रविवार, 18 जनवरी 2015

दिल्ली के दिल में क्या है?


दिल्ली विधानसभा चुनावों की गुत्थी अचानक एक विकट गुत्थमगुत्था लगने लगी है.
अभी कुछ दिनों पहले तक लग रहा था कि लड़ाई एकतरफ़ा है और मोदी लहर दिल्ली में ‘आप’ की झाड़ू पर आसानी से झाड़ू लगा देगी! लेकिन अब यह पानीपत की लड़ाइयों जैसी भीषण, घनघोर, घमासान हो गयी है! और वैसे ही औचक नतीजों की सम्भावनाओं से भरी हुई!
‘आप’, बीजेपी और काँग्रेस. तीन पार्टियाँ, तीन चिन्ताएँ, तीन लक्ष्य!
‘आप’ के लिए अस्तित्व की लड़ाई, बीजेपी के लिए इज़्ज़त की लड़ाई और काँग्रेस के लिए बची रह गयी ज़मीन को बचाये रख पाने की लड़ाई!
सवाल यह है कि इनमें से कौन जीतता है या कोई नहीं जीतता है? एक विश्लेषण.

— क़मर वहीद नक़वी By: Qamar Waheed Naqvi
दिल्ली जीते, फिर यहाँ जीते, फिर वहाँ जीते, इधर जीते, उधर जीते, पूरब जीते, पश्चिम जीते, उत्तर जीते, लेकिन अबकी बार दिल्ली का उत्तर क्या होगा? टेढ़ा सवाल है! अबकी बार, किसकी सरकार, किसका बंटाधार? सवाल एक नहीं, दो हैं! किसकी सरकार? किसका बंटाधार? या फिर जम्मू-कश्मीर की तरह अधर में अटकी सरकार? वैसे जम्मू-कश्मीर में सरकार क्यों अटक गयी? ऐसे तो गुत्थियाँ कई थीं. लेकिन सुनते हैं कि दिल्ली की गुत्थी ने वहाँ सब अटका दिया!

तीन पार्टियाँ, तीन चिन्ताएँ

दिल्ली की गुत्थी अचानक विकट गुत्थमगुत्था बन गयी है! अभी कुछ दिनों पहले तक लग रहा था कि लड़ाई एकतरफ़ा है! हर जगह मोदी लहर झाड़ू लगा रही है. तो दिल्ली में भी वह kejriwal-versus-kiran-bedi-fight-for-delhi-assembly-electionआसानी से ‘आप’ की झाड़ू पर झाड़ू फेर देगी! लेकिन अब? दिल्ली की जंग बहुत बड़ी हो गयी है! पानीपत की लड़ाइयों जैसी भीषण, घनघोर, घमासान! और वैसे ही औचक नतीजों की सम्भावनाओं से भरी हुई!
सेनाएँ सज चुकी हैं. सेनापति चुन लिये गये हैं. केजरीवाल, किरण बेदी और अजय माकन. ‘आप’, बीजेपी और काँग्रेस. तीन पार्टियाँ, तीन चिन्ताएँ, तीन लक्ष्य! ‘आप’ के लिए अस्तित्व की लड़ाई, बीजेपी के लिए इज़्ज़त की लड़ाई और काँग्रेस के लिए बची रह गयी ज़मीन को बचाये रख पाने की लड़ाई! और मोदी-शाह जोड़ी ने तो किरण बेदी को मैदान में उतार कर वाक़ई इस लड़ाई को कुछ ज़्यादा ही गम्भीरता से ले लिया है! साफ़ है कि वह हर क़ीमत पर दिल्ली का यह चुनाव जीतना चाहते हैं. और इसीलिए फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की कोशिशों को भी ठंडे बस्ते में रख दिया गया, क्योंकि मुफ़्ती मुहम्मद सईद से समझौता करने के लिए बीजेपी को अनुच्छेद 370 और आफ़्स्पा जैसे कुछ मुद्दों पर नरम होना पड़ता और यह बात दिल्ली के चुनावों में उसके गले पड़ सकती थी. इसलिए अब जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की कोशिशें 7 फ़रवरी के बाद ही दुबारा शुरू होंगी!

मोदी को कितने नम्बर?

आख़िर दिल्ली क्यों बीजेपी और ख़ास कर मोदी-शाह जोड़ी के लिए नाक का सवाल है? दिल्ली भले ही एक छोटा-सा राज्य हो, भले ही उसे पूर्ण राज्य का दर्जा न मिला हो, लेकिन केन्द्र में मोदी सरकार आने के साढ़े आठ महीने के भीतर ही अगर दिल्ली में बीजेपी हार जाती है तो उसकी बड़ी खिल्ली उड़ेगी! दिल्ली देश की राजधानी है. उसका अलग चरित्र है. यहाँ का पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग और युवा वर्ग विकास के बैरोमीटर से ही सब कुछ नापता है. मोदी के विकास के नारे पर ही यहाँ लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 70 में से 60 विधानसभा क्षेत्रों में ज़बर्दस्त बढ़त दर्ज की थी. विकास के मुद्दे पर ही यहाँ शीला दीक्षित पन्द्रह साल तक राज कर सकीं. अब यह चुनाव बतायेगा कि विकास की परीक्षा में मोदी सरकार को दिल्ली ने कितने नम्बर दिये!
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किरण बेदी
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अरविन्द केजरीवाल
इसलिए सिर्फ़ साढ़े आठ-नौ महीने बाद ही बीजेपी अपने पिछले 60 के आँकड़े से अगर बहुत दूर रह कर चुनाव जीत भी जाये तो भी उसकी किरकिरी तो होगी. लेकिन अगर कहीं बीजेपी कैसे भी बहुमत के आँकड़े से पीछे रह गयी तो फिर तो बंटाधार हो जायेगा! और विपक्ष ख़ासकर काँग्रेस को सरकार पर हमला करने और अपने आपको फिर से खड़ा करने के लिए आक्सीजन मिल जायेगी! उधर, आगे बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से बड़े महत्त्वपूर्ण राज्य हैं, जहाँ बीजेपी अपना सिक्का चलाने के सपने देख रही है. दिल्ली में नतीजे अगर चमकीले न हुए, तो इन राज्यों में बीजेपी को अपनी शक्ल निखारने में दिक़्क़त हो सकती है.

किरण बेदी, क्या दाँव उलटा पड़ेगा?

दिल्ली की लड़ाई में मोदी-शाह जोड़ी के लिए कई परेशानियाँ हैं. एक तो यह कि दूसरे राज्यों की तरह यहाँ मुक़ाबला न काँग्रेस से है, न यूपीए की किसी पार्टी से. यहाँ राष्ट्रपति शासन के रूप में केन्द्र सरकार ही ख़ुद राज कर रही थी और मुक़ाबले में केजरीवाल हैं, जिनके ख़िलाफ़ बीजेपी के पास ’49 दिन के भगोड़े’ और ‘अराजकतावादी केजरीवाल’ जैसी बातों को छोड़ कर कोई मुद्दा ही नहीं है. केजरीवाल का मुक़ाबला कैसे हो? बीजेपी ज़रूर नर्वस है. इसीलिए केजरीवाल के ख़िलाफ़ ‘ट्रम्प कार्ड’ के तौर पर मोदी-शाह जोड़ी ने किरण बेदी पर दाँव लगाया है. बीजेपी में या फिर बाक़ी राजनीतिक दलों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो (याद तो नहीं पड़ता) कि पर्चे दाख़िल होने का काम शुरू हो जाने के बाद कहीं से ‘सम्भावित मुख्यमंत्री’ को ‘आयात’ किया जाये! और फिर अब तक तो पार्टी बहुत इतराते हुए सभी राज्यों में सिर्फ़ मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ती रही, तो इस बार उसे बाहर से एक चेहरा लाने की ज़रूरत क्यों पड़ गयी? क्या मोदी लहर ढलान पर है? और अगर ऐसा है भी, तो किरण बेदी क्या पार्टी को कोई ऐसा करिश्मा दे पायेंगी, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही है? वह बहुत कड़क पुलिस अफ़सर रही हैं, राजनीति में बहुत लचीलापन चाहिए. बीजेपी में शामिल होने के बाद वह दो बार पार्टी कार्यकर्ताओं से सम्बोधित हुईं. देख कर साफ़ लगा कि अभी तो उन्हें बहुत सीखना है! दिल्ली बीजेपी पहले से ही गुटों में गुटगुटायी हुई है. बाहर से आयी किरण बेदी पार्टी के अन्दर कितने कुलाबे जोड़ पायेंगी? और फिर सबसे आख़िर में सबसे बड़ा सवाल कि क्या केजरीवाल की अपील को वह काट पायेंगी, जिसके लिए उन्हें लाया गया है? कम से कम मुझे तो अभी तक उनके पास ऐसी कोई जादुई छड़ी नहीं दिखी!
दूसरी बात यह कि बीजेपी ने तो हालाँकि किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं घोषित किया है, लेकिन किरण बेदी अपने हाव-भाव से ख़ुद को उसी रूप में पेश कर रही हैं. बीजेपी सरकारों में अब तक मुख्यमंत्री संघ काडर से होता रहा है. किरण बेदी बाहर से आयी हैं और ख़बर है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किये जाने पर सवाल उठा दिया है. ख़बरों के मुताबिक भागवत को किरण बेदी के बीजेपी में आने पर क़तई एतराज़ नहीं है, लेकिन सम्भावित मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें पेश किये जाने पर उन्हें सख़्त आपत्ति है. उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि यह किसका फ़ैसला है? तो क्या मोदी-शाह जोड़ी ने सरकार और पार्टी के काम में संघ के दख़ल को कम करने की क़वायद शुरू कर दी है? लेकिन क्या यह इतना आसान है? अब ताज़ा अटकलें हैं कि बीजेपी शायद किरण बेदी को सीधा-सीधे मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न घोषित कर उन्हें चुनाव अभियान समिति का मुखिया घोषित करे. एक-दो दिन में इस पर स्थिति साफ़ होने की उम्मीद की जा रही है.
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इस बीच आरएसएस ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि संघ प्रमुख को किरण बेदी के बीजेपी में आने से कोई परेशानी है. संघ की तरफ़ से यह ट्वीट किया गया:
संघ ने यह भी कहा कि मीडिया का एक तबक़ा ग़लत ख़बरें फैला रहा है:
संघ के प्रवक्ता राजीव तुली ने भी समाचार एजेन्सी पीटीआइ को बताया कि संघ का इससे कोई लेना-देना नहीं है कि बीजेपी किसे मुख्यमंत्री के तौर पर अपना उम्मीदवार बनाती है और यह बीजेपी का अन्दरूनी मामला है, जिसमें संघ दख़ल नहीं देता.
बहरहाल, इन तमाम सफाइयों के बावजूद पार्टी के भीतर से छन कर आ रही ख़बरों के निहितार्थ यही हैं कि संघ को भी और पार्टी के भीतर एक तबक़े में बेदी के नाम पर सब कुछ सहज नहीं है.
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केजरीवाल और ‘आप’ का बुलबुला!

और अरविन्द केजरीवाल जानते हैं कि इस चुनाव में अगर वह पिट गये तो बंटाधार हो जायेगा और ‘आप’ नाम के बुलबुले की कहानी शायद ख़त्म ही हो जाये. इसलिए लोकसभा चुनाव हारने के बाद से केजरीवाल ने दिल्ली छोड़ कर किसी और तरफ़ झाँका भी नहीं. उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने दिल्ली में सरकार बना कर और चला कर दिखा दी, तो ‘आप’ देश में एक नये राजनीतिक विकल्प के तौर पर उभर सकती है. ‘भगोड़ा’ और ‘अराजक’ छवि की तरफ़ वह फिर कभी नहीं लौटना चाहते. इसीलिए उनकी आम आदमी पार्टी ने अब अपनी शैली पूरी तरह बदल ली है. वह अब धरने और आन्दोलनों के बोल नहीं बोलती. भाषा भी संयंत हो गयी है. उसने राजनीतिक दलों के सारे तौर-तरीक़े भी सीख लिये हैं. पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती अपनी ‘इमेज’ और अपना ‘परसेप्शन’ बदलने की है कि उसे एक ‘ज़िम्मेदार राजनीतिक दल’ माना जाये. इसके लिए उन्होंने काफ़ी कड़ी मेहनत भी की है और यह सच है कि पिछले दो महीनों में पार्टी को इसमें बड़ी सफलता भी मिली है, उसके बारे में लोगों की राय भी सुधरी है, लेकिन कहाँ तक, यह 7 फ़रवरी को ही पता चलेगा. बहरहाल, अगर ‘आप’ अपनी 28 सीटों का पुराना आँकड़ा भी छू ले तो भी यह उसकी उपलब्धि ही होगी!

काँग्रेस: आठ के ऊपर या नीचे?

और लोकसभा चुनावों में हार के बाद काँग्रेस में पहली बार ‘कुछ कर दिखाने’ की अकुलाहट दिख रही है. पिछली विधानसभा में काँग्रेस को आठ सीटें मिली थीं. उसकी लड़ाई फ़िलहाल तो यही है कि उसका आँकड़ा इससे नीचे क़तई न जाये. वह पूरा ज़ोर लगा रही है कि अपनी सीटों की संख्या वह कम से कम दहाई के पार तो ले जाये. इसलिए बड़े-बड़े दिग्गजों को मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है. अब देखते हैं कि दिल्ली के दिल में क्या है? और पानीपत जैसी इस लड़ाई में कौन जीतता है या कोई भी नहीं जीतता है?
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