बुधवार, 26 नवंबर 2014

भारतीय पत्रकारिता के हाशिये पर गांव







किंशुक पाठक, 
असिस्टेंट प्रोफेसर, बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, पटना 
ग्रामीण परिवेश तथा ग्रामीण जन के प्रति भारतीय जनमानस में गहरी संवेदनाएं हैं। प्रेमचंद, रेणु, शरतचंद्र, नागाजरुन जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने ग्रामीण परिवेश पर काफी कुछ लिखा है, परंतु ग्रामीण पत्रकारिता की दयनीय स्थिति काफी कचोटती है। कुछ क्षेत्रीय समाचार पत्रों को छोड़ दें, तो ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति संतोषजनक कतई नहीं है। दरअसल, दुनिया भर में यह लाइफ स्टाइल पत्रकारिता का दौर है। भारतीय पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है। पेज-थ्री पत्रकारिता का बढ़ता ‘स्पेस’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। किंतु होना कुछ और चाहिए। देश की करीब सवा सौ करोड़ आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाने वाले 70 प्रतिशत ग्रामीण लोगों की ‘लाइफ स्टाइल’ हमारे मीडिया की विषय-वस्तु क्यों नहीं हो सकती?
गांवों के लोगों को जब लगता है कि उसकी बातों को भी मंच मिलना चाहिए, तो वे खुद छोटे स्वरूप के अखबार निकालने के प्रयास करते हैं। 2008 में बुंदेलखंड के एक छोटे-से गांव से वहां की जागरूक महिलाओं ने खबर लहरिया नामक टैबलॉयड साइज का अखबार निकाला, जिसे 2009 में यूनेस्को से ‘किंग सेन्जोंग’ अवॉर्ड भी मिला। बुंदेलखंड से शुरू हुआ यह समाचार-पत्र साल 2011 से बिहार के सीतामढ़ी व शिवहर जिलों से स्थानीय अंगिका भाषा में न सिर्फ प्रकाशित होना शुरू हुआ, बल्कि यह 70,000 से ज्यादा पाठकों द्वारा पसंद भी किया जाने लगा है।
ग्रामीण पत्रकारिता का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए लगभग 20 वर्ष पहले झारखंड के दुमका के गौरीशंकर रजक ने अपनी बात अनसुनी रह जाने के बाद  पन्नों पर अपनी पीड़ा व्यक्त कर उन्हें जगह-जगह बांटना शुरू किया और धीरे-धीरे लोगों ने उनकी बातों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी के अनुसार, भारत में 62,000 समाचार-पत्र हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत यानी लगभग 55,000 स्थानीय भाषाओं में छपते हैं। लेकिन इनमें 50,000 की प्रसार-संख्या 10,000 से कम है। इतनी कम प्रसार-संख्या के कारण इनमें से कई अक्सर घाटे में चलते हैं, पर अपनी शुद्ध स्थानीयता के कारण ये पाठकों को पसंद आते हैं। यह दीगर बात है कि इन पत्रों के संवाददाता आम तौर पर बहुत शिक्षित-प्रशिक्षित नहीं होते। लेकिन अनेक बार इनकी खबरें राष्ट्रीय सुर्खियां भी बनती हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को  पत्रकारों को शिक्षित करने के कई कार्यक्रम संचालित करती है। उसी तर्ज पर भारत में ग्रामीण पत्रकारों को प्रशिक्षित करने के लिए कार्ययोजना बनाए जाने की जरूरत है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिबद्ध पत्रकारों की संख्या तो बढ़ेगी ही, उनकी रिपोर्टों की गुणवत्ता भी सुधरेगी और साथ ही उनकी व्यक्तिगत आर्थिक हालत में भी बेहतर हो सकेगी। पर मूल प्रश्न यही है कि हमारी पत्रकारिता के केंद्र में गांव, किसान और उनकी समस्याएं कब आएंगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

प्रस्तुति-- किशोर प्रियदर्शी, धीरज, उपेन्द्र कश्यप

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