया गया। हमारे संपादक राजीव सक्सेना ने मुझे इसी मंत्रालय को बतौर बीट दिया । काम शुरू करने से पहले एक बात मैं सबको बताना चाहूंगा कि कि तिवारी से हमारा संबंध चाहें जैसा भी रहा हो, मगर 1993 से लेकर आज तक 22 साल के दौरान किसी भी खाद्य मंत्री ने खुद को तिवारी से बेहतर अभी तक साबित नहीं किया है। हां तो मैं अपने बीट पर सक्रिय होने से पहले मैं अपने राशन डीलर की दुकान पर गया और आस पास के 10-12 दुकानों के पते लिए। राशन डीलर को किस किस तरह की दिक्कतों समस्याओं और कमियों का सामना करना पड़ता है। सरकार से भी इनकी कुछ मांगे हैं क्या ? इस बाबत जानकारी ली। कुछ राशन डीलर नेता सूरजमल वर्मा और शंभूदयाल खंडेलवाल समेत आस पास के पांच विधानसभा के राशन दफ्तरों के भी हाल चाल लिए और दिक्कतों को लेकर पूरी जानकारी ली। इस तरह एक ही दर्जनों डीलर से यारी भी हो गयी। यानी चार पांच दिन के भीतर उचित दर दुकान में होने वाली हर उचित अनुचित काम का ब्यौरा मिल गय। और मंत्री से मिले बगैर ही 10-12 वैसी खबरें और कुव्यवस्था की खबरें छापी।  जिसको एक चुनौती की तरह ही मंत्री तिवारी को भवि,य में लेना होता।

मंत्री बनने के कोई 15 दिन के बाद मैने इनके पीआरओ रामकिशन से मिला और मंत्री जी से मिलने के लिए कोई समय निकलने की बात कही। और जब मैं तिवारी के पास बैठा तो मेरे सवालों से ज्यादा बहुत सारी उस सड़ी गली व्यवस्था और अनियमितता और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारने पर तिवारी ने बात की। मंत्री बनने से पहले लाल बिहारी तिवारी इसी राशन विभाग में काम करते थे। मंत्री बनने पर उस समय के खाद्य आयुक्त ने मंत्री से मिलकर स्थानांतरण कराने का निवेदन किया। और बडप्पन दिखाते हुए मंत्री तिवारी ने सीएऐम से कहकर उनको मुक्त कर दिया। मेरी पहली मुलाकात बहुत अच्छी रही और एक ही बैठक में इस विभाग को मैने मंत्री से ही स्कैनिंग करवाई। मुख्य समस्याओं दिक्कतों फर्जी राशनकार्डो से लेकर बहुत सारी समस्याओं पर श्री तिवारी बक गए। जब मैं एक घंटे के बाद उनके यहां से निकला तो एक आक्रमक इंटरव्यू के अलावा 30-35 खबरों के सूत्र भी साथ लेकर ही निकला, जो वे खुद ही दे रहे थे। रोजाना दो एक खबरें छपने लगी। इसके अलावा राशन डीलर नेताओं की सूचनाएं और कमीशन बढाने को लेकर देश व्यापी आंदोलन में दिल्ली को फोकस करते हुए खबरों की झड़ी लगी रही।

शुरूआती खबरों पर तो जोरदार ठहाके लगा लगाकर खबरों पर खुशी जाहिर करने वाले श्री तिवारी तीन चार माह के अंदर ही बौखलाने लगे। राशन डीलरों की धांधली पर भी खबरे दी। और सबसे अचरज की बात कहे या मुख्य धांधली कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदाम से निकलने वाले गेहूं और चावल राशनडीलर की दुकान तक आते आते इस कदर खराब और मिलावटी हो जाता कि इसकी गुणवत्ता पर हमेशा खबरें बनती रही। मंत्री महोदय भी कोई ठोस रास्ता नहीं निकल सके। राशनडीलर की दुकान तक खाद्यान्न पहुंचाने वाली दिल्ली खाद्य आर्पूति निगम भी लगातार विवादों में रही। इस मिलावट से हमेशा एफसीआई ने अपनी भूमिका से इंकार किया। इसीमुद्दे पर एक बड़ी खबर छपी तो एफसीआई के दिल्ली हेड आर के सिवाल का मेरे पास फोन आया कि क्या खबर छाप दे हो अनामी। मैने उनसे कहा पहले पेपर देखिए कुछ नही छापा है। दोपहर को अंबादीप बिल्डिंग वाले रिपोर्टिंग दफ्तर में सिवाल धमक गए।  एकएक दप्तर में सिवाल को देखकर चौंका भी मगर रिसेप्शन पर खड़े खड़े पूरी खबर पढ़ी और संतोष जाहिर करते हुएकबर की तारीफ के साथ मेरे चाय के ऑफर को नकारते हुए चले गए। जाते जाते सिवाल ने कहा कि मेरे पास कई फओन आ गे तब जाकर मैने सोचा कि सीधे चला जाए।  इससे पहले सुबह सुबह मेरे घर पर तिवारी का फोन आ गया। आपको मेरे से क्या परेशानी है अनामी। मैने कहा कि मुझे क्यों होगी विभाग की परेशानी है तो खबर बनेगी ही। मेरी बात सुनते ही कहा और कोई पेपर तो नहीं लिख रहा है केवल आप मेरे लिए हेडक बने हो। अरे कोई नहीं लिख रहा है तो यह मेरी समस्या नहीं है। मंत्री जी नहीं माने नहीं नहीं मैं आज ही आपके संपादक से बात करूंगा। मैने पलटते ही अपने संपादक के घर और दफ्तर के नंबर देते हुए कहा कि अब आप मेरे से नहीं उनसे ही बात कर लिया करें। पता नहीं मेरे संपादक राजीव सक्सेना ने फोन पर उनकी क्या खबर ली। मेरे दप्तर जाने पर संपादक ने मुझे बुलाया और मेरे काम की सराहना करते हुए एकदम रहम न बरतते हुए सिलसिला जारी रखने को कहा। उधर मेरी खबरों का क्या असर पड़ता इसके लिए उनका पीआर रामकिशन और ऑफिस हेड अनिल बैजल से रोजाना हाल चाल मिलता रहता था।        

1995 में किसी एक दिन सचिवालय में मुझे देखते ही तिवारी जी मेरे पास आए और सबों के सामने कहा कि अनामी तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो भाई। इस शिकायत पर मैने फौरन कहा आप मंत्री हो मैं तो केवल बीट देख रहा हूं खबरें लिख रहा हूं आप तो इसी डिपार्चमेंट में बाबू रहे हैं तो हालात को सुधारिए न। में तो एकदम सामान्य घपले घोटाले कार्डधारकों को अनाज चीनी किरोसीन तेल ना मिलने की शिकायत पर लिख रहा हूं । इलाके के अधिकरियों से कहो न कि वे हरामखोर क्या कर रहे है? मेरी तमाम सफाईयों पर भी उनकी शिकायत बनी रही कि तुम यार मेरे पीछे पड़े हो। आखिरकार मैने कह ही दिया कि आप कह रहे हैं न कि मैं पीछे लगा हूं तो कल अपकी खबर लगाउंगा कि मलाई कौन चाभ रहा है ? मंत्री एकदम खामोश हो गए क्या खबर है क्या खबर है जानने की हर संभव कोशिश की।  मैने बहुत सारे पत्रकारों के बीच में ही कह दी कि तिवारी जी 10 दिन से खबर मेरे पास थी पर अब छपेगी। अगले ही दिन अपने घर के बाहर करीब एक लाख रूपये का शानदार गेट लगवाने वाले इसके लिए उपकार करने वाले डीलर और अधिकारी का नाम देकर खबर छप गयी। सुबह सुबह तिवारी जी का फोन फिर मेरे संपादक के घर पहुंच गया और उन्होने सुबकते हुए मेरी शिकायत और ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया। मेरे संपादक ने न जाने तिवारी जी को कितना फटकारा और क्या क्या कहा यह तो मैं आज तक नहीं जान पाया. मगर दफ्तर में पहुंते ही खबरें लगातार लिखने का फरमान जारी किया। और पांच सात दिन के बाद सचिवालय में तिवारी जी से मिला तो मुझे देखते ही तिवारी जी ने हाथ जोड़ दी। अब मैं कुछ नहीं कहूंगा जो मन में आए वो लिख दिया करे। संपादक गाली देता है और रिपोर्टर बात मानता नहीं तो जो मन में आए लिखो भाई। मैं इनके पास बैठ गया और पूछ आप सही सही बताइए तिवारी जी क्या मेरी खबर गलत होती है? यह सुनते ही वे फिर भड़क गए।  अरे गलत नहीं होती है इसका क्या मतलब कि रोजाना रोजाना खबर देना तो पीछे पड़ना ही तो कहेगे। मैने कहा कि चले सीएम खुराना जी के पास यदि वो मना कर देंगे न मेरा संपादक कुछ भी कहे मैं आपके विभाग पर नहीं लिखूंगा।

इस बीच 15 लाख से ज्यादा गैस धारको से किरोसीन तेल का कार्ड सरेंडर कराना और बीपीएल से उपर वाले करीब 25 लाख कार्डधारको को केवल राशन में चीनी देने का अधिकार रखते हुए गेंहू चावल की आर्पूति पर रोक लगा दी। 1991 की जनगणना के मुतबिक दिल्ली की आबादी केवल 93 लाख की थी, मगर दिल्ली में 1994 तक डेढ करोड़ से ज्यादा यूनिट के कार्ड थे। यानी दिल्ली की आबादी राशन कार् के अनुसार डेढ करोड थी। एक मुहिम चलाकर श्री तिवारी ने करीब 30 लाख फर्जी यूनिटों और राशन कार्डो को भी कैंसल कराया। और इन उपलब्धियों पर राष्ट्रीय सहारा ने ही बढ चढ़कर छापा कि किस तरह तिवरी ने इसे संभव किया।    
1996 में 10 वे लोकसभा के गठन के केवल 13 माह की भाजपा सरकार के पतन के बाद 1997 में हुए उपचुनाव 98 और 1999 में 11 वें 12 वें  लोकसभा चुनाव में व लगातार जीत हासिल कर पूर्वी दिल्ली से सांसद बने। सांसद बन जाने के उपरांत एक तरह से हम दोनों में तलाक हो गया। हालांकि वे अब हमारे सांसद थे। एक जनप्रतिनिधि के नाते तो मेरा जन अधिकार बढ़ गया था पर हमलोग दो एक साल नहीं मिले। मगर त्रिलोकपुरी में एक राशनडीलर खजांची लाल गोयल की बेटी की शादी में मैं भी गया था, और संयोग से सांसद लाल बिहारी तिवारी भी अपने लाव लश्कर के साथ पहुंचे थे। खान पान के बाद चलने से पहले मैने सोचा कि चलो सासंद से मिलते ही चला जाए। ( बतौर संसद मैं इनसे कभी मिला नहीं था) एक खास भीड़ से घिरे तिवारी के पास मैं ज्योंहि पहुंचा तो दुआ सलाम के बाद मेरा हाथ पकड़कर उपर उठया और अपने साथ रहने वालो को संबोधित किया ये पत्रकार जी है और मेरे पीछे तो नहा धोकर पड़े हुए थे। रोजाना न्यूज रोजाना न्यूज। और संपादक गाली से बात करे बाप। मुझे लगा कि इसको सबक सीखना जरूरी है। मैने फौरन कहा कि सांसद बनने के कई साल के बाद आपसे मिल रहा हूं। कोई गैस कोटा की मांग की। नहीं तो पीछे कहां था तिवारी जी एक पत्रकार का जो काम है वहीं कर रहा था । आप इसको पर्सनल क्यों ले रहे है। मगर तिवारी जी अपने खुमार में थे और मुझे लगाकि वे अपने चमच्चों के बीच मेरा उपहास करके नंबर बढाने वाले हैं। मैने कहा तिवारी जी सही मायने में तो आपके पीछे पड़ने का असली समय तो अब आया है क्योंकि अब आप मेरे संसद है। और चुनाव में न जानवे कितने आश्वासन दिए थे। एक वोटर होने के नाते यदि अभी आपको कॉलर पकड़ उठा भी लूंगा न तो पुलिस मेरे खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है। यह एक सांसद का अपने वोटरों के साथ किया गया छल माना जाएगा। मेरी आवाज तेज हो गयी थी तो मेरे कई डीलर दोस्त भी आ गए और मामले को संभाला। इसके बाद  श्री तिवारी से एक और मुलकात हुई। इस बार कोई तकरार तो नहीं हुआ पर मेरे प्रति शिकायती भाव और लहजा बरकरार रहा। अंत में जाते समय मैने श्री तिवारी को कहा कि आप मेरी खबरों को आज उठाकर देखेंगे न तो मेरे प्रति लट्टू हो जाएंगे। कि मैने आपको कितना फोकस किया था। आपके बेहतरीन कार्यो को हमसे ज्यादा कौन छापा । फिर भी तिवारी जी मेरे प्रति शिकायती लहजा ना रखे । यह मेरे को बुरा लगता है, बाकी लिखने को तो कितनों पर लिखा मगर 8-10 साल के बाद भी आपमें नाराजगी मुपझे ठीक नहीं लगती बल्कि कचोटती है।। इस पर वे मुस्कुराने लगे। मैने फिर कहा जानते हैं तिवारी जी जिन जिन पर मैने सबसे ज्यादा लिख है जिनकी कलई खोलने में कहीं पीछे नहीं रहा वे लोग ही मेरे से सबसे ज्यादा मुस्कुरा कर मिलते हैं। मैं तो एक सुयोग्य मंत्री पर लिखा है, जिसने सड़ी गली व्यवस्था में व्यापक सुधार किया। । संसद बनने के बाद इनकी राजनीति लगभग खत्म सी ही हो गयी है और ये भी पार्टी से या ( में ) भूल दिए गए है।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

मदनलाल खुराना से अपनी याराना







इस तरह मैं बना उनका चहेता

अनामी शरण बबल


एक लंबे अर्से के बाद कई पत्रिकाओं में काम करने के बाद 1993 दिसम्बर से मैं राष्ट्रीय सहारा के साथ जुड़ा। दिसम्बर 1993 माह के पहले ही सप्ताह में विधानसाभा चुनाव में बहुमत से विजयी भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना को अपने मंत्रीमंडल के साथ शपथ लेना था। चार दशक के बाद दिल्ली सरकार के गठन को लेकर भाजपा के विधायकों से भी ज्यादा उमंग उत्साह और उतावलापन मीडिया में था। शपथ ग्रहण समारोह में देश विदेश की सैकड़ों मीडिया और 500 से भी ज्यादा पत्रकारों का जमाव़ड़ा लगा। सारी मीडिया खुराना को लेकर पगलाई जा रही थी। खींचतान धक्कमपेल और आपाधापी के बीच पूरे माहौल में एक अजीब तरह की उन्मादी खुशी और उतेजना थी। पत्रकारों के इसी मेले में मैं भी था। पगलाए से पत्रकारों की भीड़ और मंत्रियों को देखने की ललक को देखकर मैं बाहर जाने के लिए उठकर खड़ा हो गया। मेरे मन में यही भाव उठा कि यहां पर तो बहुत भीड़ है भाई है अपनी दाल गलने वाली नहीं है।
दिल्ली के सभी 70 विधायकों की सूची मेरे पास थी। इस बार चुनाव के इकलौते निर्दलीय विधायक जितेन्द्र कुमार उर्फ कालू भैय्या और एकदम गांव देहात के गंवई विधायकों को खोजने में लगा। संयोग से कालू भैय्या मिल गए और जब मैने अपना परिचय दिया तो वो बेचारा मेरे सामने दंडवत सा हो गया भईया यहां पर हमलोग को तो कोई पूछ ही नहीं है। आप पहले पत्रकार हो जो मुझे खोजते हुए आए। मैने कहा यार दिल्ली में दो ही इकलौते हैं एक तुम और दूसरा सीएम। पर तुम मेरे लिए खुराना से भी ज्यादा बड़े हीरो हो कि अपने बूते जीते हो। मेरी बात सुनकर वह मेरे गले लग गया। मैने कहा कि मीडिया में मैं तुमको खुराना से ज्यदा कवर करूंगा पर इसके लिए अपने इलाके की तमाम विसंगति पूर्ण स्टोरी बतानी होगी, मेहनत करनी होगी। हम दोनों ने फोन नंबरो का लेनदेन किया। कालू भैय्या ने ही आस पास के बैठे चार पांच विधायकों से मिलवाया। सबों से नंबर लेकर मे मैने सबों को हीरो बनाने का जाल फेंका। एक तरफ खुरान एंड़ कंपनी का समारोह पूरा हुआ तो मेरे पास भी अनाम अज्ञात करीब 13 विधायकों की जन्मकुंडली आ चुकी थी। और मैने उसी समय तय किया कि विधानसभा के गठन से क्या दिल्ली का दुख कम होगा? इस पर काम करना है। सभी विधानसभा क्षेत्रों की सबसे बड़ी समस्या और कठिनाईयों को फोकस करते हुए स्पेशल स्टोरी पर काम करना है।
आमतौर पर जहां मीडिया की भीड़ लगी रहती है तो मैं वहां से परहेज करता हूं। अमूमन लोग एबीसीडी से ...जेड तक की यात्रा करते हैं मगर मैं हमेशा अपना
सफर एक्स वाई जेड से शुरू करता हूं क्योंकि इधर भीड मारामारी और लोगों का ध्यान नहीं जाता। एक सप्ताह के अंदर 30 से ज्यादा विधायकों से बात भी हो गयी और एक ही दिन में कई कई बार फोन कर करके मैने अपना नाम इनलोंगों को रटवा दिया। और कई जगह पर पेपर में कोई टिप्पणी या सामयिक मुद्दों पर अपने प्यारे विधायको के नाम डालकर और सुबह सुबह फोन करके बताते हुए नए विधायकों को अपने मोहजाल में बांध लिया। दिसम्बर 1993 के अंत तक मेरे खबरों के खजाने में खबरे ही खबरें आने लगी। और 70 नंबर के जहंगीरपुरी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक से मेरा न्यूज रेल चालू हुआ। मेरे न्यूज बैंक में लगातर खबरें बढ़ रही थी । और मैने दिल्ली पर उल्टा पिरामीड की तरह काम आरंभ कर दिया।
एक लंबे समय के बाद दैनिक पेपर से जुडाव के बाद मुझे खबर लिखने में बहुत दिक्कत हो रही थी, पर खबरों की बौछार को देखते हुए संपादक राजीव सक्सेना और चीफ रिपोर्टर डा. रवीन्द्र अग्रवाल ने इस कमी को जल्द से जल्द दूर करने का अल्टीमेटम दिय। खैर न्यूज बैंक में इतनी तरह की बेशुमार खबरें जमा होने लगी । उधर एक माह के अंदर मैं 25-30 विधायकों को अपना बना कर दोस्ती गांठ ली। और एक से बढकर एक दिल्ली की नाक काटने वाली बदनाम कहानियां लिखी। जिससे मेरे अखबार नें मुझे प्रतिष्ठा के साथ मेरी एक दिल्ली की मीडिया में पहचान दिलाई। और मैं अपने तमम बीट पर सक्रिय रहते हुए जेड टू ए का आहिस्ता आहिस्ता काम करते हुए अपने संपंर्क मजबूत करता रहा।
अप्रैल 1994 के मध्य तक दफ्तर में एक दिन एकाएक मुख्यमंत्री कार्यालय से मेरे लिए फोन आया। बात करने पर बताया कि मुख्यमंत्री खुराना मुझसे मिलना चाहते है। मैने फौरन कहा केवल चौथे ही माह में, मैं तो इस साल के अंत तक मेल मिलाप की उम्मीद कर रहा था। उधर से पूछा कि कब आएंगे ? मैं अगले ही दिन मिलने का समय ले लिया। सचिवालय में उनके सहयोगियों के कमरे में जा पहुंचा। मै आ गया हूं यह बात अंदर जाकर खुराना जी को बतायी गयी, और मुझे अंदर जाने के लिए कहा गया। मैं हॉल में ज्योंहि प्रवेश किया तो देखा कि मुझे देखते ही खुराना जी अपनी कुर्सी से उठे और मुस्कान बिखेरते हुए दरवाजे की ओर तेजी से लपक कर आने लगे। बीच में ही मुस्कान और थूक के भरपूर छींटों के बीच मुझे गले से लगा लिया। उलाहना और शिकायती लहजे में कहा कि मैं रोजना अनामी को अखबर में देख रहा हूं पर सचिवालय में कभी नहीं। मैं तुमसे मिलना चाह रहा था। अब जाकर फोन करके ही मुझे बुलाना पड़ा। तब मैने हंसते हुए कहा कि मेरी लिस्ट मे तो आप नंबर 70 थे, और मैं तो इस साल के अंत तक मिलने की उम्मीद कर रहा था। और शपथ ग्रहण समरोह की अपार भीड़ के बाद अपनी बदली हुई न्यूज रणनीति की पूरी स्टोरी खुराना जी को सुना दी। मेरी कहानी सुनकर वे हंसते हुए लोटपोट हो गएय़ हॉल के अंदर वाले निजी कमरे में उन्होने अपने साथ ही लंच भी किया, और अपने घर के बेडरूम का एकदम पर्सनल नंबर दिया। इस सलाह के साथ रात 10 बजे से सुबह 10 बजे तक मैं इसी नंबर पर रहता हूं। मेरी जेड न्यूज प्लान की तारीफ की और यह भी कहा कि तुम्हारी रिपोर्ट के बाद मैने अपने सभी 70 विधायकों को अपने इलाके की समस्याओं संकटों और जरूरतों की सूची मांगी है। तुम्हारी रिपोर्ट की भी एक फाईल बनवा रहा हूं। तब मैंने चहक कर कहा तो उसकी फोटोकॉपी मुझे भी चाहिए।
इस मुलाकात के बाद खुराना जी से अक्सर फोन पर बातें हो जाती थी। दो तीन दफा बात हुई । कभी उनकी तरफ से भी रात में मेरे पास कई बार फोन आया और उसी दिन की छपी किसी रपट पर उन्होने मेरी तारीफ की तो कई बार उलहना किया। मगर सरकर द्वारा आवंटित गौसदन योजना पर मेरी धुआंधार खबरों पर पहले तो काफी आपति की और बाद में मेरी बहुत सारी खबरों पर सहमति भी प्रकट की। और अंत में मेनका गांधी समेत दिल्ली के तमाम असरदार लोगों के गौसदन निरस्त कर दिए गए। मुलाकात की बजाय फोन पर मेरा रिश्ता ज्यादा घनिष्ठ चलता रहा। ।
1994 के बारिश के मौसम में ही दिल्ली की समस्त सड़कों को ठीक कराने और उद्यान विभाग के कार्यो में वृक्षारोपण हरियाली के लिए पेड़ पौधे लगाने की पूरी जानकरी देने के लिए एक प्रेस टूर रख गया। पत्रकारों को लेकर बस चली नहीं कि मुख्यमंत्री खुराना का रूप बदल गया। वे एक टूरिस्ट गाईड बन गए। सधे हुए तेजतर्रार गाईड की तरह करीब चार घंटे तक दिल्ली की सैकड़ो सड़कों की पूरी लंबाई के साथ विकास निर्माण और हरियाली का खाका रखा। कितने कितने करोड़ में सड़क और बागवानी के काम हुए हैं इसका ब्यौरा भी दिया। लगभग सारे पत्रकारों ने गाईड की भूमिक की सराहना की। उत्कृष्ट अगवानी मेहमानबाजी के उपरांत शाम तक हम सारे पत्रकार अपने अपने दफ्तर पहुंचे। मैने भी तीन चार खबरों की पूरी पैकेज बना दी और मेन स्टोरी सीएम बन गाईड को फोकस कर दिया। अगले दिन इस खबर के लिए अपने अखबार की खूब चर्चा रही ,तो रात में फोन करके खिलखिलाते हुए श्री खुराना भी इस खबर पर बार बार मोहित होकर सराहना की।
सीएम बीट नहीं होने के कारण मेरा रोजाना उनसे सामना नहीं होता था पर वे मेरे नाम को इस कदर रट गए थे कि कहीं दूर से भी देखने पर भी अनामी...अनामी का जाप करने लगते। और जब भाजपा की अंदरूनी राजनीति के वे शिकार बन कर उनको अपना पद छोड़ना पडा तो सचिवालय के उनके निजी कक्ष में मैं भी था। मुख्यमंत्री बनने से पहले विकास मंत्री साहिब सिंह का मुख्यमंत्री बनना लगभग तय हो गया था। वर्मा के यहां आने पर सब हंसते मुस्कुराते रहे। और अंत में मेरा हाथ पकड़कर वर्मा को थमाते हुए श्री खुराना ने कहा पत्रकारों में यह मेरा सबसे अच्छा और प्यारा दोस्त है। मगर लिखने में खाल नोंच लेता है । इसका ख्याल भी रखिएगा और इससे सावधान भी रहिएगा। विकासमंत्री वर्मा मुझे पहले से भी जानते थे श्री खुराना के सामने गले लगाते हुए तुरंत कहा बबल तो मेरा पहले से ही प्यारा मित्र है। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी मैं काफी समय तक संपंर्को मे रहा। यदा कदा हाल चाल पूछ भी लेता था। मगर इधर काफी साल हो गए जब मैं इस जिंददिल और उन्मुक्त हंसी के लिए जगत विख्यात ईमानदर मगर अपनी ही पार्टी में या (से) उपेक्षित श्री खुराना से फिर नहीं मिला।

शनिवार, 2 जुलाई 2016

मेरे जीवन के थ्री इडियट- / अनामी शरण बबल









मेरे जीवन के थ्री इडियट-1


अनामी शरण बबल

( मेरे जीवन में इडियटों की कोई कमी नहीं है पर कुछ इस तरह के भी होते हैं जिनकी छाप मन में अंकित हो जाती है। )
अपने पत्रकारीय जीवन में सैकड़ों लोगों से घुलने मिलने कहकहा लगाने का मौका मिला। यूं तो बहुत सारे अधिकारियों नेताओं से हर तरह के अनुभव रहे हैं पर दिल्ली रिपोर्टिंग के दौरान तीन इस तरह के लोग रहे हैं जिनसे मुझे और बढ़ चढ़ करकाम करने की एक प्रेरणा मिली।.यहां पर अपने साथ तीन अधिकारियों के अनुभव लिख रहा हूं जिससे भले ही तकरार हुए हो पर उनको गलत सबित करने का मुझे हमेशा बल मिला। इस बार के मेरे अधिकारियों में हैं दिल्ली पंचायत निदेशक , दिल्ली मौसम विभाग के निदेशक और दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त (अलीपुपर/कल्याणपुरी)

दिल्ली में पांच ब्लॉक होते थे। जिनके अंदर लगभग 200गंव आते हैं। (यूं तो दिल्ली में 364 गांवों का इतिहास रहा है, मगर विकास की आंधी में कुछ गांव पूरी तरह खत्म हो गए तो कुछ केवल डीटीसी बस स्टॉप के नामों में सिमट कर रह गए। हर साल इन गांवों के नाम पर एक हजार करोड़ रूपयों की बंदरबॉट होती है और फाईलों में ही अनगिनत काम पूरा हो जाते हैं। खुद गांव से होने के नाते मेरे मन में गांवो को लेकर अजीब तरह का लगाव और आर्कषण रहा है। यह बात 1995 की है। मोरी गेट कोर्च में मैं अपने एक मित्र मेद सिंह के पास बैठा था। मेद डी मुझे आज तक बबल सेठ ही कहते है। उनसे गांवों की बदहाली और ग्राम सभा
की सैकड़ों एकड़ जमीनों पर अवैध कब्जें की खबरें भी मुझे मिलती रहती थी। मेद सिंह इसी मामले के वकील थे। उन्होने मुझे मोरी गेट के उपरी तल पर बने पंचायत निदेशक से जाकर मिलने की सलाह दी।

मैं भी उस समय खाली था, तो पंचायत निदेशक डी.आर.टम्टा के दफ्तर के बाहर था। कार्ड अंदर भेजा तो अगले ही पल मुझे बुला भी लिया। सामान्य शिष्टाचार और परिचय के बाद जब मैने बातचीत शुरू की। हां इस बीच निदेशक टम्टा ने चाय का आदेश भी दे दिया था। मेरे कार्ड को लेकर एकदम दार्शनिक अंदाज में टम्टा ने कहा मैं किसी मीडिया की परवाह नहीं करता । मेरे नाम को कार्ड पर देखकर फिर टम्टा बोले आपका नाम तो बहुत सुदंर और अलग है, पर आपके मन में जो आए बिना पूछे लिख सकते है। निदेशक की बेबाकी और नीडरता को देखकर मैं चकित सा था। एकदम आपको सबकुछ लिखने की छूट मैं दे रहा हूं अनामी । जो मन में आए लिख देना । जरा मैं भी देखूं कि कौन मीडिया वाला कितना लिख सकता है। निदेशक के तेवर को देखकर मैने भी अपनी कॉपी किताब बंद कर ली। मैने टम्टा से कहा कि यह बहुत बड़ा चैलेंज दे रहे हो । इस पर लगभग बौखलाते
हुए कहा कि मैं नहीं डरता। मैने फिर कहा कि इतना साहस तो मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा भी मीडिया के सामने नहीं कर सकते। इस पर एक गाली निकालते हुए टम्टा ने कहा मैं इन मादर....की परवाह ही नहीं करता और मुझे कौन सा इलेक्शन लड़ना है। अपनी सरकारी नौकरी है जिसे कोई खा नहीं सकता । और ये नेत तो पांच साल बाद फिर सड़क छाप ही रहेंगे। पंचायत निदेशक की बात मेरे लिए एकदम खुला चैलेंज सा था। मैने उनकी साफगोई और हिम्मत की दाद दी मगर यह भी आगाह किया इस बार आपका पाला अनामी से हैं मैं भी आपको मीडिया की ताकत दिखाकर गुमान न तोड़ा तो आप भी याद करोगे। इस बीच चाय भी आ गयी। इस प्रकरण को बंद करने के नाम पर टम्टा बोले छोडो ये सब तो कल की बातें हैं कि क्या होगा, अभी तो आप मेरे साथ लीजिए। अपने बैग को संभाल कर मैं खड़ा हो गय। मेरे खड़ा होने से वे दंग रह गए और कहा प्लीज टी। मैने कहा टम्टा जी अब कैसी चाय? मुझे तो मीडिया की लाज रखनी है। एकदम गांठ बांध ले कि मैं भी बहुतों के बीच आपकी नाक नहीं काटी तो उसी दिन ई पत्रकारिता छोड़कर चाय बेचना चालू कर दूंगा। पर याद रखना। बात मीठे गरम तेवरों के साथ खत्म हो गयी। निदेशक टम्टा ने बैठे बैठे ही अपना हाथ आगे कर दिया। मैने तुरंत हंसते हुए कहा कि मै बैठे हुए लोगों से हाथ नहीं मिलाता या तो खड़ा हो नहीं तो अपना चैलेंज है ही। तब कहीं जाकर टम्टा ने अपनी कुर्सी छोड़ी और हाथ मिलाया। कमरे से बाहर निकल मैं मोरीगेट कोर्ट की तरफ चल पड़ा

मैं एक बार फिर अपने मित्र मेद सिंह के पास था। उसने चहक कर कहा हो गयी बात। मैने टम्टा से हुई बात का पूरा ब्यौरा सुना दिया। मैने कहा मेद भाई अब तुम्हारे छोटे भी की इज्जत तेरे हाथ में हैं । खड़ा होकर मेरे को गले से लगाते हुए मेद सिंह ने कहा बबल सेठ अरे चिंता किस बात की। हमलोग मिलकर उसको सूर्पनखा बनाएंगे। तीन चार स्टोरी के फौरन दस्तावेज और कॉपी निकाल कर दिय। जिसमें पंचो और ग्रामप्रधानो द्वारा ग्राम सभा की सरकरी जमीन बेचने का मामल था। इसी मीटिंग में तय हुआ कि सोमवार और शुक्रवार को इसी कोर्ट में हर सप्ताह मिलेंगे और टम्टा का चीरहरण करेंगे। और फिर जो धुंआधार खबरों की ऐसी रेल चली कि किसी किसी दिन तो ग्राससभा की गड़बड़ियों की तीन तीन खबर छपने लगी। पंचायतों की लापरवाही और ग्रामप्रधानों और पंचों के कारनामों घोटाले की झड़ी लगा दी। सभी खबरो के अंत में मैं यह जरूर लिखता कि पूछे जाने पर पंचायत निदेशक ( नाम जरूर देता था) ने अनभिज्ञता प्रकट की या कभी कोई टिप्पणी करने से इंकार किया या फिर किसी किसी खबर में यह भी लिख देता था कि इस मामले की जांच हो रही है। उधर पंचायत निदेशालय में आग लगी थी। विकास मंत्री और कई बार मुख्यमंत्री साहिव सिंह वर्मा ने टम्टा से सफाई मांगी, जवाब तलब भी किया। मगर निसंदेह टम्टा ने कभी भी फोन करके खबरों को रोकने की बात नहीं की।
इसी बीच 1996 में लोकसभा चुनाव हुआ। भाजपा के छह उम्मीदवार छह संसदीय क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे थे और बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से वरिष्ठ नेता कृष्ण लाल शर्मा के लिए पूरी पार्टी लगी थी। बाहरी दिल्ली से ही आने वाले मुख्यमंत्री की भी इससे लाज जुड़ी थी। एक लाख 98 हजार वोट से कांग्रेस के दिग्गज सज्जन कुमार को पराजित किया । जीत की खुशी में मुख्यमंत्री ने तमाम पत्रकारों को पार्टी दी थी। मैं मुख्यमंत्री के पास ही बैठा था कि एकाएक पंचायत निदेशक टम्टा कहीं से प्रकट हुए और अपना सिर मुख्यमंत्री की गोद में छिपाकर सुबकने लगे। एकाएक इतने सीनियर अधिकारी के रोने से मुख्यमंत्री भी अवाक रह गए और टम्टा को सांत्वना देते हुए जिज्ञासा प्रकट की। टम्टा ने मेरी तरफ संकेत किया और बोले मुझे इस भूत से बचाइए। ये न मुझसे बात करते हैं और कोई बात सुनते हैं और मेरा नाम दे देकर कही का नहीं रहने दिया है। मैं भी तुरंत खड़ा हुआ और जोश में कहा कि झूठा मुझे तो जूते निकल कर मारना चहिए पर मैं सीएम का लिहाज कर रहा हूं। मै सीएम को कहा ये साला तो आपकी मां को गाली दिया था। पुछिए क्या मैं झूठ बोल रहा हूं। इसने मुझे खुला चैलेंज दिया था कि मैं मीडिया की परवाह नहीं करता जो मन मे आए लिखते रहे। मेरा प्रवचन जारी रहा और इसके चैम्बर में ही मैने कहा था कि यदि मीडिया की लाज नहीं रख सका तो पत्रकारिता छोड़कर चाय की दुकान लगा लूंग। टम्टा के सामने आकर मैने पूछा बात हुई थी न । सुबकते हुए टम्टा चेहरा लटकाए खामोश खड़ा रहा। तब सीएम वर्मा ने उससे कहा जरूर तेरी गलती होगी मैं अनामी को सालों से जानता हूं वो बिना आग लगे इतना बौखला ही नहीं सकता। पार्टी का खुशनुमा माहौल फिर सामान्य सा हो चला था। मायूष खड़े ट्म्टा के पास मैं खुद गया और कहा कि चलो यार जब चैलेंज ही खत्म हो गयी तो फिर शिकवे गिले भी छोड़ो। मेरे अनुरोध के बाद भी वे वहीं खड़े रहे तो मै भी टम्टा से अलग होकर पार्टी और अपने दोस्तों में खो गया। बाद में जब मुझे अखबार में परिवहन मंत्रालय दी गयी तो मैं संभवत अप्रैल 2003 में एक दिन दिल्ली परिवहन निगम के मुख्यालय में गया। सामने डी. आर टम्टा का बोर्ड टंगा था । मैने मिलने की कोई पहल नहीं की,। उनका पहले ही ट्रांसफर हो चुका था। अगली दफा जाने पर पर मालूम चला कि वे सचिवलय में चले गए हैं



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अंत में मिलने की चाहत


दिल्ली के मौसम विभाग के निदेशक का नाम सतीश चंद्र गुप्ता था। मेरे पास मौसम विभाग भी होत था। दिल्ली में कई मौसम विज्ञानी दोस्त उपनिदेशक बनकर देहरादून और मसूरी में मौसम विभाग के निदेशक बन गए तो मुझे फोन करके बतया कि बातें किया करो अनामी जी मैं 48 घंटा पहले ही दिली के मौसम का हाल बताया करूंगा। सबों ने यही कहा कि फोन आपको करना होगा ताकि याद आ जाए। खैर इनलोगों से बड़ी मदद ली और दिल्ली के मौसम को हमेशा दो एक दिन पहले रखा। पर मैं इस समय श्री सतीशचंद्र गुप्ता पर बात कर रहा हूं। लगभग तीन साल तक संवाद का सिलसिला जारी रहा। श्री गुप्ता से बिना मुलाकात के बिना ही रोजाना मौसम को लेकर बातें होती रहती थी, लिहाजा केवल चेहरा देखने के लिए अब कौन मौसम विभाग जाए। हमारी बातचीत का क्रम इस तरह परवान पकड़ा कि रात बेरात कभी सुबह या दोपहर में घर हो या दफ्तर एक एक दिन में कई कई बार बात होती थी। और कमाल कि फोन उठाकर हलो या कौन है पूछने की बजाय सबसे पहले कहते हां अनामी बोलो। और इसके बाद वे धाराप्रवाह बोलते बताते । मौसम के बारे में मैं भी काफी कुछ जान गय था लिहाजा गुप्ता जी के संकेत देने या कोई मौसम की शब्दावली के किसी शब्द के इस्तेमाल का अर्थ जानता था। बीच में नो रोक टोक। इस तरह 5-7 मिनट में वे एक ही साथ कई खबर बता जाते थे। जिसे मैं अलग अलग मूड य मौसम के अनुकूल प्रतिकूल करके कई खबर बना देता था। मेरी खबर वे रोजना अपने दफ्तर में पढते थे और उन्होने यह टिप्पणी दर्जनों बार की होगी कि मेरी बातों का जितना सटीक विश्लेषण करके खबर लिखते हो वो सबसे अलग होता है। उनकी सराहना पर मैं हमेशा यही कहता था कि खबर लिखते समय आपकी कही हुई बात याद आ जाती है इसलिए ही सावधन होकर लिखता हूं। बिना मिले हमारा प्रेम और लगाव बरकरार था। फोन उठाते ही नाम लेने पर मैं अक्सर पूछता था कि यह आप कैसे जान जाते हैं कि मेरा फोन है। इस पर वे हंस पड़ते फिर भी मेरी हैरानी बनी रहती। कभी कभी तो घर आकर केवल जांचने के लिए भी रात 11 के बाद फोन कर देता था। तब भी वही जवाब कैसे हो अनामी अभी मौसम शांत है या जैसा होता था बताकर हंसते हुए फोन रख देते।
एक दो बार मैने उनसे पूछा भी मेरे इतने फोन करने या समय असमय लगातार तंग करने पर गुस्सा नहीं आता या नहीं लगता कि परेशान कर रहा हूं। इस पर वे हंसते हुए कहते कि जब तुम्हारा फोन नहीं आता है तब गुस्सा भी आता है और चिंता भी होने लगती है। सही कहो तो तुमसे बात करने का चस्का सा लग गया है और बिन बात किए लगता है कि कहीं कुछ कमी सी है। उनकी बात सुनकर मैं भी हंसते हुए कहा कि सही मायने में मुझे भी बिन बात किए मन नहीं भरता है। और फिर हम दोनों फोन पर जोर से खिलखिला उठते। ।

एक दिन दोपहर में उनका फोन आया। अमूमन फोन मैं ही करता था। वे बोले अनामी तुम्हारी उम्र कितनी है। यह 2003 की बात है। उनके सवाल पर एक बार मैं हंसने लगा क्या सवाल है सर । तो वे बोले अनामी मैं 12 दिन के बाद रिटायर होने वाला हूं। कल रात को तेरे बारे मे सोच रहा था कि पूरी नौकरी में तुम इकलौते हो जिससे मिले बगैर ही तीन साल तक बात करता रहा था। तुमने तो बात करने का चस्का लगा दिया। मैंने अगले ही दिन आने का वादा किया तो उन्होने कहा तुम्हारा लंच कल मेरे साथ रहा। श्री गुप्ता ने कहा मैं भी बहुत उतावला हूं अनामी तुम्हें देखने को कि तुम कैसे हो जिसका मैं आदी हूं। उनकी बातें सुनकर मै हंस पड़ा सर तब तो आपको निराश होना पड़ेगा क्योंकि आपकी लैला या शीरी तो एकदम सामान्य साधारण सा चेहरा मोहरा वाला है। मेरी बातें सुनकर उन्होने कहा चाहें जितना भी साधारण हो मगर मेरी लैला निसंदेह सबसे अलग है कि रिटायर होने वाले को भी अपना मजनू बना दिया है । मैंने हंसते हुए कहा हाय मेरे मजनू । और खिलखिलाते हुए हम दोनों ने फोन रख दी।


अगले दिन मैं एकदम 12 बजे उनके कमरे के बाहर था। कार्ड भेजने पर वे खुद बाहर निकले और संबोधित किय अनामी। मैं सामने ही था और हंसते हुए कहा आप बाहर आए लैला खुश हुई। और हंसते हुए मैं साथ में अंदर चला गया। बीच में खाना भी खाए और चाय कॉफी के कई दौर के बीच लगभग चार घंटे तक हजार तरह की बातें हुई। उन्होने कई बार इसका अफसोस जताया कि तुमसे मुलकत ही तब हो रही है जब मैं जाने वाला हूं यार। तीन साल पहले मिले होते तो अब तक पचास बार मिल गए होते। मैने चुस्की ली यह तो आपकी नहीं भाभी की किस्मत थी नहीं तो लैला मजनू के चक्कर में वो परेशान रहती।.. और मुझे बार बार घर जाकर बताना पड़ता कि उनकी लैला कौन है ? फिर हमलोग खिलखिला पड़े। मैने कहा तो अब इजाजत है ? खड़े होते हुए पूछा कैसे आए हो ? मैने कहा कि आया तो बस से था मगर अभी ऑटो कर लूंगा। उन्होने तुरंत कहा नहीं मेरी लैला मेरी सरकारी गाडी से जाएगी। और अंत में मैने उनके पैर छूए । वे एकदम निहाल से हो गए। अंत में मैने भी उनकी मदद,प्रोत्साहनऔर प्यार के लिए आभार जताया। उन्होने मुझे गले से लगा लिय। ऐसे मौके पर भला मैं कहां चूकने वाला उनकी बांहों में ही पूछा कि बांहों में कौन हैं लैला या अनामी ? यह सुनते ही बांहों की जकड़ सख्त करते हुए कहा दोनों । और अनमने मन से हमलोग अलग हुए। कई माह तक तो बीच में बात होती रही, फिर एक अंतराल आ गया। सरकारी फ्लैट से अलग होने पर फोन नंबर भी बदल गए हमेशा की तरह ही पुराना से पुराना रिश्ता भी एक समय के बाद अर्थहीन हो जाता है। मैं यह तो नहीं जानता कि श्री गुप्ताजी अब कहां पर हैं मगर मेरी यह प्रार्थना है कि वे हमेशा खुश और अच्छी सेहत के साथ रहे।








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पुलिसिया दोस्ती




यह संस्मरण एक पुलिसिया की है। दुख की तो यह बात है कि इतना जिंदादिल इंसान मोतीराम गोठवाल अब जीवित नहीं है। 50 से भी कम उम्र में संसार छोड़ने वाले गोठवाल की पत्नी की भी बहुत याद आती है । हालांकि मैं उनसे कभी मिला नहीं मगर मेरी आवाज सुनते ही सबसे पहले भईया बोलनी और गोठवाल जी कहं पर है यह बताते हुए वहां का नंबर दे देती थी । बात 1994 की है। दैनिक अखबार राष्ट्रीय सहारा में नार्थ ईस्ट का क्राईम भी मैं ही देखता था। दो चार बार गोठवाल से बात हुई तो उन्होने कहा कभी अलीपुर आओ यार गप्प भी करेंगे और क्राईम की ऐसी खबरे दूंगा जो किसी के पास नहीं होगी। एक दो दिन में ही उसने गाड़ी भेज दी तो मैं अपने पुलिसिया मित्र से अलीपुर निकल पड़ा। बहुत ही गरमजोसी के साथ मेल मिलाप हुआ दिल्ली पुलिस में सहायक पुलिस आयुक्त( एसीपी) अलीपुर के प्यार जोश और मिलने की लालसा के चलते हम गहरे दोस्त से बन गए। बिना काम के भी केवल हाल चाल जानने के लिए हमलोग आपस में बात कर ही लेते थे।
मगर अलीपुर एसीपी और किसी पेपर का क्राईम रिपोर्टर के बीच तो आंख मिचौली वाला नाता होता है। जरूरत बे जरूरत बात करने और संपंर्क मे तो रहना ही होता है। लगभग एक दर्जन बार ऐसा हुआ कि जब मुझे गोठवाल से रात में बात करनी हो तो वे घऱ पर नहीं होते। ( उस समय तक मोबइल की पैदाईश नहीं हुई ती। मैं भाभी से पूछता कहां है अपना हीरो? भाभी ने केवल एक बार मुझसे कहा था कि भैय्या मैं आपको हमेशा बता दिया करूंगी कि हीरो कहां पर हैं, मगर आपको कभी भी यह नहीं बताना होगा कि नंबर किसने दिया है । श्रीमती गोठवाल कहें य भाभी या बहन मैने पूछा कि क्या आपको मेरे उपर विश्वास है ? आपने तो मुझे देखा तक नही है कि मैं कैसा हूं ? इस पर उन्होने कहा कि विश्वास होने पर आदमी को देखने की जरूरत नहीं पड़ती आप एक नेक इंसान है यही मेरे अटल विश्वास का संबल है। मैं एक इतने सीनियर पुलिस अधिकारी की बीबी की बातें सुनकर दंग रह गया।

करीब दो साल में ऐसे सात आठ बार मौके आए जब रात में मैं बात करना चाह रहा था और वे घर या दफ्त कहीं नहीं थे। तो अंतत एक ही शरण था। फोन करते ही वे कहां हैं और वहां का नंबर क्या है सब मेरे पास होता। और जब मैने उनके घर पर फोन करके गोठवाल के बारे में पूछता तो बात हो जाती थी और एक दो संयोग पर ध्यान नहीं दिया मगर बाद में फोन आने पर गोठवाल एकदम चौक जाता और सबसे पहले यही पूछता कि नंबर कहां से पाए कि मैं यहां पर हूं। बाद मे जब कभी गोठवाल कहीं अपने घर से बाहर किसी मित्र के यहां बैठे हो और मैने फोन कर दिया तो वे सीधे लाईन पर आने की बजाय यह पूछने को कहते कि कहीं कोई अनामी शरण का तो फोन नहीं है ? जब मैं इधर से कहता कि हां अनामी तो बेचैन होकर गोठवाल मेरी बात सुने बगैर ही यही पूछते कि तुमको यह कैसे पता कि मैं यहां पर हूं। मैं बार बार हंसकर टाल देता। मगर उस दिन गोठवाल तैश में थे नहीं अनामी फोन पर बता न। मैंने हंसते हुए कहा कि तेरे भीतर मैने एक ट्रांसमीटर एडजस्ट करा दिया है जिसमें जहं कहीं भी रहो वहां का फोन नंबर और शक्ल दिखने लगती है। मेरी बातों से खीझते हुए गोठवाल फिर पूछते बोलो अनामी क्या काम है। एक बार वो कहीं बेहद गोपनीय बैठक में था और बीच में ही मेरा फोन टपक गया। इस बार तैश में आकर गोठवाल चीख पड़ा। अनामी यार तुम्हें खबरिया का नाम बताना होगा साला है कौन भाई जो मेरी जासूसी करता है और तुम तक नंबर आ जाता है। इस बार वो गुस्से में था तो बात नहीं हो सकी।

1995 में किसी एक दिन मैं अशोक विहार में नार्थ इस्ट जिले के पुलिस कमीश्नर करनैल सिंह के कमरे में घुसा ही था कि गोठवाल पहले से मौजूद थे। थोडी देर में काम निपटने के बाद मैं बाहर निकलने लगा तो गोठवाल ने कहा कि मैं भी चल रहा हूं बस मेरा इंतजार करना। दो चार मिनट में ही गोठवाल बाहर निकले और जबरन मुझे अपनी गाड़ी में चलने को कहा। मैने हंसकर पूछा कहीं थर्ड डिग्री का तो इस्तेमाल नहीं करना। मेरी बातों को सुनकर वो केवल हंसता रहा। जब अलीपुर मै उसके कमरे में बैठा तो वह एकदम पुलिसिय अंदाज में बोला अनामी तुम्हें आज नाम बताना होगा कि तुम्हें यह नंबर कौन देता है कि मैं कहं पर हूं। मैने भी आगाह किया कि पुलिसिया धौंस, पर तो कुछ नहीं बताउंगा और पुलिस की तरह नहीं एकदम जो याराना है उसी लय में बात करो। गोठवाल ने फिर पूछा तो मैने कहा कि एक बार बताया था न कि तेरे अंदर एक ट्रांसमीटर फिट है। इस पर वो उखड़ गया। कमाल है यार एक तरफ दोस्त भी कहता है और मेरी जासूसी भी करता है। मैंने हंसते हुए कहा चोर की दाढी में तिनका। साले किन चोरों से मिलने जाते हो कि हवा खराब है। मेरी बात से वो परेशान होकर कुर्सी पर बैठ गया। मैने बात मोड़ने के लिए पूछा कि चाय बगैरह पीलाओगे तो पीला नहीं तो वापस दफ्तर भिजवाइए। मेरी बात सुनते ही उसने कहा कि चलो। गाड़ी में जब हमलोग बैठ गए तो मैने पूछ किधर ? इस पर गोठवाल ने कहा चलो घर चलते हैं वहीं चाय भी पीएंगैं और उधर से ही तुमको भिजवा भी देंगे। घर क नाम सुनते ही मैं अंदर से थोडा कंपित हुआ कि कहीं गोठवाल को अपनी बीबी पर तो शक नहीं है कि वो नंबर देती हो। घर का नाम सुनते ही मैं खुश हो गया। उसने मेरे चेहरे के भाव को देखर ही कहा क्या बात है। मैने फौरन कहा कि गुस्से में लाल पीला टमाटर हो रहे गोठवाल को देखने तो भला है कि भाभी को देखूंगा। मैने चुटकी ली गोठवाल भईया कल तुम इस आरोप में पकड़ ना लेना कि साले मेरी बीबी से बात करता है। मेरी इस चुहल पर गोठवाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। मगर एक बार फिर उसने पूछा कि यार लेकिन तुमको यह पता कैसे चलता है कि कहां पर हूं। मैने जोर से गोठवाल को कह कि गाड़ी रोको अगर मेरे उपर विश्वास है तो बात करो नहीं तो बार बार बच्चों वाली लालीपॉप देने के नाम पर एक ही सवाल को बार बार दोहरा रहे हो । अभी घर ले जा रहे हो बाद में पता नहीं क्या क्या इल्जाम लगा दो। मैं नहीं जाता यार गाड़ी रूकवा दो। मेरे यह कहने पर वो एकदम ठंडा सा हो गया। तुरंत माफी मंगने लगा। मैने कहा माफी की जरूरत नहीं है यर पर अब मैं कभी फोन ही नहीं करूंगा। बिना बात किए क्य तेरी तरफ से टिप्पणी डालना मैं नहीं जानता। पर जब हमलोग में विश्वस ही नहीं है तो चाय फाय क्या। मैं घर पर चलकर भी नहीं लूंगा ।
खैर घर के पास ही यह तकरर हो रही थी लिहाजा घर तो जाना ही पडा। उसने अपनी पत्नी से मेरी मुलाकात कराई। मैं भी अनजान सा देखकर खामोश रह। दफ्तर लौटते समय गोठवाल ने फिर माफी मांगी। तब मैने कहा कि अब मैं फोन नहीं करूंगा जब आपका गुस्सा शांत हो जाए तो फोन करना नहीं तो यह हमलोग की अंतिम भेट है। कई माह के बाद गोठवाल का फोन आया और फिर से बात चालू करने का आग्रह किया। मैने कहा कि अब तो मेरे पास क्राईम रहा नहीं मगर जरूरत पड़ी तो जरूर बात होगी। दो तीन साल के बाद एक बार फिर गोटवाल का फोन आया कहां हो अनामी भाई। बोली में पुलिसिय रौब और धमक आ गयी थी। एकदम पुलिसिया प्यार दिखाते हुए बोला साले कहां रहे सालो साल । यही दोस्ती करता है। अब मैं कल्याणपुरी का एसीपी बनकर आया हूं। तेरे कार्ड में नंबर देखा तो यार यह तो तेरा ही इलाका है। एकदम चहकते हुए खुशी जाहिर कर रहा था। मैने पूछा कहां है । तपाक से गोठवाल ने कहा दफ्तर में । मैं उसके पास आधे घंटे मे पहुंच गया। कमरे में घुसते ही गोठवाल ने मुझे अपनी बांहो में दबोच लिया, अभी तक नाराज हो क्या अनामी। मैने हंसते हुए कहा नहीं नाराज क्यों रहूंग। गोठवाल मुझे बांहों मे लिए लिए ही बीच के शक तकरार के लिए माफी मांगी। मैने गोठवाल से कहा कि तेरी बांहों में यदि मेरा दम टूट गया न तो सच मान मेरी बीबी तुमसे जरूर नाराज हो जएगी। फिर एक ठहाके के साथ मैं बंधन मुक्त हुआ।
कल्याणपुरी में रहते हुए उनसे कई बार मुलाकात होती रही। जब भी घर चलने को कह तो उसने हमेश कहा कि नहीं पत्नी को साथ लेकर ही आउंगा। मगर काल की क्रूर नियति और संयोग के बीच इतना निश्छल दोस्त कब भगवान को रास आया है। उसके निधन की खबर भी मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ। तो मैं उसके घर जाकर अपनी शोक संवेदना भी जाहिर नहीं कर सका।

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