रविवार, 30 नवंबर 2014

संचार के मॅाडल और संचार शोध



 
संचार क्‍या है?
प्रस्तुति-- स्वामी शरण, नुपूर,सिन्हा

संचार प्रेषक का प्राप्तकर्ता को सूचना भेजने की प्रक्रिया है जिसमे जानकारी पहुंचाने के लिए ऐसे माध्यम (medium) का प्रयोग किया जाता है जिससे संप्रेषित सूचना प्रेषक और प्राप्तकर्ता दोनों समझ सकें . यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिस के द्वारा प्राणी विभिन्न माध्यमों के द्वारा सूचना का आदान प्रदान कर सकते हैं. संचार के श्रावानिक (auditory) माध्यम हैं (जैसे की) बोली, गान और कभी कभी आवाज़ का स्वर एवं गैर मौक्हिक (nonverbal), शारीरिक माध्यम जैसे की शारीरिक हाव भाव (body language), संकेत बोली (sign language), सम भाषा (paralanguage), स्पर्श (touch), नेत्र संपर्क (eye contact) अथवा लेखन (writing) का प्रयोग संचार की परिभाषा है - एक ऐसी क्रिया जिस के द्वारा अर्थ का निरूपण एवं संप्रेषण (convey) सांझी समझ पैदा करने का प्रयास में किया जा सके जीवन के सभी क्षेत्रों जैसे घर, स्कूल, सामुदायिक, काम की प्रक्रिया संचार के द्बारा ही या कहे की सहयोग से पुरे होते हैं . संचारण विभिन्न माध्यमों  द्बारा संदेश भेजने की अभिव्यक्ति है चाहे वह मौखिक अथवा अमौखिक हो,


संचार के प्रमुख आयाम elements
विषय वस्तु (किस प्रकार की वस्तुएं संचारित हो रहीं हैं )
स्रोत, स्कंदन करने वाला , प्रेषक या कूट लेखक (encoder)(किस के द्वारा),
रूप (किस रूप में),
चैनल ( किस माध्यम से),
गंतव्य, रिसीवर, लक्ष्य या कूटवाचक (decoder) (किस को)
 सलाह और आदेश दें और सवाल पूछें ज्ञान और अनुभव प्रदान करें (feedback)
.संचार शोर (communication noise)


संचार के प्रकार
अन्तः व्यक्तिगत(intrapersonal
 अन्तर व्यक्तिगत (interpersonal
समुह संचार (group communication)
जनसंचार (mass communication)

अंत:व्यक्तिक संचार
यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसकी परिधि में स्वंय व्यक्ति होता है। मनुष्य अपने अनुभवों घटनाओं व्यक्तियों प्रभावों एवं परिणामों काआकलन करता है। संदेश प्राप्त करने वाला और संदेश भेजने वाला स्वंय ही होता है। आत्मक विश्लेषण आत्मविवेचन आत्मप्रेरणा आदि इसी प्रकार के संचार कहलाते हैं। अर्थात दूसरे शब्दों में कह सकते है जब एक व्यक्ति अकेला अपने आप से बात करता है तो उसे स्वगत संचार कहा जाता है। क्योंकि वह स्वयं से ही संचार करता है।
अंरवैयक्तिक संचार
जब व्यक्ति एक दूसरे बातचीत करता है तो उसे अंरवैयक्तिक संचार कहते हैं। बातचीत सामने बैठकर टेलीफोन मोबाइल पेजर संगीत चित्र ड्रामा लोककला इत्यादि से हो सकती है। इस संचार प्रक्रिया में संदेशों का प्रेषण मौखिक भी हो सकता है और स्पर्श मुस्कुराहट आदि से भी। इसमें प्रतिपुष्टि तुरंत हो सकती है। संदेश प्रेषक और संदेश ग्राहक की निकटता इस प्रकार के संचार की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है।
अंरवैयक्तिक संचार दुतरफा प्रक्रिया है अर्थात स्त्रोता संदेश प्राप्त करते ही प्रतिक्रया देता है। यह संचार प्रक्रिया गतिशील होता है।
समूह संचार
जब व्यक्तियों का समूह आमने सामने बैठकर विचार विमर्श, विचार गोष्ठीवाद विवाद कार्य शिविर सार्वजनिक व्याख्यान इंटरव्यू आदि करता है तो उसे समूह संचार कहते है। यह बहुत प्रभावशाली होता है। क्योंकि इसमें वक्ता को अपने अपने क्षेत्र में अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है। स्कूल कॉलेज प्रशिक्षण केन्द्र चौपाल रंगमंच कमेटी हॉल जैसे प्रमुख स्थानों पर संचार गतिशील होता । दूसरे शब्दों में समूह संचार उन व्यक्तियों के बीच संभव है जो किसी उद्देश्य के लिये अमुख स्थान पर एकत्र होते हैं।
जन संचार
जनसंचार का अर्थ विस्तृत आकार के बिखरे हुये समूह तक संचार माध्यमों द्वारा संदेश पहुंचाना है। पर इस प्रकार के संचार में भी किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। रेडियो टेलीविजन टेपरिकार्डर फिल्म वीडियो कैसेट सीडी के अलावा समाचारपत्र पत्रिकायें पुस्तकें पोस्टर इत्यादि इसके माध्यम कहलाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य बहुत विशाल है इसे किसी परिधि में रखना कठिन है। वर्तमान समाज में जनसंचार का कार्य सूचना प्रेषण विश्लेषण ज्ञान एवं मुल्यों का प्रसार तथा मनोरंजन करना है।

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संचार का इतिहास


कोई २००,००० वर्ष पूर्व मानव-वाणी के प्रादुर्भाव के साथ मानव संचार में एक क्रान्ति आयी थी। लगभग ३०,००० वर्ष पूर्व प्रतीकों का विकास हुआ एवं लगभग ७००० ईसापूर्व लिपि और लेखन का विकास हुआ। इनकी तुलना में पिछली कुछ शताब्दियों में ही दूरसंचार के क्षेत्र में बहुत अधिक विकास हुआ है। संचार के इतिहास को हम प्रमुख घटनाओं  से जोड कर अच्‍छे से समझ सकते हैं.


प्रमुख घटनाएँ


  • चित्रलिपि का विकास
  • वर्ण आधारित लिपि का विकास
  • कागज का आविष्कार
  • घूर्णी प्रिंटिंग का विकास
  • यूरोप में समाचार पत्रों का प्रकाशन
  • फोटोग्राफी का विकास
  • चलचित्र (सिनेमा) का आविष्कार
  • विद्युत टेलीग्राफ
  • दूरभाष
  • रेडियो - सन् १८८८ में हर्ट्ज ने रेडियो तरंगों पर प्रयोग किये।
  • दूरदर्शन - सन् १९२३ में बेयर्ड ने टेलीविजन सिस्टम का पेटेंट लिया।
  • अन्तरजाल का विकास -
  • मोबाइल फोन का विकास 


    संचार के मॉडल



    शान्नोन और वीवर

    शान्नोन और वीवर का मूल मॉडल  रेडियो और टेलीफोन के प्रौद्योगिकियों के कामकाज को समझने के लिए डिजाइन किया गया था.उनकी प्रारंभिक मॉडल के तीन elements में प्रेषक , चैनल , और रिसीवर शामिल थे . इनके अनुसार एक टेलीफोन बातचीत में टेलीफोनमें बात करने वाला एक व्‍यक्ति प्रेषक  टेलीफोन एक चैनल और दुसरा व्‍यक्ति रिसीवर होता था। इस संचार में अवरोध पैदा करने वाले सिग्‍नल को उनहोने  शोर का नाम दिया  . और यह बताया कि शोर भी संकेत के अभाव का मतलब हो सकता है. एक साधारण भाषा में, इसे अक्सर ट्रांसमिशन मॉडल या standard view of communication संचार के मानक दृश्य के रूप में जाना जाता . इस मॉडल की ताकत सरलता, व्यापकता, और quantifiability हैं.


    सामाजिक वैज्ञानिकों क्लाउड शान्नोन और वॉरेन वीवर निम्नलिखित तत्वों पर आधारित मॉडल है:
    1. एक जानकारी के स्रोत है , जो एक संदेश का उत्पादन करते है.
    2. एक ट्रांसमीटर , जो संकेतों में संदेश encodes को करता है
    3. एक चैनल है , जो संकेतों संचरण के लिए अनुकूलित कर रहे हैं
    4. एक रिसीवर है , जो 'डीकोड' (reconstructs) संकेत से संदेश.में करता है 
    5. एक गंतव्य है , जहां संदेश आता है.
शान्नोन और वीवर का तर्क है कि इस सिद्धांत के भीतर संचार के लिए समस्याओं के  तीन स्तर थे.
1तकनीकी समस्या कैसे सही ढग से संदेश को प्रेषित किया जा सकता है?
अर्थ semantic समस्या: ठीक ठीक कैसे अर्थ को अवगत कराया जाए ?
3 प्रभावशीलता समस्या: कारगर ढंग से कैसे प्राप्त अर्थ को व्यवहार को प्रभावित करने वाला बनाया जाए?
संचार शोध

जब हम संचार शोध की चर्चा करते है तो इसका तात्पर्य मुख्य रूप से जनसंचार प्रक्रिया एंव संचार के प्रभावो का वैज्ञानिक अध्ययन करना है। जिससे किसी तथ्यात्मक निष्कवर्ष पर पहुंचा जा सके। निरीक्षण-परीक्षण के प्रयोग पर अधारित वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग करने पर ही सत्य को खोजा जा सकता है, सामाजिक घटनाओ पर संचार प्रभाव के संबंध में सत्य की खोज ही संचार शोध है। आज मीडिया और जनसंचार आधुनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यरकता बन चुके हैं और ये हमारे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और यहां तक व्ययक्तिगत जीवन को प्रभावित कर रहें हैं। मीडिया पर हमारी निर्भरता ही हमें उसकी प्रक्रिया और प्रभाव को समझने की प्रेरणा प्रदान करती है। संचार शोध के इतिहास पर नजर डाले तो पता चलता है कि सर्व प्रथम अमेरिका उच्च शिक्षा में संचार के क्षेत्र में संस्थाओं के विकास के अध्ययन परंपरा की शुरुआत हुई जो आगे चलकर यूरोपीय विकास के साथ संबद्ध हो गई। जो समाज विज्ञान में मानवता विकास के सन्दर्भ में ही संचार शोध के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष सन्‌ १९५५ में काज एंव लेयर फील्ड ने प्रस्तुत किया वैसे उसकी शुरुआात सन्‌ १९४० में ही हो गई थी इसके बाद जनसंचार के प्रतिमानों में सामाजिक संस्थाओ का अध्ययन एंव उनका सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक प्रभाव शिक्षा का इतिहास, पत्रकारिता एंव प्रकाशन के इतिहास का अध्ययन शामिल हो गया। फिर भी यह कहते हुए संकोच नही हो रहा है कि संचार अध्ययन के इतिहास पर अब तक कोई उल्ले खनीय शोध नहीं हो पाया है। कुछ संचार वैज्ञानिको ने अपने ऐतिहासिक शोध अध्ययन में संचार के कुछ संगठित संस्थाओ के क्षेत्र का निर्धारण किया है। जिनमें हेराल्ड लासवेल (१९४८) बेरेल्सन (१९५४) डेनिस मैक्विल (१९६९) रोजर और वेल (१९८५) के नाम उल्लेखनीय हैं। संचार शोध का ऐतिहासिक विश्ले)षण करने वाले विद्वानों में कार्ल हॉलैण्ड (१९४९), सीट्रोम (१९८२) कैफी और होिशयार (१९८५) वार्टेल, रोजर्स व शूमेकर (१९७१) आदि प्रमुख हैं।



संचार शोध का स्वरुप
1 संचारक स्त्रोत विश्लेषण
संचारक और उसके वे गुण जो प्रभावी संचार में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं, संचार शोधार्थियों को आकर्षित करते रहे हैं जैसे संचारक स्त्रोत की विश्वसनीयता, विशेषज्ञता, उद्देश्य और आकर्षण का आडियंस पर प्रभाव पड़ता है।
2 संदेश विश्लेषण
संदेश की अंतर्वस्तु का विश्ल्षण करना और इसका संचार के अन्य तत्वों के साथ संबंध खासकर लोगों के व्यवहार, मनोवृतियों और मुल्यों पर प्रभाव का अध्ययन संतार शोध का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसे अंतर्वस्तु को शैली, विस्तार, पाठनीयता, प्रभाव, तर्कशीलता और अन्य विशेषताओं के आधार पर जांचा जाता है।
3 चैनल विश्लेषण
विभिन्न प्रकार के चैनलों या संचार माधायमों की विशेषताओं उनका शक्तियों और सीमाओं, उनकी पहुंच और प्रभाव का अध्ययन भी संचार शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
4 आडियंस शोध
आडियंस की विशेषताओं जैसे उसका आकार गठन भौगोलिक वितरण रुचियों मनोवृत्तियों विचारों और व्यवहार (प्रतिक्रिया) का अध्ययन संचार शोध की दिलचस्पी का प्रमुख क्षेत्र रह है।
पाठक सर्वेक्षण और कार्यक्रम की रेटिंग जैसे टीआरपी ऐसे शोध का उदाहरण है।
5 प्रक्रिया और प्रभाव शोध
संचार माध्यमों के प्रभाव (विशेषकर संचार प्रक्रिया के विभिन्न तत्वों) का विभिन्न स्तरों – पहुंच व संपर्क व्यापकता समझ या बोध स्मृति बोध स्वीकृति और कार्रवाई पर अध्ययन संचार शोध का महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
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संचार; संचार के मॅाडल और संचार शोध जारी है ..................कल तीसरे भाग में ....................


4 टिप्‍पणियां:

  1. तीसरा भाग कहा है अंकुर जी?
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  2. थोड़ा और स्पष्ट करो जी
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