मंगलवार, 25 नवंबर 2014

अनुवाद में सहायक तत्व






इंटरनेट के आने के बाद स्वतंत्र अनुवादकों का एक ऐसा समूह सामने आया है जिसने अनुवाद को उसके परंपरागत क्षेत्र से बाहर निकालकर सार्वजनिक जीवन के बड़े दायरे से जोड़ने का काम किया है। अपनी भाषा, संस्कृति और पेशे के प्रति सजग अनुवादक ब्लॉग के माध्यम से उन पाठकों से भी संवाद स्थापित कर रहे हैं जो अनुवाद की जटिलताओं से अपरिचित हैं। अब अनुवादक घर बैठे विदेशी एजेंसियों और क्लाइंटों के लिए काम कर सकते हैं। ब्लॉग से उन्हें इंटरनेट पर अपनी अच्छी छवि बनाने में भी मदद मिलती है।

अनुवाद से संबंधित 100 महत्वपूर्ण ब्लॉगों की सूची नीचे प्रस्तुत है :

1. http://patenttranslator.wordpress.com

2. http://lingocode.com/the-translators-teacup

3. http://translationjournal.blogspot.in

4. http://linguagreca.com/blog

5. http://translationmusings.com

6. http://thoughtsontranslation.com

7.
1

कृपया निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर देने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आप निम्नलिखित में से किसे सही वाक्य मानते हैं?

साथियों, तैयार हो जाओ।साथियो, तैयार हो जाओ।दोनों वाक्य सही हैं। अब संबोधन में अनुस्वार का प्रयोग मान्य हो गया है। पुराने नियम के आधार पर पहला विकल्प सही माना जाएगा। इनमें से किसी एक विकल्प को सही घोषित करना संभव नहीं है।
3

हाल ही में हिंदी अनुवादक समूह में प्रकाश शर्मा जी ने 'अंतरराष्ट्रीय' और 'अंतर्राष्ट्रीय' वर्तनियों की चर्चा की। मैंने उन्हें इन शब्दों में जवाब दिया :

"हिंदी में 'अंतरराष्ट्रीय' और 'अंतर्राष्ट्रीय' दोनों प्रचलित हैं। ऐसे शब्दों में एकरूपता पर ध्यान देना चाहिए। लेखक को एक ही पाठ में इन दोनों वर्तनियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

'अंतरराष्ट्रीय' को बेहतर वर्तनी बताने वाले लोग यह तर्क देते हैं कि 'अंतर्राष्ट्रीय' का अर्थ है 'राष्ट्र के भीतर का'। इसे आप 'अंतर्देशीय' शब्द के संदर्भ में बेहतर ढंग से

हिंदी में 'उप' और 'गैर' उपसर्गों के प्रयोग में एकरूपता नहीं है। 'उपमुख्यमंत्री' और 'गैरज़िम्मेदार' जैसे शब्दों को 'उप-मुख्यमंत्री', 'उप मुख्यमंत्री', 'गैर-ज़िम्मेदार' या 'गैर ज़िम्मेदार' भी लिखा जाता है। इन प्रयोगों में उपसर्ग की इस मूलभूत विशेषता की अनदेखी की जाती है कि इसका प्रयोग हमेशा शब्द के साथ होता है। हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि अंग्रेज़ी में non-nuclear जैसी वर्तनी में हाइफ़न या योजिका का प्रयोग नहीं करने पर शब्द अटपटा-सा दिखता है। यह समस्या हिंदी में नहीं है। हिंदी में उपसर्ग
3

अशोक सेकसरिया  ने कुछ दिनों पहले भारतीय भाषा परिषद में अंग्रेज़ी के प्रति बढ़ते मोह की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी। वे इस संस्था के संस्थापक दिवंगत सीताराम सेकसरिया के पुत्र हैं।

उनका पत्र नीचे प्रस्तुत है :

भारतीय भाषाओं को संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए जिन संस्थाओं को गठित किया गया हो , वे अगर अपने उद्देश्य से ठीक विपरीत काम करने लगें तो कम से कम उसका प्रतिवाद करना प्रत्येक भारतीय भाषा प्रेमी का कर्तव्य है । एक समय की ऐसी प्रसिद्ध और प्रतिबद्ध दो संस्थाओं नागरी प्रचारिणी सभा , वाराणसी तथा
6

हिंदी अनुवादक समूह की गूगल वेबसाइट पर निम्नलिखित विषयों से संबंधित वेबसाइटों की सूचियाँ उपलब्ध हैं :

अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश अनुवाद आलेख अनुवाद समाचार अनुवाद से संबंधित ऑनलाइन जर्नल व पत्रिकाएँ ऑनलाइन हिंदी पत्रिकाएँ ऑनलाइन हिंदी समाचार-पत्र डाउनलोड किए जा सकने वाले हिंदी शब्दकोश फ़ॉन्ट परिवर्तक मानक हिंदी वर्तनी के नियम हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दकोश हिंदी व्याकरण हिंदी साहित्य से संबंधित वेबसाइटें हिंदी सीखने वालों के लिए उपयोगी वेबसाइटें हिंदी-हिंदी शब्दकोश

अगर हिंदी या अनुवाद आपकी आजीविका का साधन
1

कुछ दिनों पहले अरविंद जी की सुपुत्री मीता जी से पेंगुइन कोश के बारे में बात करते समय मैंने उनसे अरविंद जी के कोशों की विस्तृत जानकारी माँगी थी। उन्होंने मुझे जो जानकारी दी है उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :

"अरविंद कुमार और कुसुम कुमार के कोश - एक परिचय

(प्रकाशन के कालक्रम से)

अरविंद कुमार और कुसुम कुमार -

1. समांतर कोश - हिंदी थिसारस

शब्द शक्ति को कई गुना बढ़ाने का सबल साधन है - समांतर कोश. आधुनिक भारतीय भाषाओँ मेँ एकमात्र बृहद और बहुपुरस्कृत थिसारस.

1757 में प्लासी के युद्ध के बाद कम्पनी की सत्ता का उभार पूरी तरह होना आरम्भ हो गया। 1763 ई. में तीसरे फ्रांसीसी युद्ध में विजयी होने के बाद कम्पनी के सामने अब कोई विदेशी प्रतिद्वंद्वी न रह गया था। 1765 ई. में बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्राप्त कर कम्पनी ‘‘कम्पनी बहादुर’’ बन गयी थी। प्रशासक के रूप में कम्पनी व्यापार-वाणिज्य के अलावा भारत की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी चिंतन करने लगी। ऐसा करना इंगलैण्ड की शासन परम्परा के अनुसार ही था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना 1600 ई.
1

इन दिनों पाठकों को नीलाभ जी और मनोज जी के ब्लॉगों पर महत्वपूर्ण रचनाकारों की अनूदित रचनाएँ पढ़ने को मिल रही हैं। आप ये ब्लॉग यहाँ पढ़ सकते हैं :

http://neelabhkamorcha.blogspot.com (नीलाभ जी का ब्लॉग)

http://padhte-padhte.blogspot.com (मनोज जी का ब्लॉग)

लिंक : http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/12/101202_russia_mafiawiki_pa.shtml

अशुद्धियाँ

1. बीबीसी के इस पेज पर 'रूस' को 'रुस' लिखा गया है।

2.
1

शिक्षा माध्यम के रूप में पौर्वात्य एवं पाश्चात्य भाषाओं की उपयुक्तता एवं ज्ञान विज्ञान के साधन के रूप में उनकी महत्ता इस दौर की बहसों के केन्द्र में थे। दूसरा दौर मैकाले एवं कम्पनी के चार्टर द्वारा अंग्रेजी शिक्षा को माध्यम रूप में चयन तथा सरकारी नौकरियों के लिए उसकी अनिवार्यता का दौर है। सच्चे अर्थों में एक औपनिवेशिक भाषा एवं साम्राज्यवादी उपकरण एवं वर्चस्व माध्यम के रूप में अंग्रेजी की प्रतिष्ठा की कालावधि भी यही है। मैकाले के सपनों के अनुसार अंग्रेजी मानस एवं शिक्षा में रचा बसा एक शिक्षित मध्

अनर्स्ट कैसिरर ने भाषाई मध्यवर्ती विश्व (Linguistic intermediary World) नामक पद का प्रयोग करते हुए भाषा को विश्व दृष्टि नियामक वस्तु स्वीकार किया। उनके अनुसार व्यक्ति की मानसिक क्रियाएं उसकी अपनी व्यक्तिगत विशिष्टताओं की अपेक्षा उसकी भाषा में निहित विश्व दृष्टि द्वारा निर्धारित होती है। विभिन्न समाज अपनी-अपनी भाषा द्वारा निर्मित अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। उनकी अवधारणाएं भी अपनी सामाजिक संरचना एवं प्रकारांतर से उनके द्वारा प्रयुक्त भाषा पर निर्भर होती हैं। बेंजामिन ली व्होर्फ के अनुसार ‘‘भाषा ह

'संवेद' के जनवरी अंक में प्रकाशित इस आलेख में ऋषिकेश राय ने भाषा के अनेक पहलुओं का वर्णन करते हुए भारत में अंग्रेज़ी के वर्चस्व के कारणों को इतिहास के पन्नों में खोजने की कोशिश की है। उन्होंने इस आलेख में ऐसे कई मुद्दे उठाए हैं जिन्हें भारत में भाषा और हिंदी से संबंधित विमर्श में उचित स्थान मिलना चाहिए।

मैं दो बातों के लिए 'संवेद' पत्रिका के संपादक किशन कालजयी का आभारी हूँ। पहली बात तो यह कि उन्होंने मुझे इस आलेख को यहाँ प्रस्तुत करने की अनुमति दी और दूसरी यह कि उनके संपादन में प्रकाशित होने वा
3

'संवेद' के जनवरी अंक में प्रकाशित इस आलेख में ऋषिकेश राय ने भाषा के अनेक पहलुओं का वर्णन करते हुए भारत में अंग्रेज़ी के वर्चस्व के कारणों को इतिहास के पन्नों में खोजने की कोशिश की है। उन्होंने इस आलेख में ऐसे कई मुद्दे उठाए हैं जिन्हें भारत में भाषा और हिंदी से संबंधित विमर्श में उचित स्थान मिलना चाहिए।

मैं दो बातों के लिए 'संवेद' पत्रिका के संपादक किशन कालजयी का आभारी हूँ। पहली बात तो यह कि उन्होंने मुझे इस आलेख को यहाँ प्रस्तुत करने की अनुमति दी और दूसरी यह कि उनके संपादन में प्रकाशित होने व
1

1. कविता लेखन भी एक तरह से हाशिए पर चली गयी है।

कविता लेखन भी एक तरह से हाशिए पर चला गया है।

2. उनका लेखन एक शगल होती है।

उनका लेखन एक शगल होता है।

3. लेकिन एक आदर्श यातायात व्यवस्था स्थापित होने के बावजूद भी सड़क दुर्घटनाओं की एक निश्चित संभावना रहती है।

लेकिन एक आदर्श यातायात व्यवस्था स्थापित होने के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं की एक निश्चित संभावना रहती है।

4.
6

मुझे हाल में डॉ. महेंद्र भटनागर के काव्य-संसार को करीब से देखने का अवसर मिला। पिछले पाँच दशकों से साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय डॉ. महेंद्र भटनागर की अनेक कविताओं का भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मैं इस पोस्ट में उनकी 'अनुवाद : एक सेतु' शीर्षक कविता आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ :

अनुवाद : एक सेतु

अनुवाद

मात्र भाषान्तर नहीं

वह सेतु है !

.

एक मन को दूसरे से

जोड़ने का,

परस्पर अजनबीपन

तोड़ने का !

.
1

मणींद्र नाथ ठाकुर का यह आलेख पिछले साल 20 नवंबर को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के राजनीतिक अध्ययन केंद्र में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। इस आलेख में उन्होंने विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाओं की उपयोगिता और अंग्रेज़ी के अनुचित दबाव पर चर्चा की है। मैं आशा करता हूँ कि विचार-विमर्श की इस प्रक्रिया में हिंदी ब्लॉगर भी सम्मिलित होंगे।

भाषा की दीवार

अपने समाज के बारे में सोचने-समझने की हमारी भाषा क्या होनी चाहिए? इस प्रश्न पर पहले भी काफी विचार हुआ है। ले
10

अनु गर्ग हर दिन 200 से अधिक देशों के करीब 6 लाख लोगों को अंग्रेज़ी के शब्दों से संबंधित रोचक जानकारी ई-मेल से भेजते हैं। यह सोचकर सचमुच सुखद आश्चर्य होता है कि जिस इनसान ने अंग्रेज़ी की पढ़ाई छठी कक्षा से शुरू की थी वही आज दुनिया भर में लोगों को इस भाषा के सौंदर्य से परिचित करा रहा है। उत्तर प्रदेश के छोटे-से गाँव में आम के पेड़ के नीचे सरकारी शिक्षा प्राप्त करने वाले अनु गर्ग ने अंग्रेज़ी को एक नया शब्द भी दिया है। यह शब्द है linguaphile जिसका मतलब होता है भाषा प्रेमी। अनु गर्ग ने अपने कर्म से
3

हिंदी में नुक्ते का सवाल थोड़ा उलझा हुआ है। आप नुक्ते का चाहे जैसा प्रयोग करें, आपकी भाषा पर नुक्ताचीनी करने वाले लोग मिल ही जाएँगे।

एक सज्जन ने हिंदी में नुक्ते का प्रयोग करना बंद कर दिया। लोगों ने उनकी भाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि नुक्ते के प्रयोग के बिना ज़लील और जलील में अंतर करना कैसे संभव होगा।

लोगों के कहने पर उन्होंने दुबारा नुक्ते का प्रयोग करना शुरू किया। अब मानक हिंदी वर्तनी के नियम बनाने वालों ने उनसे कहा कि हिंदी में 'क' और 'ग' में नुक्ता लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें यह
17

चीन में एक रेस्तराँ का नाम अंग्रेज़ी में 'Translate Server Error' लिख दिया गया। हुआ यह था कि किसी तकनीकी समस्या के कारण कंप्यूटर पर चीनी नाम के अनुवाद के बदले 'Translate Server Error' का संदेश दिखा और अंग्रेज़ी नहीं जानने के कारण या हड़बड़ी में यही अनुवाद रेस्तराँ के साइन बोर्ड पर लिख दिया गया।

चीनी रेस्तराँ का साइन बोर्ड देखने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें :

http://www.techhui.com/profiles/blogs/1702911:BlogPost:17678

कुछ लोग तकनीक को ज़रूरत से अधिक महत्व देते हैं। उन्हें यह छोटी-सी
4

अंग्रेज़ी के संपर्क में आकर हिंदी सालों से बदलती आई है और अब सवाल यह उठता है कि क्या इस बदलाव से हिंदी हमेशा समृद्ध होती है या इसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। संसार की हर भाषा दूसरी भाषाओं से प्रभावित होती है और हिंदी कोई अपवाद नहीं है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर भाषाएँ अंग्रेज़ी या अन्य भाषाओं से प्रभावित होने के बदले आतंकित होने लगती हैं।

संसार की हर भाषा के व्याकरण में एक बात बिल्कुल स्पष्ट होती है कि बहुवचन बनाने के लिए दूसरी भाषा के व्याकरण का पालन नह
12

भाषा का सवाल मानवता के उन मूल्यों से जुड़ा है जिन्हें मान्यता दिलाने के लिए पूरे विश्‍व में हज़ारों आंदोलन हुए हैं। पुरुष-स्त्री समानता, स्वतंत्रता आदि आधुनिक मूल्य माने जाते हैं, लेकिन इन मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले आधुनिक समाज को अतीत के उन काले पन्नों को भी पलटना होगा जब उपनिवेशवाद के कारण करोड़ों व्यक्‍तियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीका के सैकड़ों समुदायों का नामोनिशान मिट गया। जो समुदाय उपनिवेशवाद की विनाश-लीला से बच गए उन्हें आज अपनी पहचान बचाने के लि
4

क्या आपने ग़ज़नी फ़िल्म की नायिका असिन के नाम पर कभी ध्यान दिया है? पहले मुझे लगता था कि यह नाम किसी ऐसी भाषा में है जिसके बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम है। बाद में मुझे यह जानकर बहुत आश्‍चर्य हुआ कि इस नाम में संस्कृत के उपसर्ग 'अ' और अंग्रेज़ी के शब्द 'sin' का प्रयोग हुआ है। उपसर्ग 'अ' में किसी चीज़ के नहीं होने का भाव छिपा होता है। असिन का अर्थ है - 'निष्पाप'। इस नाम में वैश्‍विक संस्कृति की झलक मिलती है। आज हमारा जीवन भौगोलिक सीमाओं से उतना प्रभावित नहीं होता है जितना कुछ दशकों पहले तक होत
3

अगर किसी भाषा को बाज़ार के रहमोकरम पर छोड़ दिया जाए तो उस भाषा के भविष्य पर प्रश्‍नचिह्न लग जाता है। कुछ अखबारों में हिंदी के प्रयोग को देखकर यह शंका होती है कि ये अखबार जान-बूझकर हिंदी की दुर्गति कर रहे हैं। हिंदी में अंग्रेज़ी शब्दों के संतुलित प्रयोग पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब हिंदी अखबारों में स्टूडंट मर्डर केस सॉल्व जैसी भाषा का प्रयोग होने लगे तो हमें सावधान हो जाना चाहिए। अब इस भाषायी आक्रमण ने नया रूप ले लिया है। हिंदी के कुछ अखबारों में रोमन लिपि का अनावश्यक प्रयोग होने
12

इंटरनेट पर अनेक हिंदी शब्दकोश उपलब्ध हैं। इनमें से अधिकतर शब्दकोशों पर अंग्रेज़ी शब्दों के हिंदी पर्याय और हिंदी शब्दों के अंग्रेज़ी पर्याय दोनों उपलब्ध हैं। ऐसे ऑनलाइन शब्दकोशों में शब्दकोश, गूगल शब्दकोश और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मुंबई) द्वारा बनाया गया शब्दकोश सर्वाधिक उपयोगी हैं।

1.
5

हिंदी में विमर्श की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए वैचारिक पत्रिकाओं का प्रकाशन आवश्यक है। अनेक हिंदी प्रेमी स्तरीय पत्रिकाओं के अभाव का रोना रोते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि पत्रिकाएँ उनके सक्रिय सहयोग के बिना प्रकाशित नहीं हो सकती हैं। हाल में 'पहल' जैसी पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया। हिंदी के पाठकों के लिए इससे बुरी खबर क्या होगी कि इस घटना के बाद राजेंद्र यादव ने हंस के भविष्य पर भी प्रश्‍नचिह्‍न लगाते हुए यह घोषणा कर दी कि आने वाले कुछ वर्षों में 'हंस' का निकलना भी बंद हो सकता
2

1. गूगल के इस समझौते से लाखों किताबों को इंटरनेट पर प्रकाशित हो सकती हैं।(http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2009/09/090919_google_vr_ak.shtml)

सही वाक्य : गूगल के इस समझौते से लाखों किताबें इंटरनेट पर प्रकाशित हो सकती हैं।

2. भारतीय क्रिकेट टीम के कोच गैरी कर्स्टन ने कहा है कि उन्होंने ऐसा कोई दस्तावेज़ तैयार नहीं किया है कि जिसमें क्रिकेटरों को सलाह दी गई है कि खेल बेहतर करने के लिए सेक्स करना चाहिए.
2

हिंदी से संबंधित मुद्दों पर प्राय: सार्थक बहस नहीं हो पाती है। कुछ हिंदी प्रेमी हिंदी और बाज़ार के संबंध को लेकर बहुत उत्साहित हो जाते हैं तो कुछ लोग निराश होकर इस भाषा की मृत्यु के बारे में बात करने लगते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों को संतुलित नहीं कहा जा सकता है। हिंदी अपने विकास के लिए न तो पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर है और न ही इस भाषा के अंत की भविष्यवाणी करना उचित है। हिंदी अपने प्रारंभिक काल से ही तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रही है। हमें संघर्ष को हार का पर्याय

मैंने कुछ दिनों पहले अंग्रेज़ी के एक अखबार के संपादकीय में यह पढ़ा कि भाषाओं का विलुप्त होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इन्हें बचाने के लिए किए जा रहे प्रयत्नों का कोई खास महत्त्व नहीं है। इस संपादकीय से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अंग्रेज़ी का यह अखबार भाषायी साम्राज्यवाद के पक्ष में खुलकर सामने आ गया है। भाषा का सवाल राजनीति और बाज़ार से जुड़ा है। आज अप्रत्यक्ष साम्राज्यवाद के दौर में बाज़ार की ताकतें यह निर्धारित करती हैं कि किन भाषाओं को जीवित रखना है और किन्हें इतिहास के कूड़े पर फेंक देन
7

हिंदी में वर्तनी की शुद्धता और एकरूपता की प्राय: अनदेखी होती है। इससे हमारी भाषा का विकास बाधित होता है। कुछ लोग व्याकरण को निर्रथक साबित करने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग इस तथ्य की उपेक्षा करते हैं कि व्याकरण के बिना भाषा में अराजकता आ जाती है और यह अराजकता अंतत: संवादहीनता और भ्रम की स्थिति पैदा करती है।

मैं इस पोस्ट में कुछ ऐसे नियमों के बारे में बताना चाहता हूँ जिनका पालन करना बहुत आसान है।

1.
4

हिंदी ऐसी माँ की तरह है जिसके बच्चे उससे प्यार नहीं करते हैं। यह एक कड़वा सच है। फ़ादर कामिल बुल्के जैसे हिंदी प्रेमी ने हिंदी बोलने वालों के बारे में कहा था कि वे अपनी भाषा से उतना प्यार नहीं करते हैं जितना प्यार अन्य भाषा बोलने वाले अपनी भाषा से करते हैं। अधिकतर हिंदी भाषी ऐसी संतान की तरह होते हैं जो कमाने के लिए घर से निकल कर पूरी दुनिया को तो अपना लेती है, लेकिन अपने घर की कोई ख़बर नहीं लेती है।

जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रसंगों में हम अपनी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। ऐसे प्रसंगों
6

इंटरनेट पर हिंदी से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श के लिए अनेक मंच उपलब्ध हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार में इन मंचों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इनमें से कुछ मंचों से हिंदी सीखने वाले छात्रों को व्याकरण, शब्द-प्रयोग आदि से संबंधित उपयोगी जानकारी मिलती है। कुछ मंच ऐसे भी हैं जहाँ हिंदी के विद्वान इस भाषा के अनेक पक्षों पर विचार-विमर्श करते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण मंचों की जानकारी नीचे प्रस्तुत है :

1.
4

संसार की हर भाषा में कहावतों का विशेष महत्त्व होता है। कहावतों से समाज के अनुभव प्रकट होते हैं। कुछ कहावतें गलत धारणाओं पर भी आधारित होती हैं, लेकिन अधिकतर कहावतों से जीवन की सच्चाई सामने आती है। कहावतों के पीछे छिपे किस्से बहुत दिलचस्प होते हैं।

एक कहावत है : “आब-आब कर मर गए, सिरहाने रखा पानी”। कहा जाता है कि यह कहावत एक व्यक्‍ति से जुड़ी है जो कमाई के लिए काबुल गया था। काबुल में अनेक वर्षों तक रहने के बाद वह फ़ारसी बोलने लगा। भारत में अपने घर लौटने के बाद वह बीमार पड़ गया। बीमारी की हालत में
1

मुझे कुछ दिनों पहले अरविंद जी से मिलने का सौभाग्य मिला। अरविंद जी ने भारत में कोशकारिता को एक नया आयाम दिया है। उन्होंने अपनी धर्मपत्‍नी कुसुम कुमार के साथ मिलकर अनेक वर्षों तक अथक परिश्रम करने के बाद हिंदी के सर्वप्रथम समांतर कोश (थिसारस) की रचना की। हाल में प्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी (http://tinyurl.com/kod2vj) को अब तक प्रकाशित अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोशों में सर्वाधिक उपयोगी माना जाता है।

अरविंद जी ने बातचीत के दौरान भाषा और व्याकरण के संबंध में अनेक रोचक
3

नई पुस्तकों की जानकारी देने वाली इस पत्रिका के जुलाई अंक में ऐसी बहुत-सी बातें हैं जिनके बारे में मैं आपको बताना चाहता हूँ। इस अंक में 'मैं और मेरी पुस्तकें' स्तंभ में साहित्यकार रमेश उपाध्याय यह बताते हैं कि अमेरिका द्वारा वियतनाम पर हमला किए जाने के विरोध में हुए एक प्रदर्शन में शामिल होने के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था। वे इस प्रदर्शन में अपने कुछ मित्रों के साथ गए थे। रमेश जी उस वक्‍‍त साप्ताहिक हिंदुस्तान में उप-संपादक के रूप में कार्यरत थे। इस पत्रिका के संपादक रामानंद जोशी के प

आजकल हिंदी की अधिकांश पत्रिकाओं में भाषा की शुद्धता पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इन पत्रिकाओं में हिंदी के असहज और अशुद्ध प्रयोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

अशुद्ध हिंदी के निम्नलिखित उदाहरण भाषा से संबंधित एक आलेख से लिए गए हैं :

1. आज हम देख रहे हैं कि भाषा के माध्यम से किस ख़ूबी के साथ विकल्पहीनता (TINA Syndrome) को थोपी और प्रतिष्ठित की जा रही है।

2. राजनीतिक-आर्थिक असमानता को भाषा-नीति और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक पहचान से आज अलग नहीं की जा सकती।

3.
1

बाज़ार की हिंदी ने मानक हिंदी के कुछ नियमों पर प्रश्‍नचिह्न लगा दिया है। आजकल बहुत कम लोग हिंदी में बहुवचन बनाने के नियम का पालन करते हैं। उदाहरण के लिए, व्याकरण की दृष्टि से 'ब्लॉग' का बहुवचन 'ब्लॉग्स' नहीं होता है लेकिन हिंदी के लगभग सभी ऑनलाइन अखबारों में इस शब्द के प्रयोग

के उदाहरण मिल जाएँगे। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :

1. वेबसाइट पर उपलब्ध ब्लॉग्स के माध्यम से लोगों को अपनी राय देने तथा दूसरों के विचार से अवगत होने की सुविधा प्रदान की गई है। (http://tinyurl.com/nyouns)

2.
4

हिंदी के अनेक शब्दों की शुद्ध वर्तनी को यूनिकोड फ़ॉन्ट में टाइप करना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, श्रृंखला में 'श्र' का प्रयोग व्याकरणसम्मत नहीं है। समस्या तो यह है कि इसके शुद्ध रूप को टाइप करने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। यह संयुक्ताक्षर हिंदी वर्तनी पर तकनीक के नकारात्मक प्रभाव का अच्छा उदाहरण है। मानक भाषा के अपने नियम होते हैं। कई बार प्रयोग के आधार पर अशुद्ध रूप को ही मानक मान लिया जाता है। अगर समय रहते 'श्र' के सही रूप को टाइप करना संभव नहीं हो पाया तो भविष्य में इसे ही मानक रूप मान लेन
10

हिंदी में संस्कृत के अनेक शब्दों का प्रयोग होता है। कुछ लोग संस्कृत को नीरस भाषा मानते हैं, लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। संस्कृत के साहित्‍य का अध्ययन करने वाले इस भाषा की संपन्नता से परिचित हैं।

संस्कृत में एक अभिव्यक्‍ति है : 'जामाता दशमो ग्रह:', अर्थात् दामाद दसवाँ ग्रह होता है। संस्कृत को दकियानूसी विचारधाराओं की भाषा मानने वालों को इस भाषा में लिखी ऐसी बातों की जानकारी नहीं है। इन तीन शब्दों से भारतीय समाज का एक नकारात्मक पक्ष सामने आता है। भारत में लड़की का पिता अपने दामाद की किसी बात से
2

कुछ दिन पहले किसी हिंदी अखबार के एक आलेख में अपराधी नेताओं के लिए 'बाहुबली' शब्द के प्रयोग को अनुचित बताया गया था। मुझे भी अपराधियों को 'बाहुबली' कहना उचित नहीं लगता है। अपराधी को 'बाहुबली' कहकर हम उसे महिमा मंडित करते हैं। 'बाहुबली' शब्द से मन में ऐसे शक्‍तिशाली व्यक्‍ति की तस्वीर उभरती है जो अपने बल से विपरीत परिस्थितियों का आसानी से सामना कर सकता है। यह शब्द अपराधी को सकारात्मक छवि प्रदान करता है। मीडियाकर्मियों को इस शब्द के बदले किसी ऐसे शब्द का प्रयोग करना चाहिए जो अपराधी के लिए उचित हो।
1

कुछ शब्दों के बारे में दिलचस्प धारणाएँ बन जाती है। ऐसा ही एक शब्द है 'नियर'। इस शब्द का प्रयोग संत कवि कबीर ने निम्नलिखित दोहे में किया है :

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

इस दोहे में 'नियरे' का वही अर्थ है जो अंग्रेज़ी के 'near' का होता है। मेरे मोहल्ले के एक सज्जन ने इसी आधार पर यह साबित कर दिया था कि संस्कृत अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी की भी जननी है। सच तो यह है कि अंग्रेज़ी में इस शब्द की व्युत्पत्ति पुरानी नॉर्स के 'नेर' से हुई है।
4

शब्दों की दुनिया बहुत दिलचस्प होती है। कई शब्द हमारी ज़िंदगी में बार-बार आते हैं। कुछ शब्दों से अपनी दोस्ती हो जाती है औऱ कुछ समय के साथ हमसे दूर हो जाते हैं।

मैं बचपन में पेंसिल की लिखावट मिटाने के लिए 'रबर' का प्रयोग करता था। आजकल इसे 'रबर' न कहकर 'इरेजर' कहा जाता है। कुछ लोग 'रबर' को गलत प्रयोग मानकर 'इरेजर' शब्द का प्रयोग करते हैं। उन्हें शायद इस बात की जानकारी नहीं है कि 'रबर' का प्रयोग ब्रिटिश अंग्रेज़ी में होता है। आजकल भारत में अमेरिकी अंग्रेज़ी का अधिक प्रयोग होता है। इतिहास भी इस बात
1

इंटरनेट पर कुछ ऐसे न्यूज़लेटर उपलब्ध हैं जो अंग्रेज़ी शब्दों से संबंधित रोचक व महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। हर शब्द का अपना अलग इतिहास होता है। समय के साथ-साथ शब्द के अर्थ भी बदल जाते हैं। अनेक शब्द किसी महत्त्वपूर्ण घटना, स्थान या काल से जुड़े होते हैं। इन शब्दों के माध्यम से हम संबंधित देश के इतिहास, संस्कृति आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते हैं।

कई बार हमें ऐसा लगता है कि हम जो कहना चाहते हैं उसके लिए कोई शब्द अस्तित्व में नहीं है। लेकिन ऐसे शब्द प्राय: शब्दकोश के पन्नों में
2

1. इससे ग्राहक 'अपनी' वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेंगे। (जनसत्ता; 15 अप्रैल, 2009)

उपर्युक्त वाक्य में 'अपनी' के स्थान पर 'अपने' का प्रयोग करना चाहिए। 'लक्ष्य' शब्द स्त्रीलिंग नहीं है।

2.
7

इंटरनेट के इस युग में अनुवादक देश-विदेश की अनेक एजेंसियों के लिए कार्य करते हैं। कई बार उन्हें भुगतान से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मसलन, कई एजेंसियाँ समय पर भुगतान नहीं करती हैं और कुछ मामलों में भुगतान होता ही नहीं है।

इंटरनेट पर कुछ ऐसे ऑनलाइन समूह हैं जो इस संदर्भ में हमारी सहायता कर सकते हैं। इन समूहों में भुगतान नहीं करने वाली एजेंसियों की जानकारी दी जाती है।

निम्नलिखित समूहों की सदस्यता नि:शुल्क है:

1. http://finance.groups.yahoo.com/group/translationagencypayment

2.
2

हिंदी की दुर्दशा के कुछ और उदाहरण:

1. जरूरी है कि क्वेश्चन की लैंग्विज को समझें। (नवभारत टाइम्स)

क्या हिंदी के 'प्रश्न' और 'भाषा' जैसे शब्द इतने कठिन हैं कि इनके बदले अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग किया जाए?

2. हॉट्स में करंट इशू पर आधारित क्वेश्चन पूछकर स्टूडंट्स की प्रतिभा जांची जाती है। (नवभारत टाइम्स)

उपर्युक्त वाक्य में 'स्टूडंट्स', 'क्वेश्चन' आदि के बदले हिंदी के शब्दों का प्रयोग किया जा सकता था।

3.
9

हर भाषा अपने समाज का आईना होती है। जिस भाषा को बोलने वाले ही उसकी उपेक्षा करते हो, उसकी स्थिति बद से बदतर होती जाती है और यह बात हिंदी पर भी लागू होती है। भाषा में वर्तनी की अनेकरूपता आदि को एक हद तक स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन जब भाषा की अशुद्धियाँ अराजकता का रूप लेने लगे तो यह चिंता का विषय बन जाता है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हिंदी के ऐसे प्रयोग देखने को मिलते हैं जिन्हें देखकर गहरी निराशा होती है।

कुछ उदाहरण यहाँ दिए गए हैं:

"...
4

तकनीक के विकास के साथ अनुवाद का स्वरूप भी बदल रहा है। मशीन अनुवाद, अनुवाद के सॉफ़्टवेयर आदि से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न सामने आते हैं जिनके उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिल सकते हैं। इस वर्ष अप्रैल में भाषा व अनुवाद पर होने वाले राष्ट्रीय सम्मेलन में आप भारत के विभिन्न क्षेत्रों के अनुवादकों व विद्वानों से इन सभी विषयों पर विचार-विमर्श कर सकते हैं। इस सम्मेलन में अनुवाद उद्योग की चुनौतियों पर भी चर्चा की जाएगी।

इस सम्मेलन की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें:

http:
1

इस समूह का उद्देश्य हिंदी अनुवादकों के बीच संवाद को बढ़ावा देना है। अनुवाद से संबंधित ऐसे कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर किसी पुस्तक में नहीं मिलते हैं। इस स्थिति में यह समूह बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। इसके सदस्य हिंदी, अनुवाद, हिंदी अनुवाद आदि से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श करते हुए एक-दूसरे के ज्ञान में वृद्धि कर सकते हैं।

इंटरनेट पर अनुवाद से संबंधित स्तरीय जानकारी उपलब्ध है, लेकिन अनेक अनुवादक समयाभाव या किसी अन्य कारण से इस जानकारी से वंचित रहते हैं। ऐसे अनुवादकों के लिए यह समूह विशेष रूप
1

हर भाषा में वर्तनी की अनेकरूपता देखने को मिलती है, लेकिन हिंदी वर्तनी में यह 'अराजकता' का रूप ले चुकी है।

मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। English को हिंदी में अँग्रेज़ी, अँग्रेजी, अंग्रेजी, अंग्रेज़ी, अँगरेज़ी, अँगरेजी, अंगरेजी या अंगरेज़ी लिखते हैं। वर्तनी की इस अराजकता से भाषा की शुद्धता को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इससे भाषा का विकास भी बाधित होता है।

मानक हिंदी के नियमों पर विचार-विमर्श करना आवश्यक है। इंटरनेट पर मानक हिंदी से संबंधित निम्नलिखित नियम उपलब्ध हैं (http://www.giitaayan.co
2
लोड हो रहे हैं
Dynamic Views टेम्पलेट. इसके द्वारा संचालित Blogger.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें