शनिवार, 29 नवंबर 2014

टीवी समाचार की दुनिया / पुस्तक समीक्षा







भारत में टेलीविजन पत्रकारिता अपनी चरम सीमा पर है। टेलीविजन ने कुछ ही दशकों में पत्रकारिता को एक नई दिशा दी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रेडियो की हमेशा से ही एक सशक्त पहचान रही है और वर्तमान में न्यू मीडिया नए आयाम गढ़ रहा है, इसी के बीच टेलीविजन पत्रकारिता लगातार खुद को सशक्त करती नजर आती है। टीवी समाचार की बात करें तो हमारे देश में हिंदी समाचार चैनलों की अपनी एक अलग पहचान है। इसके श्रोता अपेक्षाकृत अंग्रेजी न्यूज चैनलों से अधिक हैं। टीवी में समाचार प्रसारण के कई पहलू हैं। इस क्षेत्र को करियर के रूप में चुनने वाले विधार्थियों के लिए क्लासरूम लेक्चर के साथ यह भी बहुत जरूरी हो जाता है कि असल में टीवी में काम होता कैसे है। खबर बनती कैसे है। रिपोर्टर इतने प्रभावशील कैसे होते हैं। लाइव की असल परिभाषा क्या है। कैमरा कैसे काम करता है इत्यादि।

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इन्हीं जिज्ञासाओं का जवाब देने के लिए की नई किताब टीवी समाचार की दुनिया आज बाजार में है। इस पुस्तक में समाचार प्रसारण के सभी पहलुओं पर सिलसिलेवार चर्चा की गई है। इस किताब की खास बात है कि इसके लेखक स्वयं टीवी प्रसारण क्षेत्र से दशकों से जुड़े हैं। समाचार प्रसारण के विभिन्न पहलुओं को उन्होंने अपने निजी अनुभव से पिरोया है। यही वजह है कि यह पुस्तक दूसरी पाठ्यपुस्तकों से थोड़ी अलग है।

इस पुस्तक को पांच चरणों में विभाजित किया गया है। पहले चरण में टेलीविजन में हिंदी समाचार चैनलों के विकास की विस्तार से चर्चा की गई है। लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में मीडिया की स्थापित करने में टीवी समाचार चैनलों की अहम भूमिका को बताया गया है। दूरदर्शन की भूमिका और प्राइवेट चैनलों की चर्चा के साथ-साथ शुरुआती प्राइवेट चैनलों जैसे जी टीवी, स्टार ग्रुप, एनडीटीवी और इन्हें स्थापित करने वाले व्यक्तियों आदि की भूमिका को भी देखा गया है। इंडिया टुडे ग्रुप के चैनल आज तक की विशेष रूप से चर्चा की गई है।

पुस्तक के लेखक ने इस पर खासी नजर डाली की कितने कम समय में एक सरकारी चैनल से प्रसारित होने वाले महज आधे घंटे का समाचार कार्यक्रम किस तरह एक चैबीस घंटे के समाचार चैनल में तब्दील हो गया। इसी चरण के दूसरे अध्याय में दूरदर्शन समाचार के विकास का उल्लेख किया गया है। इस अध्याय में टेलीविजन समाचार प्रसारण में दूरदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका की चर्चा की गई। पहली बार दूरदर्शन प्रसारण के लंबे अतंराल के बाद नियमित समाचार प्रसारण की शुरूआत 1965 से हुई थी जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाएं भी शामिल थीं। 2003 में दूरदर्शन 24 घंटे के समाचार चैनल के रूप में स्थापित किया गया।

पुस्तक के दूसरे चरण में लेखक ने हिंदी में टीवी के समाचार-प्रसारण तंत्र को समझाया है। इस अध्याय में टीवी पत्रकारिता के पहले पाठ के रूप में लॉगिंग प्रक्रिया और उसके अंतर्गत आने वाली दूसरी प्रक्रियाओं को विस्तार से समझाया गया है। न्यूज रूम बनाम ‘वॉर रूम’ शीर्षक के अध्याय में लेखक ने न्यूज रूम को खबरों की फैक्ट्री कहा है। न्यूज रूम को खबरों का केंद्र बताते हुए उसके सिद्धांत, वातावरण, कर्मियों, इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नॉलोजी आदि का परिचय दिया गया है। इसी चरण के एक अन्य अध्यायों में संपादक और प्रोड्यूसर के कार्यों की समीक्षा की गई है। खबरों के स्रोत के बारे में जानकारी देते हुए लेखक ने खबरों को न्यूज डेस्क तक पहुंचने की संपूर्ण प्रक्रिया को क्रमबद्ध तरीके से समझाया है।

तीसरे चरण में लेखक ने टीवी समाचार प्रसारण के जरूरी पहलुओं का क्रमवार उल्लेख किया है। इस अध्याय में सबसे पहले कैमरे की भूमिका को समझाया गया है। लेखक ने ‘क’ के सिद्धांत से अपनी बात रखने की कोशिश की है। इसमें कैमरा और कंप्यूटर का जिक्र किया गया है। मसलन टीवी न्यूज, घटना की तस्वीरों (कैमरा द्वारा) के आधार पर तैयार की गई स्क्रिप्ट (कंप्यूटर द्वारा) के अनुसार बनती है।

लेखक ने कैमरे की तकनीक, विभिन्न शूटिंग मोड, शॉट्स, मूवमेंट और फोकस आदि को समझाया है। इसी चरण के दूसरे अध्याय में टीवी समाचार प्रसारण के सबसे अहम पहलू वीडियो एडिटिंग की चर्चा की गयी है। ‘लाइव के लफड़े’ नाम के शीर्षक से लेखक ने लाइव कार्यक्रमों के प्रसारण में आने वाली विभिन्न चुनौतियों की चर्चा की है।

पुस्तक के चौथे चरण में लेखक ने समाचार बुलेटिन की विस्तार से चर्चा की है। इसमें हेडलाइन की संकल्पना को समझाते हुए लेखक ने उसकी अहमियत से रूबरू कराया है। हेडलाइन को बनाते समय बरतने वाली सावधानियां और उसके असर ने उचित ढंग से उठाया गया है। बुलेटिन के बनने से लेकर उसके प्रसारण तक की प्रक्रिया को इस अध्याय में समझाया गया है।

पांचवें और अंतिम चरण में लेखक ने वर्तमान में टीवी समाचार प्रसारण का एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है, जिसमें टीआरपी के खेल को पत्रकारिता पर हावी होते बताया है। इस चरण में विभिन्न समाचार चैनलों में हो रही टीआरपी की होड़ का संज्ञान लेते हुए कुछ कार्यक्रमों की चर्चा की गई है। बलात्कार की खबरों के प्रसारण के तरीके की चर्चा करते हुए इस जघन्य अपराध से जुड़ी खबरों को भी कहीं न कहीं टीआरपी के इर्द-गिर्द घूमता दिखाया गया है।

एक अन्य अध्याय में टेलीविजन चैनलों की निष्पक्षता पर सवाल जैसे मुद्दे की चर्चा की गई है। इसमें मीडिया ट्रायल और उससे जुड़ी रिपोर्टिंग की विस्तार से चर्चा की गई है। इसी क्रम में क्रिकेट को समाचार चैनलों पर बुरी तरह हावी होने की बात भी लेखक ने की है। समाचार चैनलों को बाइस्कोप से जोड़कर भी दिखाया है जिसमें एंटरटेनमेंट के कंटेंट की भरमार होती है, मतलब खबरिया चैनल खासा मनोरंजन करने में भी पीछे नहीं रहे हैं।

लेखक ने समाचारवाचक की भूमिका को नये ट्रेंड में न्यूज एंकर के रूप में बदलता हुआ बताया है। लेखक के विचार में एक तरह से समाचारवाचक की मृत्यु हो चुकी है। अब एंकर का जमाना है। दर्शकों ने पुराने पसंदीदा चेहरे भुला दिए हैं। आखिरी अध्याय में लेखक ने हिंदी में टेलीविजन समाचार के सरोकारों की बात की है। लेखक ने आज टेलीविजन पर हो रही पत्रकारिता को एक बहस का मुद्दा मानते हुए चैनलों की कारोबारी मानसिकता पर भी सवाल उठाने की कोशिश की है।

कुल मिलाकर इस पुस्तक में लेखक ने टेलीविजन समाचार से जुड़ी प्रत्येक छोटी-बड़ी जानकारी को सरल और मनोरंजक शैली में समझाने की कोशिश की है। यह पुस्तक मीडियाकर्मियों, छात्रों और श्रोताओं के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है।

पुस्तक : टीवी समाचार की दुनिया
लेखक : कुमार कौस्तुभ
किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य : 500 रुपए

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