शुक्रवार, 22 मई 2015

आखिर है क्या नेट न्यूट्रेलिटी..






- बालेन्दु शर्मा दाधीच

प्रस्तुति-   रिद्धि सिन्हा नुपूर, पटना 


दूरसंचार ऑपरेटर एयरटेल ने हाल ही में घोषणा की कि वह अपनी नए ‘‘एयरटेल जीरो‘‘ योजना के तहत उपभोक्ताओं को यह सुविधा देने जा रही है कि वे कुछ खास एप्लीकेशनों का इस्तेमाल डेटा प्लान लिए बिना भी अपने स्मार्टफोन पर कर सकेंगे. यानी मुफ्त के इंटरनेट कनेक्शन पर ऐसे एप्लीकेशनों का प्रयोग करना. यूजर के लिए फायदे का सौदा. लेकिन इस योजना का बाजार में खूब विरोध हो रहा है, यह कहते हुए कि यह नेट तटस्थता के सिद्धांत के खिलाफ है. आपको याद होगा कि हाल ही में अमेरिका में नेट तटस्थता या नेट न्यूट्रैलिटी को लागू करने के लिए कदम उठाए गए हैं. इसका अर्थ यह है कि दूरसंचार ऑपरेटर या इंटरनेट सर्विस प्रदाता किसी भी कंपनी, वेबसाइट, वेब सेवा, एप्लीकेशन आदि के पक्ष में कदम नहीं उठा सकते. जैसे किसी वेबसाइट को एक्सेस करने की रफ्तार बढ़ा दी जाए या फिर किसी एप्लीकेशन को बिना इंटरनेट प्लान के भी एक्सेस करने दिया जाए.
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वजह यह कि यह दूसरी वेबसाइटों या एप्लीकेशनों के साथ अन्याय है, भले ही इससे मोबाइल यूजर को निजी लाभ मिल रहा हो. यह समान आधार पर प्रतिद्वंद्विता के सिद्धांत के भी खिलाफ है.
दूसरी तरफ यह उन कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है जिन्होंने एयरटेल जीरो प्लान में हिस्सेदारी की है. मिसाल के तौर पर इसमें शामिल होने वाली फ्लिपकार्ट के लिए यह नए ग्राहकों तक पहुंचने और मार्केटिंग का जरिया है. इसके लिए वह एयरटेल को शुल्क अदा करेगी तो क्या फर्क पड़ता है. आजकल आईटी और दूरसंचार कंपनियों में अपने बाजार को विस्तार देने की होड़ मची हुई है.
फेसबुक भी इसीलिए इंटरनेट.ऑर्ग नामक योजना पर काम कर रही है जिसके तहत लोगों को मुफ्त इंटरनेट कनेक्टिविटी मुहैया कराई जानी है. गूगल भी किसी न किसी रूप में ऐसा कर रहा है.
एयरटेल जैसी दूरसंचार कंपनियों के लिए यह दोहरा फायदे का सौदा है क्योंकि एक तरफ जहां उन्हें कंपनियों से रकम मिल रही है वहीं वे अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी इस योजना का प्रयोग कर सकेंगी. आखिर कम पैसे में ज्यादा सुविधा कौन-सा ग्राहक नहीं चाहता. बहरहाल, फिलहाल नेट न्यूट्रैलिटी की बहस का अंजाम पर पहुंचना बाकी है.

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