शनिवार, 31 जनवरी 2015

विज्ञापन के मानवीय सन्दर्भ



 

 

विज्ञापन संस्कृतिः सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के मानवीय सन्दर्भ

प्रस्तुति- राहुल मानव
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आज संस्कृति और मानवीय सभ्यता दोनों पर अधिक खतरे हैं। क्योंकि, मानव समाज की जो स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है, वह एक ऐसे मोड़ में मुड़ चुकी है, जो सीधे विनाश की ओर अग्रसर है। वर्तमान समय में हमारे समाज के सामने विभिन्न प्रकार के सिद्धांत, धर्म, विचारधाराएं व लक्ष्य हैं। एक सामान्य मनुष्य से लेकर बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति के लिए यह निश्चित कर पाना कठिन होता जा रहा है कि वह कौन-से साधन को अपनाएं, स्वीकार करे।
इस संदर्भ में, संचार समाजीकरण का प्रमुख माध्यम है। संचार द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। ‘‘इतिहास के लम्बे दौर में मनुष्य का इन्द्रिय-प्रत्यक्षीकरण मानवजाति के रहन-सहन के तरीके के अनुसार बदलता रहा है। मनुष्य किस प्राकर से अपने इन्द्रिय-प्रत्यक्षीकरण को संगठित करे, किस माध्यम से वह इसे प्रभावित करे- ये बाते केवल प्रकृति द्वारा ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि ऐतिहासिक व सामाजिक परिस्थितियों द्वारा भी।’’ चूकि मानव समाज के विकास में प्रकृति के साथ-साथ मानव द्वारा उत्पन्न परिस्थितियां भी उसके और सामाजिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए परिवर्तन की प्रक्रिया हिंसक हो या अहिंसक यह समस्या मानव विकास की जड़ों से जुड़ी हुई है। इसमें दुविधा यह है कि आदमी कौन-सा रास्ता अपनाएं, हिंसा का या अहिंसा का। क्योंकि, सामाजिक लक्ष्यों के अलावा व्यक्तिगत जीवन और इसमें पैदा होने वाली स्थितियों से वह सदैव उलझा रहता है। यह समस्या मानवीय व्यवहार से जुड़ी है और सामाजिक जीवन मूलतः व्यवहार पर आधारित है। मनुष्य का सामाजिक व्यवहार उसके संस्कारों और संचार के माध्यमों पर भी निर्भर करता है। ’’संस्कार आमतौर पर व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से बनते हैं। जब वह अपने अनुभवों से गुजरता हुआ, शिक्षा और अध्ययन के द्वारा अपने आलोचनात्मक विवके से अपने समय और समाज की नई समझ बनाता हुआ आगे बढ़ता है जिससे मनुष्य के संस्कारों और उसकी अभिरूचियों में भी अंतर आता है।’’ चूंकि, मानव संस्कार परिवर्तनशील है इसलिए मानव समाज में और उसके सामाजिक व्यवहार में गतिशीलता सदैव बनी रहती है। सामाजिक व्यवहार में गतिशीलता बनी रहे ताकि विकास अपनी सतत् क्रिया-प्रतिक्रिया में अग्रसर होता रहे। इसलिए समाज में सम्पे्रषण जरूरी है क्योंकि सम्पे्रषण ही मानव समाज की वह कड़ी है जो विकास में निरंतता को बनाए रखती है।

हमें उन सामाजिक आवश्यकताओं एवं बन्धनों के वातावरण को जानना जरूरी है जिनमें मानव प्राणी सम्पे्रषण करता है। सम्प्रेषण अपने आप में विकास एक माध्यम है। ’’सम्पे्रषण का तकनीकी माध्यम जिसके चार घटक प्रमुख हैं- संदेश प्रेषित करने वाला, संदेश को ग्रहण करने वाला, संदेश जिसे प्रेषित कया जाना है और माध्यम जिसके द्वारा संदेश को संप्रेषित करना है।’’ सूचना या संदेश को सम्पे्रेषित करने वाले माध्यमों पर धीरे-धीरे बहुत कम लोगों का एकाधिकार बढ़ रहा है, जो अपनी विचारधारा एवं लाभोपार्जन की नीति को ध्यान में रखते हुए उसका गलत लाभ उठाने में दिन-प्रतिदिन सक्रिय होते जा रहे हैं। एडुआर्डो गैलियानों लिखते है कि ‘‘संचार माध्यमों पर थोडे़ से ऐसे लोगों का एकाधिकार है जिनकी सब लोगों तक पहंुच है। इतने सारे लोग इतने थोड़े से लोगों द्वारा संचार की दृष्टि से बंधक बनाकर रखे गए हो, ऐसा कभी नहीं हुआ।….. ये लोगों पर ऐसी जीवन शैली थोप रहे हैं, जिसका आदर्श नागरिक एक दासवत उपभोक्ता और एक निष्क्रिय दर्शक है।’’
ब्रिटिश भारत से पहले की भारतीय सभ्यता की बात करें, तो भले ही यहां हमें मोटे रूप से वर्ण व्यवस्था दिखाई देती हो, लेकिन उस समय मानवीय मूल्य व सभ्यता के सकारात्मक उदाहरण भी हमें मिलते है। औद्योगिक क्रांति के नाम पर मची विश्व में लूट ने मानव को धीरे-धीरे भूमण्डलीकरण के सिद्धांत में व्यक्तिवादी पहले से कहीं ज्यादा बनाने में अपनी सहभागीता दी है। इस प्रसंग में गांधी की पुस्तक ‘हिन्दस्वराज’ पश्चिमी व भारतीय सभ्यता के टकराव पर आधारित है। इसमें बार-बार गांधी यह कहते हुए नजर आते हैं कि भारतीय सभ्यता पर परिचमी सभ्यता अपना प्रभाव छोड़ रही है, जो भारतीय सभ्यता के लिए सकारात्मक नहीं है। इस सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता‘, प्रेमचन्द ने ‘महाजनी सभ्यता‘ व टेगौर ने ‘सभ्यता का संकट’ कहा है।
भले ही 19वीं सदी में डार्विन ने प्रकृति से, माक्र्स ने समाज से और फ्रायर्ड ने मनुष्य की चेतना से ईश्वर को निकाल कर बाहर कर दिया हो, मगर गांधी इसी ईश्वर में निष्ठा रखते हुए विश्व का सबसे बड़ा अहिंसक व्यवहार मानव जाति के सामने रखते हैं। ‘‘गैर-पश्चिमी समाज तथा सभ्यता के बारे में पश्चिम की अभिधारण ;ंेेनउचजपवदेद्ध तथा आधार वाक्यों ;च्तमउपेमेद्ध को लेकर आलोचनात्मक जांच, व्याख्या तथाा मूल्याकंन की यह परम्परा गांधी से ही शुरू होती है। गांधी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भविष्य दृष्टा की तरह पश्चिमी सभ्यता में निहित अशुभ प्रवृत्तियों के खतरनाक संभाव्य शक्ति का पर्दापाश किया था। दूसरे चितकों ने उपनिवेशवाद के विरूद्ध आवाज उठायी थी, परन्तु किसी ने आधुनिकता के पश्चिमी मॉडल का विरोध नहीं किया था।’’
‘हिन्दस्वराज’ पुस्तक के पहले प्रश्न का उत्तर गांधी कुछ इस भाव में देते हुए नजर आते हैं कि ‘मीडिया का एक पहलू तो यह है कि लोगों की भावनायें जानना और उन्हें जाहिर करना, दूसरा काम लोगों में मानवीय भावनाएं पैदा करना और तीसरा काम है लोगों के दोष उन्हें बताना’- ताकि एक ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमें केवल किसी एक वर्ग का नहीं अपितु पूरे समाज के नागरिकों का विकास हो सकें। गांधी ‘हिन्दस्वराज’ में मशीनीकरण, रेल, वकील, डॉक्टर आदि का विरोध करते हैं। आज के समय यदि गांधी रहते तो वे सबसे पहले संचार माध्यमों व इन पर हुकूमत रखने वालों का ही विरोध करते। क्योंकि, आज मीडिया एक ऐसी समाज रचना में अपनी अहम भूमिका दे रहा है जो किसी एक खास वर्ग द्वारा ही संचालित है।

भूमण्डलीकरण व लोकतंत्र में यह दावा बार-बार किया जाता रहा है कि ‘हर व्यक्ति को निर्णय लेने का समान अधिकार है। इस अधिकार के सिद्धांत की वकालत करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक मुनष्य में उत्कृष्टता हासिल करने की एक समान क्षमता नहीं होती और जिस क्षमता के साथ वह अपना निर्णय लेने में सफल होता है वो क्षमता उसकी न हो कर उसके आसपास के वातावरण में होती है, जो पूर्णतः संचार माध्यमों द्वारा प्रायोजित होती है। ’’संचार के साधनों का विकास तो मानव सभ्यता के साथ ही हुआ, लेकिन जिन्हें जनसंचार कहा जा रहा है, उसके विकास का संबंध पूंजीवादी विकास के साथ जुड़ा है। और जनमाध्यम किस तरह के होंगे, यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि समाज किस तरह का है और उसके विकास की दिशा क्या है।’’ पूंजीवादी देशों में पूंजी के द्वारा ही यह तय होता है कि जनसंचार के साधन व उद्देश्य क्या होंगे? पूंजीवाद का विस्तार सदैव अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर रहा है। यह ‘‘अब तक के मानव इतिहास में सबसे अधिक गतिमान उत्पादन का स्रोत रहा है। इसके गतिशील किन्तु इसके परस्पर विरोधी स्वभाव का परिणाम यह होता है कि उत्पादन इसके बढ़ते हुए सामाजीकरण के ही द्वारा होता है।’’
भले ही सामाजीकरण धर्म, राजनीति, विज्ञान, भाषा, जाति या आर्थिक स्थिति पर निर्भर हो, मगर आधुनिक समय में संचार माध्यम व संचार प्रणाली ने मानव की उपभोग शक्ति को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। चूंकि उपभोक्ता, मांग और पूर्ति के सिद्धांत पर निर्भर है और मांग से ज्यादा आधुनिक पूंजीवाद (बाजारवाद) ने संचार प्रणाली से पूर्ति की मांग पूरी की है जो कहीं-न-कहीं उपभोक्तावादी प्रणाली को अत्यन्त बढ़ावा दे रही है।
पूंजीवाद ने अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति पर संचार व संचार प्रणाली के अतिविकसित साधनों द्वारा अपना वर्चस्व बना लिया है। ‘‘पूंजीवाद के साधन के रूप में जब से लोकतंत्र पर संचार व सूचना प्रणाली इस्तेमाल होने लगी तभी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी की आड़में लोगों की सोचने की आजादी तक को छीना जा रहा है। और यह दावा किया जाता है कि यह लोकतांत्रिक देश है। अमरीकी भाषा वैज्ञानिक और चिंतक नोम चोम्स्की ने तथाकथित लोकतांत्रिक समाजों में इन संचार के नए संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह जनता के दिमाग पर नियंत्रण करने के लिए किया जा रहा है इस पर गहरा विचार किया है। पंूजीवाद एक विचारधारा है जिसमें इस सिद्धांत पर अत्याधिक बल दिया जाता है कि किसी भी तरह से लाभोपार्जन की नीति कायम रहे। इस नीति व लक्ष्य के लिए वे यह किसी भी अनैतिक व नैतिक साधनों को इस्तेमाल करने में नहीं झीझकते। स्वनपे ।सजीनेेमत की यह धारणा है कि ‘हम सभी विचारधारा के द्वारा बनाये जाते हैं। स्वनपे के अनुसार समाज की संरचना तीन स्तरों पर होती है-आर्थिक, राजनैतिक और वैचारिक। हालांकि, ये तीनों ही स्तर एक-दूसरे से जुडे़ हुए हैं। वे इस बात का तर्क रखते हैं कि वर्ग वस्तुतः औद्योगिक पूंजीवादी समाज का ही परिणाम है तथा विचारधारा इस वर्ग विभाजन को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वह पूंजीवाद के लिए ’ैपदं फनं दवद’ है। विचारधार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक व्यवस्था में अपनी दखल को बनाये रखती है।’’8 पाठक विचाराधाराओं को बनाए रखने में ‘सूचना क्रांति’ के बाद उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले। ‘सूचना क्रांति’ या ‘सूचना विस्फोट’ के बाद टेलीविजन और सूचना प्रसारण ने समाज में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया जो मूलतः पूंजीवाद पर आधारित था। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बाजार पूरी तरह से भरे पडे़ हैं। इसी वजह से मार्केटिंग के जरिए कृत्रिम मांग पैदा करने की कोशिश आज व्यवसाय का अनिवार्य हिस्सा हो गयी है।.. अर्थात् माल कैसे बेचा जाए।
मार्केट की मांग बनी रहे और पूर्ति भी होती रहे इस धारणा को बनाए रखने में अर्थात् कृत्रिम मांग अधिक से अधिक हो, के साधन के रूप में संचार प्रणाली व माध्यमों में ‘विज्ञापन’ अपनी भूमिका में उल्लेखनीय है। विज्ञापन द्वारा व्यक्ति की इच्छा को बढ़ावा दिया जाता है, जिसके चलते यह मांग उत्पन्न करता है और उपभोगवादी प्रवृति में अपनी भूमिका रखता है। ‘विज्ञापन’ पंूजीवाद के विकास में एक ‘टूल्स’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। भले ही वह केवल ‘विज्ञापन’ न रह कर स्वयं एक व्यवसाय का रूप धारण कर चुका हो। विश्व की सबसे तेज बुद्धि आज इस क्षेत्र में लगती है।
‘संस्कृति उद्योग और ज्ञानोदय का भ्रम’ नामक लेख में ‘एम. हार्खाइमर’ लिखते है कि ‘‘विज्ञापन झूठ बोलने की कला का दूसरा नाम है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है और जैसा कि गोबेल्स कहा करता था कि, समझदारी के साथ इसका इस्तेमाल किया जाए तो यह सामाजिक शक्ति को व्यक्त करता है।’’ टेवीविजन पर दिखाई देने वाले विज्ञापनों का मानव पर मनोवैज्ञानिक असर इस हद तक प्रभावी होती है कि वह न चाहकर भी उसे हासिल करने की चेष्टा करता है। टी.डब्ल्यू. एडर्नो लिखते है कि ‘संस्कृति उद्योग में प्रचार की जीत यह है कि उत्पादों को खरीदने और उपयोग करने के लिए बाध्य हो जाते है।’’
इलेक्ट्रोनिक माध्यमों का असर छपे हुए शब्दों से अधिक गहरा होता है। ये माध्यम व्यक्ति के मनोविज्ञान को बदलने की शक्ति रखते हैं। इसलिए उसके कार्य-व्यवहार को संचालित करने की ताकत भी इनमें निहित है। भले ही हम आज एक ऐसे समाज में है जिसकी सारी सीमाएं प्रौद्योगिकी की सहायता से टूट गई हैं। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के अंग के रूप में विज्ञापन सामाजिक व्यवस्था को न्ययोचित ठहरानें एवं उसके पक्ष में आम सहमति बनाने का कार्य करता है। दि जर्मन आइडियोलाजी में’ माक्र्स लिखते है कि ‘जो वर्ग भौतिक उत्पादन के संसाधनों पर प्रभुत्व रखता है, वही मानसिक उत्पादन के संसाधनों पर भी नियंत्रण रखता है ताकि जिनके पास मानसिक उत्पादन के संसाधनों का आभाव है उनके विचारों पर भी नियंत्रण रखा जा सके।’
1990 के बाद सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याएं तेजी से उभर कर सामने आयी क्यांेकि टी.वी. पर दिखाई देने वाले विज्ञापनों में सेक्स व हिंसा को बढ़ावा मिला, आज टीवी पर दिखाई देने वाले विज्ञापन इन्ही पर आधारित होते हैं। प्रसिद्ध अमरिकी समाजशास्त्री हरवर्ट आई. शिलर लिखते है कि ‘‘विश्वव्यापी बाजार और निर्वाध मुनाफे को सुनिश्चित करने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ये (विज्ञापन) प्रत्येक सांस्कृतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते है।’’
विज्ञापन के केन्द्रबिंदू ‘पूंजीवाद’ में लोभ, लाभोपार्जन, मांग और पूर्ति, उपभोग तथा साध्य प्रमुख रहते हैं। पूंजीवाद ने जिस तरीके से समाज (लोकतंत्र) पर पकड़ बनाई है जिसे वह और मजबूती से जकड़ रहा है। आधुनिक विमर्श में भले ही इसे जगह मिली हो, लेकिन आम आदमी की पकड़ से यह बात दूर है कि ‘पूंजीवाद और जनकल्याणकारी राज्य’ में गठजोड़ हो चुका है। इस गठबंधन के उदाहरण हमें अक्सर विज्ञापन के माध्यम से देखने को मिलते हैं।
विज्ञापन की थीम तथा प्रस्तुत उत्पाद से प्रायः आम आदमी गायब रहता है। चूंकि, विज्ञापन को देखना, समझना, उक्त उत्पाद को खरीदना तथा अपने साथियों के बीच उस पर चर्चा करना, एक निश्चित वर्ग की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हो सकता है। विज्ञापन के जरिए हमें अधिकारों के प्रति थोड़ा सचेत किया जाता है, लेकिन यहां कर्तव्य हमेशा गौण ही रहते है।
पूंजीवाद में कर्तव्यों की जगह लाभ हो स्थान दिया जाता है जिससे एक पूंजीवादी संचार व्यवस्था को समाज में एक बड़ा क्षेत्र मिलता है, जिसके माध्यम से समाज की व्यवस्था-प्रशासन को दिन-प्रतिदिन लाचार बनाया जा रहा है। विज्ञापन में जनकल्याण का सिद्धांत या व्यवहार अपनी पैठ, समाज में नहीं बना सकता है, और समाज(राज्य) पर यदि एक बार किसी तरह पूंजीवाद विचारधारा का नियंत्रण हो गया तो इस नियंत्रण स्थापित करने की प्रक्रिया में पूरे कर्जखोर समाज की संस्थाओं का पूरा तंत्र उसकी चपेट में आ जाता है। क्योंकि पैठ कैसी बनानी है और साधन क्या होगा, इसका निर्णय पैठ बनाने वाली शक्तियां तय करती है जो पूरी तहर से लाभोपार्जन के सिद्धांत पर पूंजीवाद व्यवस्था के कब्जे में है।
व्यवस्था की इस पद्धति को बनाए जाने के साथ ही अत्यंत उन्नत तकनीक और मनोवैज्ञानिक ढंग से राज्य के जरिए पूंजीवाद अपने को व्यावसायिक बनाए रखने का परिदृश्य हमारे सामने रहता है। व्यवस्था का यह भाव राज्य में भेदभाव और प्रतियोगिता को जन्म देता है तथा हमारे निर्णय लेने व काम को व्यवहारिक रूप देने में गलत विचारों को प्रायः तैयार रखता है जो वस्तुतः गैर-राजनैतिक, निष्पक्ष नहीं होते। इस पूरी व्यवस्था में हमें भले ही लगे कि हम आज विकसित समाज में रहते है, परन्तु यह विकास वास्तविक रूप में हमारा न होकर इसी व्यवस्था का एक और नया हथियार
विज्ञापन की इस प्रसारण प्रक्रिया ने राज्य पर एक दबाव और डाला जिसने हमारे राज्य-सांगठनिक ढांचे के बदलाव में प्रतिरोध खड़ा दिया। हमारे राज्य के साथ पूंजीवादी व्यवस्था के गठजोड़ का उदाहरण हमे आज स्पष्ट दिखाई देने लगा है, विज्ञापन के माध्यम से यही व्यवस्था-प्रक्रिया हमें अच्छी दिखाई जाती है, हमारे राज्य को लाचार और बेबस दिखाया जाता है, जहां हमें यह सोचने के बजाय कि क्या करें-कौन उचित है? कि जगह सीधे एक मात्र उपाय इस व्यवस्था से जुड़ना ही दिखाता है। निजीकरण के दौर में राज्य का हस्तक्षेप दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। निजीकरण के नाम पर भले ही हमें ऊपरी तौर पर व्यवस्थाएं ठीक लगती हो, लेकिन अंदर तो खोखलापन है। हमें विकल्प की जगह व्यवस्था को बदलना होगा। तभी हम मानव के समुदाय की रचना कर पाएगें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (ॅभ्व्) द्वारा जारी स्वास्थ्य को लेकर चलने वाले कार्यक्रम-राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम, पोलियो, एड्स, टीकाकरण, टीवी निवारण, कुष्ठ रोग निवारण आदि कार्यक्रम भारत में एक लम्बी यात्रा हमेशा से ही करते रहे है लेकिन सफलता इन्हे ‘छळव्’ ‘गैर-सरकारी संगठन’ के बाद हाथ लगी। इसके पीछे कारण यह कि हमारा राज्य हमारी मांगें पूरी नहीं कर पाता है, राज्य के जिम्मेदारी के काम प्रतिदिन कम हो रहे हें तथा यहां भी निजीकरण के बाद जनता की जरूरतें बाद की श्रेणी में आती है। जो संचार माध्यमों की अपनी एक प्रौद्योगिकी के बाद तैयार की जाती है।
विश्व पूंजीवादी व्यवस्था अपने अर्थव्यवस्था के जरिए विश्व के उत्पीड़ित देशों के शासक वर्गो की सहयोगी भूमिका को बराबर इसलिए बनाए रखती है कि यही एक शसक्त माध्यम है जिसके चलते वह सांस्कृतिक घुसपैठ की एकतरफा प्रक्रिया पर अपना कब्जा करती है। फिर इसी माध्यम से राज्य के केन्द्र में बैठे सीमित लोगों पर अपनी पकड़ करते हुए, खास अभियान को व्यवहारिक रूप देती है। और एक समय ऐसा आता है कि इसी व्यवस्था के माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगमों के कानून-नियम तैयार होते हैं, इन्ही के माध्यम से इस व्यवस्था में ऊर्जा का संचार होता है, और विश्व व्यवस्था के केन्द्र में बैठे शासक वर्गो की संस्कृति पूरे व्यवस्था के माध्यम से राज्य की आखरी ईकाई की चेतना तक एक विश्व बाजार का रूप निर्धारण कर लेती है।
अमरीकी विज्ञानी लिअन कास ने लिखा है कि ‘‘हमारे पास बुद्धि कम है, इसलिए सावधानी हमारी फौरी जरूरत है। दूसरे शब्दों में ‘अंतिम बुद्धि’ के अभाव में हम इतना ही बुद्धिमान हो सकते हैं कि इतना भर जान लें कि हमारे पास पर्याप्त बुद्धि नहीं है तो बुद्धिमानी इसी में है कि काम न किया जाए। बुद्धिमानी सिर्फ इसी में हैं कि सावधानी, संयम, विलंब और (प्रक्रिया से ) बिलगाव, जैसे कदम मानव अभियंत्रणा के बारे में उठाए जाए।’’

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