रविवार, 13 मार्च 2016

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता / श्‍याम कश्‍यप

 

 

 

 

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता

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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक-दूसरे का दर्पण हैं। इस दृष्टि से दोनों में द्वन्द्वात्मक (डायलेक्टिकल) और आवयविक (ऑर्गेनिक) एकता सहज ही लक्षित की जा सकती है। वस्तुतः हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हमारे आधुनिक साहित्यिक इतिहास का अत्यंत गौरवशाली स्वर्णिम पृष्‍ठ है। स्मरणीय है कि हिन्दी के गद्य साहित्य और नवीन एवं मीलिक गद्य-विधाओं का उदय ही हिन्दी पत्रकारिता की सर्जनात्मक कोख से हुआ था।
यह पत्रकारिता ही आरंभकालीन हिन्दी समाचार पत्रों के पृष्‍ठों पर धीरे-धीरे उभरने वाली अर्ध-साहित्यिक पत्रकारिता से क्रमश: विकसित होते हुए, भारतेन्दु युग में साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में प्रस्फुटित हुई थी।
भारतेन्दु हरिशचन्द्र (सन्1850-1885 ई0) की पत्रिकाओं कविवचनसुधा (1867ई0), हरिशन्द्र मैगज़ीन (1873ई0) और हरिशचन्द्र चंद्रिका (1874ई0) से ही हमें वास्तविक अर्थों में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। हिन्दी की आरंभकालीन साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी गद्य का चलता हुआ रूप निखर कर सामने आया और भारतेन्दु युग से गद्य-विधाओं और गद्य साहित्य की अखंड परंपरा का अबाध आविर्भाव हुआ।
पृष्‍ठभूमि: छापेखानों की और पत्रों की शुरुआत
अठारहवीं शताब्दी में भारत के कई नगरों ,गोआ, बंबई, सूरत, कलकत्ता और मद्रास में अनेक छापेखाने (प्रिंटिंग प्रेस) कायम हो गए थे स हालाँकि, हालैंड में 1430 ई0 में पहले प्रिंटिंग प्रेस के लगभग सवा सदी बाद, गोआ में 1556 ई0 में भारत का पहला प्रेस कायम हुआ था। परमेश्‍वरन थंकप्पन नायर के शब्दों में न केवल, “हिन्दी और उर्दू की पत्रकारिता का जन्म कलकत्ता में हुआ,“ बल्कि “कलकत्ता को पूरे दक्षिण-पूर्व एषिया में पत्रकारिता का जन्म स्थान माना जा सकता है। कलकत्ता से ही 1765 ई0 में एक डच विलियम बोल्ट ने पत्रकारिता के आरंभिक प्रयास किए थे और अंततः 1766 में अपना पहला “नोटिस“ छापा था।
कुछ विद्वानों की मान्यता है कि, “भारत में पत्रकारिता का आरंभ 1774 ई0 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार की ओर से मुद्रित एवं प्रकाशित “कैलकेटा गज़ेट“ से हुआ था। जो कि सही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं थी। इसलिए अधिकांश विद्वानों का मत है, जो प्रायः स्वीकार्य भी है, कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत एक आयरिश जेम्स ऑगस्टस हिकी ने 27 जून,1780 ई0 को अंग्रेज़ी में “बंगाल गज़ेट ऑफ कैलकेटा एडवरटाइज़र्स“ नामक साप्ताहिक निकाल कर की।
हिन्दी का स्वरूप और हिन्दी पत्रों का आरंभ
डॉ0 शिवमंगल राय के अनुसार ”सन्1779 आते-आते प्रथम भारतीय बाबू राम ने भी कलकत्ता में अपना प्रेस खड़ा कर लिया। हालाँकि प्रिओल्कर और नाइक ने देवनागरी में छपाई का समय 1796 में निर्धारित किया है, जबकि कुछ विद्वान इसे और भी पहले बताते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि 1786 से पहले तक तो कलकत्ता में देवनागरी टाइप ही उपलब्ध नहीं था। परमेश्‍वरन नायर के अनुसार “देवनागरी लिपि में छपाई के काम की शुरुआत कलकत्ता से ही हुई थी“ और वहीं से आरंभकालीन हिन्दी का साहित्य भी प्रचुर मात्रा में लिखा गया था तथा “1827 तक पूरे उत्तर भारत में हिन्दी का स्वरूप उभर कर सामने आ गया था।
इससे स्‍पष्‍ट है कि अंग्रेज़ों द्वारा फोर्ट विलियम से हिन्दी गद्य के तथाकथित ”निर्माण” और देवनागरी लिपि में फारसी-बोझिज्ञ तथाकथित ”हिन्दुस्तानी” भाषा के ”विकास” एवं उसकी ”लोकप्रियता” के दावे निराधार और झूठे प्रमाणित होते हैं। श्रीरामपुर (सीरामपुर) के मिशनरियों के हिन्दी मासिक ”दिग्दर्शन” (1817-18) के दो माह के भीतर ”बेंगाल ग्याजेट” और ”समाचार दर्पण” दो बाँग्ला साप्ताहिक पत्र निकले तथा 30 मई, 1826 को पहला हिन्दी समाचार पत्र साप्ताहिक ”उदंतमार्त्तंड” उदित हुआ। इसके संपादक, मुद्रक और प्रकाशक पं0 युगलकोशोर शुक्ल स्वयं एक सहृदय कवि एवं सुलेक्जक थे; अतः आरंभ से ही इस पत्र का रुझान लगभग अर्ध- साहित्यिक था।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी अपने ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” (मुद्रण: सं0 1995) में इसे हिन्दी का पहला पत्र बताते हुए लिखते हैं ”उदंतमार्त्तांडके बाद काशी के ”सुधाकर” और आगरा के ”बुद्धिप्रकाश” आदि के प्रयासों से “अदालती भाषा उर्दू बनाई जाने पर भी, वुक्रम की 20वीं शताब्दी के आरंभ के पहले से ही (यानी सन् 1840-45ई0 के पहले से ही) हिन्दी खड़ी बोली गद्य की परंपरा हिन्दी साहित्य में अच्छी तरह चल पड़ी ; उसमें पुस्तकें छपने लगीं, अखबार निकलने लगे। कहना ना होगा कि इन अखबारों के अर्ध-साहित्यिक रूप से ही क्रमश: साहित्यिक प्तरकारिता का विकास हुआ।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस पत्रकारिता, नवोदित गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप आरंभ से ही राजनीतिक और विचारधारात्मक रहा है। अर्थात उपनिवेशवाद- विरोधी और लोकोन्मुख भले ही उन पत्रकारों और लेखकों ने औपनिवेशिक विदेशी सत्ता, उसके कठोर सेंसरशिप और दमनकारी पेअशासन-तंत्र की आँखों में धूल झोंकते हुए कैसे भी संकेतात्मक, छद्म और प्रतीकवादी तरीके क्यों न अपनाएँ हो। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के जनक भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र ने अपनी आँखों से सन् 1857 का ”गदर”, उसके असफल रहने पर उन प्रथम स्वाधीनता-संग्रामियों का निर्मम नरसंहार और सामान्य भारतवासियों का नृशंस दमन देखा था।
आचार्य शुक्ल 1857 के प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम से गद्य-साहित्य की परंपरा का संबंध जोड़ते हुए ”इतिहास” में लिखते हैं कि “गद्य-रचना की दृष्टि से ……… संवत 1914 (अर्थात 1857ई0) के बलवे (गदर) के पीछे ही हिन्दी गद्य-साहित्य की परंपरा अच्छी चली“ । इस तरह हम देखते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता से ही साहित्यिक पत्रकारिता और गद्य साहित्य का विकास होता है और दूसरे, आरंभकाल से ही जुझारू गद्य-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का संबंध हमारे साम्राज्यवाद-विरोधी संग्राम से भी बड़ा प्रत्यक्ष और गहरा था
हिन्दी गद्य का निर्माण
डॉ0 नामवर सिंह इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि “पत्रकारिता को ही लें। सही है कि हिन्दी गद्य का निर्माण स्वाधीनता संग्राम के जुझारु और लड़ाकूपन के बीच हुआ। संघर्ष के हथियार के रूप में निस्संदेह, साहित्य के पहले उसका यह रूप हिन्दी पत्रकारिता, सबसे पहले और सबसे ज़्यादा भारतेन्दु की पत्रकारिता में प्रस्फुटित और विकसित हुआ था।
अशोक वाजपेयी के शब्दों में, “गद्य के निर्माण में पत्रकारिता का भी कुछ न कुछ हाथ होता है। पुराने जमाने से ही था, जो बहुत अच्छे गद्यकार थे ,वे बहुत अच्छे पत्रकार भी थे। इन्हीं तथ्यों को उजागर करते हुए डॅा0 रामविलास शर्मा बहुत पहले यह लिख चुके थे कि “भारतेन्दु से लेकर प्रेमचन्द तक हिन्दी साहित्य की परंपरा में यह बात ध्यान देने योग्य है कि सभी बड़े साहित्यकार पत्रकार भी थे। पत्रकारिता उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई थी। यह पत्रकारिता एक सजग और लड़ाकू पत्रकारिता थी। प्रेमचंद भी “एक सफल संपादक थे और ”हंस” के ज़रिये उन्होंने साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी को शिक्षित किया। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता की यह भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भारतेन्दु और प्रेमचंद के अलावा यही बात पं0 महावीरप्रसाद द्विवेदी, निराला, मुक्तिबोध, यशपाल, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह और नंदकिशोर नवल के बारे में भी कही जा सकती है। साहित्य और पत्रकारिता के इन घनिष्‍ठ संबंधों की ओर संकेत करते हुए प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित लिखते हैं कि “हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में पत्रकारिता की अनन्य देन रही है। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से युग-प्रवृत्तियों का प्रवर्तन हुआ है, विभिन्न विचारधाराओं का उन्मेश हुआ है और विशिष्‍ट प्रतिबाओं की खोज हुई है। वस्तुतः साहित्य और पत्रकारिता परस्पर पूरक और पर्याय जैसे हैं। शायद इसीलिए लोग पत्रकारिता को ”जल्दी में लिखा हुआ साहित्य” और साहित्य को ”पत्रकारिता का श्रेष्‍ठतम रूप” भी कहते हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में तो यह मणि-काँचन-योग और भी प्रत्यक्ष है ।
एक रोचक घटना: संदर्भ यूरोप का — साहित्यिक पत्रकारिता का उदय
सेंट फॉक्स साहित्यिक पत्रकारिता के आरंभ का बड़ा दिलचस्प विवरण देते हुए बताते हैं कि रेनाडो नामक पेरिस के एक डॉक्टर अपने अस्पताल के रोगियों के मन-बहलाव के लिए अद्भुत घटनाओं, रोचक किस्सों, अलौकिक विवरणों और दिलचस्प खबरों को जमा करके बीमारों को पढ़ने देने लगे। डॉ रेनाडो का विशवास था कि ऐसे मनोरंजन से रोगियों को शांत और प्रसन्न रखा जा सकता है और उन्हें शीघ्र निरोग भी किया जा सकता है। कहना न होगा कि उन्हें इसमें आशातीत सफलता भी मिली।
इससे उत्साहित होकर, पेरिस प्रशासन की अनुमति से, रेनाडो ने 1632 ई0 से ऐसी सामग्री संकलित कर एक नियमित साप्ताहिक पत्रिका शुरु कर दी, जो आम लोगों में भी खासी लोकप्रिय हो गई। रेनाडो के अनुकरण पर पेरिस से ही सांसद डेनिस द” सैलो ने 1650ई0 में ”जर्नल द” सैवेंत्रास“ नामक एक साहित्यिक पत्र आरंभ किया। आइज़क डिज़रेज़ी के मतानुसार साहित्य और समालोचना की यही सबसे पहली पत्रिका है। ऐसी ही दूसरी पत्रिका 1684 में बेल ने निकाली इसका नाम “वावेत्स द“ ला रिपब्लिक द” लेटर्स“ था।
फॉअस के बाद इंग्लैंड से भी अनेक साहित्यिक पत्र निकलने लगे। इनमें डेनियल डेफो का ”द रिव्यू” पहला अंग्रेज़ी पत्र था, जिसके लिए उन्हें 1703 में जेल भी जाना पड़ा था। तत्पश्‍चात रिचर्ड स्टील का ”द टैटलर”, फिर स्टील और ऐडिसन द्वारा मार्च,1711 से मिलकर निकाला गया ”द स्पेक्टेटर” तथा साहित्य समालोचना की विख्यात पत्रिका ”द मंथली रिव्यूज़” के नाम विशेश उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त, “जेंटिलमेन्स मैगज़ीन”, ”द क्रिटिकल” तथा डॉ0 सैम्युल जॉनसन की दोनों सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं ”द रैम्बलर” और ”द आइडलर“ का भी विशेश ऐतिहासिक महत्तव है। अंग्रेज़ी साहित्य के विकास में इनका अमूल्य योगदान माना जाता है
वस्तुतः फ्राँसीसी क्रांति के बाद 1749-50 से तो यूरोप के प्रायः सभी देशों से अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित और लोकप्रिय होने लगीं सयूरोपीय ”रेनाँसाँ” (पुनर्जागरण), मध्य वर्ग के उदय और जातीय चेतना (नैशनेल्टी की चेतना के बोध) के विकास से इस साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत का सीधा संबंध था, ठीक वैसे ही, जैसे कि कालांतर में भारतीय भाषाओं में —-
विशेष रूप से हिन्दी में, साहित्यिक पत्रकारिता का गहरा संबंध नवोदित भारतीय मध्य वर्ग की उत्तरोत्तर क्रमश: होती हुई लोकतांत्रिक चेतना, जातीय नवोन्मेश और साम्राज्य-विरोधी राश्ट्रीय मुक्ति-संग्राम से भलीभाँति परिलक्षित किया जा सकता है।
संदर्भ
1) ”हिन्दी नवजागरण: बंगीय विरासत” (खंड दो), सं0 शम्भुनाथ और रामनिवास द्विवेदी ;
प्रकाशक: कोल इंडिया लि0, कलकत्ता (1993), पृष्‍ठ 919
2) उपर्युक्त, पृ0 905
3) उपर्युक्त, पृ0 919
4) उपर्युक्त, पृ0 920
5) उपर्युक्त।
6) उपर्युक्त।
7) उपर्युक्त, 907
8) उपर्युक्त, 911
9) ”समाचारपत्रों का इतिहास”, अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी ; ज्ञानमण्डल लि0, वाराणसी (द्वितीय सं0
1953), पृ0 33-34
10) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; सं0 2005, प्रकाशन सण्स्थान, नयि दिल्ली, पृ0 309
11) उपर्युक्त, पृ0 312
12) उपर्युक्त, पृ0 307
13) ”पूर्वग्रह”,सं0 अशोक वाजपेयी, अंक 44-45 (मई-अगस्त,1981), नामवर सिंह
14) उपर्युक्त, पृ0 14
15) ”प्रेमचंद और उनका युग”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन ;पृ0130
16) उपर्युक्त, पृ0159
17) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, सं0 प्रो0 सूर्यप्रसाद दीक्षित , पृ0 3
18) यूरोप के उपरलिखित सभी विवरण, लखनऊ विश्‍वविद्यालय की ”जन-संचार एवं पत्रकारिता” के विशय कौ प्रथम पी0एच0डी0 डिग्री के षोध-प्रबंध (डॉ0ष्याम कष्यप) से लिए गए हैं।
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (2)
साहित्य में आधुनिक चेतना, स्वच्छंद आत्माभिव्यक्ति और व्यक्तिगत पाठक समुदाय के विकास के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता का उदय हुआ था। यूरोप ही नहीं, कुछ अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में, हिन्दी में कतिपय विलंब से यहाँ तक कि अपनी सहोदर उर्दू की तुलना में भी कुछ विलंब से इसका कारण यह था कि अन्य भारतीय भाषाओं और उर्दू की तुलना में हिन्दी में गद्य का विकास देर से हुआ था। भारतेन्दु युग से पहले तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली हिन्दी के इस प्रचलित विभाजन से भी हिन्दी गद्य के स्वाभाविक विकास में बाधा नज़र आती है, लेकिन एक बार उन्नीसवीं षताब्दी के उत्तरार्ध में गति पकड़ लेने के बाद, हिन्दी गद्य और प्रकारांतर से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने अभी हिन्दी के अतिरिक्त दुनिया की किसी भी भाषा में कभी भी ऐसा विभाजन नहीं था और न ही उसे ”धर्म” से जोड़ने की अवैज्ञानिक सोच अपने तीव्र विकास में सबको पीछे छोड़ दिया और वह उत्तरोत्तर प्रगति-पथ पर अग्रसित हो गई। शीग्र ही हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को आधुनिक साहित्य के सर्जनात्मक विकास में प्रेरक भूमिका निभाते हुए देखते हैं।
यहाँ इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी दृष्टिगत रखना चाहिए कि इस आधुनिक साहित्य और उसकी विविध विधाओं को लोकप्रिय बनाते हुए सामान्य पाठकों और जनसाधारण तक संप्रेशित करने में साहित्यिक पत्रकारिता की लगभग केंद्रीय भूमिका है, लोग एकदम ही साहित्यिक गद्य-विधाओं, विशेष रूप से ब्रजभाषा की तुलना में खड़ी बोली हिन्दी की आधुनिक कविता के पाठक नहीं बन गए थे, खास तौर से मुक्त-छंद और छंद-मुक्त कविता के, किताबों से पहले जनसाधारण, खासकर मध्यम वर्ग के पढ़े-लिखे लोग, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के नियमित पाठक बने थे ; जैसे कि उपन्यासों के पाठक बनने से पहले वे साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले छोटे-छोटे निबंधों, एकांकी नाटकों, प्रहसनों, टिप्पणियों,राजनीतिक व्यग्य-स्तंभों और छोटी कहानियों के नियमित पाठक बने थे स यह अनायास ही नहीं है कि राल्फ फाक्स उपन्यास को बुर्जुआ समाज में ”मध्य वर्ग का महाकाव्य” कहते हैं। इसकी शुरुआत, जैसा कि पहले भी संकेत किया जा चुका है, उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक (”उदंतमार्तंड ;1826ई0) में हो चुकी थी।
भारतेन्दु पूर्व की अर्ध-साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं से उभरने वाली रचनाओं ने खबरों के प्रति उत्सुकता के साथ ही, लोगों में मनोरंजक और साहित्यिक रूझान वाली रचनाओं में भी रुचि जाग्रत करने में बड़ी भूमिका निभायी थी। भारतेन्दु-युग की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता ने लोगों की रुचि पढ़ने की ओलृ अधिकाधिक मोड़ते हुए उन्हें हिन्दी साहित्य के जागरूक पाठक बनाया, लोगों ने गंभीर साहित्य पढ़ने की आदत डाल ली, उन्हें टीका-टिप्पणी करने की ओर प्रेरित करके सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया।
साहित्य और पत्रकारिता
साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य की लोकरंजनकारी भूमिका के कारण हि सामान्य पत्र-पत्रिकाएँ भी साहित्यिक विषयों को बराबर स्थान देती थीं। बीसवीं शतब्दी के उत्तरार्ध में भूमंडलीकरण के दौर की शुरुआत से, खास तौर से 1995 के बाद से निजी टेलीविज़न चैनलों और चौबिसों घंटे के न्यूज़ चैनलों के विस्फोट और फलस्वरूप हिन्दी के दैनिक अखबारों द्वारा भी, उनकी रंगारंग अंधी दौड़ की फूहड़ नकल की प्रवृत्ति ने ज़रूर आज यह स्थिति बदल दी है, जिस पर हम आगे यथावसर चर्चा करेंगे स यहाँ यह समझने की आवश्‍यकता है कि अपने आरंभकाल से ही साहित्य और पत्रकारिता का चोली-दामन का संबंध रहा है।
पत्रकारिता का साहित्य के साथ अपने जन्मकाल से बहुत गहरा संबंध बताते हुए राकेश वत्स लिखते हैं कि मानव-यात्रा के “इसी पड़ाव पर (यानी मध्य-वर्गीय लोकतांत्रिक आंदोलनों, राजनीतिक और विचारधारात्मक विकास के पड़ाव पर) आकार साहित्य के संबल की ज़रुरत महसूस हुई स चूँकि पत्र-पत्रिकाएँ ही उसे पाठकों के उस वर्ग तक पहुँचा सकती थीं, ……. पत्रकारिता ने उसकी इस ज़रूरत को पूरा किया। वे आगे बताते हैं कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तो मूलतः साहित्य के प्रति समर्पित होती ही हैं, बल्कि शायद ही कोई ऐसा पत्र या पत्रिका होगी जिसमें किसी न किसी रूप में साहित्य के लिए स्थान सुरक्षित नहीं किया जाता होगा। यानी, कविता, कहानी, गज़ल, गीत, निबंध, नाटक, एकांकी, संस्मरण, यात्रा-वृतांत, शब्दचित्र, रोपोर्ताज़, पुस्तक समीक्षा, आलोचना, उपन्यास- सभी कुछ प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा है। उनका रूप और आकार भले भिन्न-भिन्न रहा हो।
जिन गैर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का गंभीर साहित्य की ओर रूझान नहीं था, वे भी, खासकर दैनिक और साप्ताहिक या पाक्षिक अखबार और पत्रिकाएँ भी ”फिलर” के रूप में लघु-कथाएँ, क्षणिकाएँ और व्यंग्य के नाम पर चुटकुलेबाजी, यानी ”साहित्य” के नाम पर रची जाने वाली सारी सामग्री धड़ल्ले से छापते रहे हैं। यहाँ तक कि फिल्मी समाचार पत्र-पत्रिकाएँ भी इन सबको नज़रंदाज़ नहीं करतीं थीं। कहना न होगा कि साहित्य के नाम पर छपने वाला बड़े पैमाने का यह सारा कूड़ा और स्तरहीन रचनाओं का अंबार श्रेष्‍ठ साहित्य तथा स्तरीय और प्रभावि रचनाओं का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि हर छपा हुआ शब्द साहित्य नहीं होता! फिर भी इससे एक माहौल बनता है, एक वातावरण निर्मित होता है। इससे साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता का विस्तार होता है। लोगों में कम-से-कम पढ़ने की ललक और पाठकीय संस्कृति विकसित होती है। लोगों में साहित्य पढ़ने की आदत पड़ती है।
साहित्यिक पत्रकारिता और ”मास-लिटरेचर” यह समझ लीजिए कि स्वयं श्रेष्‍ठ साहित्य न होते हुए भी ऐसी स्तरहीन रचनाओं का ढेर श्रेष्‍ठ रचनाओं के लिए खाद बनता है। ऐसा साहित्य खुद निकृष्‍ठ होते हुए भी पाठक-संस्कृति और साहित्यिक पत्रकारिता के विकास को गति प्रदान करता है। इसी श्रेणी में आप सस्ते और भावुकतापूर्ण रोमैंटिक उपन्यास तथा तिलिस्मी-ऐयारी और जासूसी उपन्यासों को भी शामिल कर सकते है। आचार्य शुक्ल भी इसी तथ्य को अपने ”हिन्दी साहित्य इतिहास” में रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि, “हिन्दी साहित्य के इतिहास में बाबू देवकीनंदन (खत्री) का स्मरण इस बात के लिए सदा बना रहेगा कि जितने पाठक उन्होंने उत्पन्न किए उतने और किसी ग्रंथकार ने नहीं ”चंद्रकांता” पढ़ने के लिए न जाने कितने उर्दू जीवी लोगों ने हिन्दी सीखी ”चंद्रकांता” पढ़कर वे हिन्दी की और प्रकार की साहित्यिक पुसतकें भी पढ़ चले और अभ्यास हो जाने पर कुछ लिखने भी लगे इसीलिए प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ धारावाहिक रूप से उपन्यास और ऐसी कहानियाँ बराबर छापते हैं। इस किस्म के साहित्य को ”मास-लिटरेचर” कहा जाता है और यूरोप तथा अमरीका के समाजशास्त्रियों ने इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता पर अनेक दिलचस्प अध्ययन किए हैं।
पहले ”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”कादंबिनी” और ”सारिका” या विभिन्न दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के रविवारीय पृष्‍ठों में छपने वाली चालू और स्तरहीन रचनाओं तथा ”इंडिया टुडे” (हिन्दी)- जैसी समाचार पत्रिकाओं में छपने वाली बाज़ारू रचनाओं के नियमित पाठक ही, उनकी चेतना में धीरे-धीरे विकास और साहित्यिक रुचि के क्रमषः परिश्कार के अबाद ”कल्पना”, ”प्रतीक”, ”कवि”, ”कृति”, ”कहानी”, ”नई कहानियाँ”, ”लहर”, ”पहल”,”धरातल”, ” आलोचना”,”कथा”, ”समारम्भ”, ”पूर्वग्रह”, ”कसौटी”, ” बहुवचन”, ”समस”, और ”पुस्तकवार्ता” जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक भी बनते हैं। कहना न होगा कि इस विशाल पाठक-समुदाय की चेतना में यह विकास और उनकी साघित्यिक रुचि में परिश्कार भी ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं के पठन-पाठन से ही आता है। यहाँ एक विशेश बात यह भी स्मरणीय है कि ”हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं में से ही उभरकर सामने आता है। साहित्यिक पत्रकारिता की इस संदर्भ में ऐसी ही द्वंद्वात्मक भूमिका होती है।
साहित्यिक रचनाओं का मूल्यांकन
ध्यान रहे कि साहित्यिक पत्रकारिता, रुचि का यह परिश्कार कृतियों, रचनाओं और रचनाकारों के मूल्यांकन के माध्यम से ही करती है स इस प्रकार साहित्यिक पत्रकारिता रचनाओं का स्तर निर्धारित करते हुए, अच्छी और श्रेष्‍ठ रचनाओं को स्तरहीन बाज़ारू रचनाओं के भारी-भरकम कूड़े से अलगाती है। वास्तव में, यह छँटा हुआ श्रेणीकरण के बाद साहित्य का भावी इतिहास बनता है।
शॅापेन हॉवर ने साहित्यिक पत्रकारिता की इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “साहित्यिक पत्रों का कर्त्तव्य है कि वे युग की युक्तिहीन और निरर्थक रचनाओं की बाढ़ के विरुद्ध मज़बूत बाँध का काम करें। … यों कहें कि नब्बे फीसदी रचनाओं पर निर्दयतापूर्वक प्रहार करने की ज़रूरत है। साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ तभी अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकेंगे। इसी प्रसंग में वे आगे लिखते हैं कि,“ अगर एक भी ऐसा पत्र है, जो उपर्युक्त आदर्शों का पालन करता हो, तो उसके डर के मारे प्रत्येक अयोग्य लेखक, हरेक बौड़म कवि, प्रत्येक साहित्यिक चोर, हरेक अयोग्य पद-लोभी, प्रत्येक छंद दार्शनिक और हरेक मिथ्याभिमानी तुक्कड़ काँपेगा ; क्योंकि उसे इस बात का डर रहेगा कि छपने के बाद उसकी घटिया रचना खरी आलोचना की कसौटी पर ज़रूर कसी जाएगी और उपहासास्पद सिद्ध होगी। शॅापन हॉवर की यह मान्यता है निकीक इससे घटिया लेखकों को, जिनकी उँगलियों में लिखने की खुजली उठती है, लकवा मार जाएगा। इससे साहित्य का बड़ा हित होगा, क्योंकि साहुत्य में जो चीज़ बुरी है, वह केवल निरर्थक ही नहीं, बल्कि सचमुच बड़ी हानिकारक भी है, कहना न होगा कि हिन्दी की श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं और हमारे श्रेष्‍ठ समालोचकों ने ठीक यही भूमिका निभाई है।
साहित्य का इतिहास और पत्रकारिता इस प्रकार, साहित्यिक पत्रकारिता, जो आज साहित्य के इतिहास की स्रोत-सामग्री और कल का साहित्येतिहास है, दृढ़तापूर्वक अच्छी और बुरी रचनाओं, प्रवृत्तियों तथा साहित्यिक आंदोलनों के बीच निर्णायक फर्क दिखाकर साहित्य के इतिहास के निर्माण में भी अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, साहित्यिक पत्रकारिता, इस तरह, स्तरहीन रचनाओं से स्तरीय और अप्रासंगिक कृतियों से प्रासंगिक लेखन को अलग करती है।
वस्तुतः युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता से ही उस युग के साहित्यिक आंदोलनों, बहस-मुबाहिसों, साहित्यिक समस्याओं, प्रश्‍नों और चुनौतियों तथा इन सबके फलस्वरूप उस युग की नई-से-नई साहित्यिक प्रवृत्तियों के उभरने, उनके क्रमश: विकास तथा विभिन्न साहित्यिक प्रवृत्तियों के आपसी अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंद्वों का भी अंतरंग परिचय हम पा सकते हैं। यह युग-विशेश की साहित्यिक पत्रकारिता ही है, जो हमारे समक्ष उस युग-विशेश का भरा-पूरा और कलात्मक प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। इससे हमें अपनी समकालीन समस्याओं और चुनौतियों को समझने में मदद मिलती है तथा भविष्‍य के सर्जनात्मक संघर्षों का परिप्रेक्ष्य भी।
संदर्भ:–
1) ”उपन्यास और लोकजीवन”, राल्फ फाक्स ; पीपीएच, नई दिल्ली, पृ0 31
2) ”जनसंचार”, (सं0) राधेष्याम शर्मा ; राकेश वत्स का लेख ; हरियाणा साहित्य अकादमी, पृ0 201
3) उपर्युक्त , पृ0 205-06
4) उपर्युक्त, पृ0 206
5) ”हिन्दी साहित्य का इतिहास”, रामचन्द्र शुक्ल ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, प्र0 356-57
6) ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता”, शीर्षक लखनऊ विश्‍वविद्यालय की जन-संचार एवं पत्रकारिता
विषय की प्रथम पी-एच0डी0 डिग्री के शोध-प्रबंध (प्रो0 श्‍याम कश्‍यप) से।
7) उपर्युक्त
8) उपर्युक्त
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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (3)

साहित्यिक पत्रकारिता का सामान्य पत्रकारिता से अंतर और उसका विशिष्‍ट स्वरूप अब तक कुछ उभर आया होगा। समाचारपत्र (या समाचार पत्रिकाएँ) जहाँ सूचना पर बल देते हुए सामान्य ज्ञान प्रेषित करते हैं, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देष्य सांस्कृतिक चेतना और परिवेश में परिश्कार लाते हुए पाठक को विषिश्ट ज्ञान प्रशिष्‍ट करना होता है। इसलिए इस क्षेत्र में प्रशिष्‍ट साहित्य-विवेक और विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सूक्ष्म एवं अंतरंग परिचय की आवश्‍यकता होती है। साहित्य और पत्रकारिता का अंतर रेखांकित करते हुए नेमिशरण मित्तल बताते हैं कि, “साहित्य का मूल लक्षण उसका शास्वत स्वरूप तथा चिरंतन तत्व है, किन्तु पत्रकारिता तात्कालिकता, सामयिकता और क्षणभंगुरता के आयामों में कैद होती है, वैसे तो साहित्य में भी सरसता और सुबोधता पर बल दिया जाता है, लेकिन उसके प्रशिष्‍ट काला-चरित्र के कारण जटिलता तथा दुर्बोधता और अनेकार्थकता को भी दुर्गुण नहीं माना जाता, साहित्यिक पत्रकारिता की भाषा शैली पर इसका कुछ-न-कुछ असर तो पड़ता ही है।
सामान्य पत्रकारिता जहाँ लोकमत के निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम होती है, वहीं साहित्यिक पत्रकारिता लोकरंजन, लोक-शिक्षण और जनरुचि के परिश्कार का प्रयास करती है स इसीलिए उसका स्वरूप वैचारिक, संवेदनात्मक और मनोरंजनपरक होता है, लेकिन यहाँ ”संवेदनात्मक” का अर्थ तथाकथित ”शुद्ध साहित्य” के झंडावरदारों की समाज-निरपेक्ष और विचारधारा से परहेज प्रचारित करने वाली कृत्रिम और रहस्यात्मक संवेदना से नहीं है। इसी तरह ”मनोरंजन” का अर्थ व्यावसायिक और बाजारू पत्रिकाओं के फूहड़ और विकृतिपूर्ण समाज-विरोधी और सस्ते मनोरंजन से नहीं है। कहना न होगा कि साहित्यिक पत्रकारिता का उद्देश्‍य मुक्तिबोध की ”ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान” की अवधारणा को अपना आदर्श मान कर चलना चाहिए स श्रेष्‍ठ-साहित्य के आदर्शों और उद्देश्‍यों से भिन्न आदर्श और उद्देश्‍य साहित्यिक पत्रकारिता के हो ही नहीं सकते। दोनों एक न होते हुए भी अन्योन्याश्रित हैं।
साहित्यिक पत्रकारिता का चरित्र स्वरूप
साहित्यिक पत्रकारिता के चरित्र-निरूपण और उसके प्रशिष्‍ट स्वरूप पर विचार करेत हुए हमें गंभीर साहित्यिक पत्रिकाओं को फिल्म, संगीत, राजनीति और धर्म आदि की तरह ”साहित्य” का भी धंधा करने वाली व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलगाकर देखना चाहिए। यह अंतर आज़ादी के पहले से रहा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसा अंतर साहित्यिक पत्रकारिता के जन्म के समय से ही रहा है। शुरु से ही साहित्यिक पत्रिकाएँ सदैव सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र से जुड़ी या उनकी हितपोशक प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रित पत्रिकाओं से अलग, बल्कि विरोधी रही हैं, भले ही इस विरोध तथा प्रतिरोध की शैली उसका स्वरूप कितना ही भिन्न-भिन्न क्यों न हो।
यह अंतर ”उदंतमार्तंड”. ”सुधाकर”, ”प्रजाहितैशी” या ”पयाम-ए-आज़ादी” का ”बनारस अखबार” जैसे पत्रों से साफ झलकता है। यह अंतर भारतेन्दु की ”कविवचनसुधा” और धड़फले के हाथ में जाने के बाद की स्तरहीन और पतित ”कविवचनसुधा” में और भी प्रत्यक्ष है। यह अंतर ”सरस्वती” (महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन-काल की), ”माधुरी”, ”मतवाला”, ”सुधा”, ”चाँद”, ”हंस”(प्रेमचंद के संपादन-काल से लेकर अमृत राय-रामविलास शर्मा-शिवदानसिंह चौहान के प्रगतिवादी-काल तक का), ”विप्लव”, ”नय साहित्य”, ”रूपाभ” सहित ऐसी ही अनेक छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं तथा बाजारू और व्यावसायिक पत्रिकाओं के बीच सदैव रहा है। कहना न होगा कि हमारा ” हिन्दी साहित्य का इतिहास” इन महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से ही अस्तित्व में आया है।
आज़ादी के बाद यह अंतर ”कल्पना”, (बदरी विशाल पित्ती एवं अन्य), ”समालोचक” (रामविलास शर्मा), ”प्रतीक” (अज्ञेय), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य), ”कृति” (श्रीकांत वर्मा), ”आलोचना” (नामवर सिंह), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई), ”कहानी” (श्रीपत राय), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी) और ”नई कहानियाँ” (कमलेश्‍वर, फिर भीष्‍म साहनी) जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाओं तथा व्यावसायिक घरानों की प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्रिकाओं –”धर्मयुग”, ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान”, ”ज्ञानोदय”, ”सारिका”, ”निहारिका” और ”कादम्बिनी” आदि के बीच बड़ा स्पष्‍ट रहा है। यह अंतर सारी दुनिया में और विश्‍व की प्रायः अभी भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं और राजसत्ता (भले ही उसे ”जनसत्ता” का झूठा नाम दें) या धनसत्ता की होतपोशक प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाओं में रहा है। इस अंतर के कारण ही दुनिया-भर में साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”लघुपत्रिका” या ” लिटिल मैगज़ीन” आंदोलन होते रहे हैं।
लघु-पत्रिका आंदोलन

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में जब उपर्युक्त अंतर और फलस्वरूप विचारधारात्मक संघर्ष बहुत तीव्र हो गया तो सन् 60 के बाद साहित्यिक और व्यावसायिक पत्रिकाएँ एक-दूसरे के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई में भिड़ गईं, यह लड़ाई कमोबेश आज भी जारी है, इस सातवें दशक के मध्य में ही हिन्दी में ”लघु-पत्रिका” आंदोलन के रूप में ऐसा जबर्दस्त साहित्यिक विस्फोट हुआ कि सेठाश्रयी और व्यावसायिक प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं का पूरी तरह भट्ठा बैठ गया। उनमें श्रेष्‍ठ रचनाओं और श्रेष्‍ठ साहित्यकारों का टोटा पड़ गया।
हिन्दी के युवा और युवतर लेखकों-कवियों और आलोचकों ने इन पत्रिकाओं के खिलाफ सफल्क और ज़ोरदार ”बहिष्‍कार” अभियान चलाया, यहाँ तक कि प्रतिष्ठित बुजुर्ग कवि-लेखक भी इन पत्रिकाओं में छपने से हिचकिचाने लगे, इनमें छपने वाले लेखक साहित्यिक मान्यता और साहित्यिक प्रतिष्‍ठा के लिए तरसते रह गए, जो प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लेखक इनमें छपता था, उसे पूरे साहित्य-जगत का विरोध और बहिष्‍कार झेलना पड़ता था।
हिन्दी का यह लघु-पत्रिका आंदोलन इतना लोकप्रिय और प्रभावी सिद्ध हुआ कि प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं का ज्वार आ गया। स्मरणीय है कि ऐसे ही विचारधारात्मक और सर्जनात्मक संघर्ष में से ही यूरोप में ”प्रोटेस्ट मूवमेंट” उभरकर सामने आए थे तथा विश्‍व-भर में छा गए थे, हिन्दी में उभरा यह ”लघु-पत्रिका आंदोलन” अब तो एक तरह से साहित्येतिहास और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास का भी अंग बन चुका है। कालांतर में साहित्यिक पत्रिकाओं के च्वरूप में भारी परिवर्तनों के बाद भी उनके लिए ”लघु-पत्रिका” या ”अव्याओकर लोक-प्रचलितवसायिक” पत्रिका नाम ही सर्वमान्य और रूढ़ होकर लोक-प्रचलित हो चुका है। वास्तव में, ऐसी पत्रिकाएँ ही साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, मानी जाती हैं।
नया दौर: ”वाम वाम वरम दिशा …….”
सन् साठ के बाद एक जबर्दस्त आंदोलन की तरह आरंभ हुआ लघु-पत्रिकाओं का यह अभियान अनेक उतार-चढ़ावों के बाद, सत्तर और अस्सी के दशकों में प्रगतिशील और वामपंथी रुख अख्तियार कर लेता है। इसकी परिणति इस रूप में होती है कि एक ओर जहाँ उपर्युक्त प्रतिष्‍ठानी पत्रिकाएँ या तो बंद हो जाती हैं अथवा अप्रासंगिक होकर अपना प्रभाव खो देती हैं, वहीं ” आलोचना” (नामवर सिंह एवं नंद किशोर नवल) के अलावा ”पहल” (ज्ञानरंजन), ”लहर” (प्रकाश जैन और मनमोहिनी), ”प्रगतिशील वसुधा” (कमला प्रसाद), ”उत्तरार्ध” (सव्यसाची), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”कलम” (चंद्रबली सिंह), ” ओर” (विजेन्द्र्), ”क्यों” (मोहन श्रोत्रिय और स्वयं प्रकाश),” आरम्भ” (नरेश सक्सेना और विनोद भारद्वाज),”धरातल” (नंदकिशोर नवल), ”कथा” (मार्कण्डेय), ”समासम्भ” (भैरवप्रसाद गुप्त),”इसलिए” (राजेश जोशी) और ”कसौटी” (नंदकिशोर नवल)– जैसी श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित लघु-पत्रिकाएँ तथा कई नई पत्रिकाएँ चंद अविस्मरणीय विशेषांक प्रकाशित कर धीरे-धीरे पृष्‍ठभूमि में चली गईं।
दैनिक समाचारपत्रों में साहित्यिक पत्रकारिता
प्रायः सभी दैनिक, पाक्षिक और साप्ताहिक अखबारों में हमें छिट-पुट साहित्यिक रूझान उनके रविवारीय संसकारणों में तो दिखता है, लेकिन इस क्षेत्र में उनका कोई महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान नहीं दिखता, अपवाद स्वरूप, प्रमुख प्रगतिशील दैनिक ”जनयुग” में न केवल यह साहित्यिक-विचारधारात्मक रूझान स्पशष्‍ट नज़र आता है, बल्कि उसका रविवारीय परिशिष्‍ट मुख्यतः साहित्य को ही समर्पित होता था, कुल चार पृष्‍ठों के इस परिषिष्‍ट में एक विचारधारत्मक अग्रलेख और छोटे से बच्चों के कोने के अलावा शेष प्रायः तीन-साढ़े तीन पृष्‍ठ साहित्य को ही समर्पित होते थे।
”जनसत्ता” ने भी अपने रविवारीय परिषिश्ट में इस परंपरा का मंगलेश डबराल के संपादन में निर्वाह किया। इसीतरह जब तक राजेंद्र माथुर रहे ”नवभारत टाइम्स” ने भी कुछ स्थान साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया। लेकिन कालांतर में इस श्रेष्‍ठ परंपरा का अवसान हो गाया, नब्बे के दशक के मध्य तक भूमंडलीकरण की आँधी में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के पैर उखड़ने लगे स धीरे-धीरे आज हम एक ऐसे विचार-शून्य — या कहें प्रायोजित मीडिया के प्रायोजित विचारों में डूबते -उतराते अपढ़ समाज और सांस्कृतिक-शून्‍यता की ओर बह रहे हैं, एक ऐसा समाज जहाँ उपभोक्तावाद के दलदल की ओर ढकेलती अपसंस्कृति की गहरी ढलान है।
अंतिम उल्लेखनीय प्रयास

इस स्थिति से निकलने की कोशिश में देश भर के उत्तर भारत के हिन्दीभाषी, प्रमुख साहित्यकारों-संपादकों की 29-30 अगस्त,1992 को कलकत्ता में साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की पहली राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी हुई। इसी कड़ी में 14-15 मई, 1991 को जमशेदपुर में राष्‍ट्रीय समन्वय समिति गठित की गई। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता को पुनः उसके श्रेष्‍ठ और उच्चतर धरातलों पर प्रतिष्ठित कर पाने के सभी प्रयास आशातीत रूप में फलप्रद नहीं हो पाए।
मुख्य बात यह है कि ये सभी साहित्यिक पत्रिकाएँ अपने कलेवर, आकार और साज-सज्जा में भले ही ”लघु” पत्रिकाएँ थीं, अपने प्रभावी साहित्यिक मूल्यांकन, श्रेष्‍ठ रचनाओं के प्रकाशन और प्रतिभाशाली नए लेखकों की नई से नई पीढ़ियाँ तैयार करके उन्हें प्रशिक्षित करने की दृष्टि से बिल्कुल भी लघु या छोटी नहीं कही जा सकतीं स ये अपनी अंतर्वस्तु (कन्टेन्ट) और वैचारिक प्रतिबद्धता की दृष्टि से निस्संदेह बड़ी- बहुत बड़ी पत्रिकाएँ ही कही जाएँगी। अपने युग की प्रतिनिधि और भावी साहित्येतिहास का कच्चा माल, एक तरह से साहित्य रचना और मूल्यांकन के प्रशिक्षण के संस्थान, विश्‍वविद्यालय !!
वास्तव में, ये सभी पत्र-पत्रिकाएँ सत्ता-तंत्र और व्यवसाय-तंत्र की तथाकथित ”बड़ी” और रंगीन, सेठाश्रयी, बाजारू पत्रिकाओं से भिन्न, यथार्थ में साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, चाहे इन्हक पत्रिकाएँ ”गैर-व्यावसायिक पत्रिकाएँ” कहा जाए या ”प्रतिष्‍ठान-विरोधी” और ”श्रमजीवा पत्रिकाएँ” कहा जाए अथवा लोक-प्रचलित ”लघु-पत्रिकाएँ” , साहित्यिक पत्रकारिता के श्रेष्‍ठ और सच्चे प्रतिमान हमें इन्हीं पत्र-पत्रिकाओं में दृष्टिगोचर होते हैं।
संदर्भ:-
1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 डॉ0 रामप्रकाश) में नेमिशरण का लेख, पृ0 116
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (4)
अब तक के विवेचन से यह तो स्पष्‍ट हो ही जाता है कि साहित्यिक पत्रकारिता मात्र तकनीक नहीं, बल्कि भाषिक और विचारधारात्मक चेतना भी है। भाषिक संवेदना और वैचारिक चेतना के साथ ही वह साहित्य और अन्य ललित कलाओं की तरह खुद भी एक सर्जनात्मक और कलात्मक रूप है।
कला भी और विज्ञान भी
जैसा कि ऊपर कहा गया है, साहित्यिक पत्रकारिता एक कला है— एक ऐसी कला जो अपने सर्वोच्च स्तरों पर सर्जनात्मक साहित्य से होड़ करती है। कह सकते हैं कि कला और सर्जनात्मक संगठन का समन्वित प्रयास लेखक अगर लिख कर सृजन करता है, तो एक श्रेष्‍ट साहित्यिक पत्रकार अपनी संगठनात्मक क्षमता, संपादन सामर्थ्य और वस्तुनिष्‍ट आलोचनात्मक विवेक से साहित्य को कलात्मक गतिशील रूप, नवोन्मेश की चेतना और लोकोन्मुख प्रगतिशील दिशा दे सकता है। कहना न होगा कि इन कलात्मक और संगठनात्मक साहित्यिक प्रयासों को भी व्यापक अर्थ में सर्जनात्मक ही कहा जाएगा।
इस दृष्टि से देखें तो भारतेन्दु हरिश्‍चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, रामविलास शर्मा, यशपाल, हरिशंकर पएासाई और नामवर सिंह की साहित्यिक पत्रकारिता किस लेखक के सर्जनात्मक और कलात्मक प्रयासों से कम है, इसीलिए, और ठीक इन्हीं अर्थों में, श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रकारिता एक विज्ञान भी है। कहना न होगा कि अपने खास अर्थों में आज के संचार क्रांति के उत्तर-औद्योगिक परिदृश्‍य में साहित्यिक पत्रकारिता भी— सामाजिक चेतना को एक सुनिश्चित रूप एवं दिशा देने में तथा साथ ही लोकमत की सूक्ष्म प्रक्रिया को प्रभावित करने में अपना विशेष योगदान देती है। सामान्य पत्रकारिता की तुलना में साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की यह भूमिका, प्रक्रिया के स्तर पर, अधिक जटिल एवं सूक्ष्म तथा प्रभाव की दृष्टि से अधिक स्थायी किन्तु लगभग अदृश्‍य होती है। साहित्यिक पत्रकारिता लोकमत-निर्माण और लोक-शिक्षण का कार्य भी परोक्ष ढंग से करती है। इस प्रकार वह समाज की विचार-चेतना के विकास में और व्यापक सांस्कृतिक एवं सामाजिक जनरुचि के परिश्कार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है स वह भी संचार-क्रांति की कार्य प्रणाली और नियमों – अवधारणाओं का कमोबेश अनुसरण करती है।
एक सामान्य पत्रकार और संपादक की तरह साहित्यिक पत्रकार और संपादक को भी आज की अधुनातन प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी, कलात्मक रूप-सज्जा और मूल्यांकन में वैज्ञानिक वस्तुपरकता का अभ्यस्ज्ञान की जात तथा विज्ञान की जानकारी से लैस होना चाहिए। एक कुशल साहित्य संपादक और साहित्यिक पत्रकार के पास वैज्ञानिक की वस्तुनिष्‍ठता और सर्जक कलाकार की अंतष्चेतना, दोनों का होना लगभग अनिवार्य है।
साहित्यिक पत्रकारिता के विविध रूप और भेद

साहित्यिक पत्रकारिता के इस स्वरूप-विस्लेशण और चरित्र-निरुपण के बाद, उसके उन प्रमुख भेदों पर भी विचार करना प्रासंगिक होगा जिनके आधार पर हम उसकी विभिन्न शाखाओं अथवा अलग- अलग क्षेत्रों के आधार पर उसका विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है —-
1) प्रस्तुतिकरण के आधार पर ;(2) अवधिपरक विभाजन ; (3) विधापरक विभाजन ; (4) भाषिक आधार पर ; (5) प्रकाशकीय आधार पर ; तथा (6) विचारधारापरक विभाजन
1)प्रस्तुतिकरण के आधार पर विभाजन
यह सुज्ञात है कि आज समूची पत्रकारिता का विभाजन प्रस्तुति के आधार पर, दो अलग- अलग सर्वथा स्वतंत्र क्षेत्रों में हो चुका है: (क) प्रिंट मीडिया ; और (ख) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। इसी तरह, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी, इसी आधार पर तीन भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय है: (क) रेडियो (ख) टेलीविज़न और वेब-मीडिया (न्यू-मीडिया)। समग्र जनसंचार और पत्रकारिता का ही एक अभिन्न अंग होने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता का भी प्रस्तुतिकरण के आधार पर इन स्वतंत्र क्षेत्रों में विभाजन किया जा सकता है। इन क्षेत्रों में प्रस्तुत की जाने वाली श्रव्य ( ऑडियो) और दृश्‍य-श्रव्य (ऑडियो- विज़ुअल) साहित्यिक सामग्री साहित्यिक पत्रकारिता है।
इनके अंतर्गत विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। पहले यह सामग्री पत्र-पत्रिकाओं में छपती थी ; अब रचना पाठ और पुस्तक समीक्षा से लेकर साहित्यिक सभा-सम्मेलनों की रपटें, साहित्यकारों के बीच वाद-विवाद या संवाद और बहस या विमर्ष तहा प्रतिष्ठित बड़े लेखकों से साक्षात्कार, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर कार्यक्रम आदि रेडियो, टेलीविज़न और इंटरनेट पर प्रसारित होते हैं। यू-ट्यूब आदि पर स्थायी रूप से भी उपलब्ध रहते हैं।
2) अवधिपरक विभाजन:
इसी तरह साहित्यिक पत्रकारिता का अवधिपरक विभाजन भी किया जा सकता है। दैनिक और साप्ताहिक समाचारपत्रों के विपरीत साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रायः मासिक, द्विमासिक, त्रैमासिक और कभी छमाही या सालाना संकलनों के रूप में ही होती हैं। साप्ताहिक ”मतवाला”- जैसे कुछ अपवाद भी होते हैं, जैसे कि पहले दैनिक ”जनयुग” और अब ”जनसत्ता” के साप्ताहिक साहित्यिक परिशिष्‍टों के रूप में दैनिक अखबारों में भी हमें अपवाद-स्वरूप गंभीर साहित्यिक पत्रकारिता के दर्शन होते हैं। अवधि के आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारिता का विभाजन मुख्यतः तीन तरह से किया जा सकता है: मासिक, द्विमासिक और त्रैमासिक।
लेकिन यह विभाजन केवल नियमित रूप से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं पर ही लागू हो सकता है। लघु-पत्रिका आंदोलन के दौरान जो हज़ारों नहीं भी , तो सैंकड़ों साहित्यिक पत्रिकाएँ निकलीं, वे प्रायः ”अनियतकालीन” ही निकलीं स जो निश्चित अवधि वाली नहीं थीं, वे भी आगे चलकर अनियतकालीन बन गईं और अंततः बंद भी हो गईं स जो निश्चित अवधि में अब भी नियमित रूप से निकल रही हैं, उनमें मासिक ”हंस” (हाल ही में मृत्यु से पूर्व तक सं0 राजेन्द्र यादव) तथा ”पखी” (सं0 प्रेम भारद्वाज) तथा द्विमासिक ”पुस्तकवार्ता” (सं0 भारत भारद्वाज) और त्रैमासिक ” आलोचना”(प्र0सं0 नामवर सिंह)–जैसी प्रतिनिधि पत्रिकाओं का उल्लेख किया जा सकता है। उसी तरह अनियतकालीन पत्रिकाओं के प्रतिनिधित्व में ”पहल” (सं0 ज्ञानरंजन) और ”दस्तावेज़” (सं0 विस्वनाथ प्रसाद तिवारी) का ज़िक्र अकिया जा सकता है। इनमें से ”पहल” का हाल ही में 98 वाँ अंक आया है और ”दस्तावेज़” का 145 वाँ।
3) विधापरक विभाजन:

विापरक विभाजन के अंतर्गत साहित्यिक का विभाजन मुख्यतः चार तरह से किया जा सकता है: (अ) कहानी पत्रिका, (ब) कविता संबंधी पत्रिका, (स) आलोचना और पुस्तक समीक्षा संबंधी पत्रिका तथा (द) सर्वविशय- संग्रह परक पत्रिका। आजकल साहितय की सभी विधाओं को कम या ज़्यादा स्थान देने वाली पत्रिकाएँ ही अधिक हैं। फिर भी, किसी एक मुख्य विधा को प्रमुखता देने के साथ थोड़ी बहुत अन्य सामग्री या कसी दूसरी विधा की चंद रचनाओं को भी शामिल करने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ भी खासी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन पुस्तक समीक्षाएँ तो प्रायः प्रत्येक पत्रिका का अनिवार्य अंग हैं।
किसी एक ही विधा दृढ़ता से केंद्रित पत्रिकाएँ अपवादस्वरूप ही कही जा सकती हैं ; जेसे कि पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिकाएँ, ”समीक्षा” (सं0 गोपाल राय) और ”पुस्तकवार्ता” तथा कहानी की पत्रिकाएँ ”कहनी” और ”नई कहानियाँ”। कमलेश्‍वर के संपादन में निकलने वाली ”सारिका” भी कहानी-केंद्रित पत्रिका ही थी, जो बंद हो चुकी है। इसी तरह कविता-केंद्रित पत्रिका ”कविता” (सं0 जुगमिंदर तायल और भगीरथ), नेमिचंद्र जैन की ”नटरंग” नाटक” केंद्रीय पत्रिका में थी। आलोचना” है तो मुख्यतः समालोचनाओं और पुस्तक समीक्षाओं की पत्रिका, लेकिन उसमें प्रायः साहित्य, संस्कृति और राजनीति से संबंधित देशी-विदेशी विद्वानों के लेख ( अनुवाद भी) तथा कभी-कभार कोई साक्षात्कार या चंद मौलिक अथवा अनूदित कविताएँ भी स्थान पा जाती हैं।

4) भाषिक आधार पर विभाजन:

कुछ साहित्यिक पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ हिन्दी के साथ ही उसकी जनपदीय बोलियों, यथा बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बघेली, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज, नेमाड़ी, पहाड़ी, हरियाणवी, मारवाड़ी और राजस्थानी आदि की रचनाएँ भी छपती हैं। कुछ पत्रिकाएँ इन जनपदीय उपभाषाओं-बोलियों में निकलती हैं, जिन्हें हम विशाल हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता की व्यापक परिधि में गिन सकते हैं। कुछ पत्रिकाएँ हिन्दी के साथ ही उर्दू और अंग्रेज़ी के भी हिस्सों के साथ द्विभाषी निकलती हैं। पहली मिसाल ”शेष” (सं0 और दूसरी महात्मा गाँधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय की पत्रिका ”हिन्दी: ”भ्प्छक्प्” (सं0 ममता कालिया) कही जा सकती हैं।

5) प्रकाशकीय आधार पर विभाजन:

प्रकाशकीय आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन इस तरह किया जा सकता है:
अ) दृढ़्तापूर्वक पूर्णतः साहित्य को समर्पित पत्रिकाएँ, जो मुख्यतः प्रायः ”लघु पत्रिकाओं” की श्रेणी में
आती हैं और इन पर विस्तार से चर्चा की भी जा चुकी है।
ब) प्रकाशकों, विश्‍वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं या ऐसे ही प्रतिष्‍ठानों से निकलने वाली साहित्यिक
पत्रिकाएँ। मिसाल के लिए ”आलोचना” (राजकमल प्रकाशन), ”पुस्तक वार्ता” और ”बहुवचन” (म0गाँ0
अं0 वि0वि0वर्धा), ”माध्यम” (हिन्दी साहित्य सम्मेलन) तथा ”नटरंग (नटरंग मटरंग प्रतिश्ठान)- जैसी
पत्रिकाएँ,।
स) उद्योग के स्तर पर व्यावसायिक इज़ारेदार घरानों की मिल्कियत ( ओनरशिप) में निकलने वाली
पत्रिकाएँ, मिसाल सपम ”ज्ञानोदय” ( अब ”नया ज्ञानोदय” नाम से सारिका और ”धर्मयुग” (साहू
जैन का ”टाइम्स गु्रप”), ”साप्ताहिक हिन्दुस्तान” (बिड़ला गु्रप) तथा
द) सरकारी पत्रिकाएँ, लेकिन इस श्रेणी में प्रायः निकृष्‍ट किस्म की पत्रिकाएँ होती है। फिर भी जब कोई अच्छा साहित्यकार उनका संपादक बन जाता है तो कुछ अंक अच्छे निकल जाते हैं। मिसाल के लिए ”पूर्वग्रह” (सं0 अषोक वाजपेयी), ”साक्षात्कार” (सं0 सोमदत्त) और ”आजकल” (सं0 पंकज बिष्‍ट) का नाम उल्लेख किया जा सकता है। साहित्य अकादमी की ”समकालीन भारतीय साहित्य” भी
6) विचारधारापरक विभाजन:

विचारधारा के आधार पर भी साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन दो तरह का विभाजन है —-
1) राजनीतिक तौर पर ; जैसे कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों की ”पहल”, ”वसुधा”, ”क्यों”, ” ओर”, आदि पत्रिकाएँ माकपा से जुड़ी ”उत्तरार्ध”, ”कलम” और ”नया पथ” बहुत पहले भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (अविभाजित) ने हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में ”नया साहित्य”, ”नया अदब” और ”इंडियन लिटरेचर” नाम से अत्यंत श्रेष्‍ठ साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित की थीं। लेकिन ये सभी अल्पायु ही साबित हुईं।
दूसरी तरफ, (ख) साहित्यिक आंदोलनों के आधार पर भी विभाजन किया जा सकता है। जैसे कि प्रगतिवादियों का ”हंस” ( अमृत राय), ”विप्लव” (यशपाल), ”वसुधा” (हरिशंकर परसाई) और समालोचक (रामविलास शर्मा)–जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ तो थीं, तो प्रगति-विरोधिायों की ”प्रतीक” (अज्ञेय्), ”निकश” (धर्मवीर भारती) और अन्य परिमलीय, ”नयी कविता” (जगदीश गुप्त एवं अन्य परिमलीय गुट) आजकल विचारधारात्मक आधार पर साहित्यिक पत्रिकाओं का विभाजन पाश्‍चात्‍य अस्तित्ववादी, विखंडनवादी, रूपवादी–जैसी तमाम विचारधाराओं और आंदोलनों से प्रभावित और उनकी प्रचारक पत्रिकाओं तथा प्रगतिशील वामपंथी और भूमंडलीकरण की विरोधी तथा प्रतिबद्ध और प्रतिरोध की संघर्षधर्मी साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच किया जा सकता है।
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हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता (5)

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत, जैसा कि पहले भी उल्लेख किया जा चुका है, भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र की पत्रिका ”कविवचनसुधा” के 15 अगस्त, 1861 ई0 से, बनारस से प्रकाशन के साथ होती है। भारतेन्दु न केवल आरंभकर्ता थे, बल्कि उन्होंने अपनी नेतृत्वकारी प्रतिभा से साहित्य और पत्रकारिता के बिखरे हुए सारे सूत्रों को समेट कर एक नए युग का सूत्रपात किया। भारतेन्दु की साहित्यिक पत्रकारिता से ही हिन्दी साहित्य की नई-से-नई गद्य-विधाओं की शुरुआत हुई। ”भारतेन्दु-समग्र” के संपादक हेमंत शर्मा ने यह ठीक लिखा है कि, “आज की पत्रकारिता का ऐसा कोई रूप नहीं जिसका बीज भारतेन्दु में न हो’’। उन्होंने साहित्य को देशहित से जोड़कर, अपनी पत्रकारिता के माध्यम से, भाषा-शैली और लोकप्रियता के ऊँचे तथा कलात्मक मानदंड स्थापित किए।
साहित्यिक पत्रकारिता के हमारे अब तक के विवेचन से, सबसे महत्वपूर्ण बात यह उभरकर सामने आती है कि वह प्राचीनकाल के यूनानियों की उस दोधारी कटार की तरह पैदा हुई थी जिसे ग्रीक भाषा में ”स्तिलुस” (STILUS) कहा जाता था। यह लिखने और घोंपने, दोनों कामों में प्रयुक्त होती थी। हमारे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी चेतना के साथ विकसित इस साहित्यिक पत्रकारिता की एक धार यदि देश को गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ओर तनी थी, तो दूसरी धार उनके पिट्ठुओं, देषी रजवाड़ों, ज़मींदारों, महाजनों और धर्म के ठेकेदार पाखंडियों, रूढ़ियों तथा सामाजिक कुरीतियों की ओर तनी थी। हमारे अब तक के वर्णन, विश्‍लेषण और विवेचना से साहित्यिक पत्रकारिता का स्वरूप, उसके क्षेत्र और वर्गीकरण के साथ ही, उसके इतिहास की भी एक हल्की सी रूपरेखा उभरती हुई दृष्टिगोचर हुई होगी। वस्तुतः हमारे इस प्रबंध के प्रस्तुत पाँचवें और अंतिम खंड की विषय-वस्तु भी यही है।

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास

साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास हमरे साहित्य के इतिहास का अभि का अभिन्न अंग है ; और साहित्य का इतिहास हमारे समग्र साँस्कृतिक और सामाजिक इतिहास का अंग है। इनमें उठने वाली परिवर्तनों की लहरें एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं और परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। लेकिन साहित्य के इतिहास की कुछ धीमी गति की तुलना में साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की गति कुछ तीव्रतर होती है। इसीतरह सा से उस पर तामान्य पत्रकारिता के इतिहास का एक हिस्सा होने की वजह से उस पर तात्कालिकता और एक हद तक समसामयिक दवाबों का भी तुलनात्मक रूप से अधिक असर दिखता है, फिर भी अपने खास चरित्र के कारण साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास, उसके काल-विभाजन, भाषा-शैलीगत विविध परिवर्तनों और प्रवृत्तियों के टकराव या सामंजस्य आदि का अपना वैशिष्‍टय तो होता ही है, मोटे तौर पर हम हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास को मुख्यतः दो बड़े कालखंडों में विभाजित कर सकते हैं: (क) आज़ादी से पहले की साहित्यिक पत्रकारिता ; और (ख) आज़ादी के बाद की साहित्यिक पत्रकारिता, भारत्येन्दु युग से आरंभ करते हुए, हम भारतेन्दु-युग से पहले के कालखंड को इस इतिहास की पृश्ठभूमि भी मान सकते हैं अर्थात ”उदंतमार्त्तांड” के प्रकाशन (30 मई, 1826) से लेकर ”कविवचनसुधा” के प्रकाशन (15 अगस्त, 1867) तक ”भारतेन्दु-पूर्व युग या हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास की ”पृष्‍ठभूमि” से आगे के दोनों प्रमुख युगों के भीतर भी हम इस प्रकार कालविभाजन कर सकते हैं —-
क) स्वतंत्रता पूर्व की साहित्यिक पत्रकारिता (1867-1947 ई0)
1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग ; (1867-1902)
2) द्विवेदी-प्रेमचंद युद ; (1900-1935)
3) प्रगतिवादी युग ; तथा (1936-1950-53)
ख) स्वातंत्र्योत्तर साहित्यिक पत्रकारिता (1947 से लेकर आज तक)
1) प्रगति-प्रयोग का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधराओं का दौर (1947-1964)
2) लघु पत्रिका आंदोलन का दौर ; (1964- 1974)
3) आपात्काल और उसके बाद का दोर ; तथा (1975-1995)
4) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध अन औरका समकालीन दौर (1995 …….)
कालविभाजन का वैज्ञानिक आधार
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के संदर्भ में छिट-पुट काम तो हुए हैं, लेकिन उसके समग्र विवेचन, वैज्ञानिक काल विभाजन और प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण के आधार पर कोई बड़ा काम अभी तक नहीं हुआ है। कहना न होगा कि इस लिहाज़ से हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का अभी तक कोई इतिहास है ही नहीं ! लेकिन ”इतिहास” न होने पर भी साहित्यिक पत्रकारिता तो रही है और अब भी अस्तित्व में है ; सक्रिय है, गतिशील है। दरअसल, इसे वस्तुनिष्‍ठ ढंग से और प्रामाणिक तथ्यों एवं कालविभाजन की वैज्ञानिक पद्धति से कालक्रमानुसार (क्रॉनोलौजिकली) लिपि-बद्ध करने की ज़रुरत है। मौजूदा पतनशील दौर में तो और भी ज़रूरत है ; ताकि इस ”इतिहास” की क्रांतिधर्मी चेतना से प्रेरणा लेकर एक नए वनजागरण की मशाल जलाई जा सके।
इतिहास में हम एक नए युग की समाप्ति और नए युग के आरंभ की कोई तिथि निर्धारित करते हैं तो उसका अर्थ यह नहीं कि ठीक उसी दिन से युग बदल गया और तदनुरूप उसकी प्रवृत्तियाँ भी एक से दूसरे युग के दरम्यान एक संक्रमणकाल (ट्राँज़ीशनल पीरियड) होता है ; और कभी-कभी तो यह दौर खासा लंबा खिंच जाता है। दूसरे, एक युग के दौरान ही आगे आने वाले युग की कतिपय प्रवृत्तियाँ, कुछ लक्षण उभरने लगते हैं। इसी तरह युग परिवर्तन हो जाने पर भी पिछले युग या युगों की कुछ-न-कुछ प्रवृत्तियाँ जारी रहती हैं ; धीरे-धीरे तिरोहित होती हैं फिर भी, हम किसी ऐतिहासिक घटना, किसी खास आंदोलन, साहित्यिक पत्रिका या युगांतरकारी व्यक्ति-विशेष और उनकी किन्हीं निश्चित तिथियों को आधार बनाकर कालविभाजन करते हैं ; यथा, स्वाधीनता-पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर से इसी तरह ”कविवचनसुधा” की प्रकाशन-तिथि या ”सरस्वती” का वह अंक जिससे पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी ने संपादन संभाला अथवा आपात्काल और उसमें सेंसरशिप लागू होने का वर्श या देश में तथाकथित ”नयी आर्थिक नीति” लागू होने से बदली हुई परिस्थितियाँ आदि से इन सबका आधार सामाजिक- आर्थिक परिवर्तन और उनसे प्रभावित राजनीतिक, साँस्क्रतिक और साहित्यिक परिवर्तन आदि होते हैं।
अब हम ”हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास” की अत्यंत संक्षिप्त रूपरेखा, उपर्युक्त सात शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत करते हुए, युगानुरूप प्रवृत्तियों, आंदोलनों, प्रतिनिधि पत्रिकाओं और इन परिवर्तनों के प्रेरक या वाहक युगांतरकारी व्यक्तियों की भूमिका रेखांकित करने का प्रयास करेंगे। स्मरणीय है कि कोई भी ”इतिहास” पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तियों की नामावली की लंबी-चौड़ी ”सूचि” नहीं होती, ऐसा होने पर वह ”इतिहास” नहीं, रेलवे टाइमटेबल या टेलीफोन डायरेक्टरी बन कर रह जाएगा।
1) भारतेन्दु-बालमुकुन्द गुप्त युग (1867-1902)
”कविवचनसुधा” से हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात करते हुए, भारतेन्दु ने 15 अक्टूबर, 1873 से पाक्षिक ”हरिश्‍चंद्र मैगज़ीन” का प्रकाशन शुरु किया। ”सुधा” 15 अगस्त, 1867 में मासिक निकली थी। प्रकाशन के दूसरे वर्ष से वह पाक्षिक, फिर 5 सितंबर, 1873 से साप्ताहिक रूप में निकलने लगी थी। ”मैगज़ीन” भी पाक्षिक थी तथा 8 अंकों के बाद जनवरी, 1874 से उसका नाम ”हरिश्‍चंद्र चंद्रिका” हो गया। भारतेन्दु ने स्त्रियों के लिए भी एक पत्रिका ”बाला-बोधिनी” निकाली थी। डॉ0 रामविलास शर्मा ने ”सुधा” को ”एक युग का सजीव इतिहास” और “भारतेन्दु युग का दर्पण” निरूपित करते हुए लिखा है कि वह सच्चे अर्थों में “जनता के हितों के लिए लड़ने वाले निर्मम सैनिक की तरह थी। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ”सुधा” के बाद यही काम ”मैगज़ीन” और ”चन्द्रिका” ने किया। हिन्दी साहित्य की सभी गद्य-विधाएँ इसी युग में प्रस्फुटित हुईं।
डॉ0 शर्मा ने लिखा है कि भारतेन्दु की पत्रिकाओं का “मूल स्वर देशोन्नति और अंग्रज़ी शासन की नुक्ताचीनी का था और उन्होंने “विभिन्न साँस्कृतिक विषयों को एक ही जगह समेटकर पत्रिका की ऐसी पद्धति चलाई जिसका अनुसरण आगे चलकर हिन्दी की अधिकांश पत्रिकाएँ करती रहीं। भारतेन्दु की पत्रिकाओं के अलावा ”आनंदकादंबिनी” (प्रेमघन), ”भारतेन्दु” (राधाचरण गोस्वामी), ”ब्राह्मण” (प्रतापनारायण मिश्र), ”हिंदी प्रदीप” (बालकृष्‍ण भट्ट), ”सारसुधानिधि” (दुर्गाप्रसाद मिश्र और सदानंद मिश्र) तथा ”भारतमित्र” (बालमुकुन्द गुप्त) इस युग के प्रतिनिधि पत्र-पत्रिकाएँ और उनके यशस्वी संचालक और संपादक हैं, जो भारतेन्दु की इस राह पर दृढ़तापूर्वक जीवनपर्यन्त चले परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो।
बाबू बालमुकुंद गुप्त, पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी के समकालीन थे। डॉ0 शर्मा के अनुसार वे भारतेन्दु युग के ऐसे सिपाही थे जिन्होंने हरिश्‍चंद्र की मृत्यु के बाद सेनापति की कमान संभाली। वे बताते हैं कि ”भारतमित्र” के साथ गुप्त जी का नाम वैसे ही जुड़ा है जेसे ”सरस्वती” के साथ द्विवेदी जी का। डॉ0 शर्मा लिखते हैं कि गुप्तजी “हिन्दी-उर्दू की बुनियादी एकता के प्रबल समर्थक थे। अपनी उग्र राजनीतिक चेतना के कारण वे भारतेन्दु से अधिक बालकृष्‍ण भट्ट के निकट हैं। उनका गद्य ललित और सरस है, इस दृष्टि से वे भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और प्रतापनारायण मिश्र की शैली के अनुवर्ती हैं। किन्तु उनका-सा व्यंग्य उस युग के किसी अन्य लेखक में नहीं है। वाद-विवाद को कलात्मक बना देने में वे अनुपम थे। गुप्त जी इस क्षेत्र में आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में हास्य-व्यंग्य के सिरमौर हरिशंकर परसाई के पूर्वज कहे जा सकते हैं।

2) द्विवेदी-प्रेमचंद युग (1900-1935)

द्विवेदी जी के संपादन काल की ”सरस्वती” को “आधुनिक हिन्दी साहित्य का ज्ञान-कांड“ बताते हुए डॉ0 शर्मा ने इस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का उच्च मूल्यांकन किया है। वे लिखते हैं कि ”सरस्वती मर्यादा तथा हिन्दी की अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इस समय जो सामग्री निकली, उससे यदि सुधा और हंस में निराला और प्रेमचंद के लेखों की तुलना करें तो यह तथ्य स्पष्‍ट हो जाएगा कि प्रेमचंद की यथार्थवादी धारा और निराला की छायावादी धारा, दोनों द्विवेदी युग से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह भाई के भारतेन्दुकालीन लेखकों के भावबोध से द्विवेदी जी के भाव-बोध का अंतर दिखाई देता है। अंतर विचारधारा में नहीं है, अंतर है भाषा और साहित्य की परख में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनकी ”सरस्वती” का मह्त्व यह है कि उन्होंने हिन्दी नवजागरण की बिखरी हुई असंगठित शक्ति को एक जगह एकताबद्ध और संगठित किया।
स्मरणीय है कि ”सरस्वती” द्वारा द्वेवेदी जी के संपादन में 1903 ई0 से यह ऐतिहासिक युगांतर शुरु करने से पहले यह भूमिका माधवराव सप्रे के संपादन में ”छत्तीसगढ़ मित्र” (सन 1900से) आरंभ कर चुका था। डॉ0 नारद के शब्दों में, “माधवदास सप्रे का कृतित्व हिन्दी लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार कर देने के लिए भी दृष्‍टव्‍य रहेगा। पं0 महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं0 श्रीधर पाठक, पं0 कामताप्रसाद गुरु, पं0 गंगाप्रसाद अग्निहोत्री, पं0 जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, पं0 रामदास गौड़ तथा पं0 नागीश्‍वर मिश्र प्रभुति अन्य अनेक लेखक ऐसे थे जिनकी प्रारंभिक रचनाओं को ”छत्तीसगढ़ मित्र” ने बड़े ही उत्साह से प्रकाशित किया। कहना न होगा कि सप्रे जी बाद में भी ”सरस्वती” में द्विवेदी जी के एक नियमित सहयोगी लेखक के रूप में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता और हिन्दी नवजागरण में अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। आलोचक रामचन्द्र शुक्ल का ”इतिहास” और उपन्यासकार और पत्रकार प्रेमचंद तथा हिन्दी कविता में छायावाद, नए यथार्थवाद और छन्द-मुक्त प्रगतिवादी नयी कविता का सूत्रपात करने वाले, साथ ही एक प्रखर पत्रकार सूर्यकान्त त्रिपाठी ”निराला” इसी युग की देन हैं। प्रेमचंद के संपादन काल की ”माधुरी” भी (जिसके संपादक मंडल में प्रेमचंद थे) इस हिन्दी नवजागरण के ”ज्ञान कांड” में ”सरस्वती” और ”छत्तीसगढ़ मित्र” की सहोदर पत्र-पत्रिकाएँ थीं।
इनके अलावा, इस युग की अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पं0 चंद्रधर शर्मा गुलेरी का अल्पायु ”समालोचक” (1901-02) जयशंकर प्रसाद की ”इंदु” पहले माखनलाल चतुर्वेदी, फिर गणेश शंकर विद्यार्थी, बालकृष्‍ण शर्मा ”नवीन” के संपादन में ”प्रभा”, ”रामरख सहगल की क्रांतिकारी पत्रिका ”चाँद ” (जिसमें छ: नामों, यथा बलवंत सिंह, से भगतसिंह लिखते थे और जिसके जब्तषुदा ”फाँसी” अंक को उन्होंने ही तैयार किया था), अल्पायु ”साहित्य”, ”साहित्य समालोचक”, ”श्री शारदा” और वीणा के नाम उल्लेखनीय हैं। इन साहित्यिक पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रकारों-लेखकों के अलावा दैनिक ”वर्तमान” के संपादक रमाशंकर अवस्थी, शिवपूजन सहाय, राधामोहनद गोकुल जी, सत्यभक्त, इतिहासज्ञ काशीप्रसाद जायसवाल, श्‍यामाचरण राय, जनार्दन भट्ट, डॉ0 बेनीप्रसाद, बैरिस्टर मन्निलाल, रामनारायण शर्मा, नाथूराम प्रेमी, कृष्‍णानंद जोशी, गंगाधर पंत, ईश्‍वरदास मारवाड़ी, नवजादिकलाल श्रीवास्तव, शिवप्रसाद गुप्त, त्रिमूर्ति शर्मा, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी, देवीप्रसाद गुप्त, सुंदरराज, सत्यदेव, जगन्नाथ खन्ना, गिरीन्द्रमोहन मिश्र, मधुसूदन शर्मा, वीरसेन सिंह, बदरीदत्त पांडे, संतराम, सीताराम सिंह, शिवप्रसाद शर्मा, धनीराम बख्‍शी, द्वारिकानाथ मैत्र, सिद्धेश्‍वर शर्मा, पृथ्वीपाल सिंह, गुलजारीलाल चतुर्वेदी, श्‍यामसुंदर वर्मा, प्रेम वल्लभ जोशी, रामनारायण मिश्र, कामताप्रसाद गुरु और मिश्र बंधु के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ0 बेनीप्रसाद और राधामोहन गोकुल जी अपने नामों के अलावा ”सत्यशोधक” और ”प्रत्यक्षदर्शी” के नामों से भी लिखते थे।
अंत में, जैसे हम भारतेन्दु-युग के बारे में डॉ0 रामविलास शर्मा की पुस्तकों ”भारतेन्दु हरिश्‍चंद्र और हिन्दी नवजागरण” तथा ”भारतेन्दु-युग और हिन्दी भाषा की विकास परंपरा” से जान सकते हैं, ठीक उसी प्रकार, द्विवेदी-प्रेमचंद युग का भरा-पूरा जीवंत चित्र हमें डॉ0 शर्मा की ”महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण” तथा ”प्रेमचंद और उनका युग” पुस्तकों में मिलेगा। ये चारों कालजयी कृतियाँ हिन्दी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के इतिहास की अमूल्य धरोहर तथा अनिवार्यतः पठनीय हैं।
3) प्रगतिवादी युग (1936-1950-53)
साहित्य के इतिहासकार प्रगतिवादी के युग को अप्रैल, 1936 से 1953 तक मानते हैं। इसका आधार प्रेमचंद की अध्यक्षता में 9-10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ में सम्पन्न प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) का स्थापना सम्मेलन है। कुछ लोग 1949-50 तक तो कुछ 1953 तक इसकी कालावधि मानने के पीछे यह तर्क देते हैं कि आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों और प्रगतिशील लेखकों के सरकारी दमन और पार्टी की रणदिवे लाइन के संकीर्णवादी दौर में आंतरिक कलह तथा गुटबाजी की वजह से प्रलेसं0 का निष्क्रिय हो जाना स दूसरे लोग, इसके विपरीत मार्च,1953 में दिल्ली सम्मेलन में रामविलास शमजार्ने के नेतृत्व और महासचिव पद से हट जाने के बाद संगठन वास्तव में समाप्त हो गया था और सभी प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाएँ भी एक-एक करके बंद हो गईं थीं। अपवाद स्वरूप, सिर्फ हरिशंकर परसाई की ”वसुधा” अवश्‍य 1958 तक निकलती रही।
इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यिक पत्रकारिता का सबसे क्रांतिकारी, तेजस्वी और साथ ही कलत्मक रूप हमें प्रगतिशील दृष्टिकोण वाली पत्र-पत्रिकाओं और उनके लेखकों-संपादकों के कृतित्व में ही नज़र आता है। ऐसी पत्र-पत्रिकाएँ भारतेन्दु की पत्रिकाओं से लगातार प्रलेसं0 की स्थापना (1936) तक बराबर निकलती रही हैं। इनकी मुख्य विषयवस्तु ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की गुलामी से देश की आज़ादी और स्वतंत्र भारत को एक जनवादी, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणतंत्र बनाने के उद्देश्‍य से मज़दूरों, किसानों और तमाम मेहनतकशों से प्रतिबद्धता तथा उनकी समस्याओं को उठाना रही। शोषण-विहीन समाज के स्वप्न और हर तरह के शोषण और दमन का यथार्थ चित्रण करते हुए उसका प्रतिरोध तथा फासीवाद एवं युद्ध के विरोध में शांति और सोवियत संघ का समर्थन ”प्रगतिवादी” साहित्य तथा पत्रकारिता का उद्देश्‍य रहा है। इस दृष्टि से जिन महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का नामोल्लेख किया जा सकता है, उनमें ”हंस” (प्रेमचंद, उनकी मृत्यु के बाद अमृतराय), ”विप्लव” (यशपाल), ”रूपाम” (पंत), ”नया साहित्य” ,”लोकयुद्ध”, ”जनयुग”, (तीनों कम्युनिस्ट पार्टी), ”चकल्लस”, ”उच्छृंखल” (दोनों अमृतलाल नागर), ”जनता”, ”संघर्ष”, ”नया सवेरा” ,”उदयन” ”वसुधा” (परसाई), ”समालोचक” (राम विलास शर्मा), ”नया पथ” (यशपाल एवं अन्य) और मुक्तिबोध के संपादन में सोख्ताजी का साप्ताहिक ”नया खून” आदि प्रमुख हैं। सभी पत्र-पत्रिकाएँ ठेठ प्रगतिवादी थीं।
4) प्रगति का द्वंद्व तथा प्रगति-विरोधी विचारधाराओं का दौर (1947-1964)
दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में अंध-कम्युनिस्ट विरोध के साथ ही अस्तित्ववाद, रूपवाद, नयी समीक्षा, संरचनावाद और ऐसी ही तरह-तरह की दार्शनिक, साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आज़ादी के बाद इन आंदोलनों और विचारधाराओं का खासा असर दिखाई देने लगा था। साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में ”प्रगति” और ”प्रयोग” का द्वंद्व तो 1943 में अज्ञेय के संपादन में ”तारसप्तक” के प्रकाशन से ही परिलक्षित होने लगा था ; लेकिन 1947 से अज्ञेय के ”प्रतीक” के प्रकाशन के साथ ही इस संघर्श का स्वरूप भी बदलने लगा था।
पहले जहाँ (”तारसप्तक” और कुछ बाद तक) एक ही प्रगतिवादी परिधि में दो विरोधी दृष्टिकोणों में टकराव था ; जिसे ”प्रगति” बनाम ”प्रयोग” के द्वंद्व का नाम दिया जाता है। इस टकराव का केंद्र आलोचना और कविता के क्षेत्र बने स बाद में नयी कहानी भी षामिल हो गई स एक ही प्रगतिशील धारा के अंतर्गत एक ओर जहाँ रामविलास शर्मा, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन आदि थे ; तो दूसरी ओर ”प्रगतिवाद” की रूढ़ समझ के विरोध में मुक्तिबोध, शमषेर बहादुर सिंह, हरिषंकर परसाई और नामवर सिंह थे, जो नए-नए प्रयोगों को ज़ोरदार वकालत करते थे ।
आज़ादी के बाद अज्ञेय ने ”दूसरा सप्तक” और ”तीसरा सप्तक” के माध्यम से नए ”प्रयोगों” की वकालत को खींचकर ”प्रयोगवाद” के सिद्धांतों और आंदोलन में बदल दिया। दुनिया भर में जिस शीत युद्ध की अंध-कम्युनिस्ट-विरोधी लहर का प्रभाव छाने लगा था, हिन्दी में भी कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम” के प्रवक्ता के तौर पर ”प्रतीक” और ” अज्ञेय” के नेतृत्व में इसकी गोलबंदी होने लगी। जल्दी ही ”नयी कविता” पत्रिका (सं0 जगदीश गुप्त) और ”परिमल” संस्था ( अज्ञेय, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही आदि) ने भी इस मोर्चे में शामिल होकर ज़ोरदार प्रगति-विरोधी अभियान छेड़ दिया।
प्रगतिशील लेखक संघ, उसकी विचारधारा से जुड़े मंचों, पत्र-पत्रिकाओं के अवसान के बाद इन प्रगति-विरोधियों को खुला मैदान मिल गया। राजनीतिक सत्ता और धनसत्ता के परोक्ष और प्रत्यक्ष समर्थन तथा तमाम प्रतिष्‍ठानी सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाओं के विशाल मंच उपलब्ध होने पर एकबारगी तो साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्रों में इनकी ही सर्वत्र विजय-पताका लहराने लगी। लेकिन तब भी सतह के नीचे प्रगतिशील साहित्य की एक शक्तिशाली सृजनात्मक अंतर्धारा प्रवाहित रही जो समय पाकर कालांतर में एक बार फिर उभरी।

5) लघु-पत्रिका आंदोलन का दौर (1964-74)

भारत पर 1962 में चीन के हमले और 1964 में नेहरू जी कि मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ हरेक क्षेत्र में स्वतंत्र्योत्तर व्यामोह से मोह-भंग हो रहा था, वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी एकछत्र सत्ता के बुर्जुआ लोकतंत्र में अंतर्विरोध और दरारें पड़ने लगी थीं तथा समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की विरोधी तमाम तरह की दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी- अवसरवादी ताकतें, मुख्यतः साम्प्रदायिक और हिह्दुत्ववादी-पुराणपंथी शक्तियाँ गोलबंद होकर शक्तिशाली हो रही थीं। उन्हें अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों, उनकी बहुराष्‍ट्रीय पूंजी तथा देशी इज़ारेदार पूंजीपति घरानों और उनकी पत्र-पत्रिकाओं का भरपूर समर्थन था। इसका असर तमाम साँस्कृतिक क्षेत्रों और साहित्यिक पत्रकारिता पर भी प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था। सरकारी, अर्ध-सरकारी और प्रतिष्‍ठानी पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही ”धर्मयुग”, ”सारिका”, ”साप्ताहिक हिम्दुस्ताम”, ”ज्ञानोदय” जैसी सेठाश्रयी पत्रिकाओं ने प्रगतिशील सोच के लेखकों, विशेष रूप से नए लेखकों के लिए प्रकाशन के अपने सभी दरवाज़े बंद कर दिए। इसी के विरोध में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में 1964-65 से जबर्दस्त लघु-पत्रिका आंदोलन चला; जिसकी विस्तृत चर्चा पिछले पृष्‍ठों में की जा चुकी है।
इस दौर में विशेष बात यह हुई कि 1967 में नक्सलवादी आंदोलन के साँस्कृतिक क्षेत्रों खासकर साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उसका ज़ोरदार असर देखा गया। लघु-पत्रिकाओं का खासा बड़ा हिस्सा तथा नौजवान लेखकों-संस्कृतिकर्मियों का बहुमत इस ओर आकर्शित होने लगा। उधर कम्युनिस्ट पार्टी में 1964 में विभाजन के बाद माकपा और भाकपा से जुड़े लेखकों-पत्रकारों की पत्र-पत्रिकाओं ने भी नए सिरे से अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया। फलस्वरूप 1969-70 से लघु-पत्रिका आंदोलन के इस दूसरे दौर ने एक शक्तिशाली नामपंथी मोड़ ले लिया। इस दौर की परिणति मई,1975 में गया में ”राष्‍ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ” के नाम से देश की सभी भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के मंच का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद तो प्रायः 1995 तक मुख्यतः और प्रायः 2000 तक प्रायः साहित्यिक पत्रकारिाता में मार्क्सावादी विचारधारा तथा व्यापकतथा प्रगतिशील और वामपंथी दृष्टिकोण से प्रतिबद्ध लेखकों, संपादकों तथा पत्र-पत्रिकाओं का ही वर्चस्व कायम रहा। इस दौर की साहित्यिक पत्रकारिता का विस्तृत उल्लेख भी हम पिछले पृष्‍ठों में कर चुके हैं।

6) आपात्काल और परवर्ती दौर (1975-95)

देश में जून, 1975 में आपातकाल और फलस्चरूप कठोर ”सेंसरशिप” लागू होने के बाद हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता ने एक बार फिर भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता की कलात्मक संकेतधर्मिता, प्रतीकवाद और कूटनीति का सहारा लिया। इसमें भी मुख्यतः तीन धाराएँ दिखाइ देती हैं। एक तो उन दक्षिणपंथी-साम्प्रदायिक पक्ष के लेखकों-पत्रकारों की धारा, जो आपात्काल, सेंसरशिप औएा इंदिरा-विरोध के तेवरों के साथ मुख्यतः अंध-कम्युनिस्ट विरोध और सोवियत-विरोध की नीतियों की प्रचारक थी।
दूसरी धारा कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लेखकों, पत्रकारों और संपादकों की थी, जो आपात्काल, सेंसरशिप और तत्कालीन सत्ता के विरोध के साथ ही दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक और सत्ता-लोलुप फासिस्ट शक्तियों को भी बेनकाब कर रही थी। लेकिन सबसे ज़्यादा तादाद उन अवसरवादी लेखकों-पत्रकारों और साहित्यिक पत्रिकाओं की थी जो सत्ता की चापलूसी और जी-हज़ूरी में झुक गईं थीं। तमाम प्रतिष्‍ठानी और सेठाश्रयी पत्र-पत्रिकाएँ इसी रीढ़-विहीन तीसरी धारा में थीं। उनके लेखकों में भी ऐसे ही अवसरवादी तत्वों का बहुमत था।
स्मरणीय है, कि हर तरफ से चौतरफा हमलों की शिकार भाकपा से जुड़ी पत्रिका ”पहल” ही हुई स उधर ”जनयुग” ने ”प्री-सेंसरशिप” को मानने से इनकार कर दिया तथा सेंसरशिप के विरोध में कोरे पृष्‍ठों और काली पट्टियों के साथ सारिका” छापने की वजह से भाकपा से जुड़े संपादक कमलेश्‍वर को टाइम्स ऑफ इंडिया ने बर्खास्त कर दिया। यही नहीं, इससे कुछ अर्सा पहले, प्रगतिशील लेखक संघ के राष्‍ट्रीय अध्यक्ष तथा भाकपा से जुड़े महान व्यंग्यलेखक और पत्रकार हरिशंकर परसाई पर राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आर0एस0एस) के हुदुत्व सैनिकों ने उनके घर में घुसकर दिन-दहाड़े लाठियों से संघातक हमला किया था। इस प्रकार हम देखते हैं कि तमाम तरह के अवसरवादियों , पाखंडी कायरों और नकली शहादत का मुखौटा पहनने वाले नौटंकीबाज़ लेखक-पत्रकारों तथा साहित्यिक पत्रिकाओं के विपरीत, वामपंथी और प्रगतिशील क्षेत्रों की साहित्यिक पत्रकारिता ने ही, इस दौर में भी अपनी सच्ची संघर्शशील भूमिका निभाई !
7) भूमंडलीकरण और उसके प्रतिरोध का समकालीन दौर (1995 ……)
आज हमारा समाज भूमंडलीकरण के ऐसे दोर से गुज़र रहा है जहाँ, मनुष्‍य एक श्रोता या पाठक से बदलकर मात्र उपभोक्ता और साथ ही स्वयं उपभोग की ”वस्तु” में …. वह भी बाज़ार की एक ”पण्य-वस्तु” के रूप में बदल चुका है। इसके विस्तार में न जाते हुए, यहाँ हम यही कहना चाहेंगे कि अब संस्कृति की जगह पतित अप-संस्कृति ने ले ली है और ज्ञान की जगह ”सूचना” मात्र में से वह भी वही सूचना, जो दुनिया में ”सूचना-नियंत्रण” करने वाली बहुराष्‍ट्रीय सूचना-सत्ताएँ तय करती हैं। दूसरे, सूचना की जगह ”गलत सूचना” (डिस-इन्फोरमेशन) और दुश्‍प्रचार तथा प्रायोजित आम-राय और विश्‍व- अभिमत से इस तरह अब आपके मस्तिष्‍क को, आपके विचारों को भी नियंत्रित किया जा रहा है और फूहड़ मनोरंजन की आदत डाली ज रही है। इस तरह धीरे-धीरे हम एक अपढ़ समाज की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में साहित्यिक पत्रकारिता के आगे सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह लोगों में सांस्कृतिक विवेक, स्वतंत्र कला-चेतना और विचारोत्तेजक,किन्तु संवेदनात्मक साहित्य के प्रति रुचि पैदा करे। इसके लिए वह प्रिंट ही नहीं, बल्कि ”इलेक्ट्रॉनिक” विशेष रूप से ”न्यू मीडिया” के वैकल्पिक साधनों के प्रयोगात्मक अवसर तलाश करे। भूमंडलीकरण और बाज़ारवाद के इस दौर में साहित्यिक पत्रकारिता को भी संगठित और व्यापक वैकल्पिक शक्ति बनकर प्रतिरोधाओं का शस्त्र बनना होगा। एक नए नवजागरण का लोकप्रिय अग्रदूत !!
संदर्भ:–
1) ”पत्रकारिता और संपादन कला”, (सं0 रामप्रकाश), में नेमिशरण मित्तल का लेकह, पृ0 116
2) ”भारतेन्दु-समग्र”,(सं0 हेमन्त शर्मा), की भारतेन्दु को पढ़ने के बाद शीर्षक ”भूमिका”
3) उपर्युक्त
4) ”परंपरा का मूल्यांकन”, रामविलास शर्मा ; राजकमल प्रकाशन, पृ0110
5) ”महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण, रामविलास षर्मा ,राजकमल प्रकाशन, पृ0 381
6) उपर्युक्त, पृ0 72
7) उपर्युक्त, पृ0 281
8) उपर्युक्त, पृ0 366
9) म0 प्र0 में हिन्दी पत्रकारिता: एक शताब्दी, डॉ0 कैलाश नारद, पृ0 39
10) भूमंडलीकरण और बाज़ार के बारे में विस्तृत अध्ययन के लिए प्रो0 (डॉ0) कमल नयन काबरा तथा
प्रो0 (डॉ0) पुष्पेश पंत की पुस्तकें देखिए


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