रविवार, 11 जनवरी 2015

पत्रकारों के पत्रकार संजीव भानावत के लिए दो शब्ज


महापत्रकार संजीव भानावत के प्रति दो शब्द 


 Anami Sharan Babal 
 दुनिया में हंसना सबसे कठिन होता है सर मगर आप हंसते भी है और जग को हंसाने और जागरण करने की अनवरत चेष्टा भी करते है। आपके साथ मेरा परिचय का संवंध या सिलसिला 1987 में तब शुरू हुआ जब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रवेश किया तो आर्येन्द्र उपाध्यायके जरिए शुरू हुआ और 2015 में यह कहते हुए कतई संकोच नहीं हो रहा है कि लगभग 30 साल तक लगातार चलते और जलते हुए किसी युवा से अधिक मचलते हुए और पत्रकारिता के संग टहलते हुए आपको देखकर कभी कभी सहसा चकित रह जाता हूं। यह बार बार सुना था कि एक आदमी कभी रिटायर नहीं होता यह आपको देखकर महसूसकर लगता है कि आपकी उर्जा उष्मा और पत्रकारिता के लिए सर्मपण और अथक सक्रियता से अचंभा भी होता है। दिल्ली से आप दूर है यह सोच कर कभी कभी लगता था कि इतने सक्रिय सज्जन को तो दिल्ली में होना चाहिए था, मगर आज मैं पूरे गौरव के साथकहता हूं कि भगवाल ने आपको दिल्ली के दुर्गंध से दूर रखा तभी पत्रकारों के पत्रकार रहते और हजारों पत्रकार को पत्रतार बनाने के बाद भी आपमें ललक और जीवंतता बनी हुई है। तीन दशक तक लगातार सक्रिय देखते हुे मैं यह दावा करता हूं कि यदि पुरस्कारों में ईमानदारी बरती जाती और पत्रकारिता के लिए यदि कोई ज्ञानपीठ पुरस्कार होता तो इस समय आपसे योग्य उम्मीदवार कोई नहीं था। मेरी बात बहुतों को चापलूसी भी लग सकती है, मगर संजीव भानावत सेमेरा यही रिश्ता है कि आज तकहमलोग कभी न मिले है न फिलहाल मिलने का कोईसंयोग ही है। केवल शब्दों का नाता है। और फेसबुक पर लगातार छह माह तक आपके द्वारा आयोजित सम्मेलनों सेमिनारों की सफलता को देखकर आपकी क्षमता और आयोजन संगठन से मैं मोहित सा हो गया। ज्यादातरों के लिए एक आयोजन करना मुश्किल होता है, मगर यहां पर तो आयोजनों की बौछार को देखकर इसआदमी की दक्षता गुणवत्ता और पत्रकारिता के प्रति निष्ठा को मैं सलाम करता हूं।और हजारों पत्रकारों के गुरू को प्रणाम करता हूं, जिनके भीतर पत्रकारिता ही धड़कन है और जीवन भी। मगरसर पुरस्कारों की तो एक राजनीति होती है मगर मैं पूरे सम्मान के साथ यह मानता हूं कि आप अलग है। हालांकिमैं परमआ. रामजीलाल जांगिड सरका शिष्य रहा हूं जिसका मुझे गर्र्व भी है, पर इसका अफसोस भी है कि काश मैं अपका भी शिष्य रहता ताकि पत्रकारिता की गहराईयों को और जान पाता। पर मैं सर मैं एकलव्य कीतरह आपका शिष्य हूं,क्योंकि आपको गुरू और पत्रकारों के पत्रकार ( महा पत्रकार) है। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि हजारों पत्रकारों को परिमार्जित करना किसी बी सुयोग्य संपादक से बड़ा काम है. बड़ी जिम्मेदारी है। क्योंकि संपादक तो अपने अधीन पत्रकारों को निखारते हैं , मगर एक गुरू तो मिट्टी के माधो को आकार देता है।मेरी निष्ठा और आपके प्रति सम्मान हमेशा बनी रहेगी, क्योंकि आप मेरे गुरू शिक्षकमार्गदर्शक औरसलाहकार जीवनभर रहेंगे। अपने इस मन और दिल से माने गे गुरूको प्रणाम करता हूं , और यह मेरा सौभाग्य है कि इस समय आपसे योग्य पत्रकारिता का गुरू कोई नहीं है

1 टिप्पणी:

  1. अनामिशरण भाई, आपने भानावत जी के संबंध में जो लिखा है, उसी रूप में मैेंने भी उन्हें जाना है। अभिभूत कर देने वाला व्यक्तित्व है, उनके भीतर का मनुष्य सचमुच अत्यंत आत्मीय है।

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