सोमवार, 24 नवंबर 2014

घर में ही बेगानी उर्दू और उसकी पत्रकारिता







-संजय द्विवेदी

प्रस्तुति-- निम्मी नर्गिस, जावेद, इम्त्याज 
   हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है, जब जंगे आजादी की लड़ाई में उर्दू अखबारों ने सबसे कड़े शब्दों में अंग्रेजी सत्ता का प्रतिकार किया था।
   उर्दू भी अन्य भारतीय भाषाओं की तरह अपनी पत्रकारिता, साहित्य और अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों से हिंदुस्तान की आजादी की मांग कर रही थी। आजादी मिलने और पाकिस्तान बनने के सिलसिले ने इस भाषा को जिस तरह से तंगनजरी का शिकार बनाया उसका उदाहरण ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। भाषा दिलों को जोड़ती है, वह संवाद का माध्यम है। उसमें हमारी भावनाएं, संवेदनाएं, सुख-दुख, प्यार, इबादत, रूसवाई सब कुछ शामिल होते हैं। सारी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने में सक्षम भाषाएं ही विस्तार पाती हैं और लोगों का प्यार पाती हैं। उर्दू के पास भी सारा कुछ था। विपुल साहित्य, शेरो-शायरी की दुनिया और संवेदनाओं को बहुत बेहतर तरीके से व्यक्त करने का साहस और सलीका। लेकिन क्या हुआ कि उर्दू अपने घर में ही बेगानी हो गयी? वह हमारी जबान नहीं रही। वह किसी गैर मुल्क की जबान बन गयी। जबकि सच यह है कि पूरा पाकिस्तान भी उर्दू को नहीं स्वीकारता, बांग्लादेश के अलग होने की कहानी में भाषा भी एक बड़ा सवाल था। बंटवारे ने उर्दू को जो जख्म दिए उसमें वह पाकिस्तान की भाषा तो बन नहीं पाई और हिंदुस्तान के बड़े हिस्से में भी उसे रूसवाईयां झेलनी पड़ीं। राजनीतिक कारणों से उसे कुछ राज्यों ने दूसरी राजभाषा का दर्जा जरूर दे दिया है किंतु उसकी उपेक्षा साफ दिखती है।
    उर्दू पत्रकारिता के पास भी आज पाठक नहीं है। इसका सबसे बडा कारण यह है कि उर्दू की कोई एक जमीन नहीं है, एक प्रदेश नहीं है, एक इलाका नहीं है। उसके पाठक बिखरे हुए हैं और किसी भी राज्य में पहली लोकप्रिय भाषा के तौर पर प्रचलित नहीं है। जैसे बांगला के पास पश्चिम बंगाल, मराठी के पास महाराष्ट्र, मलयालम के पास केरल जैसे उदाहरणों से हमें समझना होगा कि किसी राज्य की प्रथम भाषा न होने के कारण उर्दू की कोई खालिश जमीन नहीं है। पूरा वतन ही उसकी जमीन है।वह समूचे देश में पढ़ी और समझी जाती है पर उसके पाठक बिखरे हुए हैं। जबकि आज के मीडिया को बाजार चाहिए, पाठक चाहिए और खरीददार चाहिए। बिखरी हुयी जमीन के कारण कोई दैनिक अखबार उर्दू के पास ऐसा नहीं है जो हिंदुस्तान के दस या बीस बड़े अखबारों में अपनी जगह बना सके। उर्दू अखबार नई तकनीकों के इस्तेमाल, बेहतर छाप-छपाई के बावजूद नहीं पढ़े जा रहे हैं क्योंकि उसके पास पाठक या तो नहीं हैं या बिखरे हुए हैं। इसके चलते उर्दू अखबारों की माली हालत भी खराब रहती है। उन्हें सरकार के उपर ही निर्भर रहना पड़ता है। फिर उर्दू अखबारों ने अपने पाठक के हिसाब से ही अपना कटेंट निश्चित किया है और वे इस्लामी दुनिया में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। ऐसे में एक बड़ा पाठक वर्ग उनसे जुड़ नहीं पाता।
   भारत के तमाम बड़े शहरों मुंबई, हैदराबाद, लखनऊ, भोपाल, दिल्ली, चंड़ीगढ़ या पंजाब के तमाम शहर उर्दू अखबारों के कद्रदान हैं किंतु उर्दू का अपना भूगोल न होना या बहुत विस्तारित होना एक बड़ी समस्या है। सरकारी निर्भरता से अलग उर्दू के अखबार अपना आर्थिक माडल खड़ा नहीं कर पा रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है राष्ट्रीय सहारा के उर्दू रोजनामा और दैनिक जागरण समूह के इंकलाब के आने के बाद एक नई तरह की पत्रकारिता का विकास उर्दू में भी देखने को मिल रहा है। इसी तरह उर्दू के चैनल भी आज अच्छा काम कर रहे हैं। उर्दू के धार्मिक, समाचार और मनोरंजन चैनलों की जगह भी बन रही है। उनके कार्यक्रम पसंद किए जा रहे हैं। इससे जाहिर तौर पर उर्दू भी अब अपना बाजार तलाश रही है। फिल्मी गीतों में उसकी जगह महत्वपूर्ण है ही। अनुवाद के माध्यम से अनेक बडे शायर और लेखक बाकी भाषाओं में पढ़े और सराहे जा रहे हैं। ऐसे में एक भाषा के तौर पर उर्दू के विस्तार और लोकप्रियता की संभावनाएं मरी नहीं हैं। उर्दू की पत्रकारिता पर विमर्श के अवसर भी हैं और आत्मपरीक्षण के भी। उर्दू सबको लेकर चल सकती है और अपनी नैसर्गिक मिठास से वह हिंदुस्तान की सरजमीं पर फिर से चहक सकती है। इसमें समाज और मीडिया दोनों को अपनी जिम्मेदारियां निभानी होंगीं। एक भाषा के तौर पर उर्दू को बचाना ही होगा क्योंकि उर्दू इस देश की जमीन की भाषा है, उसमें हिंस्दुस्तान का इतिहास, उसकी सांसें और संघर्ष धड़कते हैं। वह जाने कितने शायरों, दानिशमंदों की जुबां से निकलकर लोगों की रूहों को छू लेने की क्षमता रखने वाली भाषा है। हिंदुस्तानी कौम का इतिहास उर्दू के बिना पूरा नहीं होगा। उसकी आत्मीयता, उसकी प्रांजलता, सरलता और प्रवाह उसके साहित्य और पत्रकारिता दोनों में दिखता है।
   आज की उर्दू पत्रकारिता के मुद्दे देश की भाषाई पत्रकारिता के मुद्दों से अलग नहीं हैं. समूची भारतीय भाषाओं के सामने आज अंग्रेजी और उसके साम्राज्यवाद का खतरा मंडरा रहा है। कई भाषाओं में संवाद करता हिंदुस्तान दुनिया और बाजार की ताकतों को चुभ रहा है। उसकी संस्कृति को नष्ट करने के लिए पूरे हिंदुस्तान को एक भाषा (अंग्रेजी) में बोलने के लिए विवश करने के प्रयास चल रहे हैं। अपनी मातृभाषाओं को भूल कर अंग्रेजी में गपियाने वाली जमातें तैयार की जा रही हैं,जिनकी भाषा, सोच और सपने सब विदेशी हैं। अमरीकी और पश्चिमी देशों की तरफ उड़ान भरने को तैयार ये पीढ़ी अपनी जड़ों को भूल रही है। उसे गालिब, रहीम, रसखान, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, मलिक मोहम्मद जायसी के बजाए पश्चिमी धुनों पर थिरकाया जा रहा है।
   जड़ों से विस्मृत होती इस पीढ़ी को मीडिया की ताकत से बचाया जा सकता है। अपनी भाषाओं, जमीन और संस्कृति से प्यार पैदा करके ही देशप्रेम और राष्ट्रवाद से भरी पीढ़ी तैयार की जा सकती है। उर्दू पत्रकारिता की बुनियाद भी इन्हीं संस्कारों से जुड़ी है। वह भी भारतीयता का एक अद्भुत पाठ है। उर्दू पत्रकारिता पर केंद्रित इस किताब के बहाने हमें एक बार फिर उस देश की सोचने की जरूरत है, जिसे हम काफी पीछे छोड़ आएं हैं। यह किताब देवनागरी में प्रकाशित की जा रही है ताकि हिंदी भाषी पाठक भी उर्दू पत्रकारिता के स्वर्णिम अतीत और वर्तमान में उसके संधर्ष का आकलन कर सकें। उर्दू और उसकी पत्रकारिता को बचाना दरअसल एक भाषा भर को बचाने का मामला नहीं है, वह प्रतिरोध है बाजारवाद के खिलाफ, प्रतिरोध है उस अधिनायकवादी मानसिकता के खिलाफ जो विविधताओं को, बहुलताओं को, स्वीकार करने को स्वीकारने और आदर देने के लिए तैयार नहीं है। यह प्रतिरोध है हिंदुस्तान की सभी मातृभाषाओं का, जो मरने के लिए तैयार नहीं हैं। वे अंग्रेजी के साम्राज्यवाद के खिलाफ डटकर खड़ी हैं और खड़ी रहेंगीं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें