रविवार, 25 जनवरी 2015

सिकुड़ती पत्रकारिता और फैलता मीडिया


 

 

- पुण्य प्रसून वाजपेयी

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समाचार4मीडिया.कॉम ब्यूरो


मीडिया का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन जर्नलिज्म गायब है। आज मीडिया से आंदोलन और पसीने की महक खत्म हो रही है। लेकिन इस विस्तार का फायदा है क्योंकि विस्तार लोगों को जोड़ेगा, जागरूक बनाएगा औऱ ऐसा होगा तो देश की तस्वीर आईने की तरह साफ होगी। लेकिन इस सब के बीच पत्रकारिता को नुकसान हुआ है यह तो तय है।
टीवी का रिमोट हाथ में लिए दर्शक और अखबार के पन्ने पलटता दर्शक कुछ खोज रहा है क्योंकि जो उसे मिल रहा है जो जानकारी मिल रही है उस जानकारी का वह क्या करे। जानकारी का अभाव एक बड़ा संकट है। लोगों के सामने जानकारी का संकट इसलिए है क्योंकि पत्रकारों की इंटलेक्चुअल हत्या हो रही है।
मुनाफे और घाटे के सिद्धात ने पूरे समाज को प्रभावित किया है। मीडिया भी इसी के पीछे चल रहा है। मशीनीकरण ने भी काफी कुछ बदला है। पहले कहा जाता था कि अखबार निकालना एक बेटी की विदाई की तरह होता है लेकिन मशीन ने इस श्रम को हर लिया और संवेदनाएं मरने लगीं। और एडवरटाइजिंग ने पत्रकारिता पर कब्जा कर लिया।
देखें तो आज देश का वित्तमंत्री मानसून है, मानसून न आए तो अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है, लेकिन हर जगह सरकार की सफलता के ऐड दिख रहे हैं और जो सपने दिखाए जा रहे हैं क्या ऐड के माध्यम से जो सपने दिखाए जा रहे है मीडिया उसके सच्चाई जाहिर करने में कोई भूमिका निभा पा रहा है। पतन समूचे समाज का हुआ है। मीडिया के हाथ अगर कमजोर हुए हैं तो यह ऊपरी स्तर पर आई कमियों के कारण हुआ है। इसे नवप्रवेशी की कमियों पर थोपकर नहीं बचा सकता। मंथन होता है तो विष भी निकलता है और अमृत भी। हमें दोनों का उपयोग करना सीखना होगा।

प्रस्तुति- नुपूर सिन्हा, समिधा

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