सोमवार, 28 मार्च 2016

50 साल से निकल रही है त्रैमासिक पत्रिका संबोधन








कमर मेवाडी जी के संबोधन को सलाम  

अनामी शरण बबल

राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार और संबोधन त्रैमासिक पत्रिका के संपादक कमर मेवाड़ी को मैं नहीं जानता हूं अलबत्ता साहित्यिक पत्रिका हंस में अक्सर संबोधन पत्रिका का एक विज्ञापन जरूर देख लेता था.। दर्जनों दफा संबोधन के विज्ञापन को देखने के बावजूद इसको लेकर मन में कोई दिलचस्पी नहीं जगी। एकाएक हंस के ही किसी अंक में जब इसके 50 साल से लगातार प्रकाशित होने वाली पत्रिका संबोधन के विज्ञापन पर जब मेरी नजर गयी तो मेरा माथा ठनका कि संबोधन और 50 साल । मैं पहले तो अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाया कि कमाल है एक साहित्यिक पत्रिका के 50 साल हो गए और मेरे पास इसका कोई एक भी अंक नहीं है। मैं खुद को थोडा शर्मसार और अबोध सा पा रहा था। मेरे भीतर इस कमर मेवाड़ी नामक साहित्यकार संपादक को लेकर बड़ी जिज्ञासा जगी कि आखिरकार यह हैं कौन जो इतनी शांति और एक तपस्वी की तरह किसी पत्रिका को 50 साल तक प्रकाशित करने के बाद भी खुद को पर्दे के पीछे ही रखते हैं। संबोधन पत्रिका के प्रेम विशेषांक को देखने और अपने पास होने की लालसा बढ़ गयी और मैं किसी भी कीमत पर संबोधन से जुड़ने के लिए लालयित सा हो गया। मेरी उत्कंठा को हवा दी मातृभारती ईबुक लाईव करने वाले डिजिटल प्रकाशक महेन्द्र शर्मा जी ने। वे तमाम प्रेम कहानियों को पुस्तिका के रूप में लाईव करना चाहते थे। हालांकि यह अभी तक तो तय था कि राजसमंद में जाकर इस आयोजन का साक्षी बनू, पर यह मुमकिन नहीं हो सका अलबत्ता मेरे और महेन्द्र शर्मा के मन में अभी भी यह लालसा जीवित है कि संबोधन परिवार से एक बार मिलना बहुत जरूरी सा है। यह कभी भी हो सकता है कि एकाएक  कभी भी मेवाड़ी जी से मिलने मैं राजसमंद पहुंच कर ही दम लूं।
किसी भी जगह से किसी पत्रिका या अखबार को निकालना सरल नहीं होता । बड़ी मेहनत और दिन रात की मेहनत के बाद 10-15 अंक निकलना भी कठिन नहीं होता, क्योंकि मन में लगन जेब में धन और  विज्ञापनों से मिलने वाले धन का आश्वासन जीवित रहता है। मगर चार से आठ माह गुजरते- 2 उत्साह चूकने लगता है, पत्रिका के साथ जुड़े संगी साथी भी छिटकने लगते हैं। यानी तम मन और धन के साथ जुड़ने वाले लोगों की टीम बिखरने लगती है और उस पर पूरे उत्साह और बढ़ चढ़कर धन की मदद और विज्ञापन देने वाले तमाम सज्जन लोग भी कन्नी काटने लगते है। यानी चार छह माह पहले तक कुछ कर गुजरने की सारी योजनें धीरे धीरे खंडित होने लगती है। छोटे शहर मे कम लोगो और सीमित संकुचित साधन संसाधनो के बीच पत्रिका को चलाना नाको चने चबाने से भी कठिन है, फिर कांकरटोली राजसमंद से संबोधन के भविष्य को लेकर सपने देखना भी मुंगेरीलाल के हसीन सपनो जैसा ही था।  मगर कमाल के आप हो कमर मेवाड़ी जी, फिर आप और आपकी पूरी टीम ही वंदनीय है जो किसी न किसी तरह 50 सालो मे कम होने की बजाय कारवां बढ़ता ही चला जा रहा है। यहां पर मैं संबोधन से ज्यादा इस परिवार के महत्व पर ज्यादा जोर दूंगा कि सारे लोग भले ही संबोधन के सूत्र में बंधे है। पर इनके कारण ही संबोधन को यह गौरव प्रतिष्ठा और मान सम्मान मिला। निजी प्रयासों से अपने बूते संबोधन भारतकी पहली पत्रिका है जिसके जीवन में 50 वसंत आए। भले ही संबोधन को नहीं देखा था पर मैं इससे एक सहोदर  देख रहा था। भले ही मेरा सही जन्म वर्ष नवम्बर 1965 की हो ,मगर सरकारी जन्म तो फरवरी 1966 की ही है । इस लिहाज से मैं और संबोधन की आयु करीब करीब एक समान ही है। संबोधन को देखने की ललक को पूरा करने के लिए कमर मेवाड़ी जी से बात करने के सिवा और कोई दूसरा रास्ता जो न था (क्योंकि लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन के बाद सभी जगह वितरण की व्यवस्था करना भी तारे तोड़ने के बराबर है। हंस में ही कमर जी का मोबाइल नंबर था और मैने फटाक से फोन करके संबोधन को देखने और इसकी कहानियों को ईबुक में करने की बात रखी। मैने इनसे कहा कि 25 कहानी हैं तो संबोधन को मातृभारती 25 हजार रूपए बतौर पारिश्रमिक भी देगी। मेरी बात सुनते ही कमर जी ने दो टूक कहा कि आप मुझे क्यों देंगे जो लेखक है पारिश्रमिकत आप सीधे उसको दीजिए। इस पर मैने कहा कि मैं कहा कि 25 लोगों के ईमेल और बैंक खाते मंगवाना जटिल काम है  इससे ज्यादा भला है कि सीधे संबोधन के खाते में राशि डाल दी जाए। , मगर पैसे के भुगतान को लेकर कमर जी ने खुद को अलग कर लिया। एक साधनहीन पत्रिका के संपादक की धन को लेकर यह ईमानदारी चकित करती है । खैर अंतत मेवाड़ी जी ने मुझे भी इस मौके पर बुलाया कि खुद आकर इस पत्रिका के परिवार को देखिए, मगर यह संभव ना हो सका।( शायद दो एक माह में कांकरटोली जाना मुमकिन हो)
मेवाड़ी जी से बात करके अपना नाम बताया और संबोधन पत्रिका की एक प्रति की मांग रखी। बिना किसी हिल हुज्जत के उन्होने मेरा पता नोट किया और नौ मार्च को पत्रिका और अपनी कहानियों की एक किताब जिजीविषा और अन्य कहानियां पंजीकृत डाक से भेज दी। मगर हाय री मोदी जी कि भारतीय डाक (Indian post) कि 18 मार्च को पता करने पर ज्ञात हुआ कि अभी तक तो कोई पंजीकृत डाक आयी ही नहीं है, मगर 19 मार्च को डाकिया एक चेकबुक को लेकर घर पर आकर बताया कि आपकी किताब आ गयी है, पर पत्ता गलत लिखा है। मैने उससे बकझक भी की। खैर सोमवार 21 मार्च को आखिरकार कल्याणपुरी डाकघर में जाकर संबोधन पत्रिका को अपने हाथों में लिया। मै बता नहीं सकता कि संबोधन को देखकर कितनी खुशी हुई।  यह महज एक पत्रिका नहीं थी बल्कि एक इतनी दुर्लभ पत्रिका का एक खास अंक है जिसके लिए संबोधन और इसके सदस्यों को 50 साल तक श्रम करनी पड़ी थी। सरकारी खर्चे पर तो आजकल समेत प्रकाशन विभाग की कई पत्रिकाएं 65-70 साल से निकल रही है , मगर 1966 में एक पत्रिका का स्वप्न देखने वाले युवा लेखक कमर मेवाड़ी की जिस लगन समर्पण और संबोधन को भी अपने बच्चों की तरह ही देखभाल करने की अदम्य लालसा का ही यह फल है कि आज भले ही श्री कमर मेवाड़ी 78 साल के बुजुर्ग हो गए , मगर इनकी देखरेख और संरक्षण में पचासा का हो गया संबोधन तमाम साहित्यकारों लेखको को हैरत में डाल देता है। अपने बूते किसी पत्र- पत्रिका को जीवित रखने का दो उदाहरण मेरे मन को हमेशा रोमांचित करता है। फैजाबाद से प्रकासित जनमोर्चा अखबार निकालने वाले श्री शीतला सिंह जी ने इस अखबार को करीब 40 साल से अपने बूते अपने कंधे का आसरा दे चला रहे हैं तो औरंगाबाद बिहार के बारून से नवबिहार टाईम्स नामक एक साप्ताहिक अखबार निकालने वाले कमल किशोर ही वह दूसर उदाहरण हैं जिन्होने धन्ना सेठों पूंजीपतियों की मदद के बगैर ही अपने बूते चलाया। साधन संसाधन जुटाकर नवबिहार टाईम्स की उम्र को 25 साल करने वाले कमल किशोर की यह एक बडी उपलब्धि है।
पत्रिकाओं की बात करे तो अपने बूते   (हालांकि पर्दे के पीछे कई अमीर लेखकों का सहारा था) हंस पत्रिका को जाने माने साहित्यकार राजेन्द्र यादव जी ने 25 साल तक निकाला (अब हमारे बीच यादव जी नहीं हैं तो पत्रिका के संपादन का जिम्मा गया बिहार के धन्ना करोड़पति लेखक रंगकर्मी  और कथाकार संजय सहाय संभाल रहे हैं। श्री संजय के हाथों निसंदेह हंस का भविष्य सुरक्षित है। जब बात हंस की निकल ही गयी है तो यहां पर मैं बता दूं कि जिस हंस पत्रिका को हमलोग प्रेमचंद की पत्रिका हंस मानकर इसको पुर्नजीवित करने का जो श्रेय और गौरव राजेन्द्र यादव एंड पार्टी आज तक देते रहे है, वह केवल एक पक्ष है,  सच कुछ और है। 2005-06  के दौरान मैं अमर उजाला अखबार में दिल्ली का मुख्य संवाददाता था। संयोग से अमर उजाला और हंस पत्रिका का दफ्तर एकदम पास में ही था। इस दौरान यादव जी से मेरी ठीकठाक दोस्ती हो गयी थी। वे हमेशा मुझसे कहते तुम अपनी कहानी दो मैं अगले ही अंक में छापता हूं, जिसे मैं अक्सर यह कहकर टाल देता कि आपको लड़कियों और महिला लेखको के उद्धार से मौका मिले तब ना।
 हां तो मैं हंस पत्रिका के बारे में बता दूं कि हंस का नाम प्रेमचंद के परिजनों से लेने की बजाय राजेन्द्र यादव जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज की वार्षिक पत्रिका हंस के नाम को साभार किया था। यह मेरे लिए बड़ी खबर थी लिहाजा मेरा पत्रकार मन इसको न्यूज बनाने के लिए आतुर हो उठा और राजेन्द्र यादव की सहमति के बाद अमर उजाला के सभी एडिशन में यह खबर छपी कि प्रेमचंद का नहीं हंसराज कॉलेज की पत्रिका है राजेन्द्र यादव का हंस  इस खबर को लेकर बड़ी चर्चा भी रही तो वहीं मैने यादव जी की कॉफी के साथ करीब एक घंटे तक खूब मस्ती की।
यादव जी से मेरा कोई प्यार भरा नाता नहीं था कई बार मैने जमकर आलोचना भी कि मगर हर बार खिलखिला कर हर बात को मस्ती में उड़ा देने की आदत मेरे को हमेशा अचंभित करती थी। जब हंस के 25 साल पूरे हे तो मैने अपना सिर यादव जी के चरणों पर रख दिया और निवेदन किया कि मेरी अब तक की गलतियों  नादानियों को माफ कर देंगे आपने एक पत्रिका को 25 साल तक निकाल कर तमाम पूंजीपतियों को शर्मसार कर दिया।  आपने तो यादव जी एक इतिहास ही रच डाला है। मेरी बात सुनकर वे खुश हुए और गले से लगाते हुए कहा कि चलो तुम खुश हुए तो मोगैंबों भी खुश हुआ।. यह सुनते ही आस पास के लोग ठठाकर हंसने लगे।  
मगर यहां पर संबोधन के संपादक श्री कमर मेवाड़ी जी तो अपने मित्र राजेन्द्र यादव से भी चार कदम आगे निकले। दिल्ली मे रहते हुए जाने अनजाने में हंस दफ्तर एक मठ बन गया था, जहां पर अपनी कहानियों के प्रकाशन के लिए बेताब लेखक लेखिकाओं की फौज यादव के इर्दगिर्द रहती थी। वे इस ग्लैमर को जानते मानते और पहचानते हुए भी अपनाते थे। लिटरेचर ग्लैमर के बीच भी यादव जी ने इतनी आजादी दे रखी थी कि कोई भी आकर सीधे अपनी बात (चाहे कैसी भी हो ) रख और कर सकता था।
 अजीब संयोग है कि मैं अपनी बात संबोधन पर केंद्रित करने के बाद भी हमेशा भटक सा ही जा रहा हूं। पत्रिका की अन्य अंकों तो देखने का सुयोग मुझे नहीं मिला है मगर एक ही अंक में जिस नियोजित तरीके से प्रेम कहानियों का चयन किया है और उसमें एक ही साथ तीन तीन पीढ़ियो के लेखको को एक ही साथ एक ही कवर में देखना ही इस अंक की सबसे बड़ी खासियत बन जाती है।  किसी भी आदमी के जीवन के 50 साल का बहुत महत्व होता है। लगभग 70 प्रतिशत जीवन गुजारने के बाद ही उम्र के 50 वे बसंत का सुयोग हासिल होता है। इस दौरान बाल्यावस्था, किशोरावस्था, यौवनकाल के उपरांत आदमी 45 बसंत के बाद ढलान पर आ जाता है। पच्चास को तो अधेडावस्था कहना ही होगा। इस दौरान एक आदमी को रोजाना नाना प्रकार की दिक्कतों संकटो विपतियों संघर्षो उपलब्धियों से लेकर अपने मंसूबों को पूरा करता है। ठीक संबोधन भी आज अपनी तमाम हसरतो के साथ 50 वें बंसत पर इतरा रहा होगा।
संबोधन के यौवन को देखकर वाकई बहुतों के दिल में छूरी भी चल गयी हो तो हैरानी नहीं क्योंकि इसको मंजिल से भी आगे ले जाने वाले मेवाड़ी जी का नाम आज भी बिना ग्लैमर के अनजान सा ही है। अपनो को फोकस करने की बजाय संबोधन को ही लगातार सर्वोच्च प्राथमिकता देना और अपने साथ जुड़े लोगों की टोली को कांकरटोली में एक साथ रखना भी  हैरान करता है। लगता है कि कांकरटोली नाम के साथ ही इसको यह वरदान भी हासिल है कि जमाना भले ही कितना  आगे क्यों ना चला जाए, लोग भले ही अपने आप को भूल जाए,संयुक्त परिवार के टूटन का असर भले ही आदमी और आदमी तथा रिश्तों को केवल घर और बिस्तर तक ही समेट दे। लोग खून के रंग को भूलने की दुहाई देने लगे मगर कांकरटोली से प्रकाशित संबोधन परिवार की टोली सदैव एकसूत्र में ही बंधी और जुड़ी रहेगी ।  
 यह संबोधन पत्रिका  अब किसी एक कमर मेवाडी जी की अपनी पत्रिका नहीं  रह गयी है। इसे अब पूरे शहर की पत्रिकाकी तरह देखा जाना ही सही होगा।  जिसे टीवी पर अपनी दुकान के विज्ञापन की तरह कांकरटोली राजसमंद के हर घर की यह अपनी पत्रिका की तरह मान्य और स्वीकार्य होने की जरूरत है। पूरे शहर को अब सोचना होगा कि संबोधन  बगैर कमर मेवाड़ी जी के संरक्षण के बाद भी किस तरह और कैसे चलेगी ?  मेवाड़ी जी तो एक योद्धा की तरह मैदान फतह कर ली है। उन्होने अपनी पारी खेल दी है।  मगर अब संबोधन के मार्फत इस कांकरटोली राजसमंद शहर के लोगों को संबोधन की मान प्रतिष्ठा रखनी होगी। बात दूर तलक जाएगी कि तरह ही संबोधन को संबोधित मेरा पत्र भी काफी लंबा हो गया है। खुद को विराम देते हुए मैं चचा गालिब के कुछ शेर के साथ श्री कमर मेवाडी को सलाम करना पसंद करूंगा। .
बकौल गालिब
मुहब्बत में नहीं है फर्क , जीने और मरने का ।   
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले।।
जरा कर जोर सीने पर कि तीरे-पुर-सितम निकले।
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले ।।.
हजारों ख्वाहिशे ऐसी, कि हर ख्वाहिश पे दम निकले ।
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले ।।


अनामी शरण बबल
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