शुक्रवार, 27 मार्च 2015

एक पत्र संजीव भानावत के नाम / अनामी शरण बबल




जयपुर में हो रहा है मीडिया गुरूओं का महासम्मेलन

प्रस्तुति- रिद्धि सिन्हा नुपूर



बहुत खूब। मगर इस मीडिया गुरूओं के महा मिलन महा सम्मेलन समारोह के आयोजन के लिए संजीव भानावत जी को  बहुत बहुत मुबारक हो। मगर, इसे सार्थक बनाने की कोशिश होनी चाहिए और मीडिया के भविष्य और भविष्य की मीडिया मीडिया शिक्षा का स्तर पत्रकारिता के नाम पर व्यवसाय पत्रकारिताके नाम काला पीला काम पर समेत मीडिया में आ रहे छात्रों के स्तर पर भी गंभीर चर्चा कराते हुए इसे सार्थक बनाइए। परम्परागत मीडिया के क्षय और प्रिंट मीडिया के 2043 तक  खत्म होनेया मरने की  चिंतापर सारगर्भित विचार सामने आए।  समेत पश्चिमी देशों में मीडिया के हालात पर भी एशिया और भारत से तुलना जरूरी है। मीडिया शिक्षा में बुनियादी परिवर्तन कमी प्रशि7ित गुरूओं विभागों हेड अॉफडिपार्टमेंट पर भी बहस की जरूरत हो सकती है । बगैर किसी तैयारी के तमाम विवि द्वारा पत्रकारिता की पढाईऔर इसमें व्याप्त कमी को भी मुद्दा बनाया जा सकता है। . मेरा निवेदन है कि हर सत्र के कवरेज के लिए पांच -2  लडकों का एक समूह आयोजन से पहले ही गठित करे जो एक सत्र की रिपोर्ट को फौरन लिखकर वेबसाईट ब्लॉग फेसबुक गूगल प्लस समेत मीडिया के अन्य साधनों पर फटाफट शेयर करे। कुछ लड़को को लगाइए जो एक परिचर्चा सा आयोजन करे जिसमें  बाहर से आए ज्यादातर मीडिया गुरूजी से आज की मीडिया या मीडिया की दशा दिशा पर विचार  लेकर परिचर्चा को फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से चर्चा में चर्चित करे।  मेरे ख्याल से तीन चार समूह बनाकर पूरे कवरेजको एक र्कोजेक्टकी तरह दे, जिसमें रोजाना की रपट को एक सत्र समाप्त होने के बाद समय की सीमा दे ,अलबत्ता बाद में रिपोर्ट में संशोदन का अधिकार भी चात्रों को दे।
 इतना बडा आयोजन तो केवल एक ही आदमी करा सकता है और वो है संजीव भानावत जी ( जयपुर वाले ) पर इसकी गूंज महीनों तक हर जगह महसूस हो तभी लाभ और कार्यक्रमकी सफलता का पैमाना संभव है। है। फिर पूरे आयोजन के सभी सत्रवार रिपोर्ट को एक जगह डाला जाए ताकि कोई पूरे आयोजन को पढकर इसकी महत्ता गरिमा गुणवत्ता और जरूरत को समझ सके। एक सत्र छात्रों का भी रखे जो इन तमाम महागुरूओं के समक्ष अपनी जरूरत अपनी आवश्यकता और क्या होना चाहिए पर जोर दे सके ताकि गुरूदेव को भी छात्रों की मांग का पत्ता लगे।
फिर एक सत्र खान पान ब्यूटी श्रृंगार और फोटो सत्र का भी रखे तो किसी को कोई (मुझे तो कतई नहीं) आपति नहीं होगी। बाकी सर मेरी बात को बुरा मानने का आपको पूरा अधिकार है, पर आज की जरूरत को तो महा आयोजक  को ही बताना होगा ताकि वे भावी समारोह चर्चा और संगोष्ठियों में वैचारिक अगन लगा सके।
अनामी शरण बबल

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