शनिवार, 29 नवंबर 2014

“नई दुनिया: एक परंपरा का अंत” या अवसान








Sher Singh
नई दुनिया मेरा सब से पसंदीदा अखबर था । अपने भोपाल प्रवास के दौरान में इस का एक एक पन्‍ना जैसे चाट लेता था । अपने हैदराबाद प्रवास के दौरान में इंदौर से हैदराबाद आने वाले अपने मित्रों को नई दुनिया का रविवारीय अंक ले कर आने के लिए अनुरोध करता था । जून – 2011 में गाजियाबाद में आने के बाद यही पेपर लगवा दिया । लेकिन एक दिन कुछ और ही नाम से पेपर आया तो मैंने यहां के संवाददाता अपने मित्र को फोन लगा कर पूछा कि यह क्‍या मजाक है । उन्‍होंने बताया कि नई दुनिया को बेच दिया गया है । जान कर बहुत दुख हुआ । शायद अपनी अपनी समस्‍याएं रही होगी । लेकिन हमारा तो प्रिय पेपर चला गया

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