मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

भाटगिरी युग में पत्रकारिता / हम पत्रकार हैं या भाट





नोट-- लेख तो बहुत ही बढ़िया हैं पर ...  पत्रकार बेचारे की क्या गलती है?  जनता असली भाट दलाल को तो पहचानती ही नही।   असली दलाल भाट या चम्पू तो दफ्तर में बैठे कुर्सीछाप पत्रकार हैं जो लगातार फोनियादेश  दे रहे है कि इस तरह करो उस तरह करो। अब भाट युग में तो रोजाना सड़क पर धूल चाटने वाला पत्रकार बेचारा क्या जाने दफ्तर और मालिकों की भाटगिरी मगर ...............................

 
(जेएनयू में देशद्रोह को लेकर सियासतदानों की तरह पत्रकार भी दो पालों में बंट गये हैं। दोनों बता रहे हैं कि हमारी कमीज तुम्हारी कमीज से सफेद है जबकि हकीकत यह है कि पत्रकारिता तो बची ही नहीं है। भाटगीरी हो रही है, उस पर भी इतना गुमान !)

हम पत्रकार हैं या भाट !
बिद्याशंकर तिवारी 

जेएनयू में देशद्रोह को लेकर मचे कोहराम में सियासतदानों की तरह मीडिया भी दो पालों में बंट गई है, एक पाले में राष्ट्रभक्त हैं तो दूसरे में धर्मनिरेपक्षता के झंडाबरदार। जो दोनों में से किसी पाले में नहीं हैं तो समझिये कि वे फिर पत्रकार नहीं हैं ! अपने जमाने के ठसक वाले और बेबाक पत्रकार रहे खुशवंत सिंह से जुड़ा एक वाकया याद आ रहा है जिसे उन्होंने खुद लिखा था कि एक बार वो कहीं उड़नखटोले से जा रहे थे, उसी में रामनाथ गोयनका मिल गये, सरदार जी ने सोचा कि पुराने मालिक हैं दुआ-सलाम तो कर ही लेना चाहिए। सो वह उनके पास पहुंच गये। नमस्कार किया। इस उम्मीद से कि वह भी ताइद करेंगे लेकिन गोयनका साहब तो गोयनका ठहरे, भला अपना अंदाज कैसे छोड़ते सो बोले, कहिए भांट जी! खुशवंत सिंह चूंकि इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर रह चुके थे इसलिए गोयनका साहब की आदतों से अच्छी तरह वाकिफ थे, उसी अंदाज में उन्होंने उसे स्वीकार किया, दोनों के बीच कुछ बातें हुर्इं और चलते बने। चाहते तो खुशवंत सिंह इस निजी बातचीत को सार्वजनिक नहीं भी कर सकते थे लेकिन वो ऐसी शख्सियत थे कि बिना लिखे उनके पेट का पानी नहीं पचता, मूड में आया लिख दिया। अब वो अपने बीच नहीं हैं, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे, साथ में उनकी लेखनी को सहस्त्र सलाम भी। लेकिन मौजूदा दौर की पत्रकारिता पर गोयनका जी के हवाले से वह हकीकत बयां कर गये। जमीनी हकीकत यही है कि हम सब भांट है, कोई किसी के लिए भांटगीरी कर रहा है और कोई किसी के लिए। दरअसल 1991 के बाद आये बाजारवाद के दौर ने पूरी दुनिया को एक बाजार में तब्दील कर दिया है जिसमें हर चीज यहां तक कि दीन, ईमान, भगवान का नाम सब बिकाऊ है और पत्रकारिता भी। पत्रकारों की औकात कंटेट प्रोवाइडर से ज्यादा कुछ भी नहीं है। वर्तमान में देश में लगभग एक लाख समाचार पत्र-पत्रिकाएं छप रही हैं और आठ सौ चैनल हैं। इनमें से कुछ अपवादों को छोड़कर शायद ही कोई बड़ा मीडिया घराना होगा जिसका मीडिया के अलावा दूसरा व्यवसायिक हित न हो। यदि वो समाचार पत्र या चैनल घाटे में चला रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि इसके पीछे उनका अपना मकसद है और उसी मकसद के मुखौटा हैं पत्रकार। जेएनयू में देशद्रोह की घटना को लेकर मचे सियासी कोहराम और उसके बाद खबरिया चैनलों पर चल रही गला फाड़ प्रतियोगिता को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रवीश ने अपने खास कार्यक्रम ‘ये अंधेरा ही आज के टीवी की तस्वीर’ में गला फाड़ने वाले पत्रकारों अर्णव गोस्वामी, दीपक चौरसिया, संदीप चौधरी व रोहित सरदाना सरीखे एंकरों की खूब खबर ली। ईमानदारी यह बरती कि उसमें खुद को भी शामिल किया। रवीश जन सरोकार की पत्रकारिता करते हैं इसलिए उन्होंने भरसक ईमानदारी बरतने की कोशिश की, उनको खूब दाद भी मिल रही है लेकिन माफ कीजिएगा रवीश जी आपने भी अर्ध सत्य ही दिखाया। क्या आज के दौर में आप और मुझ समेत कोई भी पत्रकार दिल पर हाथ रखकर कह सकता है कि जब वह लिखता है या बोलता है तो वह निरपेक्ष होता है। क्या आप अपने कार्यक्रमों में सवाल पूछते हैं तो उसमें आपका और आपके चैनल का दृष्टिकोण शामिल नहीं होता है। यदि भगवाधारियों के पाले में खड़े चैनलों और उनके एंकरों ने कन्हैया को देशद्रोही साबित करने की जल्दीबाजी की तो क्या आपने टुडे ग्रुप और एबीपी के हवाले से अपने अंदाज में उसे क्लीन चिट देने की हड़बड़ी नहीं दिखाई। गौर फरमाइये, क्या कश्मीर और जेएनयू की परिस्थितियों की तुलना की जा सकती है । यदि घाटी में देश विरोधी नारे लगते हैं तो उसकी इजाजत जेएनयू में भी दी जानी चाहिए। क्या देशद्रोह का अपराध इसलिए कम हो जाता है कि भाजपा कश्मीर में पीडीपी और पंजाब में अकालियों के साथ सत्ता का स्वाद चख रही है। जेएनयू प्रकरण को लेकर इतना हाय तौबा मचा हुआ है और हरियाणा आरक्षण की आग में जल रहा है। यह सबको पता है कि जिस चीज की मांग की जा रही है वह नाजायज है, सुप्रीम कोर्ट उसे नकार चुका है लेकिन इस नाजायज मांग को लेकर मार्च नहीं निकलते, एंकर उस अंदाज में गले का रियाज नहीं करते दिखे। बात सिर्फ ओबीसी में जाटों को आरक्षण देने की ही नहीं है, दूसरी श्रेणियों में भी जो आरक्षण मिले हुए हैं उसका लाभ वही लोग ले रहे हैं जो इसके अधिकारी नहीं हैं किन्तु जब उसकी समीक्षा की मांग उठती है तब जन सरोकार की पत्रकारिता नहीं दिखती। घूरहू राम आज भी गांव में घूर पर गोबर ही फेंक रहे हंै, यह बात अलग है कि उनके हाथ में भी मोबाइल आ गया है, आरक्षण क्या है, यह उन्हें नहीं मालूम है। मालूम भी कैसे हो उसके हक की मलाई तो पासवान और पुनियों का खानदान चाट रहा है। वो भला कब चाहेंगे कि घूरहू भी अपना हक मांगे। सियासतदानों की तो मजबूरी है। चुनाव जीतना है, सरकार बनानी है इसलिए लोगों को गुमराह करके रखना है लेकिन ऐसे मुद्दों पर तो किसी ने गला नहीं फाड़ा, किसी को जिम्मेदारी याद नहीं आई। जिम्मेदारी तब याद आएगी जब इस पर सियासत शुरू होगी और सियासतदान अलग-अलग पालों में खड़े होंगे। तब हम पत्रकार भी प्रबंधन के हित के मुताबिक पालों में खड़े हो जाएंगे और गलाफाड़ प्रतियोगिता शुरू हो जाएगी कि हमारी कमीज तुम्हारी कमीज से झकास है। यह बात दीगर है कि अपनी तो कोई कमीज है ही नहीं, जो प्रबंधतंत्र पहनाता है उसे पहनना पड़ता है लेकिन चूंकि पत्रकार हैं इसलिए इस दंभ को नहीं छोड़ सकते कि हमारी कमीज तुम्हारी कमीज से सफेद है!

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