रविवार, 30 नवंबर 2014

स्तंभ लेखन के बारे में


- सुधा मूर्ति



प्रस्तुति- राहुल मानव

ND
मैं जब भी स्तंभ लिखती हूँ, पाठक उस पर विचार व्यक्त करते हैं। पर मुझे इस तरह की ढेरों प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं, जिनका स्तंभ से कोई लेन-देन नहीं होता है। कुछ प्रतिक्रियाओं में स्तंभ की सामग्री की प्रशंसा होती है तो कुछ व्यंग्यात्मक होते हैं। स्तंभ, जिसे मैं लिख रही हूँ, मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, जिनका संबंध हृदय से है। जहाँ तक संभव हो सके, मैं पाठकों तक अपने मन की बात पहुँचाने की कोशिश करती हूँ।

दहेज हत्याओं की भयावहता, भ्रष्टाचार के कारण और नैतिकता व ईमानदारी जैसी चीजों का वर्णन करना बहुत आसान है। इन बातों पर कोई भी उपदेश दे सकता है। ज्यादातर पाठक मुझसे कुछ व्यक्तिगत अनुभव चाहते हैं, कुछ ऐसा जो मेरे या मेरे मित्रों के साथ घटा हो। एक शिक्षक के तौर पर मैं इस तथ्य से परिचित हूँ कि उपमा और उदाहरण देने से विषय स्पष्ट हो जाता है।

इसलिए जब मैं लिखती हूँ तो अपने कुछ अनुभवों का वर्णन करती हूँ। वह वाकया मेरे परिवार या मित्रों के परिवार का हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरे बेटे ने क्या कहा या मेरी सहेली ने क्या कहा, मैं उसकी विशिष्टता दर्शाना चाहती हूँ। मैं दैनिक जीवन के कुछ पलों को इसलिए लिखती हूँ, जिससे कि पाठक खुद का उन से जुड़ाव महसूस कर सकें। मुझे ऐसे बहुत से पाठकों का सामना करना पड़ा, जो इसे गलत समझते हैं और आलोचनात्मक और तकलीफ पहुँचाने वाली प्रतिक्रियाएँ भेजकर उनका समय बर्बाद करते हैं।


ND
'हमेशा गलत नहीं होती नई पीढ़ी' शीर्षक से लेख लिखने के बाद मुझे एक पत्र मिला। मैंने अपने बेटे के साथ बातचीत का वर्णन किया था। इसे लिखने का उद्देश्य मेरी या मेरे बेटे की बढ़ाई करना नहीं था। यह दो पीढ़ियों के बीच का संवाद था, मेरा बेटा अगली पीढ़ी से और मैं अपनी पीढ़ी की प्रतिनिधि थी। मैं इस बातचीत का वर्णन बगैर व्यक्तिगत हुए भी कर सकती थी, श्री ए और श्रीमती बी के बीच हुई बातचीत के रूप में या फिर दो पीढ़ियों के बीच के अंतर पर सामान्य निबंध लिख सकती थी, परंतु मैंने सोचा कि जो सचमुच में हुआ है उसके बारे में लिखना ज्यादा बेहतर होगा। फिर जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ मुझे मिलीं उनमें इल्जाम था,-'आपने अपने बेटे के बारे में लिखा।'

एक बार मैंने सामाजिक असंवेदनशीलता के बारे में लिखा था। मैं दूसरों से यह कहना चाहती थी कि हम अपनी अलग दुनिया में इस कदर व्यस्त हो जाते हैं कि अपने आसपास क्या हो रहा है, यह जानने या सोचने का हमारे पास वक्त ही नहीं होता है। हमें निश्चित ही अपने परिवार कीफिक्र करनी ही चाहिए, मैं इससे इंकार नहीं कर सकती। परिवार महत्वपूर्ण होता है और किसी को अपने परिवार की कीमत पर समाजसेवी नहीं बनना चाहिए। मेरा प्रयोजन सिर्फ इतना ही था कि कम से कम हमें दूसरों के बारे में सोचना तो चाहिए।

मेरा मतलब यह नहीं था कि आर्थिक मदद या पैसा देना जरूरी है। मैंने अपने अनुभव से एक छोटा-सा उदाहरण दिया। मेरे द्वारा कहानी कहने और भगवान बुद्घ का यशगान करने पर कुछ पाठकों का रवैया आलोचनात्मक हो गया। मेरे लेख में, भगवान बुद्घ त्याग के प्रतीक और एक संवेदनशील व्यक्ति हैं, जो परोपकार करते थे। हर कोई बुद्घ नहीं हो सकता लेकिन कम से कम हम ऐसे महान लोगों से कुछ तो सीख ही सकते हैं। जब मेरे लेखों का सकारात्मक अंत होता है, वे पाठकों को पसंद आते हैं। लेकिन जब किसी लेख का अंत नकारात्मक होता है, मुझे इस तरह की प्रतिक्रियाएँ देते हैं कि-'हम आप से इस तरह की उम्मीद नहीं रखते हैं' या 'आपको हमेशा अच्छी बातें लिखनी चाहिए।'

वास्तविक जीवन में किसी भी मनुष्य में सभी अच्छे गुण नहीं होते, कोई मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र में सफल नहीं होता, कोई व्यवस्था बिना नकारात्मकता के नहीं होती। असल में जीवन सकारात्मकता और नकारात्मकता, आनंद और दुःख और ऊँच-नीच का मिलाजुला रूप है। यह एक लेखक का कर्तव्य है कि वह नकारात्मक बातों का भी वर्णन करे, क्योंकि यह भी जीवन का एक हिस्सा है और हमें अपने आप में सकारात्मक सोच रखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।

एक ही घटना को दो अलग-अलग लोगों द्वारा दो अलग नजरिए से देखा जा सकता है। मेरे स्तंभ में मैं पूरी कोशिश करती हूँ कि मैं सामान्य दिलचस्पी के विषयों पर अपने विचार व्यक्त करूँ। मेरी मंशा किसी भी व्यक्तिगत बात का प्रदर्शन या वर्णन करने की नहीं है। मैं सिर्फ किसीघटना का वर्णन करके, यह पाठकों पर छोड़ देना चाहती हूँ कि वे अपने जीवन से उससे संबंधित बात पर सोचें।

पाठकों की निष्पक्ष राय मुझे सोचने और मेरे व्यक्तिगत स्तंभ को और बेहतर बनाने के लिए मददगार होती है। न तो लिखने से प्राप्त धन, न ही प्रसिद्घि की चाहत की वजह से मैं लिखती हूँ। मैं लोगों से मिलने, उन्हें समझने और जीवन के अलग-अलग अनुभवों को बाँटने के लिए लिखती हूँ। कई बार लोग लालच या जलन की वजह से आवेगपूर्ण व्यवहार करते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वे बुरे हैं। यह भी मानव का ही गुण है। इसलिए मेरा विश्वास है कि पाठक ही मेरे प्रेरणास्रोत हैं।

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