रविवार, 25 जनवरी 2015

खबरों पर स्टैंड लेना ही पड़ता है: / अमिताभ अग्निहोत्री



पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार अपने करियर की शुरुआत सब एडिटर या उपसंपादक के तौर पर ही करते हैं और पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंचने वाले अधिकांश शख्स मैनेजिंग एडिटर के तौर पर रिटायर होते हैं। पर वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री अपने आप में विरले ही हैं। उन्होंने दैनिक जागरण से सब एडिटर के तौर पर करियर की शुरुआत की और आज समाचार प्लस चैनल के मैनेजिंग एडिटर के तौर पर अपने करियर की पारी को आगे बढ़ा रहे हैं। समाचार4मीडिया के असिस्टेंट एडिटर अभिषेक मेहरोत्रा के सात सवालों का ‘चक्रव्यूह’ कुछ यूं पार किया अमिताभ अग्निहोत्री ने...

 एक सब एडिटर से मैनेजिंग एडिटर बनने का नुस्खा क्या है, यह बताइए ताकि तमाम नवोदित पत्रकार इससे प्रेरणा पा सकें?
देखिए, सफलता का एक ही मूलमंत्र है काम के प्रति समर्पण। सन् 88 में आईआईएमसी में टॉप करने के बाद माननीय कमलेश्वर जी की संपादकीय टीम का हिस्सा बनते हुए दैनिक जागरण में सब एडिटर बना। वहां डेस्क के काम को तल्लीनता के साथ सीखा। जब करीब डेढ़ वर्ष बाद कमलेश्वर जी और उनकी टीम ने दैनिक जागरण छोड़ा तो जागरण प्रबंधक ने मेरे काम को देखते हुए अखबार निकालने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी। बस फिर क्या था, खूब जम कर काम किया और फिर छह महीने में प्रमोशन दर प्रमोशन मिलते गए और सब एडिटर से डीएनई यानी डिप्टी न्यूज एडिटर तक का सफर तय किया। लेकिन मन में रिपोर्टिंग करने की जो इच्छा थी, उसके चलते 1991 में जागरण के नैशनल ब्यूरो का हिस्सा बन गया। वह दौर राम मंदिर आंदोलन का था और मेरी बीट उस समय बीजेपी, आरएसएस और वीएचपी थी, तो बस रोज बड़ी खबरें ब्रेक करता था और 6 दिसंबर की तिथि निर्धारण के बारे में भी जागरण ने ही सबसे पहले खबर ब्रेक की थी, वो बाइलाइन स्टोरी बहुत चर्चा का विषय बनी।

उसके बाद 1993 में अखबार ‘आज’ के नैशनल ब्यूरो का हिस्सा बना। यह वो दौर था जब शादी हुई थी तो थोड़ा समय वैवाहिक जीवन से लेकर सामाजिक जिम्मेदारी और घर निर्माण आदि आवश्यक कार्यों को देना था, तो उस समय ‘आज’ के साथ एक दशक लंबी पारी खेली। उसके बाद 2004 में दैनिक भास्कर ग्रुप के प्रमुख सुधीर अग्रवाल के साथ मीटिंग हुई और फिर भास्कर के नैशनल ब्यूरो को जॉइन किया। भास्कर के बैनर तले भी जमकर रिपोर्टिंग करने के बाद 2008 में दिल्ली में‘देशबंधु’ अखबार की लॉन्चिंग के समय संपादक के तौर पर वहां जुड़ गया। यह वो समय था जब अखबार के बंडल की बंधाई से लेकर अखबार की छपाई तक हर विधा को बारीकी से सीखा, साथ ही साथ रिपोर्टिंग से लेकर एडिटोरियल राइटिंग तक अपनी कलम खूब चलाई।

पर हमेशा नया सीखने की ललक ने कदम कहीं भी ठहरने नहीं दिए। 2010 में टोटल टीवी ज्वाइन कर टेलिविजन इंडस्ट्री को समझा। फीड ट्रांसफर से लेकर पीटूसी और ब्रॉडकास्टिंग तक के हर चरण को समझने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय दिया। करीब डेढ़ साल वहां काम करने के बाद दिसंबर 2011 में समाचार प्लस की परिकल्पना के साथ जुड़ा और 15 जून 2012 को समाचार प्लस का यूपी/उत्तरांचल चैनल लॉन्च किया और 6 अगस्त 2013 को राजस्थान चैनल शुरू कर दिया।



समाचार प्लस के शो ‘बिग बुलेटिन’ और ‘चक्रव्यूह ‘में आप जिस तरह से अपनी तल्ख टिप्पणी रखते हैं, वो कोई स्ट्रैटजी है या फिर यह आपका स्टाइल है?
बेबाक बोलना मेरी आदत है। ‘बिग बुलेटिन’ में ही नहीं, 2004 से जब टीवी चैनलों में पैनल डिस्कशन का हिस्सा बना करता था, तब भी नेताओं को खरी-खोटी सुनाता था। मेरा साफ मानना है कि अगर आपने काम नहीं किया है, तो आपको सुनना ही पड़ेगा। हां एक बात जरूर है कि समाचार प्लस के शो ‘बिग बुलेटिन’ के दौरान मैंने मैनजिंग एडिटर के तौर पर एक एडिटोरियल व्यू देने की परंपरा जरूर शुरू की। इसका फीडबैक यह मिला कि अधिकांश दर्शक यही कहते हैं कि आपकी बात जनता की आवाज होती है। तमाम लोग सवाल पूछते हैं कि जिस तरह आप नेताओं को असलियत दिखाते हैं, क्या आपसे नेता नाराज नहीं होते, इस पर मेरा एक ही जवाब होता है कि मैं पक्षपात विहीन टिप्पणी करता हूं, न मुझे किसी का भय है और न किसी से द्वेष। आज भी जब किसी शो में बैठता हूं तो एक अघोषित दवाब अपने ऊपर महसूस करता हूं, जो मेरी ज्यूरी यानी दर्शकों का होता है। लोगों की आपसे अपेक्षाएं होती हैं और अगर आप न्यायसंगत बात नहीं कह पा रहे हैं, तो आपको मीडिया से संन्यास ले लेना चाहिए।

माना जाता है कि संपादक या मैनिजिंग एडिटर पर प्रबंधन का काफी दवाब होता है, आपका इस पर क्या कहना है?
मेरा इस सवाल पर एक ही जवाब होता है कि जितने दवाब या दखलअंदाजी का जिक्र किया जाता है, असल में वैसा होता नहीं है। अधिकांशत:  मैंने पाया है कि प्रबंधन के दबाव के नाम पर एक हौव्वा बनाया जाता है। देशबंधु में मैं जब संपादक हुआ तो मैंने वहां निधन/श्रद्धांजलि का एक कॉलम शुरू किया जो मुफ्त में छपता था। लोगों ने हमारे इस कदम का खूब स्वागत किया, प्रबंधन ने भी कभी इस पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। मेरा मानना है कि अगर आप ठीक नीयत से काम करते हैं, तो कोई आपको नहीं रोकता है।

ऐडवरटोरियल कॉन्सेप्ट पर आपकी क्या राय है ?
मैं इस कॉन्सेप्ट से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता हूं। मेरा स्पष्ट मानना है कि एडिटोरियल और ऐडवरटाइज़मेंट के बीच अंतर रखना ही चाहिए। ऐडवरटोरियल कॉन्सेप्ट पाठक या दर्शक के साथ छलावा है। प्रायोजित परिशिष्ट की अवधारणा ही मूलत: गलत है। अखबार या चैनल की संपादकीय ईमानदारी के साथ कुछ भी लागलपेट नहीं होनी चाहिए।

आजकल चैनलों पर खबरों के साथ-साथ खेल, क्राइम और मनोरंजन शो भी खूब आ रहे हैं, कहीं चैनल अपने मुख्य काम से भटक तो नहीं गए हैं ?
मैं सोच ही रहा था कि यह सवाल अभी तक क्यों नहीं पूछा गया ? हार्ड कोर खबरों को तो चैनल दिखाते हैं ही, पर हां साथ ही साथ काफी अन्य सेक्टर की खबरों या फीचरिश खबरों को भी लिया जा ता है। इस बात को उदाहरण के जरिए समझिए। हमारे यहां एक कहावत है, खिचड़ी के चार यार-चटनी, पापड़, दही, अचार तो बस इसी आधार पर जैसे हिंदुस्तान के भोजन की थाली विविधता पूर्ण होती है। चैनल भी विविधताओं के साथ आपको कंटेंट परोस रहे हैं ताकि आपके लिए कुछ बोरिंग न हो।

आजकल जिस तरह मीडिया इंस्टिट्यूट्स की बाढ़ आई है, क्या आपको लगता है कि इससे जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स की क्वॉलिटी बहुत बढ़िया हो गई है?
आपने कबीर का दोहा `कबीर' यह घर प्रेम का,  खाला का घरनाहिं । सीस उतारे हाथि धरि,  सो पैसे घर माहिं’ तो सुना ही होगा। बस इसी तर्ज पर मेरा मानना है कि अब कुकुरमुत्तों के तरह उग रहे मीडिया इंस्टिट्यूट्स से कोई बड़ा लाभ नहीं हो रहा है। सुविधा की नौकरी और सुरक्षित जीविका चाहने वाले पत्रकारिता में न आएं, यही ठीक है। पत्रकारिता को मैं एक अनुष्ठान की तरह मानता हूं। जिस तरह अध्यात्म के लिए आत्मा का शुद्धिकरण जरूर है उसी तरह जर्नलिज्म के लिए व्यक्तित्व का शुद्धिकरण आवश्यक है।

मीडिया ट्रायल के नाम पर तमाम बार मीडिया को कठघरे में किया जा ता है, आप इसे किस तरह देखते हैं ?
तमाम बार मैंने मीडिया ट्रायल पर आयोजित चर्चाओं में भाग लिया है और मेरा इस विषय पर यही कहना है कि जिस तरह लोग मीडिया ट्रायल की बात करते हैं तो ऐसे में खबर लिखना या चलाना बहुत ही मुश्किल है। सिर्फ कथित घटना के चलते अमुक पर लगा कथित आरोप लिखना कहां तक सही है। अगर मेरे सामने कोई घटना घटी है या मैं किसी भी तरह से घटना से परिचित हूं तो मुझे एक स्टैंड लेना ही पड़ेगा। अगर हम हर समय फाइनल फैसले का ही इंतजार करते हैं तो फिर किसी भी खबर को पूरी तरह से बीस साल बाद ही रिपोर्ट कर सकेंगे।

प्रस्तुति-- किशोर प्रियदर्शी, राहुल मानव

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