रविवार, 8 मार्च 2015

अभिव्यक्ति को नई धार देता सोशल मीडिया



कृष्ण कुमार यादव


 
 

आज का दौर सोशल मीडिया का है। हर आयु-वर्ग के लोगों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स का ेज दिनों-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। आज सोशल नेटवर्किंग दुनिया भर में इंटरनेट पर होने वाली नंबर वन गतिविधि है, इससे पहले यह स्थान पोर्नोग्राफी को हासिल था। सोशल नेटवर्किंग साइट्स संचार व सूचना का सशक्त का जरिया हैं, जिनके माध्यम से लोग अपनी बात बिना किसी रोक-टोक के रख पाते हैं। यह बात देश और दुनिया के हर कोने तक पहुँच जाती है। आप खुद के विचार रखने के साथ-साथ दूसरों की बातों पर खुलकर अपनी राय भी व्यक्त कर पाते हैं। एक परिभाषा के अनुसार, ''सोशल मीडिया को परस्पर संवाद का वेब आधारित एक ऐसा अत्यधिक गतिशील मंच कहा जा सकता है जिसके माध्यम से लोग संवाद करते है,ं आपसी जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उपयोगकर्ता जनित सामग्री को सामग्री सृजन की सहयोगात्मक प्रयिा के एक अंश के रूप में संशोधित करते हैं।''
दुनिया के भिन्न-भिन्न देशों में लोग अपनी सुविधा व परिवेश के अनुसार इन सोशल साइट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। नब्बे के दशक में पहली बार सोशल मीडिया की चर्चा हुई जब 1994 में सबसे पहला सोशल मीडिया जीओसाइट् के रूप में लोगों के सामने आया। इसका उद्देश्य एक ऐसी वेबसाइट बनाना था जिसके माध्यम से लोग अपने विचार और बातचीत आपस में साझा कर सके। आंरभिक दौर में इसे मात्र 6 शहरों में इस्तेमाल हेतु बनाया गया था पर आज यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो चुका है। आज फेसबुक, टि्वटर, गूगल प्लस, लिंक्डइन, माय स्पेस, पिंटररेस्ट आरकुट, जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स दुनिया को एक सूत्र में बांध रही हैं। आंकड़ों में बात करें तो फेसबुक पर एक अरब, ट्वीटर पर 20 करोड़, गूगल प्लस पर 17.5 करोड़, लिंक्डइन पर 15 करोड़ एवं पिंटररेस्ट पर 11 करोड़ से यादा प्रयोक्ता सयि हैं। सोशल साइट्स के प्रयोक्ताओं की दीवानगी इसी से समझी जा सकती है कि औसतन प्रतिमाह वे फेसबुक पर 405 मिनट, पिंटररेस्ट पर 89 मिनट, टि्वटर पर 21 मिनट, लिंक्डइन पर 17 मिनट व गूगल प्लस पर 3 मिनट व्यय करते है। भारत में फेसबुक व गूगल प्लस, ब्राजील में गूगल प्लस, फ्रांस में 'स्काई राक', द0 कोरिया में 'साय वर्ल्ड', चीन में 'क्यू क्यू' तो रूस में 'वेकोनेटाकटे' साइट्स लोकप्रिय है। अब तो भिन्न-भिन्न वर्ग के लोग भी अपने विचारों को साझा करने के लिए सोशल साइट्स इजाद करने लगे हैं। मसलन 'मक्सलिम' दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के बीच तो 'रिसर्चगेट' दुनिया भर के वैज्ञानिकों के बीच लोकप्रिय है। यही कारण है कि आज फेसबुक पर आम आदमी ही नहीं खास लोग भी सयि हैं। राजनीति, फिल्म जगत, साहित्य, कला, अर्थ, मीडिया, कारपोरेट जगत से लेकर सरकारी सेवाओं में पदस्थ एवं सैन्य अधिकारी भी फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ऐसे लोग जो अपने मन की बात कहने के लिये उचित मंच नहीं पाते, वे भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब लिख-पढ़ रहे हैं।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स में सबसे ज्यादा  फेसबुक का है। वर्तमान में इसके 100 करोड़ से भी यादा सदस्य हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 2.2 अरब लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं और इनमें से करीब आधे का फेसबुक पर प्रोफाइल है। वर्ष 2004 में अपनी स्थापना के बाद से ही इसने पता नहीं कितने बिछुडे हुए लोगों को फिर से मंच पर मिलने का अवसर प्रदान किया। एक छोटे से प्रयास के रूप में शुरू की गई यह वेबसाइट आज दुनिया की सिरमौर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट बन चुकी है। जनवरी, 2009 में किए गए इंटरनेट सर्वे के अनुसार यह दुनिया में सबसे यादा इस्तेमाल की जाने वाली सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट है। वेबसाइट का विश्लेषण करने वाली एलेक्सा डॉट काम ने इसको दुनिया की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण वेबसाइट करार दिया है।
फेसबुक का आरंभ एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि इसका भी एक इतिहास है। चार फरवरी, 2004 को अमेरिकी युवा कम्प्यूटर प्रोग्रामर मार्क जुकरबर्ग ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अपने तीन दोस्तों डस्टिन मोस्कोविट्ज, एडुवर्डो सवेरिन और सि हगेस के साथ मिलकर इस वेबसाइट की शुरूआत की थी। इस वेबसाइट की शुरूआत का मुख्य मकसद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों को एक-दूसरे से जोड़ना था। धीरे-धीरे इस मंच से यहाँ के दूसरे विश्वविद्यालयों के छात्र भी जुड़ते चले गये। इसकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता के कारण इसने देखते ही देखते वेबसाइट की दुनिया में नए कीर्तिमान स्थापित किए। आज फेसबुक पर आने वाले 70 फीसदी से यादा लोग अमरीका से बाहर के हैं। फेसबुक आज भले ही मात्र एक क्लिक पर आसानी से उपलब्ध हो, पर इस मुकाम तक आने में उसे तमाम अहम पड़ावों से भी गुजरना पड़ा। मार्क जुकरबर्ग ने सबसे पहले 2003 में 'फेसमाश' नाम से वेबसाइट शुरू की लेकिन हार्वर्ड प्रशासन ने हैकिंग के आरोप लगाकर उसको बंद कर दिया। इसके बाद फेसमाश को द फेसबुक डॉट काम के नाम से दोबारा लांच किया गया और बाद में फेसबुक नाम दिया गया। फेसबुक की बदौलत मार्क जुकरबर्ग रातोंरात इंटरनेट उद्यमी बन गए। 14 मई, 1984 को न्यूयॉर्क में जन्मे मार्क जुकरबर्ग वर्ष 2008 में दुनिया के सबसे कम उम्र के अरबपति बने। यही नहीं वर्ष 2010 में प्रसिध्द टाइम पत्रिका ने उनको 'पर्सन ऑफ द ईयर' चुना। वर्ष 2011 में उनकी संपति का आकलन 17.5 अरब डॉलर किया गया। इंटरनेट की दुनिया में इतिहास रचते हुए 2012 में फेसबुक ने पाँंच अरब डॉलर का आई0 पी0 ओ0 लांच किया, जो कि सोशल मीडिया के क्षेत्र में फेसबुक का एक ांतिकारी कदम था। अपने नौ साल के सफर में फेसबुक ने तमाम अहम् पड़ाव पार किए हैं। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में फेसबुक 'वर्चुअल कन्ट्री' का रूप ले चुका है। चीन और भारत को छोड़ दें तो फेसबुक प्रयोक्ताओं की संख्या किस भी देश की जनसंख्या से यादा है। आज फेसबुक दुनिया का तीसरा बड़ा देश बन चुका है। दुनिया भर में हर सात में से एक व्यक्ति फेसबुक से जुड़ा हुआ है। हर व्यक्ति अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति, यिा-प्रतियिा और अपने बारे में लोगों को रूबरू कराने हेतु इस साइट पर आता है। आज फेसबुक तमाम ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराता है, जो इसके प्रति लोगों की अभिरुचि बढ़ाने में सहायक है। फेसबुक ने जिस तरह से लोगों को फोटो और वीडियो अपलोड करने की सुविधा दी है, उससे भी लोगाें की दिलचस्पी इसमें रचनात्मकता के स्तर पर काफी हुई है। वर्ष 2005 में फेसबुक में पिक्चर अपलोड करने की सुविधा प्रदान की गई। अब तक 219 अरब फोटो अपलोड किये जा चुके हैं। औसतन हर माह 9 अरब फोटो फेसबुक पर लोड किए जाते हैं। सिंतबर 2006 में फेसबुक ने विस्तार करते हुए 13 साल वर्ष से यादा उम्र से ऊपर आयु के लोगों को इससे जुड़ने की अनुमति प्रदान की। फरवरी, 2009 में फेसबुक लाइक शुरू किया गया। इस वक्त लाइक्स की संख्या 1.13 ट्रिलियन से भी यादा है। सितंबर 2011 में फेसबुक पर प्रयोक्तों के लिए टाइमलाइन की सुविधा आरंभ कर इसे और भी आकर्षक व रोचक बनाया गया। जनवरी 2012 से टाइमलाइन सुविधा को सभी के लिए अनिवार्य कर दिया गया।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। कभी कम्प्यूटर से घबराने वाले और उसको देखकर नाक-भौं सिकोड़ने वाले उम्रदराज भी आज सोशल साइट्स पर सयि नजर आते हैं। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में शहरी क्षेत्र में सोशल मीडिया के प्रयोक्ताओं की संख्या दिसम्बर 2012 तक 6.2 करोड़ से यादा थी। स्पष्ट है कि भारत के शहरी इलाकों में 74 प्रतिशत अर्थात् प्रत्येक चार में से तीन व्यक्ति सोशल मीडिया का किसी न किसी रूप में प्रयोग करते हैं। इसी रिपोर्ट में भारत के 35 प्रमुख शहरों के आंकड़ाें के आधार पर यह भी बताया गया कि 1.82 करोड़ सयि मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ता या 77 प्रतिशत उपयोगकर्ता (कुल 2.36 करोड़ में से) सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। इससे यादा इस्तेमाल सिर्फ ई-मेल (83 प्रतिशत) का होता है। कुल 72 प्रतिशत सयि इंटरनेट बेस के प्रयोक्ताओं में से 82 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया से जुड़े हुये हैं। वस्तुत: सोशल मीडिया तक पहुँच कायम करने में मोबाइल का बहुत बड़ा योगदान है और इसमें भी युवाओं की भूमिका प्रमुख है। गौरतलब है कि भारत में 25 साल से अधिक आयु की आबादी 50 प्रतिशत  और 35 साल से कम आयु की 65 प्रतिशत है। ऐसे में आंकड़े बताते है कि भारत में सोशल मीडिया पर प्रतिदिन करीब 30 मिनट समय लोगों द्वारा व्यतीत किया जाता है। इनमें अधिकतम कालेज जाने वाले विद्यार्थी (82 प्रतिशत) और युवा (84 प्रतिशत) पीढ़ी के लोग शामिल हैं।  सोशल साइट्स ने स्कूली दिनाें के साथियों से मिलवाया तो आज देश-दुनिया के कोने में रहने वाले मित्र भी एक-दूसरे को फेसबुक पर ढूँढ़ रहे हैं। वास्तविक जीवन में मुलाकातें भले ही न होती हों पर सोशल साइट्स पर हर किसी के हजारों मित्र है। इस आभासी दुनिया ने तो कइयों को विवाह के बंधन में भी बाँध दिया। आप वास्तविक जीवन में जिनसे मिलने की कल्पना भी नहीं कर पाते, वे फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स पर आपकी फ्रेंड लिस्ट में हो सकते हैं। फिल्म और किेट से जुड़े सितारे सोशल साइट्स पर लोगों के साथ जुड़ रहे हैं और उनसे अपनी बातें शेयर कर रहे है। परंपरागत मीडिया भी अब फेसबुक व टि्वटर जैसे माध्यमों पर न सिर्फ अपने पेज बनाकर उपस्थिति दर्ज करा रहा है, बल्कि विभिन्न मुददों पर लोगों द्वारा व्यक्त की गयी राय को इस्तेमाल भी कर रहा है। इलेक्ट्रानिक मीडिया तो अब विशेषज्ञों की राय के समांतर सोशल मीडिया के माध्यम से तुरंत आमजन की राय भी ले रहा है।
इस आभासी दुनिया के सहारे न सिर्फ मित्र बनाए जा रहे हैं, बल्कि उन्हें वोट बैंक से लेकर व्यवसाय में धनार्जन हेतु भी इस्तेमाल किया जा रहा है। वह दिन चले गये जब लोग एक दूसरे से विदा होते वक्त पता और फोन नम्बर लिया करते थे। अब तो लोग सोशल साइट्स के माध्यम से ही एक दूसरे से जुड़े हुये हैं और सोशल साइट्स के माध्यम से भी रिश्ते निभा रहे हैं। कारपोरेट कंपनियाँ अपने उत्पादों को बेचने हेतु इनका खूब इस्तेमाल कर रही हैं, आखिर ऐसी मुफ्त सेवा कहाँ मिलेगी ? फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स ने साहित्य को भी काफी समृध्द किया है। यहाँ नवोदित से लेकर स्थापित रचनाकारों का साहित्य देखा-पढ़ा जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं की पहुँच भले ही हजारों मात्र तक हो, पर यहाँ तो लाखों पाठक हैं। इनमें से कई पाठकों ने तो तमाम पत्र-पत्रिकाओं का नाम भी नहीं सुना होगा, पर सोशल साइट्स के माध्यम से वे भी इनसे रूबरू हो रहे हैं। अकादमिक बहसों का विस्तार अब फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स पर भी होने लगा है। नारी विमर्श, बाल विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, विकलांग विमर्श, सब कुछ तो यहाँ है। आप इन्हें शेयर कर सकते हैं, लाइक कर सकते हैं, कमेन्ट कर सकते हैं, वाद-प्रतिवाद कर सकते हैं और आवश्यकतानुसार नई बहसों को भी जन्म दे सकते हैं। विचारों की दुनिया में क्रांति  लाने वाला सोशल मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसकी न तो कोई सीमायें हैं, न कोई बंधन।                भारत सहित दुनिया के विभिन्न देशों में न सिर्फ वैयक्तिक स्तर पर बल्कि राजनैतिक दलों के साथ-साथ कई सामाजिक और गैरसरकारी संगठन भी अपने अभियानों को मजबूती देने के लिए सोशल मीडिया का बखूबी उपयोग कर रहे हैं। सोशल मीडिया सिर्फ अपना चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं है बल्कि इसने कई  पंक्तियों  व वैचारिक बहसों को भी रोचक मोड़ दिये हैं। जिन देशों में लोकतत्र का गला घोंटा जा रहा है वहाँ अपनी बात कहने के लिए लोगों ने सोशल मीडिया का लोकतंत्रीकरण भी किया है। हाल के वर्षों में अरब जगत में हुई
क्रांतियों में सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही। लोग इसके माध्यम से एक दूसरे से जुड़े रहे और क्रांति  का बिगुल बजाते रहे। इसके चलते राजसत्ताओं को यह पसंद नहीं आया। इसकी वजह से ईरान, चीन, बांग्लादेश, उबेकिस्तान, और सीरिया में इस पर प्रतिबंध भी लगाया गया। भारत में भी अन्ना आंदोलन को चरम तक ले जाने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत में भी समय-समय पर गूगल, टि्वटर, फेसबुक पर निगरानी की बात की जाती रही है। ऐसा नहीं है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स का विवादों से पाला नहीं पड़ा है। समय-समय पर यह चारों तरफ आलोचना का शिकार भी बना है। फेसबुक कईयों में एक नशा बनकर भी उभरा है। फेसबुक पर नित्य प्रोफाइल फोटो बदलना, दिन में कई बार स्टेट्स अपडेट करना, घंटों फेसबुक मित्रों के साथ चैटिंग करना जैसी आदतों ने युवा पीढ़ी को काफी हद तक प्रभावित किया है। घंटों तक फेसबुक पर चिपके रहने से न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है बल्कि कुछ नया करने की रचनात्मकता भी खत्म हो रही है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से तमाम अश्लील सामग्री और भड़काऊ बातें भी लोगाें तक प्रसारित की जा रही है, जो कि लोगों के मनोमस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स  ने लोगों को वास्तविक जीवन की बजाय आभासी जीवन में रहने को मजबूर कर दिया है। यह एक ऐसा खेल बन चुका है, जहाँ एक दूसरे के साथ लाइक और शेयर के साथ सुख-दुख और सपने बांँटे जाते हैं और अगले ही क्षण रिश्तों को ब्लाक भी कर दिया जाता है। इसी प्रकार फेसबुक ने अपनी नीति में घोषित किया हुआ है कि 13 साल से ऊपर के लोग ही इस वेबसाइट से जुड़ सकते हैं, लेकिन मई 2012 में किए गए एक इंटरनेट सर्वे में 13 साल से कम आयु के 75 लाख बच्चे इससे जुड़े पाए गए। दुर्भाग्यवश, कई बार ये बच्चे फेसबुक पर साइबर बुलिंग का भी शिकार हो जाते है। सोशल नेटवर्किंग को दुनिया में बढ़ रहे तलाक के मामलों में भी कसूरवार ठहराया गया है। सर्वे हर पाँच में से एक तलाक के लिए फेसबुक को जिम्मेदार बताते हैं। कार्यालय समय में फेसबुक के यादा इस्तेमाल के चलते तमाम संस्थानों ने अपने यहाँ इसे बैन कर रखा है। भारत में एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर कंपनियाँ आफिस के अंदर सोशल साइट्स के इस्तेमाल को अच्छे रूप में नहीं लेती हैं।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स आज एक स्टे्टस सिम्बल का प्रतीक बन चुका है, जिनकी अच्छाईयाँ हैं और बुराईयांँ भी। यह आप पर निर्भर करता है कि आप सोशल मीडिया से क्या अपेक्षा रखते हैं ? सोशल मीडिया आपको सोशल भी बना सकता है और एकाकी भी। सोशल मीडिया पर आप अपने पुराने मित्रों के साथ तरोताजा हो सकते है तो अनजाने लोगों के साथ धोखा भी खा सकते हैं। सोशल मीडिया पर आप दुनिया को अपनी अच्छाईयों व रचनात्मकता से रूबरू करा सकते हैं तो दूसरों की बुराईयों को सीख भी सकते हैं। कोई भी माध्यम अच्छा या बुरा नहीं होता बल्कि इसका प्रयोग करने वाले उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं और यही बात सोशल मीडिया पर भी लागू होती है। सूचना-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ सैम पित्रोदा के अनुसार, सूचना के आदान-प्रदान, जनमत तैयार करने, विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों के लोगों को आपस में जोड़ने, भागीदार बनाने और सबसे महत्वपूर्ण यह कि नये ढंग से संपर्क करने में सोशल मीडिया एक सशक्त और बेजोड़ उपकरण के रूप में तेजी से उभर रहा है। यदि सरकारें सर्वोत्कृष्ट ढंग से लाभ उठाना सीख लें तो सोशल मीडिया उनके लिए अत्यंत प्रभावकारी नीति उपकरण बन सकता है। स्पष्ट है कि सोशल मीडिया सिर्फ चेहरा दिखाने का माध्यम नहीं बल्कि लोगों को जोड़ने, यादों को सहेजने संवाद के माध्यम से प्रतिसंवाद, उनमें चेतना फैलाने व विमर्श पैदा करने एवं विभिन्न सरोकारों पर जीवंत एवं अनंत बहस का उत्कृष्ट माध्यम है।


प्रस्तुति-- राहुल मानव, समिधा
 

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