मंगलवार, 25 नवंबर 2014

राहुल बारपुते : हिन्दी पत्रकारिता के अग्रज




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Rahul-Barpute
राहुल बारपुते उन सम्पादकों में से हैं, जिन्होंने अपने खून-पसीने से हिन्दी पत्रकारिता की नींव की सींचा। उन्होंने आजाद भारत की नई विधा की हिन्दी पत्रकारिता की दिशाएं तय की और नई पौध तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह बाबा यानी राहुल बारपुते का ही कमाल था कि राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, शरद जोशी, आलोक मेहता, डॉ. रणवीर सक्सेना, नरेन्द्रकुमार सिंह जैसे सम्पादक तैयार हो सके।
राहुल बारपुते की कोशिश थी कि नईदुनिया जैसा क्षेत्रीय अखबार भी अन्तरराष्ट्रीय स्तर का बने। इसी कारण राहुलजी के जमाने में राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होती थी। नईदुनिया में डॅगवुड और ब्लांडी जैसी कार्टून पट्टी उन्हीं के जमाने में छपना शुरू हुए।
श्री बारपुते की दिलचस्पी साहित्य, कला और सरकारी आयोजनों में रहा करती थी। भारत भवन के कार्यक्रमोें में वे हवाई जहांज से उड़कर भोपाल जाया करते थे। अशोक वाजपेयी उनके अभिन्न मित्रों में थे। श्री बारपुते मध्यप्रदेश कला परिषद में भी रहे। श्री राहुल बारपुते के मित्रों में विष्णु चिंचालकर (जिन्हें राहुल जी ने गुरूजी नाम दिया था), नाट्यकर्मी बाबा डिके और गायक कुमार गंधर्व प्रमुख थे। मराठी समाज की सांस्कृति़क गतिविधियों को भी नईदुनिया हमेशा प्रमुखता से स्थान देता था। मराठी समाज के लोग नईदुनिया को समाज का मुखपत्र ही मानते थे।
राहुल बारपुते मस्त-मौला तबीयत के थे। वे अपने साथियों को हमेशा सुविधाओं और लालच से दूर रहने की नसीहत देते थे। उनका मानना था कि पत्रकारों को ज्यादा वेतन नहीं लेना चाहिए और समाज की सेवा का ध्येय रखना चाहिए। श्री बारपुते को मैंने कभी भी एक घंटे से ज्यादा समय नईदुनिया के दफ्तर में नहीं पाया। वे शाम को आते, अपनी डाक देखते, कुछ फोन वगैरह करते, कभी-कभी शाम की मीटिंग को संबोधित करते और यह जा...... वह जा......। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नईदुनिया के कार्यालय में उनका मन नहीं लगता था, इसका मतलब यह भी नहीं कि उनकी दिलचस्पी अखबार रत्तीभर भी कम थी। वे जहां भी जाते, नईदुनिया उनके साथ होता, वे नईदुनिया के पर्याय थे और नईदुनिया उनकी पर्याय।
इंडियन्स और भारतीय : राहुल जी की यात्रा संस्करण
आप कौन है? ड्रग स्टोर में मेरे पास के स्टूल पर बैठे गठीले जवान ने पूछा। उसको मैंने जो जवाब दिया वह बताने से पहले ड्रग स्टोर क्या चीज होती है सो बता दूं। क्योंकि ड्रग स्टोर एक खास अमेरिकी संस्था है। वैसे ड्रग का मतलब होता है ‘दवाई’ और इन दुकानों में साधारण दवाइयां मिलती हैं, पर उसके अलावा अन्य कई चीजें भी मिलती हैं जैसे सिगरेट, तरह-तरह के गम (जिसे अमेरिकी उसी प्रकार चूसते हैं, जैसे भारतीय पान को) सोडा लेमन जैसे निरीह पेय पदार्थ आदि। यानी एक किस्म का प्राथमिक जनरल स्टोर, सोडा लेमन की दुकान का मिक्शचर समझ लीजिए। मैं भी पी रहा था अननास का रस, वह कुछ और पी रहा था। मैंने अपने गिलास में निगाह उठाकर उसकी और देखा और कहा ‘इंडियन’।
उसने एकाएक गंभीर होकर कहा- ‘मजाक कर रहे हो।’ मैं कुछ चकराया। अपनी राष्ट्रीयता बताने में मजाक वैâसे हो गया? मैंने कहा- ‘नहीं मैं इंडियन ही हूं।’ ‘अच्छा’ उसने कहा ‘अभी पता चल जाता है कि तुम वैâसे इंडियन हो। बताओ की किस राष्ट्र के इंडियन हो?’ मेरे चेहरे पर नासमझी की जो शून्यता छा गई होगी उस समय, वह उसने निश्चित ही भांप ली थी। ‘बताते क्यों नहीं कि तुम किस राष्ट्र के हो?’ यह कहकर उसने तीन चार ऐसे नाम लिए कि जिन्हें मैं जीवन में पहली बार सुन रहा था। मुझे निशाना बनाकर जो नाम उसने दनादन दागना शुरू किए थे, उसकी श्रृंखला समाप्त होने पर (अथवा सांस लेने के लिए सांस लेने के रुका होगा वह) मैंने कहा, ‘नो, नो, मैं इंडिया का रहनावाला हूं। इंडिया, इंडिया जो एशिया में है। अब उसकी समझ में कुछ आया ‘तो तुम अमेरिकी इंडियन नहीं हो?’ मैंने कहा, ‘बिल्कुल नहीं! हमारे पुरखों में भी जब कोई अमेरिकी इंडियन नहीं था, तो मैं वैâसे हो सकता हूं। आय एम एन इंडियन प्रâाम एशिया!’ गनीमत था कि उसे भूगोल का इतना ज्ञान तो था कि एशिया नाम की कोई चीज है, वरना उसे समझाना कठिन हो जाता। फिर मैंने पूछा कि ‘तुम कौन हो?’ तो उसने बताया कि मैं भी इंडियन हूं और अपनी जाति का नाम बताया। आठवीं कक्षा का ज्ञान कभी-कभी काम दे जाता है, वह मुझे अब पता चला। जब कोलम्बस के पीछे यूरोप से जहाज पर जहाज लदकर वहां के निवासियों को इस ‘नईदुनिया’ में ला रहे थे तो उन्हें यहां के मूल निवासियों से लड़ाइयां लड़नी पड़ी थी। इन मूल निवासियों को इंडियन्स या रेड इंडियन्स कहते हैं। आदि बातें या मुझे एकाएक स्मरण हो आई।
ये मूल निवासी आज भी अमेरिका में हैं और इन आदिवासियों की समस्या भी आदिवासी समस्या है। यहां भी अनुसूचित जातियां हैं, यह सुनकर मुझे कुछ तसल्ली हुई। केवल हमारे यहां नहीं, संसार के एक अगुवा राष्ट्र में भी वह समस्या है यह जानकर किस भारतीय को तसल्ली न होगी। इस समस्या का जैसे हल वहां खोजा जा रहा है, वैसे हमारे यहां लागू हो या नहीें, यह तय करना तो विशेषज्ञों की अनवरत चलने वाली मीनार श्रृंखला की सिफारिशों पर निर्भर करता है। मुझे इस समस्या का हल करने हेतु किए जा रहे अमेरिकी सरकारी प्रयासों में से एक को कुछ देखने का अवसर मिला। कुछ देखना और अध्ययन करना, इसमें बड़ा फर्वâ है, सो बताना जरूरी नही है। बहरहाल जो कुछ देखा और सुना उसका निष्कर्ष यही निकला है कि जहां बगैर कुछ दिए ही कुछ मिलता है, वहां तरक्की मुश्किल है। ‘समथिंग फॉर नथिंग’ कहा था मेरे मित्रों ने। और बात भी ऐसी ही है।
अमेरिका के आदिम निवासियों में और अमेरिका को अपना निवास बताने वालों में काफी अर्से तक हिंसक संघर्ष चलता रहा। पर अन्त में आदिम जातियों को विज्ञान की संहारक शक्ति के समक्ष पराजय स्वीकार करनी पड़ी। अब चाहे इसे तत्कालीन अमेरिकी शासकों की उदारता कहें या यह मानें कि विवेक की चुभन ने प्रशासन को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि इन विभिन्न आदिम जातियों से समझौता किया जाए। १८६८ में संधि में हो गई और ऐसे क्षेत्र निर्धारित किए गए कि जो केवल आदिम जातियों के लिए ही आरक्षित हों। अमेरिका में ऐसे अनेक आरक्षित केन्द्र हैं। रिजर्वेशन शून्य कहते हैं उन्हें। रैपिड सिटी के पास (अर्थात केवल ११५ मील के फासले पर) पाइन रिज रिजर्वेशन है। सो इसे देखने की बात तय है।
एक, ११५ मील का फासला कोई खास नहीं माना जाता, यह मैं अब तक के अनुभवों से जान ही चुका था। सो जब लॅरी ने कहा कि पाईनरिज घूम आएं तो मैं उस ‘घूम आने’ की बात का प्रतिवाद नहीं कर सका। वहां तक पहुंचने में जो दो ढाई घंटे लगे, उस अर्से में इन अमेरिकी इंडियन्स के बारे में कुछ जानने का प्रयास मैंने किया। इनकी अनेक जातियां हैं और बोलियां भी अनेक हैं। नाम भी इनके मजेदार हैं जो इन प्रमुखों के नाम से चले आ रहे हैं। जैसे लाल बादल, पगला घोड़ा, वह जवान जिसके घोड़े से लोग डरते हैं, चिलम (पाइप) भरने वाला आदि। मुझे यह नाम बड़े पसंद आए। बैशक लगते अटपटे हैं- पर इसका कारण यही है कि वे अनुवाद मात्र है और अनुवाद में यह एक खासियत होती है। यदि कोई परमेश्वर लाल को मिस्टर ग्रेटेस्ट गाड रेड कहे तो हमें अटपटा लगेगा ही। मैंने लॅरी से अपनी प्रतिक्रिया बताई और यह वाक्या भी सुनाया जिसका उल्लेख किया जा चुका है। उसे यह अनुवाद वाली बात कहां तक समझ में आई कहना कठिन है पर भारतीय और अमेरिकी भारतीय में से केवल ‘भारतीय’ ‘‘भारतीय’’ (इंडियन्स) के उल्लेख से हुई गड़बड़ी उसे खूब मजेदार लगी। मैंने भी हंसी में लॅरी का साथ दिया अवश्य, पर मन ही मन सोचा कि उस समय बात इतनी विनोदपूर्ण नहीं लगी थी।
पाइन रिज एक बड़ा खूबसूरत स्थान है, इसमें कोई शक नहीं! बल्कि रैपिड सिटी में पाईप रिज तक जाने वाला खूबसूरत रास्ता ही दर्शनीय है और यह बस्ती जो तब एक खास जाति का घर बन गई है, बड़े ढंग से बसाई गई। इस आरक्षित क्षेत्र की विशेषता यह है कि यहां सिर्पâ आदिम जाति के लोग ही बस सकते हैं जो गैर आदिम दिखाई देते हैं वे या तो मिशनरी हैं, या सरकार के इंडियन अपेâअर्स विभाग के कर्मचारी हैं या फिर सलाहकार विशेषज्ञ हैं। वर्ना सारी बस्ती आदिवासियों की ही है। हालांकि इस पर खर्च अमेरिकी केन्द्रीय सरकार करती है।
पाइन रिज में अच्छा खासा सरकारी स्वूâल है। (मिशनरी स्वूâल भी है) अस्पताल है, बिजली है- मतलब न्यूनतम आधुनिक सुविधाएं सब उपलब्ध हैं। विकास के विभिन्न कार्यक्रम भी जारी है, लेकिन इन सब का नतीजा? निश्चित रूप से कहना कठिन है। यहां उच्च अधिकारी से मुलाकात होने पर मैंने पूछा कि यहां के लोग अन्यत्र जा कर क्यों नहीं बसते? तो पता चला कि जाते हैं, पर अधिकांश लौट कर चले आते हैं। मैंने यह भी तलाश करने की कोशिश की कि इस प्रकार की विशेष व्यवस्था कब तक जारी रहेगी? इसका भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। हालांकि यह स्पष्ट हो गया कि विभिन्न लोगों से प्रश्नोत्तर हो जाने के पश्चात कि ऐसे कोई संभावना निकट भविष्य में नहीं है।
एक बड़ा मजेदार तथ्य यह सामने आया कि इंडियन्स की वर्तमान स्थिति के लिए उनके चरित्र की कई विशेषताएं भी एक हद तक जिम्मेदार हैं। जैसे उन्हें कल की परवाह नहीं होती। जिसे भी कुछ मिल जाता उसे आपस में बांट-बूंट कर लोग आनन्द मनाते हैं। इस पर जब मैंने राय व्यक्त की कि इन का दोष यही है कि ये लोग पर्याप्त रूप से स्वार्थी नहीं है। तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हमारे साथ जो गाइड महाशय थे उन्होंने उक्त बात को अत्यंत गंभीरतापूर्वक ग्रहण किया। वे बोले- पर्याप्त! कहिए कि इनमें से अधिकांश की स्वार्थ की समझ ही नहीं है। स्वार्थ और तरक्की का क्या संबंध है- सो जो दर्शनाचार्य ही बता सकते हैं पर, उस क्षण के बाद इंडियन्स के प्रति मेरे मन में अनायास ही आदर की भावना जाग उठी। यह संभव नहीं रहा कि पिछड़ा हुआ स्वीकार करूं (हालांकि उनकी आर्थिक दशा सम्पन्न नहीं थी, यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी) इन आरक्षित क्षेत्रों की एक उल्लेखनीय बात यह है कि जिनके हेतु यह क्षेत्र है उन विभिन्न इंडियन्स जातियों का कोई भी सदस्य उसे खाना, कपड़ा, निवास आदि की न्यूनतम सुविधाएं तो मिलती ही हैं।
कुछ लोगों की राय में ‘समथिंग फॉर नथिंग’ वाली बात भी इनकी तरक्की की गति पर ब्रेक लगाए हुए है। वैसे इनके स्वूâल में (जहां हम भोजन के लिए निमंत्रित थे) जो बच्चे आए थे औसत अमेरिकी बच्चों जैसे ही नजर आए। स्वस्थ, स्वच्छ, जिन्दादिल, साफ-सुथरे, परन्तु फिर भी वास्तविकता है कि यहां के लोग सामान्यता अन्यत्र जाना पसंद नहीं करते। संभव है कि पर्याप्त स्वार्थी मनोदशा का अभाव और ‘समथिंग फॉर नथिंग’ की नीति दोनों का मिलाजुला परिणाम हो कि वह समाज अमेरिकी जीवन के व्यापक प्रवाह से अलग ही है, उस में घुल मिल नहीं पाया। जब वहां से वापस रैपिट सिटी लौटते समय हम पाइन रिज की सीमा रेखा पार कर रहे थे। वहां तब लगे तार के अहाते को देखकर मेरे मन में अनायास विचार आया कि स्वार्थविहीनों की रक्षा के लिए ऐसे आरक्षित अहातों की समुचित आवश्यकता है। अन्यथा स्वार्थी उन्हें आसानी से निगल जाएंगे।
पाइन रिज के अनुभव से मुझे कुछ झकझोर दिया था तो वापस अपने शेरॅटन जानसन होटल में एक अनुभव भी मिला कि जो किसी भी भले भारतीय इंडियन्स के हृदय को उत्साहित कर देता! इसका संबंध भी इंडियन से ही है- भारतीय इंडियन्स से! मेरे सीमित अनुभवों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा चुका था कि विदेशों में भारतीय हैं। उनसे यदि मिलना ही पड़े तो अत्याधिक सावधानीपूर्वक मिलना चाहिए क्योंकि अधिकांश यह मानते हैं कि वे कुछ खास हैं। उनकी अदाएं, बातचीत का ढंग कुछ इस प्रकार होता है मानों आपने उनसे नमस्ते क्या कर ली, अत्यंत छोटे मुंह कोई बहुत बड़ी बात कर डाली हो। कोई भयंकर दु:साहस! लेकिन हर नियम के अपवाद होेते ही हैं और जो खुशकिस्मत होते हैं ये ऐसे अपवादों से ही टकराते हैं।
लॅरी मुझे होटल के दरवाजे पर छोड़कर चला गया। यह कहकर कि डिनर के लिए मैं तैयार हो जाऊं तब तक वह भी तैयार होकर आ जाएगा। कमरे की चाभी लेने के लिए में स्वागत मेज पर पहुंचा। चाभी तथा डाक लेकर मैं लिफ्ट की ओर मुड़ा ही था कि पीछे से किसी ने आवाज दी क्या आप ही वह भारतीय हैं जो पिछले दिनों से यहां होटल में टिके हुए हैं? मैंने मुड़कर पीछे देखा। कोई नहीं, केवल लिफ्ट बॉय ही था। मेरे चेहरे पर अंकित अचरज को देखकर उसने मुस्कुरा कर फिर सवाल दोहराया। मैंने स्वीकृति में सिर हिलाते हुए कहा- जी हूं तो वही कहिए? उसने लिफ्ट का दरवाजा बन्द करते हुए कहा- मैं भी भारतीय हूं और आपसे मिलने की बड़ी इच्छा थी। क्षणार्ध के लिए मैं बड़ा प्रसन्न हुआ कि चलो, कोई तो है जिसे मुझसे मिलने की बड़ी इच्छा रही है, यानि अपनी भी शोहरत है। पर तत्काल ख्याल आया कि यह न अपना मुहल्ला है, न अपना दफ्तर। यहां भला किसी को मुझसे क्या वास्ता हो सकता है? जब मैंने उससे पूछा, तो उसने बताया कि इस क्षेत्र में भारतीयों की संख्या की संख्या कम है। (न्यूयॉर्वâ, वाशिंगटन, सेन प्रâांसिस्को, शिकागो, बॉस्टन की तुलना में) यानि गिनती के ही सही, मिल जाए। ईमानदारी की बात है कि मैं भी गपाष्ट के लिए लालायित था। सो हम दोनों बड़ी रात तक बातें करते रहे। (यानि डिनर से लौटने के बाद)
मेरे इस मित्र ने जो जानकारी दी, वह संक्षिप्त में इस प्रकार है कि वह हैदराबाद में काम करता था, पक्की नौकरी में था, पर जो भविष्य उस नौकरी में था वह अधिक उत्साहवद्र्धक नहीं था। सो उसने नौकरी छोड़ दी। बड़ी मुश्किल से किराए के पैसा जुटाकर यह यहां तक आया तथा (रैपिड सिटी) के खदान एवं इंजीनियरिंग के स्वूâल में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहा था। खर्च पूरा करने के लिए वह इस होटल में बैल बॉय का काम रात पाली में करता था और दिन में अध्ययन! नि:संदेह जीवन क्रम कठोर था, पर बगैर कठोर परिश्रम के तरक्की वैâसे हो सकती है? मैंने शास्त्री की ओर (यही उसका नाम है) गौर से देखा, (एकदम साधारण आदमी, कोई विशेषता नहीं; किसी दफ्तर मेंं यूडीसी होते हैं वैसा है! उम्र तीस के आसपास) और पूछा पर इसकी क्या गारंटी कि आगे का जीवन अधिक अच्छा होगा ही? शास्त्री ने मुस्कुराकर कहा- बिना किसी सिफारिश के यहां तक आया हूं। अपने परिश्रम के सहारे यह ऊंची ट्रेनिंग ले रहा हूं, इसलिए उम्मीद है- उसने वाक्य पूरा नहीं किया पर उसकी बात से जो आत्मविश्वास झलक रहा था, उससे बड़ी और किस ग्यारंटी की आवश्कता थी? शास्त्री ने बताया कि एक और भारतीय है वह भी इसी होटल में बेल बॉय है और उसी स्वूâल में पढ़ता है। उसी ने शास्त्री को मेरे बारे में बताया था। दरअसल वही शास्त्री का प्रेरणास्त्रोत था, क्योंकि पहले वही आया था (हैदराबाद से ही) और उसी ने शास्त्री को लिखा था कि हिम्मत करके चले आओ।
अगले दिन सुबह मुझे रैपिड सिटी से आगे बढ़ना था। लॅरी की गाड़ी नीचे होटल के सामने खड़ी थी। मैं नीचे उतरा हिसाब चुकाने के लिए और बेलबॉय सामान लाने ऊपर गया। हिसाब चुकाकर में जब बाहर आया तब तक सामान रखा जा चुका था। डिक्की बन्द कर बेल बॉय मुड़ा। मैं तुरंत पहचान गया शास्त्री का मित्र। अपने साहस एवं परिश्रम के सहारे भविष्य को बनाने में जुटे इन युवकों के प्रति अपनी सद्भावनाएं व्यक्त करने की धुन में मूर्खता कर बैठा। उनकी आर्थिक स्थिति का आभास मुझे लग चुका था, सो मैंने टिप देने के लिए वालेट खोलकर दस डॉलर का वोट निकाला। लॅरी आश्चर्य चकित मुद्रा से देख रहा था कि मैं क्या कर रहा हूं। पर बेल बॉय ने मेरा हाथ थाम लिया, अजी आप यह क्या कर रहे हैं? यह हो नहीं सकता। यह तो हमारी खुश किस्मती है कि आपके दर्शन हो गए। क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं?
साफ स्वच्छ हिन्दुस्तानी में कहे गए शब्द सुनकर मेरी जो हालत हुई उसका वर्णन करना कठिन है। मैं शर्मिन्दा कर रहा था। वास्तव में मैं स्वयं लज्जित था। मुझे जानना चाहिए था कि जहां तक मेरा संंबंध था ये साधारण बेल बॉय नहीं थे। आत्मसम्मान से परिपूर्ण, साहसी प्रतिनिधि थे नई पीढ़ी के। झेंपते हुए मैंने नोट जेब में रखा और लॅरी की पास वाली सीट पर जा पहुंचा। गाड़ी स्टार्ट करते ही लॅरी ने कहा- एक बेल बॉय और टिप लेने से इन्कार कर दे! आश्चर्य है।
हां, मैंने कहा- अत्यन्त सुखद आश्चर्य।
हवाई अड्डे पर बिदा लेते समय लॅरी ने पूछा राहुल। यदि मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूं अभी या भविष्य में तो मुझे नि:संकोच रूप से सूचित करना! मैंने तत्काल उत्तर दिया लॅरी उन बेल बॉय का ख्याल रखना। मुझे विश्वास है, लॅरी ने जरूर ही उनका ख्याल रखा होगा।
(१७ अगस्त १९६४)

बिन्दु-बिन्दु विचार

  • आमतौर पर अखबार बुद्धिमान लोगों द्वारा चलाए जाते है पर बुद्धिमान व्यक्ति गलती ना करें ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • जब भगवान ने इंसान बनाकर गलती की, तो इंसान के हाथों गलती होगी ही। लाजिमी है। बुद्धिमान लोग अक्लभरी गलती करते हैं।
  • कालिदास कौन थे और क्या थे? इन प्रश्नों का उत्तर इसीी पर निर्भर है कि आप क्या है।
  • शुरु में बड़ा होकर बाद में धीरे-धीरे छोटा होना अच्छी बात नहीं है। शुरु में छोटे और बाद में धीरे-धीरे बड़ा बनना यहीं प्रकृति का नियम है।
  • इंसनों में जब फर्वâ होता है तो अखबारों में क्यों नहीं होगा? असल चीज है निगाह।
  • यदि निगाह दुरुस्त हो तो साफ समझ में आ जाएगा कि फर्वâ क्या है? छोटे-बड़े का या दृष्टिकोण का।
  • छोटे-बड़े अखबार का क्या नाप। छोटे से छोटे अखबार भी बड़े माने गए है। जैसे ‘हरिजन’ और यह भी प्रत्येक अखबार से बड़ा अखबार हमेशा मिल ही जाता है।
  • जो उपद्रवी हो, गुण्डा हो उसका भविष्यकाल और जो सज्जन हो सभ्य हो उसका सत्कार हमारी सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप तो है ही साथ ही तरक्की का भी यहीं एक मात्र मार्ग है।
(नईदुनिया से)

प्रस्तुति-- स्वामी शरण, नुपूर सिन्हा

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