रविवार, 13 मार्च 2016

टीवी का सबसे बड़ा शत्रु TRP का घनचक्कर?







तो इसे कहते हैं TRP?





डॉ. देव  व्रत  सिंह |


 भारतीय मीडिया में पिछले एक दशक के दौरान टेलीविजन के संदर्भ में यदि किसी एक शब्दावली का सबसे अधिक प्रयोग हुआ है तो वो है टीआरपी यानी टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट। बार-बार टेलीविजन निर्माता टीआरपी का बहाना बनाकर या तो किसी कार्यक्रम को बंद कर देते हैं या फिर किसी धारावाहिक या रियलिटी शो को जरूरत से अधिक चलाते रहते हैं। जब-जब टेलीविजन के कार्यक्रमों की गुणवत्ता को लेकर बहस छिड़ी निर्माताओं ने दर्शकों की पसंद का तर्क दिया और दर्शकों की पसंद को मापने का तरीका टीआरपी को बनाया गया। जबकि तथ्य ये है कि मीडिया उद्योग के भी बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर टेलीविजन रेटिंग की बारीकियां किस प्रकार तय होती हैं।
 रेडियो और टेलीविजन चैनलों का कारोबार विज्ञापनों से होने वाली आय पर निर्भर करता है। सही मायने में चैनल अपने दर्शकों और श्रोताओं तक विज्ञापनदाताओं को पहुंचने की अनुमति देकर उसके एवज में फीस वसूलते हैं और अपने दर्शकों व श्रोताओं को विज्ञापनदाताओं के सामने परोसते हैं। बाजारवाद व उपभोक्तावाद के युग में कंपनियां प्रतिस्पर्धा के चलते अपने ग्राहकों तक तीव्रता और आसानी से पहुंचना चाहती हैं। मीडिया विज्ञापन का सशक्त माध्यम है लेकिन विभिन्न प्रकार के मीडिया की भीड़ में विज्ञापन कंपनियों को ये पता लगाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है कि कौन सा मीडिया विशिष्ट ग्राहक वर्ग तक उन्हें सीधे पहुंचने में मदद करेगा। मीडिया चयन के काम में थोड़ी सी भी गलती से करोड़ों रूपये का विज्ञापन व्यर्थ चला जाता है। मीडिया और बाजार के जानकार गंभीरता और बारीकी से श्रोताओं संबंधी रिपोर्टों का अध्ययन करने के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचते हैं।
टीआरपी टेलीविजन दर्शकों और रेडियो लिसनरशिप सर्वे रेडियो के श्रोताओं की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और पसंद की शोध है जो एक तरफ कंपनियों को विज्ञापन माध्यम चुनने में मदद करती हैं तो दूसरी तरफ चैनलों को भी अपनी लोकप्रियता और आम लोगों की पसंद का अनुमान लगाने में सहायता करती हैं। इसके अलावा शोधकर्ता और अकादमिक लोगों के लिए भी ये सर्वे मीडिया के अध्ययन में सहयोगी बनते हैं।
आरंभिक काल
 सन् 1930 में रेडियो श्रोताओं का अध्ययन करने के लिए अमेरिका में पहली बार एक स्वतंत्र एजेंसी कॉपरेटिव एनालिसिस ऑफ ब्रॉडकास्टिंग का गठन किया गया। इस एजेंसी के मालिक क्रोस्ले ने टेलीविजन रिकॉल सर्वे के जरिये रेडियो श्रोताओं के बारे में जानकारी एकत्रित की। सन् 1934 में क्लॉड हूपर ने बिजनेस में कदम रखा और हूपररेटिंग भी काफी लोकप्रिय हुई। सन् 1939 में ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कोर्पोरेशन ने भी अपनी रेडियो श्रोताओं के बारे में सर्वे करना आरंभ कर दिया था। ए.सी. निल्सन ने पहली बार इस काम के लिए ऑडिमीटर नामक यंत्र का प्रयोग किया। ऑडीमीटर रेडियो में लगा दिया जाता था और ये यंत्र रेडियो के डायल की स्थिति को एक टिकर की मदद से टेप जैसे एक पेपर पर रिकार्ड कर देता था। इससे पहले सभी लोग टेलीफोन के जरिये श्रोताओं से सुने गये कार्यक्रमों के बारे में सवाल पूछ कर ये अनुमान लगाते थे कि कौनसा चैनल अधिक सुना गया था।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद टेलीविजन की लोकप्रियता बढ़ी और इसके दर्शकों के बारे में भी आंकड़ों की जरूरत महसूस हुई। अमेरिका में सन् 1949 में जेम्स सिलर ने अमेरिकन रिसर्च ब्यूरो स्थापित किया जो टेलीविजन रेटिंग्स का काम करती थी। ए.सी. निल्सन ने भी ऑडीमीटर की तरह ही पीपुलमीटर नामक एक यंत्र टेलीविजन रेटिंग्स के लिए ईजाद कर लिया। जल्दी ही बीबीसी ने भी इस दिशा में अपना कदम बढ़ा दिया। सन् 1963 में अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रैजेंटेटिव में रेडियो और टेलीविजन रेटिंग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठा और ऐतिहासिक बहस हुई। इस आलोचना के बाद अमेरिका में कंपनियों ने रेटिंग के सैंपल साइज को पहले से अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और विस्तृत कर दिया। सरकार ने रेटिंग सेवाओं की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र ब्रॉडकास्ट रेटिंग कांसिल का निर्माण भी किया। आर्बीट्रोन कंपनी ने सन् 1958 में ऐसा मीटर बनया जिससे हर रोज रेटिंग का पता चल जाता था। बाद के काल में ए.सी. निल्सन और आरबीट्रोन के बीच रेटिंग के कारोबार में कड़ी प्रतिस्पर्धा रही।
 टीआरपी की तकनीक
 दुनियाभर में ही रेटिंग का आरंभ टेलीफोन कॉल से जानकारी इकट्ठा करने में हुआ। कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान ही ये कंपनियां टेलीफोन करके दर्शकों या श्रोताओं से उनके द्वारा देखे या सुने जाने वाले कार्यक्रम के बारे में जानकारी जुटाती और उसके आधार पर किसी चैनल या कार्यक्रम की लोकप्रियता के बारे में निर्णय सुनाती। लेकिन इस विधि की कई सीमाएं थी। सबसे पहले तो ये आवश्यक नहीं कि रेडियो या टेलीविजन के सभी श्रोताओं या दर्शकों के पास टेलीफोन की सुविधा हो। ऐसे में सैंपल चयन में टेलीफोनधारकों को ही चुनना स्वयं में इस शोध को एकांगी बना देता था। दूसरा कुछ श्रोता कार में या घर से बाहर भी रेडियो का आनंद उठाते हैं। मोबाइल फोन बहुत बाद में आये हैं। इसलिए ऐसे श्रोताओं को टेलीफोन कॉल के सैंपल में शामिल ही नहीं किया जाता था। हालांकि कुछ कंपनियां श्रोताओं से पिछले 24 घंटे में सुने गये कार्यक्रमों की जानकारी भी मांगने लगी। जिससे इस शोध के आंकड़ों का विस्तार हो जाता था। बाद में अनेक कंपनियों ने विभिन्न तकनीकी उपकरण का ईजाद करके रेटिंग के कारोबार को अधिक व्यवस्थित और विश्वसनीय बना दिया। फिर भी प्रत्येक सिस्टम की अपनी कमजोरियां और खूबियां बनी रहीं।
 डायरी सिस्टम
इसमें कंपनी श्रोताओं के सैंपल चुनकर उन्हें एक साप्ताहिक डायरी दे देती है और श्रोताओं को उस डायरी में प्रतिदिन सुने या देखे गये कार्यक्रमों के बारे में हर दिन लिखने को कहा जाता था। हर सप्ताह कंपनी का प्रतिनिधि घरों से ये डायरी इकट्ठा कर लेता है और उसमें नोट सारी जानकारी के आधार पर कंपनी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देती है। इस डायरी में हर दिन के लिए एक पन्ने पर कार्यक्रम के नाम और समय का विवरण दिया जाता है। इस सिस्टम में किसी समय के दौरान परिवार के कितने सदस्यों ने कार्यक्रम विशेष देखा या सुना है ये विवरण भी दिया जाता है। इसके अलावा डायरी सिस्टम से उन लोगों को भी शोध का हिस्सा बनाया जा सकता है जिनके पास फोन नहीं है और जो रेडियो घर से बाहर भी सुनते हैं। लेकिन इस व्यवस्था की एक कमजोरी भी है। इसमें हम पूरी तरह श्रोताओं पर निर्भर हो जाते हैं। अनेक बार दर्शक या श्रोता आलस्य के कारण डायरी भरने का काम नियमित रूप से नहीं करता। कई बार वो ये काम करना भूल जाता है। अनेक बार गलत जानकारियां भरने का डर भी बना रहता है। इन सबके अलावा एक से अधिक चैनलों के बारे में जानकारियां भरना अक्सर पेचीदा हो जाता है और उसके लिए डायरी भी मोटी बन जाती है। जिससे श्रोता डायरी भरने के काम में निरूत्साहित हो जाता है।
 फ्रिक्वैंसी मैचिंग तकनीक
 दर्शकों और श्रोताओं की भूमिका को आंकड़े एकत्रित करने के काम में कम से कम करने करने की कोशिश में निल्सन कंपनी ने ऑडीमीटर और पीपुलमीटर ईजाद किये। निर्धारित सैंपल के तहत दर्शकों के घरों में उनकी सहमति से टेलीविजन सेट में पीपुलमीटर लगा दिया जाता है। दर्शकों को लिखित गोपनीयता के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के बाद एक सेट टॉप बॉक्स दिया जाता है। इसमें अनेक बटन होते हैं। जब भी परिवार में टेलीविजन देखा जाता है तो कार्यक्रम देखने वाले दर्शकों की संख्या के अनुसार सेट टॉप बॉक्स पर बटन दबा दिया जाता है। जिसमें कंपनी को ये भी जानकारी मिल जाती है कि किस समय परिवार के कौन-कौन से सदस्यों ने टेलीविजन का कौन सा कार्यक्रम देखा। पीपुलमीटर टेलीवजिन सेट की पिक्चर ट्यूब से जुड़ा होता है और टेलीविजन में चल रहे चैनल की फ्रीक्वेंसी को रिकोर्ड करता रहता है। बाद में कंपनी चैनल फ्रिक्वैंसी के इस रिकॉर्ड की मदद से देखे जाने वाले चैनल का नाम पता कर लेती है। इस तकनीक की एक ही कमजोरी है। केबल ऑपरेटर उपग्रह प्रसारण से सिग्नल ग्रहण करके अनेक बार घरों में प्रसारित करते समय उनकी फ्रिक्वेंसी बदल देते हैं। ऐसे में संभव है कि अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही चैनल की कई फ्रिक्वैंसी हों। जबकि कंपनी चैनलों की निर्धारित डाउनलिंकिंग फ्रिक्वैंसी से मिलान करके ही ये पता लगाती है कि दर्शक कौन सा चैनल देख रहे हैं।
 पिक्चर मैचिंग तकनीक
 फ्रिक्वैंसी मोनिटरिंग तकनीक की कमजोरी से निजात पाने के लिए एक नई तकनीक भी प्रयोग की जा रही है। पिक्चर मैचिंग तकनीक के तहत पीपुलमीटर पिक्चर ट्यूब में दिखाई जा रही तस्वीर के एक छोटे से हिस्से को निरंतर रिकोर्ड करता रहता है। जबकि कंपनी ऑफिस में भी सभी चैनलों के उसी हिस्से को चौबीस घंटे अलग-अलग रिकोर्ड किया जाता है। बाद में दर्शकों के घरों से प्रत्येक सप्ताह इकट्ठा की गयी रिडिंग का मिलान कम्प्यूटरीकृत तकनीक से कंपनी की रिकोर्ड की गई पिक्चर से की जाती है तो ये पता चल जाता है कि दर्शक विशेष कौनसा चैनल देख रहा था।
 भारतीय संदर्भ
 भारत में पहली बार टीरआरपी इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो ने सन् 1983 में आयोजित की थी। उसके बाद ओआरजी मार्ग ने भी तीन साल बाद 1986 में टेलीविजन रेटिंग की पहल की। आई.एम.आर.बी. ने देश के आठ शहरों में कुल 3600 डायरी बांटी और तय किया कि जो भी व्यक्ति पांच मिनट या इससे अधिक देर तक टेलीविजन देखता है वो उनके दर्शक की श्रेणी में शामिल होगा। उस दौर में रामायण की टीआरपी 80 प्रतिशत आंकी गयी थी। सन् 1991 में उपग्रह चैनलों के आगमन के बाद उनकी लोकप्रियता को मापने के लिए भी यही डायरी का तरीका अपनाया गया। सन् 1995 में पहली बार आई.एम.आर.बी. और ओ.आर.जी. मार्ग ने मिलकर पीपुलमीटर का आयात किया। भारत में आयात के बाद प्रत्येक पीपुलमीटर की कीमत 70 हजार रूपये पड़ी। अगले ही साल रेटिंग की दिग्गज अमेरीकी कंपनी ए.सी. निल्सन ने आईएमआरबी के साथ हाथ मिलाकर भारत में टेलीविजन ऑडिएंस मेजरमेंट यान टैम का गठन किया। इसके अलावा ऑपरेशन रिसर्च ग्रुप और मार्केटिंग एंड रिसर्च ग्रुप भी इंडिया टेलीविजन ऑडिएंस मेजरमेंट (इनटैम) चलाती थी। सन् 2000 में टैम ने इनटैम का अधिग्रहण कर लिया और तब से देश में केवल एक ही रेटिंग एजेंसी टैम काम कर रही हैं।
 वर्तमान में टैम तीन प्रकार के आंकड़े अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराता है। पहला, कौन से कार्यक्रम देखे जा रहे हैं। दूसरा, किस समय देखे जा रहे हैं। तीसरा, उन्हें कौन देख रहा है। इसके अलावा विभिन्न कार्यक्रमों की रेटिंग और कुल दर्शकों में चैनलों की हिस्सेदारी के आंकड़े भी दिये जाते हैं। देश के 80 से अधिक शहरों में फैले पीपुलमीटरों की मदद से टैम लगभग पचास चैनलों के बारे में हर हफ्ते जानकारी जुटाता है। मुख्यतः दर्शकों की उम्र, लिंग, आय, सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि इत्यादि के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाई जाती है। रेटिंग एनालाइजर सेवा में टैम अपने ग्राहकों को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से हर घंटे की रेटिंग का विवरण देती है। दर्शकों के निरंतर बदलते मूड और आदतों के बारे में ऑडिएंस इवैल्यूएटर की मदद ली जाती है। टैम की एडएक्स सेवा भी काफी लोकप्रिय है। इसमें 50 से भी अधिक चैनलों पर दिखाये जाने वाले करीब 500 उत्पादों के विज्ञापनों का विवरण उपलब्ध कराया जाता है। आजकल ये सब जानकारी टैम ऑनलाइन या सीडी में उपलब्ध कराती हैं।
 विश्वसनीयता का प्रश्न
रेटिंग्स पर निजी कंपनियों का करोड़ों का कारोबार टिका हुआ है। इसलिए ये सवाल अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है कि रेटिंग आयोजित करने वाली कंपनी निष्पक्ष रूप से काम करे। रेटिंग के आधार पर टेलीविजन कार्यक्रमों का भविष्य भी तय होता है। यही नहीं, अक्सर निर्माता भी टीआरपी का बहाना बनाकर अपने कार्यक्रमों के पक्ष में माहौल बनाते हैं, इसलिए रेटिंग का सामाजिक महत्व भी बढ जाता है। क्योंकि रेटिंग आजकल टेलीविजन कंटैंट को निर्धारित कर रही हैं। रेटिंग के कारोबार में लगी टैम एक निजी कंपनी है और भारत में इस क्षेत्र में टैम का एकाधिकार है। अनेक मौकों पर टैम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये गये हैं। कुछ चैनलों ने तो चुनिंदा बड़े चैनलों को लाभ पहुंचाने का आरोप भी टैम पर लगाया है। कुछ साल पहले पीपुलमीटर जिन घरों में लगाया गया था उनकी गोपनीय सूची लीक हो गयी थी। ऐसे में कोई भी चैनल यदि कुछ पीपुलमीटर वाले घरों में रिश्वत देकर उन्हें सारे दिन एक ही चैनल चलाने के लिए राजी कर ले तो उस चैनल की टीआरपी में जबरदस्त उछाल आ जाएगा।
 लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह अकसर इस शोध के सैंपल साइज को लेकर लगाया जाता है। कुछ साल पहले तक टैम अपना सैंपल साइज 4555 बताता था हालांकि ये साइज घटता बढ़ता रहता है। आलोचकों के अनुसार सौ करोड़ की आबादी वाले भारत में मात्र 4555 घरों में पीपुलमीटर के आधार पर कैसे किसी कार्यक्रम या चैनल की लोकप्रियता का अंदाजा हो सकता है। सैंपल साइज के छोटा होने का एक बड़ा कारण पीपुलमीटर का काफी महंगा होना है। इसके अलावा जितने ज्यादा शहरों या घरों में पीपुलमीटर लगाये जाएंगे उतने ही कर्मचारियों की संख्या भी बढे़गी।
 सैंपल घरों का चुनाव भी विवाद का कारण है। आलोचक मानते हैं कि सैंपल पूरी तरह भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करता। क्योंकि अधिकांश पीपुलमीटर शहरों में लगाये गये हैं और गावों और छोटे शहरों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। मीडिया रिसर्च यूजर्स कौंसिल (डत्न्ब्) के अनुसार ये सर्वे देश का केवल 38 प्रतिशत ही कवर करते हैं। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भी कुल टेलीविजन घरों के अनुपात में पीपुलमीटर की संख्या काफी कम है। एक तर्क ये भी है कि टैम के मीटर केवल घरों में लगे होने के कारण ये हॉटल, विश्वविद्यालय परिसर, क्लब, कार्यालय इत्यादि को अपने दायरे में शामिल नहीं करते। जबकि बिजनेस चैनल और क्रिकेट तो ऑफिसों में अत्याधिक देखे जाते हैं। इसके अलावा, आजकल दो टीवी सेटों वाले घरों की संख्या भी बढ़ रही है। कुल मिलाकर वर्तमान रेटिंग सिस्टम दर्शकों की संख्या गिनने पर आधारित है ना कि टेलीविजन कार्यक्रमों को देखने की मात्रा पर आधारित।
टैम रेटिंग के विपक्ष में ये भी तर्क दिया जाता है कि ये राष्ट्रीय मनोरंजन चैनलों के पक्ष में पूर्वाग्रह रखती है और स्थानीय और क्षेत्रीय चैनलों को नजरअंदाज करती हैं। दूरदर्शन समेत इनाडू व सन टीवी का मानना है कि उनके दर्शकों की संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में काफी है जबकि टीआरपी का पूरा ढ़ांचा शहर आधारित होने के कारण उनकी टीआरपी उतनी नहीं दिखाई जाती जितने के वे हकदार हैं। इनाडू टेलीविजन के मालिक रामोजी राव ने तो ग्रामीण रेटिंग यानी टेलीविजन रूरल रेटिंग निकालने का विचार भी दे डाला है। लेकिन इतना भी तय है कि जब तक कोई वैकल्पिक रेटिंग की व्यवस्था आरंभ नहीं होती तब तक सारे उद्योग जगत को टैम रेटिंग पर ही निर्भर रहना पडे़गा और वो भी एकाधिकार के सारे खतरों के साथ। जब-जब रेटिंग की वर्तमान व्यवस्था की आलोचना जोर पकड़ती है विज्ञापन और मीडिया उद्योग सरकार से हस्तक्षेप करने की गुहार लगाता है। लेकिन सरकार का कहना है कि जब तक उसका कोई सीधा हित इसमें नहीं सधता तब तक वो इस पचडे़ में पैर नहीं डालेगी। सन् 2007 में ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कांसिल (ठ।त्ब्) का गठन किया गया। जिसमें रेटिंग के तीनों पक्षों- विज्ञापनदाता, विज्ञापन कंपनियां और मीडिया के संगठन शामिल हैं। मीडिया रिसर्च यूजर्स कौंसिल पहले से काम कर रही है। कहा जा सकता है कि रेटिंग्स के कारोबार को अधिकाधिक बहुआयामी और पारदर्शी बनाने के दबाव का असर दिखने लगा है।
इसमें कोई शक नहीं कि रेटिंग का पूरा कारोबार बाजार की जरूरत के आधार पर आरंभ किया गया है। आज भी रेटिंग्स की महंगी रिपोर्टों के असली उपभोक्ता शोधकर्ता ना होकर विज्ञापनदाता हैं। जिनकी निगाह अपने संभावित ग्राहकों पर रहती है। ऐसे में उभरते शहरी मध्यम वर्ग पर रेटिंग का केंद्रित होना स्वाभाविक है। यही नहीं चैनल भी अधिकाधिक विज्ञापन आकर्षित करने के लिए ये साबित करने पर तुले रहते हैं कि ग्रामीण आबादी नहीं बल्कि शहरी मध्यम वर्ग ही उनके मुख्य दर्शक हैं।
 भविष्य पर एक नजर
तकनीकी कनवर्जेंस पूरी दुनिया में मनोरंजन की तसवीर बदल रहा है। टेलीविजन और रेडियो भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट पर रेडियो उपलब्ध होने के बाद रेडियो लिसनरशिप सर्वे को अपना ढांचा बदलना पड़ रहा है, वहीं थ्री जी मोबाइल सेवा और इंटरनेट प्रोटोकोल टेलीविजन के बाद टीवी रेटिंग्स की परिभाषा बदल रही है। अब दर्शक केवल घरों में बैठकर टेलीविजन नहीं देखते। ठीक उसी प्रकार रेडियो सुनने के माध्यम भी बदल रहे हैं। डीटीएच भारत में तेजी से पैर पसार रहा है और वीडियो ऑन डिमांड सेवा से टेलीविजन की दर्शकता का स्वरूप बदल रहा है। श्रोताओं और दर्शकों की पसंद और आदतों पर नब्ज रख पाना अब पहले से अधिक कठिन हो गया है। क्योंकि बदलते मीडिया के अनुरूप दर्शक भी स्वयं को तेजी से ढ़ाल रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से रेटिंग एजेंसियों को भी इसी रास्ते पर चलना पड़ेगा।

महत्वपूर्ण शब्दावली

 Arthur Nielsen: ए.सी. निल्सन ने दुनिया में पहली बार श्रोताओं के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए इलैक्ट्रोनिक यंत्र का उपयोग किया और अपने नाम से एक कंपनी बनाई जो बाद में दुनियाभर में रेटिंग्स जगत में छा गयी। दुनियाभर में निल्सन का नाम रेटिंग का पर्याय बन गया है।

Audimeter: अमेरिका के मैसाचुसेट्स ऑफ टैक्नोलोजी ने सन् 1936 में रेडियो श्रवण के बारे में जानकारी जुटाने वाले मकैनिकल डिवाइस-ऑडीमीटर बनाया। ये मशीन रेडियो चलाने के दौरान उसके ट्यूनिंग किये गये चैनलों के बारे में प्रत्येक मिनट की जानकारी रिकोर्ड करने में सक्षम थी। इस यंत्र ने ही बाद में पीपुलमीटर के लिए जमीन तैयार की।

 BARC: सन् 2007 में तीन मीडिया उद्योग संगठनों ने मिलकर ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च कौंसिल का निर्माण किया। इसमें विज्ञापनदाता, विज्ञापन कंपनियां और मीडिया शामिल हैं। इसका उद्देश्य टेलीविजन और अन्य ऑडियो-विजुअल मीडिया की सही और नयी रेटिंग उपलब्ध करना है।

 DART: दूरदर्शन ऑडिएंस रेटिंग्स यानि डार्ट के नाम से जानी जाने वाली ये रेटिंग दूरदर्शन चैनलों के दर्शकों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए आरंभ की गयी थी। स्वयं दूरदर्शन की दर्शक अनुसंधान इकाई डायरी मैथड से ये रिसर्च करती हैं। इसके लिए देशभर में दूरदर्शन केन्द्रों पर रिसर्च ऑफिसर नियुक्त किये गये हैं।
क्पंतल उमजीवकरू रेटिंग के इस तरीके के तहत सैंपल घरों में एक डायरी का वितरण किया जाता है और दर्शक से प्रतिदिन देखे गये कार्यक्रमों और उनके बारे में अपनी पसंद और ना पसंद की जानकारी उसमें भरने का आग्रह किया जाता है। रिसर्च प्रतिनिधि हर हफ्ते ये डायरी एकत्रित कर शोध के लिए आंकडे़ इकट्ठा कर लेता है।

MRUC: मीडिया रिसर्च यूजर्स कौंसिल विज्ञापनदाताओं, विज्ञापन कंपनियों, प्रकाशकों और प्रसारण माध्यमों का एक ऐसा संगठन है जो किसी मुनाफे के उद्देश्य से नहीं चलाया जाता। इसका गठन सन् 1994 में किया गया था। वर्तमान में इस संगठन के सभी बडे़ मीडिया कंपनियों समेंत 200 से अधिक सदस्य हैं। इसका उद्देश्य अपने सदस्यों को सस्ती, सुलभ और विश्वसनीय श्रोता अनुसंधान सुनिश्चित कराना और सभी प्रकार की रेटिंग सेवा पर निगरानी रखना।

People meter: ये इलेक्ट्रोनिक यंत्र टेलीविजन में पिक्चर ट्यूब के साथ जोड़ दिया जाता है। फ्रिक्वेंसी मोनिटरिंग तकनीक और पिक्चर मैचिंग तकनीक के जरिये पीपुलमीटर टेलीवजिन सेट में चल रहे चैनल विशेष के बारे में बिना किसी व्यवधान डाले जानकारी रिकार्ड कर लेता है। प्रत्येक सप्ताह ये जानकारी एकत्रित करके टीआरपी निकाली जाती है।

TAM: भारत में टेलीविजन ऑडिएंस मेजरमैंट यानी टैम एकमात्र ऐसी एजेंसी है जो टीआरपी तय करती है। निल्सन और इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो की आधे-आधे की साझेदारी वाली ये कंपनी देशभर में फैलेअपने नेटवर्क की मदद से टैम हर हफ्ते टीआरपी की घोषणा करती है।

IMRB: इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो देश की सबसे बड़ी मार्केट रिसर्च कंपनी है। आरंभ से ही ये कंपनी टेलीविजन रेटिंग से जुड़ी हुई है। टैम में इस कंपनी की आधी हिस्सेदारी है।

ORG-MARG: ऑपरेशन रिसर्च ग्रुप और मार्केटिंग एंड रिसर्च ग्रुप पहले दो अलग कंपनियां थी।
बाद में दोनों का विलय हुआ। इस कंपनी ने इंडियन टेलीविजन ऑडिएंस मेजरमैंट यानी इनटैम आरंभ की थी। लेकिन प्रतिस्पर्धा के बाद टैम में इसका विलय हो गया।

डॉ. देव  व्रत  सिंह झारखंड केन्द्रीय विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।

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