शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

एक 'महानायक' कि गाथा

 

 

  

मृतक" -- एक 'महानायक' कि गाथा - जिसे 'ज़िन्दा मृतक' बनने पर मजबूर होना पड़ा..... भाग- 1

"अपने महामहिम को बता दो.... मैंने सारा जीवन राजनीति मे बिताया है... मुझे किसी के सलाह की जरूरत नहीं है।" 
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 दुभाषिये 'एडम वान ट्राट' से उन्होने सख्ती से कहा कि "ये अनुवाद हिटलर को सुना दे...",,,, जो उनके और हिटलर के बीच दुभाषिए का काम कर रहा था। एडम हक्का-बक्का रह गया कि हिटलर के सामने बैठ कर कोई उनसे इस लहजे मे भी बात कर सकता है।
ये बात उस सुझाव का जवाब था जो हिटलर ने उनको दिया था ;- " भारत के स्वाधीनता संघर्ष के लिए ये उपयुक्त समय नहीं है।" 
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ये महमानव कोई और बल्कि भारतीय इतिहास के सबसे बड़े महानायक सुभाष चन्द्र बोस थे। वरना और किसकी माँ ने सवा सेर सोंठ खायी थी जो उस वक़्त के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर से इस लहजे मे बात कर सके । 
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एक महानायक,,,जिनको कुछ लोगो के छुद्र स्वार्थो के चलते "मृतक"  बनना पड़ा..... नेताजी,,की 18 अगस्त 1945 मे विमान दुर्घटना मे हुयी मृत्यु गलत साबित हो चुकी थी। ब्रिटेन ही नहीं अमेरिका तक उनको अपना दुश्मन नंबर एक समझता था....और इसी दुश्मनी का फायदा उठाया एक नंबर के मौकापरस्त कथित महान "चच्चा जवाहर लाल नेहरू" ने.... "नेताजी को युद्ध अपराधी घोषित करके ।  "        
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युद्ध अपराधी :-

नेताजी युद्ध अपराधी  है या नहीं 1997 तक इस बारे मे भारत सरकार ने प्रामाणिक तौर पर कभी बयान नहीं दिया....
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1) मुथुरामलिंगम थेवर { जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी कि पाँच सदस्यीय युद्ध समिति के सदस्य थे,} ने इस बारे मे सबसे पहले सरकार से 1950 मे रस्साकसी शुरू की। उनके पूछने पर शाहनवाज़ खां ने (जो की नेताजी के रहस्य को सुलझाने वाली बनी पहली शाहनवाज़ कमेटी के अधक्ष्य थे,,,,) बताया कि "भारत सरकार के पास इस बारे मे कोई जानकारी नहीं है।"
जब उनसे कहा गया कि ये ''नेताजी'' जैसे रुतबे कि शख्सियत का मामला है तो उन्होने कहा -''यह जानकारी इंग्लैंड और अमेरिका के पास है।''
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2) 1945 मे भारत के वायसराय 'वेवल' का नेताजी के प्रति रवैया बेहतर नहीं था। उसके सचिव 'वेतकिंस'के अनुसार "बोस बड़े युद्ध अपराधियों मे से एक थे....उन्होने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कार्य किये। बोस जैसे 'राजद्रोही' के लिए बेहतर यह होगा कि उनपर भारत से बाहर ही युद्ध अपराधी का मुकदमा चलाया जाय और दंडित किया जाय।"
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3) 1960 मे भी युद्ध अपराधी का मामला तूल पकड़ता रहा... तत्कालीन संसद 'सुरेन्द्र घोस' से मिली जानकारी के मुताबिक -" मित्र राष्ट्रों ने,भारत सरकार कि राय पर आपसी सहमति से नेताजी का नाम युद्ध अपराधी से निकाल दिया है...पर यह उनको मृत मानकर किया गया है....अगर नेताजी कभी प्रकट होते हैं तो उनको बहुरूपिया मानते हुये विश्वासघाती माना जाएगा।''
इन बातों का निष्कर्ष आप खुद निकाल सकते हैं,,,घोस,,नेहरू के एजेंट थे जो नेताजी के बारे मे मालूमात करते फिरते थे कि ओ कहाँ हैं...??
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4) 1997 मे एयर वाइस मार्शल सुरेनजी गोयल ने संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान को पत्र लिखकर मांग की ... कि युद्ध अपराधियों की सूची से नेताजी का नाम हटा दें..... जवाब मे अन्नान की तरफ से जवाब दिया रंगीले चच्चा के पक्के चेले चार बीवियों के पति शशि थरूर ने--" अन्नान को अतीत मे की गयी किसी भी कार्यवाही को आज निरस्त करने का हक़ नहीं है,,"
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5) ओस्लो निवासी प्रवासी भारतीय अर्थशास्त्री अम्लेंद्रु गुहा ने ब्रिटिश पीएम टोनी ब्लेयर को इस बारे मे पत्र लिखा.... बदले मे जो जवाब आया को सनसनीखेज ही नहीं बल्कि भारत की पूर्ण स्वतन्त्रता के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े करने वाला था....
"वह सत्ता हस्तांतरण के दस्तावेज़ देखें,,,उसमे ब्रिटिश भारत की सरकार ने ,,जो कानून की दृष्टि से भारत सरकार के समतुल्य ही है,,बोस को युद्ध अपराधी दर्शाया है॥"
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जबकि 1950 मे थेवर ने जब नेहरू के साथ यह मामला उठाया था,,, तब नेहरू का जवाब था कि "मुझे नेताजी के बारे मे ऐसे किसी गुप्त करार कि जानकारी नहीं है।"
जब उससे कहा गया कि -"भारत सरकार के लिए यह आवश्यक है कि ओ पता लगाए...कि मित्र राष्ट्रों कि युद्ध अपराधियों कि सूची मे नेताजी का नाम है या नहीं....और....अगर नहीं है तो कब और कैसे हटाया गया।"
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इस पर रंगीले रतन नेहरू का तल्खी भरा जवाब था :-भारत सरकार ...इंग्लैंड,,अमेरिका या किसी भी अन्य दूसरे देश के साथ इस बारे मे कोई मामला नहीं उठाएगी..."
क्यो नेहरू के प्रतिनिधित्व वाली भारत सरकार इस मामले को उजागर नहीं होने देना चाहती थी....क्यो...??
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इसका क्या कारण था ये तो आपको आगे पता चल ही जायेगा.... ऐसे मतलबी और मौकापरस्त थे इस देश के प्रथम परधान मनतरी चच्चा नेहरू....   
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जबकि इसके उलट कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ब्रिटिश राज के उपरोक्त विचार को ख़ारिज़ करते हुये कहा कि:- "नेताजी को युद्ध अपराधी कौन कह सकता है...??कोई देशद्रोही ही इस महान देशभक्त के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग कर सकता है। भारतवासी और भारत सरकार,,जो जनता कि ही सरकार है,,सपने मे भी नेताजी को युद्ध अपराधी नहीं मान सकती।"
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माननीय न्यायालय कि ये टिप्पणी क्या ज़ाहिर करती है....???? इसको अब अलग से लिखने कि अवयस्कता नहीं है.....
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अब गौर करने की बात ये है कि नेताजी जीवित होने के बाद भी जनता के सामने क्या इसिलिये नहीं आए कि उनको ''युद्ध अपराधी ''के तौर पर सज़ा-ए-मौत का डर था ....

नहीं मित्रों ....कदापि नहीं....  
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उन्हे अपने बारे मे कोई डर नहीं था...
एक वाकया रंगून 18 अक्तूबर 1944 का है ,,जब आसमान से गोलियों की बौछारे हो रही थी,,शत्रु के विमान ने मिंगलादेन परेड मैदान पर हमला कर दिया था....जहाँ नेताजी एक मंच पर खड़े थे...कई अफसरों ने उन से अनुरोध किया कि दौड़ कर सुरक्षित स्थान पर चलें जायें।
लेकिन वे अपने स्थान पर अडिग खड़े रहे और कुछ समय बाद निर्णय भाव से धीरे -धीरे नीचे उतरे। तब उन्होने जो कहाँ ओ रोंगटे खड़े करने के साथ ही गर्वोमुक्त भी कर देता है....
उन्होने कहा कि:- " अगर मुझे मरना है तो इस स्थिति मे ही मरना पसंद करूंगा,,,बजाय इसके कि जान बचा कर भागते हुये मरूँ.....।   
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अब तक मिली जनकारियों से मैं पुख्ता तौर पर कह सकता हु की "मृतक" 1945 के बाद जीवित थे,,,काफी बाद तक जीवित थे....साथ ही साथ देश-विदेश की बहुत सी घटनाओ मे अदृश्य रूप से उनकी उपस्थिती के सबूत भी मिले हैं.....
# "मृतक" ने माओ-त्से-तुंग की लाल सेना मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी,,लाल सेना के चीनी पुनुरुत्थान के समय एक "जनरल शिवा .....या....जनरल डेड".. कि बहुत चर्चा हुयी थी,,,दलाई लामा का भारत आकर शरण लेना उनकी इच्छा और सहयोग का ही नतीजा था....
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# "मृतक" ने वियतनाम - अमेरिका युद्ध के शुरुवाती दौर मे ही दावा किया था कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत चाहे हज़ार साल लड़े पर वे उत्तर वियतनाम को कभी जीत नहीं सकते।वियतनाम मे आज भी ऐसे दस्तावेज़ मौजूद हैं,जो उस युद्ध मे "मृतक" कि भूमिका....या कहिए मुख्य भूमिका साबित करती हैं...
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# मई 1970 मे क्वालांलपुर के एक दैनिक मे खबर छपी थी कि :-"वियतनाम की सेना मे पिछले महायुद्ध मे गायब हो चुके जनरल भी देखे गये हैं,,ये जनरल "एशियन लिबरेशन आर्मी" का नेतृत्व कर रहे थे।
"एशियन लिबरेशन आर्मी" वही आर्मी थी जिसका गठन नेताजी और धुरी राष्ट्रों (खास तौर से जापान ) ने मिलकर किया था और जिसको जापान,जर्मनी,चीनी गणतन्त्र सहित आठ देशों ने मान्यता दी थी और जिसके महानायक थे "नेताजी सुभाष चन्द्र बोस" जिनहे जापानी अक्सर प्यार से ''चन्द्रा बोस'' कहते थे....
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# "मृतक" ने अपने अनुयायियों को 1965 मे ही पूर्वी भारत-पाक सीमा पर उचित तौर पर तैयार रहने को कह दिया था और गंभीर हलचल की चेतावनी दे थी,,आप लोगो को याद होगा 1971 मे ही भारत के हस्तक्षेप से पूर्वी पाकिस्तान से बांगलादेश का उदय हुआ था....
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लम्बे हो चुके इस लेख को हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम के 2001 मे लिखे एक रिपोर्ट से समाप्त करना चाहूँगा....जिसने जी-जान लगा कर"मृतक" को पहचानने का काम किया और दुनिया के सामने रखा..... :- 
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" तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालते हुये हमे कंककंपी आ रही है। हम इस नतीजे से भयभीत नहीं हैं कि 'मृतक' नेताजी थे....बल्कि हम उस व्यक्ति (मृतक) द्वारा छोड़े गये आलेखों व पत्रों से निकलने वाले नतीजे से स्तब्ध हैं....अगर उनको यथावत मान लिया जाय तो वह भारतीय इतिहास को बदलने की सामर्थ्य रखते हैं।"   
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गुमनामी की मौत मरे इस अमर "मृतक" को हार्दिक भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ....
कुछ ही समय बाद मिलेंगे "मृतक" की और भी बहुत सी सनसनी खेज़ बातों के इतिहास के साथ.... जो बहुत बड़े बदलाव का इंतज़ार कर रहा है....
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जय हिन्द - जय नेताजी - वन्दे मातरम...
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सादर आभार है उन सबका जहां से ये जनकरियाँ प्राप्त हुयी....
1) मृत्यु से वापसी - श्री अनुज धर...
2) महानायक - श्री विश्वास पाटिल...
3) भारत-गांधी के बाद - श्री रामचंद्रा गुहा...
4) भारतीय राजनीति के दो आख्यान-
5) Netaji- Dead or Alive- श्री समर गुहा..

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