रविवार, 10 मई 2015

मीडिया मीमांसा // प्रेस का प्रेस्टीट्यूट हो जाना / मुकेश कुमार








साहित्यिक पत्रिका पाखी के नए अंक में 
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार का मीडिया कॉलम 
// मीडिया मीमांसा //


प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर



ये ज़रूरी है कि सबसे पहले उस शब्द के मायने स्पष्ट कर दिए जाएं जो इस लेख में इस्तेमाल होने वाला है, ताकि उसे दूसरे संदर्भों में देखे जाने का कोई ख़तरा न रहे। प्रेस्टीट्यूट शब्द Press और Prostitutes से मिलकर बना है। ज़ाहिर है इस पर Prostitutes शब्द का प्रभाव अधिक है। प्रेस्टीट्यूट शब्द के जनक अमेरिकी ट्रेंड फोरकास्टर जेराल्ड सीलेंट ने इसे अमेरिका द्वारा इराक़ पर हमले के समय गढ़ा था। उन्होंने इसका इस्तेमाल ऐसे पत्रकारों और टीवी चैनलों की बहसों में हिस्सा लेने वाले लोगों के लिए किया था जो सरकार या कार्पोरेट के पक्ष में पहले से ही तय आधारों पर रिपोर्टिंग करते हैं या अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। पश्चिम में ही Corporate whore (कार्पोरेट रंडी) तथा kept (रखैल) शब्द भी इसके लिए खूब प्रचलित है। इसे कृपया लिंग के आधार पर न देखें, क्योंकि इसका अर्थ सिर्फ़ देह व्यापार से नहीं है। ये बताना इसलिए ज़रूरी है कि इसे तुरंत सेक्स वर्कर के अपमान से जोड़कर देखा जा सकता है। वैसे वेश्या पुरूष और स्त्री दोनों होते हैं। आप चाहें तो इसे दुष्चरित्रता या चरित्रहीनता से भी जोड़कर देख सकते हैं।
न्यूज़ ट्रेडर, बाज़ारू, दलाल, बिकाऊ, पेड मीडिया और अब प्रेस्टीट्यूट। मुख्यधारा के मीडिया के लिए इससे बुरा वक़्त कभी नहीं था और ये भी साफ़ दिखलाई दे रहा है कि शायद आने वाले दिन उसके लिए और भी बुरे रहने वाले हैं। बाज़ार की लंपट पूँजी के सहवास ने उसके चरित्र को इस क़दर कलंकित कर दिया है कि अब हर कोई उसे राह में पड़ी कुतिया की तरह लात जमाकर चल देता है और वह बिलबलाता रह जाता है। केंद्रीय मंत्री जनरल वी. के. सिंह ने जब यही किया तो पूरा मीडिया अपनी तमाम आक्रामकता के बावजूद कुल मिलाकर बचाव की ही मुद्रा में रहा। जनरल के दुर्वचन (उनका ट्वीट था- दोस्तों, आप प्रेस्टीट्यूट्स से क्या उम्मीद कर सकते हैं) किसी भी तरह न तो शालीन थे, न ही मर्यादित। एक झटके में लोकतंत्र के चौथे खंभे कहे जाने वाले सर्वशक्तिमान मीडिया को प्रेस्टीट्यूट यानी वेश्या कह देना मामूली अपराध नहीं था। एक मंत्री होने के नाते तो बिल्कुल भी नहीं। कोई और समय होता तो जनरल को लेने के देने पड़ गए होते, उन्हें मंत्रिमंडल से हटना पड़ जाता। लेकिन वह ताल ठोंकते हुए खड़े रहे। उन्हें उनके सरपरस्त प्रधानमंत्री ने भी कुछ नहीं कहा, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो बिल्कुल भी नहीं। मुख्यधारा के मीडिया से कहीं अधिक स्वतंत्र माना जाने वाला सोशल मीडिया तो उनके साथ खड़ा भी दिखाई दिया। राजनीतिक दलों ने भी इस मामले में ज़्यादा उग्र तेवर नहीं दिखलाए। मीडिया संगठनों ने ज़रूर उनके ट्वीटर के ज़रिए दी गई इस गाली पर एतराज़ जताया और इसे अवाँछित करार दिया, लेकिन उसका कोई असर हुआ हो ऐसा दिखलाई नहीं पड़ा। पत्रकार बिरादरी ने ही उसे बहुत महत्व नहीं दिया। वज़ह साफ़ थी। साख गिरने की वजह से मीडिया द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले बचाव के अस्त्र बेकार हो गए हैं, भोथरे पड़ गए हैं।
अगर जनरल का कामेंट अपवादस्वरूप आया होता तो इसे अनदेखा-अनसुना किया जा सकता था। लेकिन सचाई ये है कि इस तरह के हमले मीडिया पर लगातार किए जा रहे हैं और इनका कोई अंत नहीं दिखता। इसके विपरीत जब हम पश्चिम में मीडिया की स्थिति को देखते हैं तो समझ में आता है कि ये तो शुरूआत भर है। पश्चिम का अनुकरण करने वाला भारतीय मीडिया उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है जहाँ प्रेस्टीट्यूट जैसे शब्द गढ़े जाते हैं। पीत पत्रकारिता जैसे कलंकित पद मीडिया के वर्तमान चरित्र को बयान करने में जब अक्षम साबित गए तब करीब दो दशक पहले जेराल्ड सीलेंट ने प्रेस्टीट्यूट शब्द गढा। उन्होंने देखा था कि किस तरह मुख्यधारा का मीडिया तमाम नैतिकताओं तथा आचरण संहिता को ताख पर रखकर सत्ता एवं कॉरपोरेट जगत के पक्ष में निर्लज्जता के साथ खड़ा हो गया है। ये इराक पर अमेरिकी हमले का समय था। पूरा मीडिया अमेरिकी हुकूमत के चरणों में लोट रहा था। तमाम पत्रकार बुश प्रशासन द्वारा परोसी जा रही ख़बरों को जस का तस परोस रहे थे। टीवी चैनलों की परिचर्चाओं में हिस्सा लेने वाले पत्रकारों और विशेषज्ञों का हाल भी वही था। उनका एकमात्र उद्देश्य बुश प्रशासन की हर ग़लत-सही कार्रवाई को उचित ठहराना। ये नज़ारा देखकर उन्हें लगा कि बहुत से पत्रकार प्रोस्टिट्यूट की तरह व्यवहार करने लगे हैं और तब उन्होंने उन्हें प्रेस्टीट्यूट का नाम दे दिया। उनका दिया ये शब्द खूब प्रचलित हुआ। ख़ास तौर पर स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों और उन मीडिया संगठनों में जो किसी कार्पोरेट का हिस्सा नहीं थे और पत्रकारिता के पेशे को जनहित में इस्तेमाल करते हैं। हाल में यूक्रेन में तख्ता पलट और उसके बाद छिड़े गृहयुद्ध की रिपोर्टिंग के समय भी अमेरिकी पत्रकारों का रवैया वाशिंगटनपरस्त रहा और उन्होंने दूसरे पक्षों को पूरी तरह से गायब कर दिया। ऐसे में प्रेस्टीट्यूट शब्द एक बार फिर ज़ोर-शोर से उछला। इसी तरह वे ईरान को शैतान के रूप में पेश करने तथा इस्रायल की आतंकवादी हरकतों को कम करके दिखाने का काम करते हैं। अमेरिकी प्रशासन की नाजायज़ हरकतों का भंडाफोड़ करने वाले जुलियन असांज के साथ भी वे इसी तरह से पेश आते रहे। कुल मिलाकर अमेरिकी मीडिया कतई स्वतंत्र नहीं है और उसके अधिकांश पत्रकार प्रेस्टीट्यूट की तरह काम करते हैं। वैसे भी अमेरिकी मीडिया की स्थिति और भी खराब हो गई है, क्योंकि मीडिया संस्थानों की संख्या तेज़ी से कम हुई है और कुछ बड़े कार्पोरेट घरानों का मीडिया इंडस्ट्री पर कब्ज़ा हो गया है, एक तरह से उनकी मोनोपली कायम हो गई है।
भारतीय मीडिया जगत में भी यही प्रवृत्तियाँ हावी हो चली हैं, इसलिए वहीं से आयातित शब्दावलियाँ भी यहाँ इस्तेमाल में लाई जाने लगी हैं। प्रेस्टीट्यूट का जुमला जनरल वी के सिंह ने नहीं गढ़ा है और न ही ये उन्होंने पहली बार इस्तेमाल किया है। दो साल पहले जब इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता ने सेना के कथित दिल्ली अभियान की सनसनीखेज़ ख़बर छापी थी, तो उस समय भी जनरल ने उनके लिए प्रेस्टीट्यूट शब्द का उपयोग किया था। उनके जन्मतिथि से जुड़े विवाद पर इंडियन एक्सप्रेस की तेज़तर्रार रिपोर्टिंग पर भी वे इस शब्द को लगातार उच्चारते रहे, क्योंकि विरोधी मीडिया को ग़ाली देने का उनका ये अपना तरीका था। इस बार उनका निशाना अर्नब गोस्वामी थे। अर्नब ने पाकिस्तान दिवस पर जनरल सिंह के अशोभनीय व्यवहार और ट्वीट्स पर जिस तरह का अभियान चलाया था, उससे वे तिलमिलाए हुए थे और उसका जवाब उन्होंने उस समय दिया जब यमन से भारतीयों के निकालने के उनके अभियान को सराहा जा रहा था। उनके प्रति लोगों में हमदर्दी पैदा हो गई और उनकी प्रतिक्रिया को समर्थन मिल गया। इन दो बड़े मौक़ों के अलावा पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनकी वजह से मीडिया को इसी तरह की ग़ाली-गलौज़ का शिकार होना पड़ा। याद कीजिए राडिया काँड को जब लोग पत्रकारों से ये पूछने लगे थे कि आप राडिया से हैं या मीडिया से। इसी तरह से जब नवीन जिंदल ने ज़ी समूह के दो संपादकों का रिवर्स स्टिंग किया था तब भी मीडिया की इसी तरह छवि जनता में बनी थी।
वैसे मुख्यधारा के मीडिया के कंटेंट का विश्लेषण करके कोई भी बता सकता है कि उसका एजेंडा क्या है और उसे कौन सेट कर रहा है। ये सर्वविदित है कि मीडिया के एजेंडे में अवाम नहीं, सरकार तथा बड़े औद्योगिक एवं व्यापारिक घराने हैं। वह उन्हीं की सेवा में रत है। उन्हीं के हितों की बात करता है, उन्हें ही खुदा बनाने में लगा रहता है। अगर शेखर गुप्ता का इंडियन एक्सप्रेस कार्पोरेट का मुखपत्र था तो अर्नब गोस्वामी अंध राष्ट्रवाद का उन्माद पैदा करने अपनी विशेषज्ञता दिखाते रहते हैं। इंडिया टीवी, ज़ी टीवी और इंडिया न्यूज़ खुले आम पूरी निर्लज्जता के साथ मोदी, उनकी सरकार और उनके परिवार की हिमायत, वकालत करते रहते हैं। एकाध को छोड़ दें तो बाक़ी के चैनल भी यही काम करते हैं बस थोड़ा सा परदा रखते हैं। प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया का आलम इससे कुछ अलग नहीं है। ऐसे में मीडिया कैसे उम्मीद कर सकता है कि उसे सम्मान से देखा जाए, उस पर प्रहार न किए जाएं या कम से कम वेश्या तो न कहा जाए।
जर्गेन हैबरमास ने लोकतंत्र में मीडिया को पब्लिक स्फीयर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना था। उससे उम्मीद की थी कि वह जनता का प्रवक्ता होने की अपनी ज़िम्मेदारी को समझेगा और जागरूक विपक्ष की भूमिका निभाएगा। लेकिन ये एक छलावा साबित हो रहा है। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था में इस अपेक्षा को पूरा करना उसके लिए संभव ही नहीं था। इसीलिए वह कभी भी शक़ के दायरे से बाहर नहीं रहा। फिर भी लंबे समय तक उसे पवित्र गाय की तरह देखा जाता रहा और अपेक्षा की जाती रही कि सब लोग उसका सम्मान करेंगे और बदले में वह सबकी आवाज़ बनेगा। लेकिन ये हुआ नहीं। नवउदारवाद के दौर में वह पूरी तरह से सत्ता प्रतिष्ठान की गोद में जा बैठा। इसलिए कई लोग उसे बड़े कार्पोरेट घरानों की चेरी और रखैल तक कह रहे हैं। प्रेस्टीट्यूट शब्द का बनना और उसका खुलकर इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति का बढ़ता जाना बताता है कि मीडिया की साख कितनी गिर गई है और वह कितना अविश्सनीय हो गया है। जैसे-जैसे नवउदारवादी प्रवृत्तियाँ और बढ़ेंगी उसका पतन भी बढ़ता जाएगा। ऐसे में इसकी कल्पना करना असंभव नहीं है कि मुख्यधारा का मीडिया लुगदी साहित्य से भी नीचे गिरते हुए पीली किताबों में तब्दील हो जाएगा।
हालाँकि इन हालात में मीडिया का पक्ष लेना बड़ा जोखिम लेना है, लेकिन जब पूरा तंत्र फासीवाद की गिरफ़्त में चला गया हो तो एक छोटी सी आस उसी से बच रहती है। लगता है कि उसमें जो कुछ भी अच्छा है उसे बचाया जाना चाहिए, अन्यथा अन्याय-अत्याचार से लड़ना बेहद मुश्किल हो जाएगा। इसलिए लाज़िमी है कि वी. के. सिंह या मार्कंडेय काटजू जैसे लोगों से मीडिया को बचाया जाए और ऐसा करते समय ये ध्यान रहे कि मीडिया के कारोबारियों के हाथ मज़बूत न हों। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हमेशा की तरह अपने धंधे और गंदी नीयत की ढाल न बना लें। ज़ाहिर है इन दो परस्पर विरोधाभासों को साधना बहुत ही टेढ़ी खीर है। फिर ये सवाल भी उठता है कि क्या सदिच्छा से ही कुछ बचाया जा सकता है और अगर बच सकता तो ये नौबत क्यों आती? वह इस कदर गिरने के पहले सँभल न जाता।

1 टिप्पणी:

  1. सर ज्ञान के संवर्धन के लिए आभार। बेहद संवेदनशील मुद्दे पर रचना अच्छी लगी।

    उत्तर देंहटाएं