बुधवार, 8 जुलाई 2015

जन सरोकारों को समझने की विधा है जन सम्‍पर्क






जयश्री एन. जेठवानी और नरेन्‍द्र नाथ सरकार।

प्रस्तुति- निम्मी नर्गिस, हूमरा असद

By News Writers, July 7, 2015

अब जब हम एक नयी सदी में प्रवेश कर गये हैं प्रबंधन के क्षेत्र में सबसे ज्‍यादा मांग रखने वाले विषयों में से एक जन-संपर्क का भी दायरा बढ़ा है। भारत में नब्‍बे का दशक जन-संपर्क से जुड़े लोगों के लिए काफी लाभकारी रहा है। जन-संपर्क को अब सिर्फ सजावट की वस्‍तु नहीं माना जाता बल्कि वह कुल मिलाकर रणनीतिक प्रबंधन का अविभाज्‍य अंग बन गया है। जन-संपर्क को भले ही नये नामों जैसे कॉरपोरेट कम्‍यूनिकेशन, पब्लिक अफेयर्स, कॉरपोरेट अफेयर्स आदि से जाने जाना लगा हो लेकिन उसका मूल तत्‍व वही है। जोय सी गॉर्डेन अपने विश्‍लेषणात्‍मक लेखों में से एक में लिखते है कि विशेषज्ञ जन-संपर्क को इसे जन-संपर्क से जुड़े लोगों द्वारा किए जाने वाले कार्यों, उनकी दृष्टि में जन-संपर्क का जो प्रभाव होना चाहिए और जन-संपर्क का उत्‍तरदायित्‍वपूर्ण किस तरह पालन किया जाना चाहिए के दायरे में रखकर देखते हैं।

बास्किन, एओनॉल्‍फ और लट्टीमोर जन-संपर्क को कुछ इस तरह परिभाषित करते हैं ”प्रबंधन कार्य जो संगठनात्‍मक उददेश्‍यों, तारतम्‍य दर्शन स्‍पष्‍ट करने और संगठनात्‍मक परिवर्तन में सहायक हैं। जन-संपर्क से जुड़े लोग सभी संबंधित आंतरिक और बाह्यजनों से संबंधों के विकास और संगठनात्‍मक लक्ष्‍यों व सामाजिक आशाओं के मध्‍य तारतम्‍य स्‍थापित करते हेतु संवाद का सहारा लेते हैं। जन-संपर्क वाले ऐसे संगठनात्‍मक कार्यक्रमों का विकास, अनुपालन और मूल्‍यांकन सुनिश्चित करते हैं जिनसे संगठन के अवयवों और जनों के मध्‍य प्रभाव के आदान-प्रदान और समझ बढ़ाने में सहायता मिलती है।”

बिट्रिश इंस्‍टीट्यूट ऑफ पब्लिक रिलेशंस जन-संपर्क को इस तरह परिभाषित करता है ”संगठन और उसके विभिन्‍न जनों के मध्‍य आपसी समझ स्‍थापित करने और बनाये रखने के लिए योजनाबद्ध तरीके से निरंतर किया जाने वाला प्रयास”
क्रेबल और विबर्ट जन-संपर्क को इस तरह परिभाषित करते हैं ”विभिन्‍न चरणों वाला संवाद प्रबंधन का कार्य जिसमें किसी संगठन और उसके वातावरण के किसी भी पहलू के मध्‍य संबंधों पर शोध, विश्‍लेषण, प्रभाव और पुनर्मूल्‍यांकन शामिल है।

डा0 रेक्‍स एफ0 हार्लो जन-संपर्कविद और इस पेशे में लंबा समय बिताने वाले एवं फाउंडेशन ऑफ पीआर रिसर्च एंड एजूकेशन से जुड़े रहे, ने ढेरों जन-संपर्क की परिभाषायें एकत्रित की और 80 प्रमुख पेशेवरों के साथ बातचीत के बाद यह परिभाषा दी है- ”जन-संपर्क प्रबंधन की एक ऐसी विशिष्‍ट शाखा है जो किसी संगठन और उसके जनों के बीच संवाद, समझ, स्‍वीकार्यता और सहयोग के तार स्‍थापित करने और उन्‍हें बनाये रखने में सहायक है, इसमें समस्‍याओं और मुद्दों का प्रबंधन भी शामिल है, प्रबंधन को भावी परिवर्तनों और उनके प्रभावी उपयोग के लिए तैयार करता है, आ रहे बदलावों का अनुमान लगाने में सहायक है और शोध सही नैतिक संवाद तकनीकें इसके प्रमुख उपकरणों में से है।

ग्रुनिंग और हंट के अनुसार ”जन-संपर्क एक ऐसा प्रबंधन कार्य है जिसमें लोगों के व्‍यवहार का मूल्‍यांकन, किसी व्‍यक्ति या जनहित वाले संगठन की नीतियों और प्रक्रियाओं की पहचान की जाती है एवं लोगों की समझ और स्‍वीकार्यता प्राप्‍त करने के लिए कार्यक्रम की योजना बनाना और उसका क्रियान्‍वयन शामिल है।”

हारवुड आई चाइल्‍ड ने 1930 में जो लिखा था उसकी प्रासंगिकता आज भी है। चाइल्‍ड ने तर्क दिया था जन-संपर्क का तत्‍व किसी विचार की प्रस्‍तुति या मानसिक व्‍यवहार बदलने की कला या सदभावपूर्ण और लाभ के संबंध बनाना नहीं है बल्कि जनहित में अपने व्‍यक्तिगत कारपोरेट व्‍यवहार के पहलुओं जिनकी सामाजिक महत्‍ता है से सामंजस्‍य बैठाना है। अब जमीन पर वापस लौटते हैं और यह जानने की कोशिश करते है जन-संपर्क का उद्देश्‍य क्‍या है और हमें उसकी आवश्‍यकता क्‍यों है। जन-संपर्क का लक्ष्‍य है।

1. लोगों के नकारात्‍मक विचारों में बदलाव लाना या उन्‍हें तटस्‍थ बनाना। 2. अविकसित विचारों को ठोस रूप प्रदान करना। 3. लोगों के सकारात्‍मक विचार।

जन-संपर्क का निरंतर प्रयास रहता है :
1. आरंभ
2. बढ़त लेना 3. परिवर्तन
4. गति पकड़ना

इसका उद्देश्‍य किसी विचार, मत या गतिविधि का आरंभ करना होता है जो पहले से विद्यमान न हो, यह किसी गतिविधि या बहस में बढ़त लेने में सहायक है, इसका उद्देश्‍य नकारात्‍मक वातावरण को परिवर्तित करना और जब चीजें धीमी हो जाए उन्‍हें गति प्रदान करना है।

कई विशेषज्ञों के अनुसार लोगों का मत जन-संपर्क के बैरोमीटर की तरह कार्य करता है। लोगों का मत एक ऐसे मनोवैज्ञानिक वातावरण का निर्माण करता है जिसमें संगठन बनते या बिगड़ते हैं। व्‍यवसाय की जटिलताओं, लोगों के मध्‍य बढ़ती विभिन्‍नताओं और उपभोक्‍ताओं की बढ़ती आशाओं को देखते हुए, जन-संपर्क को न केवल संगठन की सकारात्‍मक छवि का निर्माण करना होता है, बल्कि इसका भी कि संगठन किसलिए अस्तित्‍व में है।

1989 में जब वी. पी. सिंह की सरकार सत्‍ता में थी, भारत मां के महान सपूत महात्‍मा गांधी के 120वें जन्‍मदिन के उपलक्ष्‍य में इंडिया गेट से एक छतरी को हटाकर उनकी मूर्ति लगाने का निर्णय किया गया। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि गांधी, जिनकी ब्रिटिश राज को हटाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका थी की मूर्ति ब्रिटिशों द्वारा निर्मित छतरी के नीचे नहीं लगाई जा सकती है। एक प्रसिद्ध मूर्तिकार को मूर्ति का आकार देने का काम सौंपा गया। जैसे-जैसे मूर्ति स्‍थापना का समय निकट आया प्रसिद्ध चित्रकार और शिल्‍पी सतीश गुजराल छतरी को हटाए जाने का विरोध करने वालों में पहले थे। टाइम्‍स ऑव इंडिया में प्रकाशित एक लेख में उन्‍होंने प्रशासन द्वारा छतरी हटाये जाने के तर्क पर ही प्रश्‍न खड़ा कर दिया। गुजराल ने प्रश्‍न किया अगर छतरी ब्रिटिश राज की याद दिलाती है तो ऐसे कई भवन है, जिसमें संसद और राष्‍ट्रपति भवन भी शामिल हैं। क्‍या हम ऐतिहासिक इमारतों को ढहाने की बात सोच सकते हैं। उन्‍होंने तर्क दिया छतरी लुटियन की पूरी डिजाइन और योजना का हिस्‍सा है और उसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ पूरे क्षेत्र के रूप को प्रभावित करेगी। उसके बाद प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई। विभिन्‍न समाचार पत्रों में कई सारे लेख प्रकाशित हुए। यह मुद्दा राष्‍ट्रीय बहस का विषय बन गया। इस विचार के दो पक्ष थे, एक छतरी के हटाने का समर्थन और दूसरा विरोध। महात्‍मा गांधी का सम्‍मान किया जाना चाहिए, इस पर कोई मतभेद नहीं था। छतरी के पक्षधर लोगों का कहना था मूर्ति को छतरी के नीचे या फिर अन्‍य किसी उपयुक्‍त स्‍थान पर स्‍थापित किया जाना चाहिए। जन प्रतिक्रिया ने गति पकड़ी और मूर्ति स्‍थापित न‍हीं की जा सकी। वह आज भी उपयुक्‍त स्‍थान की बाट जोह रही है।

यह उदाहरण लोगों के मत के महत्‍व को दर्शाता है। एक व्‍यक्ति के संकल्‍प ने उसे किस तरह राष्‍ट्रीय बहस का विषय बना दिया। हालांकि उसकी शुरूआत एक अकेले ने की थी लेकिन समान सोच वाले लोग उसके पक्ष में खड़े हो गए। सरकार भी अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह सकी बल्कि लोगों के मत के सामने झुकने को विवश हुई। जन-संपर्क से जुड़े पेशेवर लोग जनमत की जटिलताओं को समझने और न केवल उस पर निगाह रखते हैं बल्कि उसी के अनुसार नीतियों और कार्यक्रमों का क्रियान्‍वयन और उनमें परिवर्तन करते हैं।

नब्‍बे का दशक जैसा कि पहले कहा जा चुका है, देश में जन-संपर्क के लिए लाभकारी रहा है। जन-संपर्क को सिर्फ मीडिया संभालने से जोड़कर नहीं देखा जाता है। उसकी भूमिका को विषयों के प्रबंधन, जनमत सर्वेक्षण, उत्‍पादों को बाजार में उतारने और आयोजनों के प्रबंधन में भी स्‍वीकार किया जाता है।

जब जन-संपर्क को व्‍यवहार में लेने की बात आती है ऐसे कौन से प्रमुख क्षेत्र है जिन पर जन-संपर्क से जुड़े लोगों का जोर प्रमुख होना चाहिए?

1. उनके लिए संस्‍थान के केन्‍द्रीय मूल्‍यों और प्रतियोगितात्‍मकता को समझना आवश्‍यक है – प्रत्‍येक संस्‍थान की कुछ प्रतियोगितात्‍मकताएं होती हैं, जो उसके लिए विशिष्‍ट हो सकती है। वह उत्‍पादन प्रक्रिया, उत्‍पादन का तरीका, असेम्‍बली लाइन विशेषज्ञता, मानव संसाधन आदि में से कुछ भी हो, जन-संपर्क के पेशे से जुड़े किसी भी व्‍यक्त्‍िा के लिए समझना और सूचना का सही प्रयोग करना आवश्‍यक है। इसी तरह प्रत्‍येक संस्‍थान के कुछ केन्‍द्रीय मूल्‍य होते हैं जिनका वह प्रतिनिधित्‍व करता है। अगर जन-संपर्क वाले को इनकी सही समझ हो तो वह कॉरपोरेशन पर हार्ड और सॉफ्ट स्‍टोरी लिखने के काम आती है। कुछ वर्ष पूर्व बिरला समूह के बारे में एक रोचक कहानी छपी।

एक राष्‍ट्रीय समाचार पत्र में उसके परिवार के कुछ केन्‍द्रीय मूल्‍यों का उल्‍लेख था। कहानी में यह कहा गया था बिरला आमतौर पर दूसरों से अलग हैं। परिवार के बारे में कहा जाता था, उसने होटल और शराब व्‍यवसाय में कदम न रखने का निर्णय किया है। इसके पीछे तर्क यह था जब वह स्‍वयं शराब का सेवन नहीं करते हैं, तो उन्‍हें शराब उत्‍पादन या परोसने का काम क्‍यों करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है जो उनके यहां कार्यरत हैं, उन्‍हे भी उन पारिवारिक मूल्‍यों का पालन करना होगा।

2. विभिन्‍न भागीदारों/जनों की पहचान करना आवश्‍यक- जन आंतरिक और बाह्य दोनों ही होंगे। उसे अंदर मुख्‍यत: निम्‍न आएंगे: कर्मचारी, उनके परिवार, यूनियन नेता, आंतरिक और बाह्य समर्थक, वित्‍तीय संस्‍थान, स्‍थानीय और ओवरसीज बैंक, स्‍टॉक एक्‍सचेंज, एजेंट, थोक विक्रेता, खुदरा व्‍यापारी, उपभोक्‍ता, स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय सरकारें, स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय प्रशासन, विशेष रूचिवाले समूह जिनमें कई लॉबियां और पेशेवर समूह, मीडिया क्षेत्रीय और मुख्‍यधारा की और अंततोगत्‍वा समुदाय। जन-संपर्क पेशेवरों के लिए विभिन्‍न जनों की संवाद आवश्‍यकताओं को समझना आवश्‍यक है। संवाद दोतरफा प्रक्रिया है। हालांकि भेजने और प्राप्‍त करने वाले दोनों की संवाद संबंधी कुछ आवश्‍यकताएं और दायित्‍व होते हैं। किसी कॉरपोरेट की संवाद संबंधी पहली आवश्‍यकता संबंधित समूहों तक अपनी गतिविधियों के बारे में सूचना पहुंचाना और संस्‍थान की सकारात्‍मक छवि बनाना है। दूसरा यह कि प्रत्‍येक संबंधित समूह की संस्‍थान से जुड़ी कुछ विशिष्‍ट संवाद आवयकताएं हो सकती है। इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है, कर्मचारियों की संवाद आवश्‍यकता अपने कल्‍याण के इर्द-गिर्द घूमती है। जैसे कोई ऊपर की तरफ बढ़ता है उनमें ज्ञान व कौशल अर्जित करने और अपनी बात सुने जाने की इच्‍छा जन्‍म लेती है। दूसरी तरफ थोक विक्रेताओं और खुदरा व्‍यापारियों की संवाद आवश्‍यकताएं अलग होती है। उनकी रूचि स्‍वयं को मिलने वाले कमीशन और अन्‍य लाभों के बारे में जानने की होती है। विशेष रूचि वाले समूह जनहित के विषयों पर नजर रखना चाहेंगे। संक्षेप में, प्रत्‍येक समूह की अपनी संवाद आवश्‍यकताएं और दायित्‍व होते हैं।

सूचना को शक्ति माना जाता है और यह कहा जाता है सूचना पर नियंत्रण रखने वाले राष्‍ट्रों के भाग्‍य का निर्धारण करते हैं। सूचना निश्‍चय ही शक्ति है लेकिन जब उसका नियंत्रण नहीं वितरण किया जाता है। जन-संपर्क जो सूचना के पूरे क्रम का महत्‍वपूर्ण भाग है को इसके वितरण पर ध्‍यान देना चाहिए। सूचना तकनीक के इस युग में सूचनाओं को दबाये रखना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

3. वातावरण पर निगाह रखना और संस्‍थान को नये परिवर्तनों से अवगत कराना:- संस्‍थान समाज का ही हिस्‍सा होता है। समाज में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में होने वाली हलचलों का संस्‍थान पर सीधा असर होता है। यह स्‍वाभाविक है जन-संपर्क से जुड़े लोग संस्‍थान के आंख और कान की भूमिका निभाता है और बाहरी दुनिया की गतिविधियों पर निगाह रखते हैं। मीडिया ऐसी गतिविधियों के बारे में जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं।

4. विभिन्‍न जनों तक कम लागत में पहुंचने के लिए सही मीडिया की पहचान करना – मार्शल मैकलुहान ने कहा है माध्‍यम ही संदेश है। आधा रास्‍ता सही मीडिया की पहचान से ही पूरा हो जाता है हालांकि बुद्धिमता अपने लक्षित समूह में से अधिकतम लोगों तक कम से कम लागत में पहुंचने के लिए सर्वोतम मीडिया की पहचान में है। मीडिया के बारे में अधिक चर्चा हम अध्‍याय छह त्रिकोण: संदेश, माध्‍यम और श्रोता में करेंगे।

5. संस्‍थान के लिए अलग कॉरपोरेट पहचान बनाना – जिस तरह दो लोग एक जैसे नहीं हो सकते उसी तरह दो संस्‍थान भी नहीं। जिस तरह लोग अलग दिखने का प्रयास करते हैं उसी तरह संस्‍थान भी। वैज्ञानिक भले ही क्‍लोनिंग की बात कर रहे हों लेकिन अपना प्रतिरूप होने का विचार ही बहुत लोगों को अटपटा लग सकता है जो सृजन को किसी अदृश्‍य शक्ति का कार्य मानते हैं। कॉरपोरेट को अपनी अलग छवि बनाने के लिए काफी धन और संसाधन व्‍यय करने पड़ते हैं। जन-संपर्क का प्रमुख काम संस्‍थान की कॉरपोरेट छवि बनाना और उसकी रक्षा करना है।

जन-संपर्क के संदर्भ में लोग ‘प्रभावी जन-संपर्क’ की बात करते हैं। जन-संपर्क से जुड़े लोग ऐसे तत्‍वों की बात करते थे जिन्‍हें मापा नहीं जा सकता। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। जन-संपर्क के प्रभाव का आकंलन बड़े और छोटे दोनों ही स्‍तरों पर विभिन्‍न जन-संपर्क कार्यक्रमों के लिए निर्धारित उददेश्‍यों के जरिए किया जाता है। हम जन-संपर्क से क्‍या आशा करते हैं? या इसे कुछ ऐसे भी कह सकते हैं जन-संपर्क की सतह क्‍या है? इसमें यह सभी आ जाता है:

1. सूचना का वितरण
2. विभिन्‍न साझीदारों का विश्‍वास जीतना
3. बेहतर उत्‍पादकता और अधिक लाभ को लक्ष्‍य बनाना
4. संबंधों में खुलापन और विश्‍वसनीयता हासिल करना प्रभावी जन-संपर्क कैसे किया जा सकता है?

अभ्‍यास
संस्‍थान के केन्‍द्रीय मूल्‍यों को समझने के लिए शीर्ष प्रबंधन प्रबंधकों के विभिन्‍न वर्गों और कर्मियों के साथ बैठे। यह पता लगायें, लोग संस्‍थान के बारे में क्‍या सोचते हैं और उनकी निगाह में संस्‍थान की छवि कैसी है। उनके विचारों को भलीभांति समझकर ‘मिशन स्‍टेटमेंट’ का रूप दिया जा सकता है। संक्षेप में अपने संस्‍थान के लिए एक दूरदृष्टि वाला कार्य करें।

जन-संपर्क के काम में लगे व्‍यक्ति को इससे संस्‍थान के चारों ओर एक आभामंडल के निर्माण और हार्ड व सॉफ्ट स्‍टोरी करने में सहायता मिलती है। यह अभ्‍यास अलग-अलग तरह के मीडिया के लिए उसे संस्‍थान के बारे में नई दृष्टि देता है, जिसका शायद पहले अभाव रहा हो।

सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वातावरण पर निगाह रखें। मुददों के बारे में जाने, वातावरण को समझे, जिससे संस्‍थान के लिए उपयोगी सूचनायें अलग की जा सके। ऐसी सूचना को फिर विभिन्‍न स्‍तरों पर निर्णय और क्रियान्‍वयन के लिए उपयोग में लिया जा सकता है।

अपने संस्‍थान की दृश्‍य और अदृश्‍य विशेषताओं, अवसरों और खतरों का विश्‍लेषण कर उसके लिए एक अलग व्‍यक्तित्‍व और कॉरपोरेट छवि का निर्माण करने में सहायता करें।

संवाद का ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें विचारों का स्‍वतंत्र आदान-प्रदान संभव हो सके। प्रभावी संवाद के मापदंड हैं : संदेश की पहुंच, संदेश का अर्थ निकालना, संदेश की विश्‍वसनीयता, जिसके इच्छित परिणाम हों।

व्‍यवसाय के बारे में अक्‍सर ऐसा कहा जाता है, कहानी जिसे बुरी तरह कहा गया हो। ऐसा तब होता है जब मुद्दे विभिन्‍न कोणों से अलग होते हैं। हम इनके बारे में अध्‍याय छह त्रिकोण-संदेश, माध्‍यम और श्रोता में विस्‍तार से चर्चा करेंगे।

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