रविवार, 25 जनवरी 2015

हिंदी को मार्केट की भाषा बनाना होगा: हरिवंश





हरिवंश, ग्रुप एडिटर, प्रभात खबर 
दरअसल देखा जाए तो यह बात तो बिल्कुल सही है कि हिंदी कवियों और विचारकों की भाषा बन गई है। ये बात पूरी तरह से सही दिखाई दे रही है। दुनिया बदली है। आज का जमाना बहुत ज्यादा एडवांस है। आज का जमाना टेक्नोलॉजी का जमाना है। लेकिन हिंदी को इस लायक विकसित नहीं किया गया कि वो आज के जमाने की भाषा बन सके। हिंदी को कारोबार की भाषा बनाना होगा। लेकिन हिंदी भाषा को लेकर ऐसे कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। देखिए 1598 में जब भारत में गुजरात के नजदीक डच व्यापार करने आए तो उन्होंने डच और हिंदी की डिक्शनरी निकाली। उस वक्त ये कारोबार की भाषा थी। ये आजादी के समय में सामाजिक परिवर्तन की भाषा थी इसलिए यह उस समय मजबूत थी, लेकिन अभी यह कारोबार या सामाजिक परिवर्तन की भाषा नहीं रही है। आजादी के बाद इसे दोनों भूमिकाओं से अलग कर दिया गया है। अगर गैर हिंदी क्षेत्रों को देखा जाए तो ये राज्य कितने आगे निकल गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि उनकी अपनी क्षेत्रिय भाषा कमजोर पड़ गई हो। उनकी अपनी क्षेत्रिय भाषा भी उतनी ही मजबूत होती जा रही है, बंगाल को देखो बांग्ला भाषा कितनी मजबूत हो गई है और वो कितनी आगे निकल गई है। तमिल को देखें तो विश्व स्तर पर तमिल भाषा में उनके अधिवेशन होते हैं। और उन अधिवेशनों में दुनिया भर के लोग आते हैं। ऐसा वहां पर क्यों है? क्योंकि उन्होंने अपनी भाषा को मजबूत किया है। लेकिन हिंदी में उसका उल्टा है हिंदी के कवि चाहतें है कि उन्हें पुरस्कार मिले, हिंदी के विचारक सोंचते हैं कि उन्हें भी कोई इनाम मिलें लेकिन बाकी भाषाओं के लोग ऐसा नहीं सोचते।  
हकीकत मे देखा जाए तो हिंदी को कारोबार की भाषा बनाने की कोशिश ही नहीं की गई। जैसा आपने कहा कि कई हिंदी अखबार हिंग्लीश का प्रयोग कर रहे हैं तो वे अखबार आम बोलचाल की भाषा के शब्द इस्तेमाल कर रहे हैं तो ठीक है लेकिन जबरदस्ती से किसी अंग्रेजी के शब्दों को हिंदी में घुसा देना हिंदी की छवि के उल्टा होगा। आज के समय मे अंग्रेजी संस्कृति में रहने वाले, अंग्रेजी का प्रचार करने वाले हिंदी दिवस मना रहे हैं। ये हिंदी दिवस इसलिए नहीं मना रहे कि वो हिंदी से प्यार करते हैं या हिंदी का प्रचार करना चाहते हैं बल्कि वो हिंदी से पैसा कमाना चाहते हैं। ऐसा करने से हिंदी के अस्तित्व पर असर तो पड़ेगा लेकिन हिंदी को ज्यादा बड़ा खतरा नहीं है, हिंदी आने वाले दिनों में मजबूत होगी। क्योंकि उदारीकरण की भी एक सीमा है। दुनिया के तीन चौथाई लोग अंग्रेजी के बाहर रहते हैं उनकी भाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती। इसलिए आशा है कि आने वाले सालों में हिंदी और भी ज्यादा मजबूत होगी।
प्रस्तुति--उपेन्द्रकश्यप, किशोर प्रियदर्शी 

1 टिप्पणी:

  1. असहमति के अपने स्वर, धुन, राग, और लय होते हैं; उसे सुना जाना चाहिए। लेकिन यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हम अपनी या अपने भाषा की या कि सभ्यता और संस्कृति की आलोचना किस बिनाह पर कर रहे हैं; उसका ठोस आधार क्या है? है भी या नहीं? अनुभवी सम्पादक के तौर पर प्रतिष्ठित हरिवंश जी कहते हैं कि हिंदी, साहित्यकारों और कवियों की भाषा हो गई है? हद है महराज! लगता है आप हिंदी के मौजूदा सूरत और सीरत से वाकिफ़ नहीं हैं या होंगे भी, तो आपने अब अपनी ताल्लुकातों को राजनीतिक मोड़ और आधार देना शुरू कर दिया है। जापान का एनएचके वल्र्ड हो या ब्रिटेन की बीबीसी वल्र्ड; दुनिया हिंदी में लगातार घूम रही है और दुनिया के तमाम छोटी-बड़ी ख़बरों के साथ अपने लक्षित पाठक, श्रोता और दर्शकों तक कायदे से पहुंच रही है। हिंदी में ढेरों कमियां हो सकती हैं; उसके साथ हमारे सम्बन्ध और बर्ताव को लेकर ढेरों नुक्ताचीनी संभव है; लेकिन हमारी हिंदी पर किसी एक मठ या मठाधीश का दबदबा है; यह सही नहीं है।

    हमारा आपके पत्र-संस्थान ‘प्रभात ख़बर’ में 2008 में ही काम करने का अनुभव है; उन दिनों आपकी दिलचस्पी हिन्दी में अच्छी-खासी थी और आप हमेशा हिंदी को अधिक से अधिक बेहतर बनाने का गूंजाइश निकालते हुए दिखते थे। मुझे जहां तक याद आ रहा है कि आप स्वयं उन दिनों कुछ महत्त्वपूर्ण अंग्रेजी की खासी चर्चित किताबों को अनूदित कर हिंदी भाषा में शामिल कर रहे थे, हिंदी-संसार के उम्मीदों के पाट को विस्तार दे रहे थे, साज-संवार रहे थे। वह आप ही थे जिसके कहे-लिखे को हम आदर्श मानते थें-‘जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर ज़माना चलता है।’ हम खुद ‘यूथ प्लस’ के काम से जुड़े थे और कम दिनों के ही अपने ‘इंटर्नशीप’ में इस परिशिष्ट का मेरे मन-मस्तिष्क पर जादूई रंग-रोगन हो चला था। लेकिन, आप और आपकी टीम वह परम्परा कायम नहीं रख सकी। आपने योग्य लोगों से काम लिया; लेकिन उन्हें आगे काम करने के लिए न्योता नहीं दिया; आमंत्रित नहीं किया, यह भी नहीं कहा कि आपमें संभावना है और आपको हर हाल में फील्ड की पत्रकारिता करनी चाहिए, न कि अकादमिक दुनिया में अध्यापन के लिए सुरक्षित-ठिकाना तलाशना चाहिए। हम तो इसी उम्मीद और निगाह से गए थे ‘प्रभात ख़बर’। यह अख़बार हमारे लिए ख़बर नहीं लाता था, बल्कि यह हमारे लिए उन ठिकानों, उन मुहिमों का पता देता था जो इंसानी तहजीब और तेवर के साथ पूरे मानवीयता और विश्व-दृष्टिकोण के लिए मर-मिट जाना चाहता है।

    आप कभी फुरसत में हों, तो ‘हिन्दी हर्टलैंड’ यानी हृदयप्रदेश हिन्दी के नाम से निकले परिशिष्ट को देखें, पता चलेगा कि युवा दिमाग ने अपनी भाषा के हाथों से जो शाब्दिक और रचनात्मक दस्तकारी की है; उसे पाठकों ने हाथों-हाथ लिया था, सराहा था; लेंकिन आपने पाठकों को इस रसास्वादन से स्वयं वंचित कर दिया। पूरी टीम बिखर गई। ऐसा क्यों हुआ यह तो आप ही जानते होंगे।

    खुद को आरामदेह स्थिति में रखते हुए जनता-जनार्दन को ‘थर्ड पर्सन’ के रूप में सम्बोधित करना बेहद आसान है। उसे हितोपदेश, जातक कथाएं, सूक्ति और सुभाषितानी सुनाना बेहद सुविधाजनक है; लेकिन अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को निकालना बेहद मुश्किल। और जहां तक मेरा सवाल है, तो हम सही आदर्श चुनें अवश्य लेकिन सही पत्रकारीय मार्गदर्शन के अभाव में ज्यादा दूर नहीं आ सके हैं। खैर! अब वापसी भी संभव नहीं है, लेकिन क्षोभ बरकरार है।

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