शुक्रवार, 17 जून 2016

आखिर किसका था महानगर?






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मुंबई से एक अखबार प्रकाशित होता है- हमारा महानगर. यह हमारा महानगर अखबार उन्हीं निखिल वागले का अखबार है जिसके दम में पर वे ईमानदारी आंदोलन चलाया करते थे. लेकिन समय ने वागले का साथ नहीं दिया और उन्होंने अखबार एक सिक्योरिटी एजंसी चलानेवाले व्यक्ति आर एन सिंह को बेच दिया. आरएन सिंह अखबार मालिक तो हो गये लेकिन अखबार को उन्होंने सिक्योरिटी एजंसी की तरह चलाना शुरू किया और पत्रकारों को वाचमैन की तरह विश्लेषण देने लगे. हमारा मगानगर पहले मुंबई से ब्राडशीट अखबार बना फिर दिल्ली आया. दिल्ली आया और दिल्ली से चला भी गयी. इसी साल फरवरी में अखबार का दिल्ली संस्करण बंद हो गया. अफवाह यह भी है कि जल्द ही यही हश्र मुंबई संस्करण का भी होनेवाला है. अखबार में काम के दौरान अपने अनुभवों को बता रहे हैं अनामी शऱण बबल.
पूर्वी उतर प्रदेश के किसी एक शहर से सामान्य लेबर की तरह मुबंई में जाकर सिनेमाई कामयाबी पाने वाले हमारा महानगर के मालिक आर एन सिंह आज मुबंई की धड़कन है। एक सिक्योरिटी कंपनी खोलकर हर माह करोड़ों रूपए की आमदनी कमाने वाले सिंह साहब की जेब में लाखों पूरबिया वोट का जादू है। यही वजह है कि शिवसेना से लेकर महाराष्ट्र का कोई भी मुख्यमंत्री आर. एन सिंह को हर तरह से अपने काबू में रखना चाहता है। हमारा महानगर के मालिकों के इसी जादू का असर है कि मुबंई में यह अखबार चल नहीं "दौड़" रहा है। लाखों की प्रसार वाले इस अखबार को पूर्वी यूपी का दर्पण बना दिया गया है। मुबंई में बैठे हर पूरबिए के लिए यह अखबार "रोजाना की जरूरतों" में शामिल हो गया ह। यही वजह है कि सामान्य मजदूर की तरह आज से 40-45 साल पहले मुबंई गए सिंह को यह शहर इस कदर भाया कि वे अपने पोलिटिकल संपर्को के चलते मुबंई के मेयर बनने का सपना भी साकार किया।
अखबार की कमाई को और बढ़ाने में इनका आधुनिक प्रेस भी कारू का खजाना साबित हुआ। मुबंई की शान माने जाने वाले हमारा महानगर के मालिक का यह जलवा है कि इनके समारोहों में बड़े बड़े धनकुबेरों से लेकर मायानगरी के चमकते सितारो और सारिकाएं  भी आकर चरण छूकर आशीष पाना अपना सौभाग्य मानती हैं। मुबंई के इसी जलवा को दिल्ली में बिखेरने का स्वप्न पाले हमारा महानगर को दिल्ली से चालू करने का कार्य़क्रम बना। पैसा खर्च करने के मामले पूरी तरह कंजूसी बरतने की सख्त योजना के साथ हमारा महानगर की योजना को लेकर राजीव रंजन नाग सामने आए। लोकल का हेड कर रहे संदीप ठाकुर की टीम में मैं भी शामिल था। मोहन सिंह काफी होम में होने वाली करीब आधा दर्जन बैठकों में पूरी तरह शामिल भी रहा। पगार के अलावा किसी भी  संवाददाता को मोबाइल, अखबार,या परिवहन भता देने से साफ मना कर दिया गया। करौलबाग के दफ्तर में मुबंईया अधिकारियों ने फिलहाल अन्य खर्चो पर रोक लगा दी। मुबंई से रोजाना तुलना करते हुए खबरों से ज्यादा विज्ञापन और इस तरह की खबरों को ज्यादा फोकस करने का आदेश दिया जिसका भविष्य में लाभ हो सके। मुबंईया अधिकारियों ने तमाम संवाददाताओं को अपने संपर्को को रिचार्ज करते रहने का भी फरमान सुनाया, ताकि कभी भी उसका लाभ लिया जा सके। विज्ञापन लाने वाले महान पत्रकारों को 20 प्रतिशत कमीशन देने का भी भरोसा दिया गया।
पत्रकारिता के इस महान दौर में सबसे संतोष की बात यही रही कि राजीव रंजन नाग और संदीप ठाकुर ने इससे खुद को पूरी तरह अलग रखा। हमारा महानगर शुरू होने से पहले ही तथाकथित मालिकों के फरमान का बीच हमारा महानगर की पूरी योजना बनी। यह मेरा सौभाग्य था या दुर्भाग्य कि हमारा महानगर से जुड़ने से पहले ही मैनें नागजी एवं ठाकुर से मुबंई जाने की वजह से 10 दिन  की छुट्टी मंजूर करवा ली थी। इसी दौरान पाइल्स की पुरानी बीमारी से मैं इस कदर पीडि़त हुआ कि करीब 15 दिन तक तिब्बिया अस्पताल में जाकर इलाज कराने के सिवा मेरे पास कोई चारा ना रहा।  मामला इतना संगीन था कि आपरेशन कराने की नौबत आ गई थी। इस दौरान निसंदेह नाग साहब का मेरे पास फोन आया और उन्होनें हाल चाल जानने के बाद कहा कि मैं तुम्हारे बारे में क्या करू?
यह सवाल नाग के प्रति मन को आदर से भर दिया। शारीरिक अस्वस्थता का हवाला देते हुए मैने उनसे कहा कि सर आप पूरी तरह आजाद है, किसी को भी रख लें, मगर फिलहाल तो मैं मजबूर हूं। संदीप ने भी मेरी सेहत पर चिंता प्रकट करते  हुए बाद में देखने का भरोसा दिया। हमारा महानगर की तरफ से आफर लेटर, बैंक खाता चेक बुक और एटीएम कार्ड आज भी मेरे लिए हमारा महानगर की याद में धरोहर बन गई। जब मैं नवम्बर 2008 में पूरी तरह ठीक हो गया, तब तक हमारा महानगर के प्रकाशन आरंभ हो चुका था। नाग और ठाकुर के प्रयासों के बाद भी फिर मेरा दोबारा इससे जुड़ना नही हो सका। हालांकि छह माह की उपहार योजना के तहत इसे लगातार लेना चालू तो किया, मगर दो माह के भीतर ही उपहार दिए बगैर ही हमारा महानगर घर पर आना बंद हो गया। हाकर से दर्जनों बार की गई जवाब तलब के बाद भी अखिरकार महाराजा समूह की तरफ से हम जैसे हजारों लोगों को इस ठगी का शिकार भी बनना पड़ा।
मुबंई की तरह दिल्ली में भी अपना रूतबा कायम करने का सिंह सपना साकार नहीं हो पाया। बगैर किसी धूम मचाए ही हमारा महानगर की दिल्ली में खामोश मौत हो गई। हालांकि हमारा महानगर पर कोई आंसू बहाने वाला भी नहीं है। इससे जुड़कर भी नहीं जुड़ पाने का गम तो कभी नहीं रहा। हां इसका अफसोस जरूर है कि अपने लाभ के वास्ते  मीडिया का दुरूपयोग करने वालों की लालच से अंततः मीडिया और अखबार की साख का ही बट्टा लगता है, जो इसकी विश्वसनीयता को कम करती है। हमारा महानगर के बंद होने का तो कोई मलाल नहीं है, मगर 10-12 कप चाय का कर्ज मेरे ऊपर जरूर है, जिसको उतारना अब मेरे लिए आसान नहीं है।

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