मंगलवार, 5 जुलाई 2016

मेरे जीवन के थ्री इडियट ( 1-2)





मेरे जीवन के थ्री इडियट-2

अनमी शरण बबल 

 
(मेरे तमाम सज्जनों और कभी दोस्त रहे (भूत) पूर्व मित्रों इसका केवल शीर्षक थ्री इडियट है, ताकि लोगों का ध्यान एकाएक जाए। इससे आहत ना हो यह मेरी करबद्द प्रार्थना है। जो सही जीवन में इढिुयटहोंगे वो कोई भी हो इस श्रृंखला में जगह नहीं पा सकते । आपलोग शीर्षक को लेकर माफ करें तो मैं पूरी रफ्तार से इडियट एक्सप्रेस को गतिमान करूंगा।)
शांत नहीं रह सकते गोस्वामी या गोस्वामी के स्वामी
पत्रकारिता से राजनीति में आने वाले पत्रकारों की कोई कमी नहीं रही है। बल्कि एक समय के बाद तो ज्यादातर पत्रकार इस तरह हवा में उड़ने लगते हैं कि बगैर जमीनी आधार और जनप्रतिबद्धता के ही चुनाव लड़ जाते हैं। बुरी तरह परास्त होकर वे अपनी साख इज्जत छवि और पत्रकारीय ईमानदरी को मटियामेट कर बैठते है। मगर दिल्ली की राजनीति में पिछले 15 साल के दौरान एकाएक (भाग्य) से अधिक चमकने वाले राजनीतिज्ञों में कम से कम तीन नामों पर तो चर्चा जरूर होनी चाहिए। जिनकी कुणडली को कभी बाद में खंगाला जाएगा,। (उधर दिल्ली में आप के उदय के बाद तो सड़क कमसे एकदम एक दर्जन प्रोपर्टी डीलर से लेकर न जाने किस किस तरह के लोग एकाएक राजनीति में पैठ बना ली। इन नवांगुतकों पर भी जरूर रामयण गाथा लिखनी होगी, भले ही तेजतर्रार दिखने वाले मुख्यमंत्री इसके बाद पता नहीं मेरे खिलाफ क्या क्या कर या कराके ही दम लेंगे। मगर यहां पर हम बात तो करेंगे केवल दिल्ली की शीला सरकार में जगह पाने वाले (भूत) पूर्व पत्रकार रमाकांत गोस्वामी की। एक पत्रकार होने के नाते लिखने के प्रसंग में अपने इस सीनियर गोस्वामी के बहाने कमसे कम दो और नेताओं का भी कोई न कोई जिक्र ना करना भी एक बड़ा अपराध सा होगा। हालांकि अपराध तो यह भी लग रहा है कि जब शीला सरकार के पत्तन के दो साल होने वाले है। यानी अत्तीत के गड़े मुर्दे को निकालने का समय तो अब चला नहीं गया बल्कि इन फूदकने वाले नेताओं के बारे में लोगों को असली चेहरा दिखाना बताना आज पहले से भी ज्यादा जरूरी है। और इस मायने में कि हमलोगों की याद्दाश्त इतनी कमजोर जो होती है कि जिसके खिलाफ सड़कों पर उतर जाने वाली जनता उसी दुष्ट को दुष्यंत मानकर अपने सिर पर बैठा लेती है।
तीनों से मेरा साबका पड़ा है। लिहाजा पार्षद से विधायक और ( जनता के वोट से ज्यादा) किस्मत के धनी महाबलि निकले महबल मिश्रा और लॉटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले विजय गोयल की सफलता की कहानी भी संघर्ष करने वालों को उपर तक पहुचंने के सपने दिखाती है और मन में आस जगाती है कि उपर तक पहुंचना असंभव नहीं है। गोयल पर एक स्टोरी पोस्ट की है जिसमें गोयल गाथा कित है।
यही हाल लगभग, पार्षद से सांसद बनने वाले महाबल मिश्रा की रही। पत्रकारों को देखते ही हाथ जोड़ने (इस मामले में सपा नेता मुलायम को भी शर्मसार करने वाले) के लिए मशहूर महाबल में छपास रोग इतना था कि अपने प्रेस रिलीज को लेकर अखबार के दफ्तर तक खुद पहुंचने में कोई गुरेज नहीं होता था। अपनी मासूमियत और इनोसेंट फेस की वजह से महाबल पत्रकारों में काफी लोकप्रिय हो गए और उम्मीद से ज्यादा प्रेस में जगह पाने में हमेशा कामयाब रहे। हालांकि विधायक बनने के बाद महाबल में थोड़ा गरूर आ गया और सांसद बनने के बाद तो थोड़ा बौद्धिक होने का घंमड़ सिर चढ़कर बोलने लगा। यही वजह है कि अब महाबल दिल्ली की राजनीति में महा होने के बाद भी बली बनने का सपना देखते देखते 1994 लोकसभा के पराजय के बाद फिलहाल बेरोजगार है।
हां तो अभी बात हो रही थी, पत्रकार रमाकांत गोस्वामी की। अपनी पत्रकारीय प्रतिभा से ज्यादा बिरला मंदिर में अपने पुजारी रिश्तेदारों की सिफारिश से दैनिक हिन्दुस्तान में रिपोर्टर की नौकरी पाने वाले रमाकांत गोस्वामी दैनिक हिन्दुस्तान में चीफ रिपोर्टर भी बनने में कामयाब रहे। हालंकि पत्रकरित कौशल और बातचीत कौशल से एक सक्षम जानदार और लोगों को अपना बनने में माहिर थे, मगर अपने कौशल को व्यावसायिकइस्तेमाल से ज्यादा नेताओं की चाटूकारिता पर खर्च किया।
बात 1996 लोकसभा चुनाव की है। मैं गोस्वामी को जानता तो था, मगर कभी मिला नहीं था। कई तरह से बदनाम होने के बावजूद खासकर पत्रकारों में खासे लोकप्रिय भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार की जेब में रहने के लिए गोस्वामी ज्यादा बदनाम थे। तालकटोरा रोड़ वाले प्रदेश कांग्रेस दफ्तर में सज्जन की चुनावी प्रेस कांफ्रेस थी। हिन्दुस्तान की तरफ से संतोष तिवारी हमलोग के साथ ही बैठे थे, मगर सज्जन के बगल में एक मोटा सा आदमी कुर्सी लगकर बैठा था। प्रेस कांफ्रेस के दौरान कई बार सज्जन उससे सलाह लेते तो कई बार अपना मुंह आगे बढ़ाकर वह आदमी भी सज्जन गोस्वामी वार्ता जारी रही। आधे घंटे की प्रेस कांफ्रेस के दौरान सज्जन को आठ-दस बार अनमोल सलाह देने वाले के प्रति मेरे मन में कोई खास उत्कंठा नहीं जगी।
प्रेस वार्ता खत्म होने के बाद मैं और ज्ञानेन्द्र सिंह (दैनिक जागरण कानपुर से दिल्ली आए चंद माह भी तब नहीं हुआ था) डीपीसीसी के बाहर खड़े होकर बातचीत में मशगूल थे। तभी मेरी नजर सज्जन कुमार के उसी चम्मबचे की तरफ गई, जो अब तक दो बार डीपीसीसी के अंदर से निकल कर बाहर खड़ी अपनी कार तक जाता और कोई सामान लेकर अंदर जा चुका था। चंद मिनटों में ही एक बार फिर वही चम्म चा फिर बाहर निकल कर अपनी कार की तरफ जाता हुआ दिखा। मैने ज्ञानेन्द्र से कहा चलो जरा देखे चमच्चे का माजरा क्या है ? अपनी कार से कुछ सामान निकाल कर फिर वापस लौट रहे मोटे सज्जन को देखकर हाथ जोड़ते हुए मैंने कहा, सर आप कौन, पहचाना नहीं? तब तपाक से वह बोला तुम लोग कौन ? तुम सुनक भी अपना आपा खोए बगैर धीरज के साथ मैंने जवाब दिया मैं राष्ट्री य सहारा से अनामी और ये दैनिक जागरण से ज्ञानेन्द्र। तब थोड़ा सहज होकर सज्जन के चम्मचे ने कहा अरे, तुमने मुझे नहीं पहचाना? मैं एचटी से गोस्वामी। तब पूरी विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर मैंने फिर कहा नहीं सर नहीं पहचाना। तब सज्जन के चमच्चे ने कहा कमाल है, अरे भाई मैं रमाकांत गोस्वामी हिन्दुस्तान से। अब चौंकने की बारी मेरी थी। मेरी आंखे विस्मय से फैल गयी। मैंने कहा कमाल है, सर आप और सज्जन के साथ, तो फिर संतोष तिवारी जी? लगभग सफाई देते हुए गोस्वामी ने कहा अरे सज्जन तो अपने भाई हैं, साथ देना पड़ता है। संतोष कवरेज के लिए आया था। इस सफाई के बाद भी मेरी हैरानी कम नहीं हो रही थी। बात को मोड़ने के लिए गोस्वामी ने शराब की कुछ बोतल और लिफाफे में रखे पकौड़े को दिखाते हुए पूछा खाओगे? जबाव देने की बजाय तपाक से मैंने पूछा क्या आप खाते है? इस पर जोर देते हुए गोस्वामी ने कहा, नहीं मैं तो पंड़ित हूं। तब मैंने पलटवार किया। नहीं सर, मैं तो महापंड़ित हूं, इसे छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे लगभग झेंप से गए। इसके बावजूद अपने दफ्तर में कभी आने का न्यौता देकर अपनी पिंड़ छुड़ाई।
लोकसभा चुनाव खत्म होने के बाद मतगणना से एक दिन पहले तालकटोरा स्टेडियम में मतगणना की हो रही तैयारियों का जायजा लेने गया था। वहां पर एक बार फिर गोस्वामी से टक्कर हो गई। इस बार हम दोनों एक दूसरे को पहचान गए। मैंने गोस्वामी से पूछा- सर, परिणाम में क्या होने वाला है? एकदम बेफ्रिक होकर गोस्वामी ने कहा होने वाला क्या है? बस देखते रहो सज्जन भाईसाहब किस तरह जीतते है। इस पर मैंने आपत्ति की और बोला कि मामला कुछ दूसरा ही होने वाला है। तब ठठाकर हंसते हुए गोस्वामी ने कहा, 'तुम अनुभवहीन लोग पोलिटिकल एयर को नहीं जानते।' खैर बात को तूल देने की बजाय मैं दफ्तर लौटा और अगले ही दिन बीजेपी के कृष्णलाल शर्मा ने सज्जन कुमार को एक लाख 98 हजार मतों से हरा कर सज्जन कुमार एंड़ कंपनी की बोलती ही बंद कर दी थी। हालांकि इसे शर्मा की जीत की बजाय इसे तत्कालीन सीएम साहिब सिंह वर्मा या पूरी बीजेपी की जीत कहें तो भी कोई हैरानी नहीं।
हिन्दुस्तान में नौकरी करने के बावजूद बिरला से ज्यादा सज्जन की वफादारी के लिए (कु) ख्यात गोस्वामी को सज्जन सेवा का पूरा फल मिला और दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सज्जन की पैरवी से रमाकांत 1998 में पत्रकारिता से अलग होकर अपने चेहरे पर पोलिटिकल मुखौटा लगाने में कामयाब रहे। दिल्ली नगर निगम विधायक सदस्य होने के नाते गोस्वामी से मेरी एक और मुठभेड़ 2001 में हुई। जब वे निगम की एक बैठक में बतौर विधायक एमसीडी सदन में आए। हम पत्रकारों को देखते ही गोस्वामी ने सबों को बेटा- बेटा कहकर प्यार दुलार दिखाना शुरू कर दिया। अपने पिता के रूप में थोड़ी देर तक बर्दाश्त करने के बाद अंततः मैने टोका गोस्वामीजी नेता का चेहरा तो ठीक है, मगर हम पत्रकारों के बाप बनने की चेष्टा ना करें। कई और पत्रकारों ने भी जब आपत्ति की तो फिर गोस्वामी खिसक लिए।
सज्जन की वफादारी निभाते हुए ही गोस्वामी ने शीला दीक्षित के भी वफादार साबित हुए। जिसके ईनाम के रूप में गोस्वामी को मंत्री होने का परम या चरम सुख भी हासिल हो गया है। हालंकि परिवहन मंत्री थे तो मुझे बड़ी उम्मीद थी कि घाटे से लस्त पस्त और करप्शन कारर्पोरेशन के रूप में जगत कुख्यात डीटीसी को वे एक पत्रकार की तरह देखेंग,मगर एक कंग्रेसी नेती की तरह तमाम घोटालों और गाठे की फाईलों को वे दबाकर अपना कार्यकाल समाप्त किया।
अलबता बीजेपी शासन में खुले 10 गौसदनो के नाम पर घपले घोटाले की जांच के लिए गठित गोस्वामी आयोग की अध्यक्षता करके हुए रमाकांत गोस्वामी की भूमिका बेमिशाल रही। गौसदनों की जांच रिपोर्ट में बतौर सबूत गौसदनों की अनियमितता पर कम से कम दो दर्जन से अधिक मेरी रिपोर्ट संलग्न है। जिनके आधर पर ही कई गौसदनों को निरस्त कर दिया गया। श्री गोस्वामी से कोई मेरा कोई शिकवा शिकायत वाला रिश्ता भी कभी नहीं रहा, इसके बावजूद मंत्री बनने की खबर से मुझे खुशी खुशी हुई। पर एक नेता की भूमिका से मुझे दुख भी हुआ कि परिवहन के नाम पर जो काम गोस्वामी नहीं कर सके उसी कम को अरविंद केजरीवाल भी कहां कर पा रहे है। पत्रकार से जब नेता बन ही गए हैं तो गोस्वामी से मैं अपील करना चाहूंगा किवे फिर से खड़ा हो और अपनी तेजतर्रार वाचाल इमेज से आप को भी बेनकाब करते हुए दिल्ली की शांत या खामोश पड़ी राजनीति या केजरी जंग के खिलाफ एक योद्दा वाली पारी खेले। और केवल पत्रकार होने के नाते ही एक पत्रकार नेता मंत्री से ही मैं अपील कर सकता हूं कि कलम छोड़ने के बाद भी एक पत्रकार नेता के सामाजिक दायित्व और जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड सकता है।

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मीडिया मैनेजमेंट के (बेताज) सज्जन बादशाह सज्जन कुमार
अनामी शरण बबल
दिल्ली के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को दुर्ज्जन मानने या साबित करने का मेरे पास कोई ठोस तर्क सबूत या पुख्ता आधार नहीं है। सज्जन कुमार से मेरा कोई गहरा या घनिष्ठ सा रिश्ता भी नहीं रहा है। पिछले कई सालों से हमारी मुलाकात भी नहीं है। हो सकता है कि रोजाना सैकड़ों लोगों से मिलने वाले
सज्जन कुमार को मेरा चेहरा या नाम भी अब याद ना हो। इसके बावजूद मीडिया मैनेजमेंट की वजह माने या इनके सहायक कैलाश का कमाल की सज्जन कुमार को सामने
फोकस किए बगैर वह मीडिया के सैकड़ों लोगों की उम्मीदों पर हमेशा खरा उतरते है।
अदालत और सिक्ख समुदाय के बीच चाहे इनको छवि को लेकर जो कुछ भी कहा जाए माना जाए, जाना जाए और मीडिया में छापा जाए इन तमाम विरोधाभास के बाद भी मीडिया और अपने आस पास के लोगों में सज्जन कुमार अपनी सज्जन छवि को कायम रखने में हमेशा क्या आज तक सफल रहे है।
मीडिया से परहेज करने वाले सज्जन अमूमन मीडिया में काफी लोकप्रिय है। फिर भी क्या मजाल कि सज्जन कुमार को कोई इंटरव्यू लेकर दिखा दे। लगतार विदेशों में ही रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू भी हाल ही में छप गया है, मगर 1984 के बाद सज्जन का कहीं भी कोई इंटरव्यू नही आया। इसके बावजूद मीडिया में हमेशा रहने वाले सज्जन कुमार सही मायने में मीडिया के लिए दुर्लभ प्राणी है। मीडिया में कब कहां कितना और किस तरह छपना है इसका पूरा जिम्मा सज्जन कुमार के मीडिया प्रभारी इसी कैलाश का हाथ रहा है।
आमतौर पर सज्जन के मन में मीडिया को लेकर ना कोई आदर है ना ही पत्रकारों से बड़ा प्यार दुलार है। इसके बावजूद दिल्ली के समस्त पत्रकारों में सज्जन कुमार के प्रति सद्भावना का ही रिश्ता है कि 1984 दंगे का मामले में कोई भी करवट बदले, मगर
अखबरों में सज्जन को लेकर हमेशा सहानुभूतिपूर्ण नजरिया ही रहा है।
हम बात सज्जन को लेकर 1996 के लोकसभा चुनाव से शुरू करते है। पहली बार लोकसभा चुनाव कवर करने की वजह से मैं भी काफी उतेजित और उत्साहित भी था। सज्जन को लेकर मैंने पूरी तैयारी कर रखी थी। करीब एक माह तक लगातार खबरें देने की योजना के तहत मैने उन इलाकों को चुना, जहां पिछले पांच साल में सज्जन कभी दोबारा ताकने भी नहीं गए थे।
सज्जन के सामने बीजेपी ने वरिष्ठ नेता कृष्ण लाल शर्मा को मैदान में थे। आमतौर पर माना जा रहा था कि शर्मा को बलि का बकरा बनाकर चुनाव से पहले ही बीजेपी ने घुटने टेक दिए। मगर मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा एंड पूरी पार्टी ने चुनावी
तस्वीर को ही दिन रात की मेहनत और लगन से बदल दिया।
एक तरफ चुनावी धूम तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सहारा में एंटी सज्जन खबरों का दौर चालू हो गया। इन खबरों से इलाके में क्या असर पड़ रहा था, यह तो मैं नहीं जानता, मगर सज्जन एंड कंपनी खेमे में जरूर बैचेनी थी। दिन में कैलाश तो कभी भी बेसमय सज्जन कुमार ने भी तीन चार बार फोन करके यह जरूर
पूछा कि अनामी भाई क्या दुश्मनी है। मैंने पलटते ही कहा, 'सज्जन भाई दोस्ती कब थी ? ' एंटी खबरों पर हैरानी प्रकट की। इसकी सफाई में मुझे कहना पड़ा, 'भाईसाब, यदि खबर गलत है, तो बताइए? चारा डालते हुए सज्जन ने कहा था अरे अनामी जी खबर चाहे जैसी भी हो, मगर असर तो पड़ता ही है।
मानना पड़ेगा कि पूरे चुनाव के दौरान एंटी खबरों के बावजूद फिर दोबारा सज्जन या कैलाश ने फिर ना कभी टोका और ना शिकायत ही की। चुनाव खत्म हो गया और एक लाख 98 हजार वोट से सज्जन कुमार पराजित हो गए। चुनाव के बाद सबकुछ सामान्य सा हो गया था, मगर दो साल के भीतर ही एक बार फिर लोकसभा चुनाव सिर पर आ गया। चुनावी सिलसिला शुरू होने से काफी पहले ही एक बार फिर पत्रकारों को पटाने का खेल चालू हो गया। उस समय तक मोबाइल नामक खिलौने का इजाद इंडिया में नहीं हुआ था। सज्जन खेमे की तरफ से हर चार छह दिन के बाद कभी रेवाड़ी का गजक, तो सोनीपत का हलवा, तो कभी किसी और शहर की धमाल मिठाई का डिब्बा सज्जन कुमार की तरफ से मेरे घर पर आने लगा। कैलाश के इस गेम को मैं समझ रहा था। फोन पर तो मैंने मिठाई ना भेजने की गुजारिश की, फिर भी मेरे घर पर कम से कम सात आठ मिठाई के डिब्बे आ चुके थे। एक दिन दफ्तर में कैलाश से मुलाकात हो गई, तो मैंने इसका विरोध जताया कि सज्जन से मेरा होली दीवाली का भी कोई नाता कभी नहीं रहा है, लिहाजा
सबसे पहले मिठाईयों के डिब्बे भेजना बंद करो। इस पर कैलाश ने दो टूक कहा, 'अनामीजी भाईसाहब ने मुझे बस आपको मैनेज करने के लिए कहा है।' बकौल कैलाश, 'भाईसाहब ने कहा है कि तू केवल अनामी को फिक्स कर ले, मैं पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज कर लूंगा।' एक सांसद का यह दावा कि मैं पूरी दिल्ली
की मीडिया को मैनेज कर लूंगा। यह बात मुझे चुभ गई। फौरन इसका प्रतिवाद करते किया, 'कैलाश भाई, सज्जन भले ही पूरी दिल्ली की मीडिया को मैनेज कर लें, मगर वे अनामी शरण बबल को मैनेज नहीं कर सकते। मीडिया मेरे गरूर और गुमान का संबल है। मैं तो मीडिया को एक साधारण सा सिपाही भर हूं, मगर बात जब मीडिया को अपनी रखैल बनाने पर आ गई है, तब तो मुझे मीडिया की लाज रखनी ही होगी ।' एकदम साफ लहजे में कैलाश को फिर मिठाई ना भेजने के लिए आगाह
किया। इसके बावजूद अगले चार पांच दिनों के भीतर ही सज्जन की मिठाई का डिब्बा फिर से आ धमका। इस बार हमने बंजारा कालम में मिठाईयों से पत्रकारों को पटाने का मजाक उड़ाते हुए टिकट मिलने पर ही संदेह जताया। 1984 के भूत की वजह से 1998 के लोकसभा चुनाव में सज्जन का टिकट एक बार फिर कट गया। यानी सज्जन के नाम पर कैलाश की पूरी कसरत ज फालतू और मेरे घर भेजे गए तमाम डिब्बे बेकार हो गए।
चुनाव हारने के बावजूद शोर शराबा या हंगामा खड़ा करने की बजाय सज्जन इलाके में सक्रिय रहते हैं। जनता से इनका नाता रहे या ना रहे, मगर जिसे इन्होंने अपना बनाया है, वह हमेशा सज्जन के लिए काम करते हुए दिख जाते हैं। सही मायने में सज्जन की असली ताकत यही लोग हैं, जो दिखावे के
बगैर सज्जन के लिए जान देने के लिए भी तैयार रहते हैं। हर साल पत्रकारों को सज्जन कुमार अपने सरकारी आवास (सांसद नहीं रहने पर भी किसी और सांसद के आवास पर) पत्रकारों को सालाना पार्टी देना कभी नहीं भूलते। पार्टी के दिन सैकड़ों पत्रकारों को लाने और वापस पहुंचाने के वास्ते दर्जनों गाड़ी
हमेशा खड़ी रहती हैं। ठेठ देहाती अंदाज में सज्जन की पार्टी में गंवई अंदाज में लिट्टी-चोखा से लेकर गन्ना, मकई भूंजा समेत लजीज खाने का मजमा सा लग जाता है। दो या तीन बार मुझे भी इसमें शामिल होने का अवसर मिला है। शायद यह इकलौता पत्रकार पार्टी होता है जिसमें नवोदित से लेकर संपादकों को भी आना रास आता है। संपादकों में सर्वसुलभ आलोक मेहता के दर्शन भी यहां पर होना परम आवश्यक है।
सज्जन में शालीनता कूट-कूट कर भरी है। यही शराफत मीडिया को भाता है। मीडिया से नाता होने के बावजूद क्या कमाल है अगर कोई सज्जन का इंटरव्यू
बेशक सज्जन के साथ यदि 1984 का दाग लगा नहीं होता तो दिल्ली की राजनीति ही कुछ और दिशा लेती। इनका पोलटिकल सफर कुछ और होता। संभव है कि वे दिल्ली के सीएम भी हो जाते। या सज्जन के सूरज के साथ साथ कांग्रेस का भी सूरज दिल्ली में कभी नहीं डूबता।(वैसे सज्जन का सूरज आज भी चमक रहा है)। अपने पराजित विधायक भाई रमेश को सांसद बनवा देना दिल्ली में केवल और केवल सज्जन कुमार के बूते में ही था। इसके ठोस आधार भी है कि पिछले 15 साल में केवल एक बार सांसद होने के बाद भी जनता से भले ही इनका साथ कम हो गया हो, मगर साथ देने वाले अपनों से सज्जन का साथ कभी कम नहीं हुआ है, जिसके बूते ही सज्जन को दुर्ज्जन कहने का
साहस आज किसी में नहीं है। भले ही परिसीमन के बाद राजधानी के राजनीतिक क्षेत्रों में भौगोलिक बदलाव आ गया, मगर विभिन्न आरोपों के बाद भी मादीपुर गांव के मूल निवासी भूत(पूर्व) सांसद सज्जन कुमार को आज भी बाहरी दिल्ली और मीडिया को मैनेज करने में बेताज बादशाह ही माना जाता है।
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विजय गोयल के पाले में गेंद
अनामी शरण बबल
उम्र के 62 बसंत में भी दिल्ली के सबसे तेजतर्रार और आप के लिए खिलाफ सबसे बड़े योद्धा साबित हुए भाजपा नेता विजय गोयल को अंतत:मोदी सरकार में शामिल कर ही लिया गया। दिल्ली में खुश होने वाले से कहीं ज्यादा बड़े जन समुदाय को यह रास नहीं आया होगा। हालांकि आप के खिलाफ भाजपा के विद्रोही तेवर के चलते का ही इनको यह पुरस्कार मिला है। वाजपेयी आडवाणी कैंप के हनुमान होने के कारण ही गोयल को मोदी कैंप में अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। मगर गोयल की निष्ठा पर किसी को संदेह नहीं। मोदी के बारे में श्री गोयल का यह बयान काफी लोकप्रिय रहा जब मोदी को भी महात्मा गांधी की तरह ही सावरमती का संत घोषित कर डाला। इसकी बड़ी चर्चा हुई। मगर मोदी जी को यह टिप्पणी जरूर रास आयी होगी। इसी तरह दिल्ली से पार्टी का एक आक्रामक चेहरे को प्रमोट करके श्री गोयल के काम को मोदी ने नवाजा है।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रहे चरती लाल गोयल के पुत्र विजय गोयल को भले ही राजनीति विरासत में मिली हो मगर उन्होने अपने संघर्ष और योद्धापन के चलते ही लंबे सफर के राही बने। 1995-96 दिल्ली की राजनीति में एक साथ तीन नेताओं का उदय हुआ। कांग्रेस खेमे से महाबल मिस्र ( पार्षद और सांसद) और रमाकांत गोस्वमी (हिन्दुस्तान अखबार के चीफ रिपोर्टर से कांग्रेस विधायक और मंत्री) तथा भाजपा खेमे से विजय गोयल ।
लॉटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले युवा नेता ( 40-42की उम्र होगी) विजय गोयल की सफलता की कहानी को सामने रखना तो और भी जरूरी है । और देश में लॉटरी का धंधा चौपट हो गया तो इसके पीछे भी गोयल की ही भूमिका रही है। महज 10 साल के भीतर लॉटरी नेता से सांसद और कैबिनेट मंत्री तक बनने वाले विजय गोयल की परियों जैसी सफलता की कहानी के पीछे दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की हर प्रकार की भूमिका रही है। दिवंगत प्रमोद महाजन की वजह से भी आसमानी सफलता हासिल करने वाले गोयल कभी दिल्ली विवि डीयू के तेजतर्रार नेता भी रहे हैं।
अखबार के दफ्तरों में अपने प्रेस नोट्स लेकर ठीक से छापने के लिए अक्सर अनुनय विनय और प्रार्थना करने वाले गोयल का रिश्ता हम पत्रकारों से सांसद बनने तक तो ठीक रहा । वे हम पत्रकारों के संपर्क में भी लगातार रहे, मगर पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में मंत्री बनते ही गोयल भाजपा के वरिष्ठ मंत्री बनकर हम पत्रकारों से ही परहेज करने लगे। शायद वे यह भूल गए कि हम पत्रकार तो चींटी की तरह होते है काम भला हो या बुरा हर जगह बेरोकटोक चींटी आ ही जाता है। चींटी किसी का सगा नहीं होता।
मंत्री पद से उतर जाने के करीब 12 साल तक श्री गोयल ने दिल्ली में की सड़कों पर धमाल चौकड़ी की, तब कहीं जाकर वे प्रधानमंत्री के गुडबुक में दाखिल हुए। दो एक बार श्री गोयल को इस बात को लेकर मुझसे बड़ी आपति हुई कि क्यों मैं उनके बारे मे बार बार कहीं कभी कुछ लिखा तो लॉटरीनेता जरूर जोड़ा। जब मेरी उनसे तकरर सी होते होते बची यह कहने पर कि सहारा आज भी 2000 से 20 हजर करोड़ की संपति का उल्लेख क्यों करती है ताकि इससे लोगों के दिमाग में मैप उभरे कि किस छोटे से आरंभ सफऱ किस तरह बड़ी मंजिल तक गयी है। यदि मैं चरती लल गोयल के बेटे को फोकस करूंगा तो लोग बाग यही समझेंगे कि यह बाप बेटे का पुश्तैनी खेल है। मग मैं लॉटती नेता लिखकर तो तुम्हारी ही छवि में चांद लगा देता हूं । अब चांद को चार चांद बनाना लगाना साबित करना विजय गोयल का काम है। और रही बात चीखने चिल्लाने की तो एक पत्रकार ही तो आईना दिखाता है। हमलोग तो एक रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह होते है । जो भी जितन भी बड़ा हुआ है और बड़ी दूर तक गया तो भी वो सब पत्रकारों के घुटने के नीचे होकर ही। मेरी बात सुनकर गोयल शांत हुए और बात खत्म हो गयी। एक लंबे अंतराल के बाद केंद्रीय मंत्री बने गोयल के सामने यह एक नायाब मौका है कि वो दूसरों से बेहतर साहित करे, क्योंकि जिन उम्मीदों के साथ मोदी ने दिल्ली के सांसदों को मंत्री बनाया था उसमें कोई भी दो साल में जनता के साथ साथ मोदी की कसौटी पर भी खऱे नहीं उतरे है। चतुर प्रधानमंत्री ने श्री गोयल के पाले में गेंद डाल दी है। अब देखना यह है कि वे किस तरह खुद को औरों से बेहतर साबित करते हैं या..........?
मेरे जीवन के थ्री इडियट-1
अनामी शरण बबल
( मेरे जीवन में इडियटों की कोई कमी नहीं है पर कुछ इस तरह के भी होते हैं जिनकी छाप मन में अंकित हो जाती है। )
अपने पत्रकारीय जीवन में सैकड़ों लोगों से घुलने मिलने कहकहा लगाने का मौका मिला। यूं तो बहुत सारे अधिकारियों नेताओं से हर तरह के अनुभव रहे हैं पर दिल्ली रिपोर्टिंग के दौरान तीन इस तरह के लोग रहे हैं जिनसे मुझे और बढ़ चढ़ करकाम करने की एक प्रेरणा मिली।.यहां पर अपने साथ तीन अधिकारियों के अनुभव लिख रहा हूं जिससे भले ही तकरार हुए हो पर उनको गलत सबित करने का मुझे हमेशा बल मिला। इस बार के मेरे अधिकारियों में हैं दिल्ली पंचायत निदेशक , दिल्ली मौसम विभाग के निदेशक और दिल्ली पुलिस के सहायक आयुक्त (अलीपुपर/कल्याणपुरी)

दिल्ली में पांच ब्लॉक होते थे। जिनके अंदर लगभग 200गंव आते हैं। (यूं तो दिल्ली में 364 गांवों का इतिहास रहा है, मगर विकास की आंधी में कुछ गांव पूरी तरह खत्म हो गए तो कुछ केवल डीटीसी बस स्टॉप के नामों में सिमट कर रह गए। हर साल इन गांवों के नाम पर एक हजार करोड़ रूपयों की बंदरबॉट होती है और फाईलों में ही अनगिनत काम पूरा हो जाते हैं। खुद गांव से होने के नाते मेरे मन में गांवो को लेकर अजीब तरह का लगाव और आर्कषण रहा है। यह बात 1995 की है। मोरी गेट कोर्च में मैं अपने एक मित्र मेद सिंह के पास बैठा था। मेद डी मुझे आज तक बबल सेठ ही कहते है। उनसे गांवों की बदहाली और ग्राम सभा
की सैकड़ों एकड़ जमीनों पर अवैध कब्जें की खबरें भी मुझे मिलती रहती थी। मेद सिंह इसी मामले के वकील थे। उन्होने मुझे मोरी गेट के उपरी तल पर बने पंचायत निदेशक से जाकर मिलने की सलाह दी।
मैं भी उस समय खाली था, तो पंचायत निदेशक डी.आर.टम्टा के दफ्तर के बाहर था। कार्ड अंदर भेजा तो अगले ही पल मुझे बुला भी लिया। सामान्य शिष्टाचार और परिचय के बाद जब मैने बातचीत शुरू की। हां इस बीच निदेशक टम्टा ने चाय का आदेश भी दे दिया था। मेरे कार्ड को लेकर एकदम दार्शनिक अंदाज में टम्टा ने कहा मैं किसी मीडिया की परवाह नहीं करता । मेरे नाम को कार्ड पर देखकर फिर टम्टा बोले आपका नाम तो बहुत सुदंर और अलग है, पर आपके मन में जो आए बिना पूछे लिख सकते है। निदेशक की बेबाकी और नीडरता को देखकर मैं चकित सा था। एकदम आपको सबकुछ लिखने की छूट मैं दे रहा हूं अनामी । जो मन में आए लिख देना । जरा मैं भी देखूं कि कौन मीडिया वाला कितना लिख सकता है। निदेशक के तेवर को देखकर मैने भी अपनी कॉपी किताब बंद कर ली। मैने टम्टा से कहा कि यह बहुत बड़ा चैलेंज दे रहे हो । इस पर लगभग बौखलाते
हुए कहा कि मैं नहीं डरता। मैने फिर कहा कि इतना साहस तो मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा भी मीडिया के सामने नहीं कर सकते। इस पर एक गाली निकालते हुए टम्टा ने कहा मैं इन मादर....की परवाह ही नहीं करता और मुझे कौन सा इलेक्शन लड़ना है। अपनी सरकारी नौकरी है जिसे कोई खा नहीं सकता । और ये नेत तो पांच साल बाद फिर सड़क छाप ही रहेंगे। पंचायत निदेशक की बात मेरे लिए एकदम खुला चैलेंज सा था। मैने उनकी साफगोई और हिम्मत की दाद दी मगर यह भी आगाह किया इस बार आपका पाला अनामी से हैं मैं भी आपको मीडिया की ताकत दिखाकर गुमान न तोड़ा तो आप भी याद करोगे। इस बीच चाय भी आ गयी। इस प्रकरण को बंद करने के नाम पर टम्टा बोले छोडो ये सब तो कल की बातें हैं कि क्या होगा, अभी तो आप मेरे साथ लीजिए। अपने बैग को संभाल कर मैं खड़ा हो गय। मेरे खड़ा होने से वे दंग रह गए और कहा प्लीज टी। मैने कहा टम्टा जी अब कैसी चाय? मुझे तो मीडिया की लाज रखनी है। एकदम गांठ बांध ले कि मैं भी बहुतों के बीच आपकी नाक नहीं काटी तो उसी दिन ई पत्रकारिता छोड़कर चाय बेचना चालू कर दूंगा। पर याद रखना। बात मीठे गरम तेवरों के साथ खत्म हो गयी। निदेशक टम्टा ने बैठे बैठे ही अपना हाथ आगे कर दिया। मैने तुरंत हंसते हुए कहा कि मै बैठे हुए लोगों से हाथ नहीं मिलाता या तो खड़ा हो नहीं तो अपना चैलेंज है ही। तब कहीं जाकर टम्टा ने अपनी कुर्सी छोड़ी और हाथ मिलाया। कमरे से बाहर निकल मैं मोरीगेट कोर्ट की तरफ चल पड़ा
मैं एक बार फिर अपने मित्र मेद सिंह के पास था। उसने चहक कर कहा हो गयी बात। मैने टम्टा से हुई बात का पूरा ब्यौरा सुना दिया। मैने कहा मेद भाई अब तुम्हारे छोटे भी की इज्जत तेरे हाथ में हैं । खड़ा होकर मेरे को गले से लगाते हुए मेद सिंह ने कहा बबल सेठ अरे चिंता किस बात की। हमलोग मिलकर उसको सूर्पनखा बनाएंगे। तीन चार स्टोरी के फौरन दस्तावेज और कॉपी निकाल कर दिय। जिसमें पंचो और ग्रामप्रधानो द्वारा ग्राम सभा की सरकरी जमीन बेचने का मामल था। इसी मीटिंग में तय हुआ कि सोमवार और शुक्रवार को इसी कोर्ट में हर सप्ताह मिलेंगे और टम्टा का चीरहरण करेंगे। और फिर जो धुंआधार खबरों की ऐसी रेल चली कि किसी किसी दिन तो ग्राससभा की गड़बड़ियों की तीन तीन खबर छपने लगी। पंचायतों की लापरवाही और ग्रामप्रधानों और पंचों के कारनामों घोटाले की झड़ी लगा दी। सभी खबरो के अंत में मैं यह जरूर लिखता कि पूछे जाने पर पंचायत निदेशक ( नाम जरूर देता था) ने अनभिज्ञता प्रकट की या कभी कोई टिप्पणी करने से इंकार किया या फिर किसी किसी खबर में यह भी लिख देता था कि इस मामले की जांच हो रही है। उधर पंचायत निदेशालय में आग लगी थी। विकास मंत्री और कई बार मुख्यमंत्री साहिव सिंह वर्मा ने टम्टा से सफाई मांगी, जवाब तलब भी किया। मगर निसंदेह टम्टा ने कभी भी फोन करके खबरों को रोकने की बात नहीं की।
इसी बीच 1996 में लोकसभा चुनाव हुआ। भाजपा के छह उम्मीदवार छह संसदीय क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे थे और बाहरी दिल्ली संसदीय क्षेत्र से वरिष्ठ नेता कृष्ण लाल शर्मा के लिए पूरी पार्टी लगी थी। बाहरी दिल्ली से ही आने वाले मुख्यमंत्री की भी इससे लाज जुड़ी थी। एक लाख 98 हजार वोट से कांग्रेस के दिग्गज सज्जन कुमार को पराजित किया । जीत की खुशी में मुख्यमंत्री ने तमाम पत्रकारों को पार्टी दी थी। मैं मुख्यमंत्री के पास ही बैठा था कि एकाएक पंचायत निदेशक टम्टा कहीं से प्रकट हुए और अपना सिर मुख्यमंत्री की गोद में छिपाकर सुबकने लगे। एकाएक इतने सीनियर अधिकारी के रोने से मुख्यमंत्री भी अवाक रह गए और टम्टा को सांत्वना देते हुए जिज्ञासा प्रकट की। टम्टा ने मेरी तरफ संकेत किया और बोले मुझे इस भूत से बचाइए। ये न मुझसे बात करते हैं और कोई बात सुनते हैं और मेरा नाम दे देकर कही का नहीं रहने दिया है। मैं भी तुरंत खड़ा हुआ और जोश में कहा कि झूठा मुझे तो जूते निकल कर मारना चहिए पर मैं सीएम का लिहाज कर रहा हूं। मै सीएम को कहा ये साला तो आपकी मां को गाली दिया था। पुछिए क्या मैं झूठ बोल रहा हूं। इसने मुझे खुला चैलेंज दिया था कि मैं मीडिया की परवाह नहीं करता जो मन मे आए लिखते रहे। मेरा प्रवचन जारी रहा और इसके चैम्बर में ही मैने कहा था कि यदि मीडिया की लाज नहीं रख सका तो पत्रकारिता छोड़कर चाय की दुकान लगा लूंग। टम्टा के सामने आकर मैने पूछा बात हुई थी न । सुबकते हुए टम्टा चेहरा लटकाए खामोश खड़ा रहा। तब सीएम वर्मा ने उससे कहा जरूर तेरी गलती होगी मैं अनामी को सालों से जानता हूं वो बिना आग लगे इतना बौखला ही नहीं सकता। पार्टी का खुशनुमा माहौल फिर सामान्य सा हो चला था। मायूष खड़े ट्म्टा के पास मैं खुद गया और कहा कि चलो यार जब चैलेंज ही खत्म हो गयी तो फिर शिकवे गिले भी छोड़ो। मेरे अनुरोध के बाद भी वे वहीं खड़े रहे तो मै भी टम्टा से अलग होकर पार्टी और अपने दोस्तों में खो गया। बाद में जब मुझे अखबार में परिवहन मंत्रालय दी गयी तो मैं संभवत अप्रैल 2003 में एक दिन दिल्ली परिवहन निगम के मुख्यालय में गया। सामने डी. आर टम्टा का बोर्ड टंगा था । मैने मिलने की कोई पहल नहीं की,। उनका पहले ही ट्रांसफर हो चुका था। अगली दफा जाने पर पर मालूम चला कि वे सचिवलय में चले गए हैं
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अंत में मिलने की चाहत
दिल्ली के मौसम विभाग के निदेशक का नाम सतीश चंद्र गुप्ता था। मेरे पास मौसम विभाग भी होत था। दिल्ली में कई मौसम विज्ञानी दोस्त उपनिदेशक बनकर देहरादून और मसूरी में मौसम विभाग के निदेशक बन गए तो मुझे फोन करके बतया कि बातें किया करो अनामी जी मैं 48 घंटा पहले ही दिली के मौसम का हाल बताया करूंगा। सबों ने यही कहा कि फोन आपको करना होगा ताकि याद आ जाए। खैर इनलोगों से बड़ी मदद ली और दिल्ली के मौसम को हमेशा दो एक दिन पहले रखा। पर मैं इस समय श्री सतीशचंद्र गुप्ता पर बात कर रहा हूं। लगभग तीन साल तक संवाद का सिलसिला जारी रहा। श्री गुप्ता से बिना मुलाकात के बिना ही रोजाना मौसम को लेकर बातें होती रहती थी, लिहाजा केवल चेहरा देखने के लिए अब कौन मौसम विभाग जाए। हमारी बातचीत का क्रम इस तरह परवान पकड़ा कि रात बेरात कभी सुबह या दोपहर में घर हो या दफ्तर एक एक दिन में कई कई बार बात होती थी। और कमाल कि फोन उठाकर हलो या कौन है पूछने की बजाय सबसे पहले कहते हां अनामी बोलो। और इसके बाद वे धाराप्रवाह बोलते बताते । मौसम के बारे में मैं भी काफी कुछ जान गय था लिहाजा गुप्ता जी के संकेत देने या कोई मौसम की शब्दावली के किसी शब्द के इस्तेमाल का अर्थ जानता था। बीच में नो रोक टोक। इस तरह 5-7 मिनट में वे एक ही साथ कई खबर बता जाते थे। जिसे मैं अलग अलग मूड य मौसम के अनुकूल प्रतिकूल करके कई खबर बना देता था। मेरी खबर वे रोजना अपने दफ्तर में पढते थे और उन्होने यह टिप्पणी दर्जनों बार की होगी कि मेरी बातों का जितना सटीक विश्लेषण करके खबर लिखते हो वो सबसे अलग होता है। उनकी सराहना पर मैं हमेशा यही कहता था कि खबर लिखते समय आपकी कही हुई बात याद आ जाती है इसलिए ही सावधन होकर लिखता हूं। बिना मिले हमारा प्रेम और लगाव बरकरार था। फोन उठाते ही नाम लेने पर मैं अक्सर पूछता था कि यह आप कैसे जान जाते हैं कि मेरा फोन है। इस पर वे हंस पड़ते फिर भी मेरी हैरानी बनी रहती। कभी कभी तो घर आकर केवल जांचने के लिए भी रात 11 के बाद फोन कर देता था। तब भी वही जवाब कैसे हो अनामी अभी मौसम शांत है या जैसा होता था बताकर हंसते हुए फोन रख देते।
एक दो बार मैने उनसे पूछा भी मेरे इतने फोन करने या समय असमय लगातार तंग करने पर गुस्सा नहीं आता या नहीं लगता कि परेशान कर रहा हूं। इस पर वे हंसते हुए कहते कि जब तुम्हारा फोन नहीं आता है तब गुस्सा भी आता है और चिंता भी होने लगती है। सही कहो तो तुमसे बात करने का चस्का सा लग गया है और बिन बात किए लगता है कि कहीं कुछ कमी सी है। उनकी बात सुनकर मैं भी हंसते हुए कहा कि सही मायने में मुझे भी बिन बात किए मन नहीं भरता है। और फिर हम दोनों फोन पर जोर से खिलखिला उठते। ।
एक दिन दोपहर में उनका फोन आया। अमूमन फोन मैं ही करता था। वे बोले अनामी तुम्हारी उम्र कितनी है। यह 2003 की बात है। उनके सवाल पर एक बार मैं हंसने लगा क्या सवाल है सर । तो वे बोले अनामी मैं 12 दिन के बाद रिटायर होने वाला हूं। कल रात को तेरे बारे मे सोच रहा था कि पूरी नौकरी में तुम इकलौते हो जिससे मिले बगैर ही तीन साल तक बात करता रहा था। तुमने तो बात करने का चस्का लगा दिया। मैंने अगले ही दिन आने का वादा किया तो उन्होने कहा तुम्हारा लंच कल मेरे साथ रहा। श्री गुप्ता ने कहा मैं भी बहुत उतावला हूं अनामी तुम्हें देखने को कि तुम कैसे हो जिसका मैं आदी हूं। उनकी बातें सुनकर मै हंस पड़ा सर तब तो आपको निराश होना पड़ेगा क्योंकि आपकी लैला या शीरी तो एकदम सामान्य साधारण सा चेहरा मोहरा वाला है। मेरी बातें सुनकर उन्होने कहा चाहें जितना भी साधारण हो मगर मेरी लैला निसंदेह सबसे अलग है कि रिटायर होने वाले को भी अपना मजनू बना दिया है । मैंने हंसते हुए कहा हाय मेरे मजनू । और खिलखिलाते हुए हम दोनों ने फोन रख दी।
अगले दिन मैं एकदम 12 बजे उनके कमरे के बाहर था। कार्ड भेजने पर वे खुद बाहर निकले और संबोधित किय अनामी। मैं सामने ही था और हंसते हुए कहा आप बाहर आए लैला खुश हुई। और हंसते हुए मैं साथ में अंदर चला गया। बीच में खाना भी खाए और चाय कॉफी के कई दौर के बीच लगभग चार घंटे तक हजार तरह की बातें हुई। उन्होने कई बार इसका अफसोस जताया कि तुमसे मुलकत ही तब हो रही है जब मैं जाने वाला हूं यार। तीन साल पहले मिले होते तो अब तक पचास बार मिल गए होते। मैने चुस्की ली यह तो आपकी नहीं भाभी की किस्मत थी नहीं तो लैला मजनू के चक्कर में वो परेशान रहती।.. और मुझे बार बार घर जाकर बताना पड़ता कि उनकी लैला कौन है ? फिर हमलोग खिलखिला पड़े। मैने कहा तो अब इजाजत है ? खड़े होते हुए पूछा कैसे आए हो ? मैने कहा कि आया तो बस से था मगर अभी ऑटो कर लूंगा। उन्होने तुरंत कहा नहीं मेरी लैला मेरी सरकारी गाडी से जाएगी। और अंत में मैने उनके पैर छूए । वे एकदम निहाल से हो गए। अंत में मैने भी उनकी मदद,प्रोत्साहनऔर प्यार के लिए आभार जताया। उन्होने मुझे गले से लगा लिय। ऐसे मौके पर भला मैं कहां चूकने वाला उनकी बांहों में ही पूछा कि बांहों में कौन हैं लैला या अनामी ? यह सुनते ही बांहों की जकड़ सख्त करते हुए कहा दोनों । और अनमने मन से हमलोग अलग हुए। कई माह तक तो बीच में बात होती रही, फिर एक अंतराल आ गया। सरकारी फ्लैट से अलग होने पर फोन नंबर भी बदल गए हमेशा की तरह ही पुराना से पुराना रिश्ता भी एक समय के बाद अर्थहीन हो जाता है। मैं यह तो नहीं जानता कि श्री गुप्ताजी अब कहां पर हैं मगर मेरी यह प्रार्थना है कि वे हमेशा खुश और अच्छी सेहत के साथ रहे।
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पुलिसिया दोस्ती
यह संस्मरण एक पुलिसिया की है। दुख की तो यह बात है कि इतना जिंदादिल इंसान मोतीराम गोठवाल अब जीवित नहीं है। 50 से भी कम उम्र में संसार छोड़ने वाले गोठवाल की पत्नी की भी बहुत याद आती है । हालांकि मैं उनसे कभी मिला नहीं मगर मेरी आवाज सुनते ही सबसे पहले भईया बोलनी और गोठवाल जी कहं पर है यह बताते हुए वहां का नंबर दे देती थी । बात 1994 की है। दैनिक अखबार राष्ट्रीय सहारा में नार्थ ईस्ट का क्राईम भी मैं ही देखता था। दो चार बार गोठवाल से बात हुई तो उन्होने कहा कभी अलीपुर आओ यार गप्प भी करेंगे और क्राईम की ऐसी खबरे दूंगा जो किसी के पास नहीं होगी। एक दो दिन में ही उसने गाड़ी भेज दी तो मैं अपने पुलिसिया मित्र से अलीपुर निकल पड़ा। बहुत ही गरमजोसी के साथ मेल मिलाप हुआ दिल्ली पुलिस में सहायक पुलिस आयुक्त( एसीपी) अलीपुर के प्यार जोश और मिलने की लालसा के चलते हम गहरे दोस्त से बन गए। बिना काम के भी केवल हाल चाल जानने के लिए हमलोग आपस में बात कर ही लेते थे।
मगर अलीपुर एसीपी और किसी पेपर का क्राईम रिपोर्टर के बीच तो आंख मिचौली वाला नाता होता है। जरूरत बे जरूरत बात करने और संपंर्क मे तो रहना ही होता है। लगभग एक दर्जन बार ऐसा हुआ कि जब मुझे गोठवाल से रात में बात करनी हो तो वे घऱ पर नहीं होते। ( उस समय तक मोबइल की पैदाईश नहीं हुई ती। मैं भाभी से पूछता कहां है अपना हीरो? भाभी ने केवल एक बार मुझसे कहा था कि भैय्या मैं आपको हमेशा बता दिया करूंगी कि हीरो कहां पर हैं, मगर आपको कभी भी यह नहीं बताना होगा कि नंबर किसने दिया है । श्रीमती गोठवाल कहें य भाभी या बहन मैने पूछा कि क्या आपको मेरे उपर विश्वास है ? आपने तो मुझे देखा तक नही है कि मैं कैसा हूं ? इस पर उन्होने कहा कि विश्वास होने पर आदमी को देखने की जरूरत नहीं पड़ती आप एक नेक इंसान है यही मेरे अटल विश्वास का संबल है। मैं एक इतने सीनियर पुलिस अधिकारी की बीबी की बातें सुनकर दंग रह गया।
करीब दो साल में ऐसे सात आठ बार मौके आए जब रात में मैं बात करना चाह रहा था और वे घर या दफ्त कहीं नहीं थे। तो अंतत एक ही शरण था। फोन करते ही वे कहां हैं और वहां का नंबर क्या है सब मेरे पास होता। और जब मैने उनके घर पर फोन करके गोठवाल के बारे में पूछता तो बात हो जाती थी और एक दो संयोग पर ध्यान नहीं दिया मगर बाद में फोन आने पर गोठवाल एकदम चौक जाता और सबसे पहले यही पूछता कि नंबर कहां से पाए कि मैं यहां पर हूं। बाद मे जब कभी गोठवाल कहीं अपने घर से बाहर किसी मित्र के यहां बैठे हो और मैने फोन कर दिया तो वे सीधे लाईन पर आने की बजाय यह पूछने को कहते कि कहीं कोई अनामी शरण का तो फोन नहीं है ? जब मैं इधर से कहता कि हां अनामी तो बेचैन होकर गोठवाल मेरी बात सुने बगैर ही यही पूछते कि तुमको यह कैसे पता कि मैं यहां पर हूं। मैं बार बार हंसकर टाल देता। मगर उस दिन गोठवाल तैश में थे नहीं अनामी फोन पर बता न। मैंने हंसते हुए कहा कि तेरे भीतर मैने एक ट्रांसमीटर एडजस्ट करा दिया है जिसमें जहं कहीं भी रहो वहां का फोन नंबर और शक्ल दिखने लगती है। मेरी बातों से खीझते हुए गोठवाल फिर पूछते बोलो अनामी क्या काम है। एक बार वो कहीं बेहद गोपनीय बैठक में था और बीच में ही मेरा फोन टपक गया। इस बार तैश में आकर गोठवाल चीख पड़ा। अनामी यार तुम्हें खबरिया का नाम बताना होगा साला है कौन भाई जो मेरी जासूसी करता है और तुम तक नंबर आ जाता है। इस बार वो गुस्से में था तो बात नहीं हो सकी।
1995 में किसी एक दिन मैं अशोक विहार में नार्थ इस्ट जिले के पुलिस कमीश्नर करनैल सिंह के कमरे में घुसा ही था कि गोठवाल पहले से मौजूद थे। थोडी देर में काम निपटने के बाद मैं बाहर निकलने लगा तो गोठवाल ने कहा कि मैं भी चल रहा हूं बस मेरा इंतजार करना। दो चार मिनट में ही गोठवाल बाहर निकले और जबरन मुझे अपनी गाड़ी में चलने को कहा। मैने हंसकर पूछा कहीं थर्ड डिग्री का तो इस्तेमाल नहीं करना। मेरी बातों को सुनकर वो केवल हंसता रहा। जब अलीपुर मै उसके कमरे में बैठा तो वह एकदम पुलिसिय अंदाज में बोला अनामी तुम्हें आज नाम बताना होगा कि तुम्हें यह नंबर कौन देता है कि मैं कहं पर हूं। मैने भी आगाह किया कि पुलिसिया धौंस, पर तो कुछ नहीं बताउंगा और पुलिस की तरह नहीं एकदम जो याराना है उसी लय में बात करो। गोठवाल ने फिर पूछा तो मैने कहा कि एक बार बताया था न कि तेरे अंदर एक ट्रांसमीटर फिट है। इस पर वो उखड़ गया। कमाल है यार एक तरफ दोस्त भी कहता है और मेरी जासूसी भी करता है। मैंने हंसते हुए कहा चोर की दाढी में तिनका। साले किन चोरों से मिलने जाते हो कि हवा खराब है। मेरी बात से वो परेशान होकर कुर्सी पर बैठ गया। मैने बात मोड़ने के लिए पूछा कि चाय बगैरह पीलाओगे तो पीला नहीं तो वापस दफ्तर भिजवाइए। मेरी बात सुनते ही उसने कहा कि चलो। गाड़ी में जब हमलोग बैठ गए तो मैने पूछ किधर ? इस पर गोठवाल ने कहा चलो घर चलते हैं वहीं चाय भी पीएंगैं और उधर से ही तुमको भिजवा भी देंगे। घर क नाम सुनते ही मैं अंदर से थोडा कंपित हुआ कि कहीं गोठवाल को अपनी बीबी पर तो शक नहीं है कि वो नंबर देती हो। घर का नाम सुनते ही मैं खुश हो गया। उसने मेरे चेहरे के भाव को देखर ही कहा क्या बात है। मैने फौरन कहा कि गुस्से में लाल पीला टमाटर हो रहे गोठवाल को देखने तो भला है कि भाभी को देखूंगा। मैने चुटकी ली गोठवाल भईया कल तुम इस आरोप में पकड़ ना लेना कि साले मेरी बीबी से बात करता है। मेरी इस चुहल पर गोठवाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। मगर एक बार फिर उसने पूछा कि यार लेकिन तुमको यह पता कैसे चलता है कि कहां पर हूं। मैने जोर से गोठवाल को कह कि गाड़ी रोको अगर मेरे उपर विश्वास है तो बात करो नहीं तो बार बार बच्चों वाली लालीपॉप देने के नाम पर एक ही सवाल को बार बार दोहरा रहे हो । अभी घर ले जा रहे हो बाद में पता नहीं क्या क्या इल्जाम लगा दो। मैं नहीं जाता यार गाड़ी रूकवा दो। मेरे यह कहने पर वो
एकदम ठंडा सा हो गया। तुरंत माफी मंगने लगा। मैने कहा माफी की जरूरत नहीं है यर पर अब मैं कभी फोन ही नहीं करूंगा। बिना बात किए क्य तेरी तरफ से टिप्पणी डालना मैं नहीं जानता। पर जब हमलोग में विश्वस ही नहीं है तो चाय फाय क्या। मैं घर पर चलकर भी नहीं लूंगा ।
खैर घर के पास ही यह तकरर हो रही थी लिहाजा घर तो जाना ही पडा। उसने अपनी पत्नी से मेरी मुलाकात कराई। मैं भी अनजान सा देखकर खामोश रह। दफ्तर लौटते समय गोठवाल ने फिर माफी मांगी। तब मैने कहा कि अब मैं फोन नहीं करूंगा जब आपका गुस्सा शांत हो जाए तो फोन करना नहीं तो यह हमलोग की अंतिम भेट है। कई माह के बाद गोठवाल का फोन आया और फिर से बात चालू करने का आग्रह किया। मैने कहा कि अब तो मेरे पास क्राईम रहा नहीं मगर जरूरत पड़ी तो जरूर बात होगी। दो तीन साल के बाद एक बार फिर गोटवाल का फोन आया कहां हो अनामी भाई। बोली में पुलिसिय रौब और धमक आ गयी थी। एकदम पुलिसिया प्यार दिखाते हुए बोला साले कहां रहे सालो साल । यही दोस्ती करता है। अब मैं कल्याणपुरी का एसीपी बनकर आया हूं। तेरे कार्ड में नंबर देखा तो यार यह तो तेरा ही इलाका है। एकदम चहकते हुए खुशी जाहिर कर रहा था। मैने पूछा कहां है । तपाक से गोठवाल ने कहा दफ्तर में । मैं उसके पास आधे घंटे मे पहुंच गया। कमरे में घुसते ही गोठवाल ने मुझे अपनी बांहो में दबोच लिया, अभी तक नाराज हो क्या अनामी। मैने हंसते हुए कहा नहीं नाराज क्यों रहूंग। गोठवाल मुझे बांहों मे लिए लिए ही बीच के शक तकरार के लिए माफी मांगी। मैने गोठवाल से कहा कि तेरी बांहों में यदि मेरा दम टूट गया न तो सच मान मेरी बीबी तुमसे जरूर नाराज हो जएगी। फिर एक ठहाके के साथ मैं बंधन मुक्त हुआ।
कल्याणपुरी में रहते हुए उनसे कई बार मुलाकात होती रही। जब भी घर चलने को कह तो उसने हमेश कहा कि नहीं पत्नी को साथ लेकर ही आउंगा। मगर काल की क्रूर नियति और संयोग के बीच इतना निश्छल दोस्त कब भगवान को रास आया है। उसके निधन की खबर भी मुझे बहुत बाद में ज्ञात हुआ। तो मैं उसके घर जाकर अपनी शोक संवेदना भी जाहिर नहीं कर सका।
मैं हर बार दो श्रृंखला जोड़ दूंग तकि लोग इसके बारे में अपनी बात कर सके।
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Comm

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