मंगलवार, 25 नवंबर 2014

एसपी बनाम एसपी





महेन्द्र प्रताप सिंह 27.03.2011 06.00Pm
देश में आज न्यूज़ चैनलों का बोलबाला है। हमारे समाज और ज़िंदगी के लगभग हर हिस्से पर आज इनकी दख़लअंदाज़ी है। आज हम न्यूज़ चैनलों के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते । लेकिन कमाल की बात यह है कि भारत में न्यूज़ चैनलों का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं हैं। देश में न्यूज़ चैनलों की शुरुआत हुए महज़ एक दशक हुआ है। और इन चैनलों की नींव माना जा सकता है, सिर्फ़ 16 साल पहले दूरदर्शन पर शुरू हुए इंडिया टुडे ग्रुप के आधे घंटे के न्यूज़ बुलेटिन आज तक को। और इस कार्यक्रम की कमान थी, जाने-माने पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह के हाथ।
आज सुरेन्द्र प्रताप सिंह प्रिंट मीडिया के साथ टेलीविज़न पत्रकारिता में भी एक बड़ा नाम है। एस.पी. के नाम से मशहूर सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने उत्तरप्रदेश के छोटे से गाँव फ़तेहपुर से निकलकर देशभर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता से पत्रकारिता को अनेक नए आयाम दिए।
सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता में अपना कैरियर की शुरुआत टाइम्स ऑफ़ इंडिया से आरंभ किया। अपने लंबे कैरियर में एस.पी. ने धर्मयुग, टेलीग्राफ़, इंडिया टुडे, और नई दुनिया जैसे पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। इस दौरान उन्होंने धर्मवीर भारती जैसे दिग्गजों के साथ काम किया। रविवार नामक साप्ताहिक पत्रिका के संपादन के दौरान एस.पी. की प्रतिभा को नई ज़मीन मिली। इस पत्रिका ने उस दौर की चर्चित-प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान के गढ़ में सेंध लगा दी। बाद में टेलीविज़न न्यूज़ के क्षेत्र में न्यूज़ बुलेटिन आज तक तो सुरेन्द्र प्रताप सिंह की पहचान ही बन गया।
सन 1995 में इंडिया टुडे समूह के मालिक अरुण पुरी ने एस.पी. को आधे घंटे के न्यूज़ बुलेटिन आज तक की ज़िम्मेदारी सौपी। एस.पी. उन दिनों इंडिया टुडे के लिए कॉलम लिख रहे थे। एस.पी. के मुताबिक़ - मैं इंडिया टुडे के लिए कॉलम लिख रहा था। पैसे भी ठीक मिल रहे थे। काम चल रहा था। इस बीच मैं बीमार पड़ा और अस्पताल पहुँच गया। लिखना रुक जाने से पैसे मिलने का सिलसिला टूट गया। अरुण पुरी से पहले भी बात-चीत हुई थी। इस बार भी हुई। उन्होंने कहा कि काम शुरू कर दीजिए। मैं मना नहीं कर पाया और जॉइन कर लिया। उसके बाद की कहानी इतिहास है। आधे घंटे के न्यूज़ बुलेटिन आज तक ने मीडिया जगत में तहलका मचा दिया। इसने हिन्दी टेलीविज़न पत्रकारिता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। अंग्रेज़ी के आतंक से त्रस्त मीडिया के क्षेत्र में आज तक ने हिन्दी को स्थापित कर दिया। एंकरिंग का कोई अनुभव नहीं होने के बावजूद उनकी सहज और सरल प्रस्तुति ने एस.पी. को टेलीविज़न पत्रकार और एंकर के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। ठेठ मुहावरों और आम बोलचाल के शब्दों के प्रयोग और रोचक शैली ने एस.पी. को रातों-रात लोकप्रिय कर दिया। एस.पी. सामाजिक सरोकारों वाले पत्रकार थे। उन्होंने दबे-कुचले और हाशिए पर मौजूद आम तबक़े की आवाज़ उठाई। इसके पहले भी बिहार के बेलछी में दलितों के उत्पीड़न के मुद्दे को एस.पी. ने रविवार में जगह दी। अन्य पत्र-पत्रिकाओं में उपेक्षित इस मुद्दे का इतना प्रभाव पड़ा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को पीड़ितों से मिलने बेलछी जाना पड़ा। एस.पी. ने आम जन से जुड़े मुद्दों को उठाया और उनका हक़ मारने वालों पर बेबाकी से तल्ख़ टिप्पणी की। उन्होंने कभी भी अंधविश्वास और अंधी आस्था को बढ़ावा नहीं दिया। गणेश जी की मूर्तियों के दूध पीने जैसी ख़बरों की असलियत उन्होंने जनता को बताकर उन्हें ऐसी अफ़वाहों से दूर रहने को कहा। ख़बरों की प्रामाणिकता और तटस्थता ने एस.पी. को लाखों लोगों का विश्वासपात्र बना दिया। दर्शक और पाठक क्या देखना और पढ़ना चाहते हैं, एस.पी. को इसकी अच्छी समझ थी। एस.पी. और आज तक एक दूसरे के पर्याय हैं। उनके आधे घंटे के कार्यक्रम आज तक का वो प्रभाव था जो वर्तमान के 24 घंटे के चैनल भी नहीं कर पाते। एस.पी. में नेतृत्व सामर्थ्य और टीम बनाने की क्षमता अद्भुत थी। योग्य और मेहनती लोगों को वे चुंबक की तरह आकर्षित करते थे। उनकी इस योग्यता ने न केवल प्रिंट मीडिया बल्कि टेलीविज़न पत्रकारिता में भी उनका साथ दिया। रविवार और  “आज तक की उनकी टीम ने देश को कई स्टार पत्रकार और मीडियाकर्मी दिए। इनमें से कई आज बड़े न्यूज़ चैनलों और समाचार-पत्रों में बड़े पदों पर हैं। इनमें राहुल देव, दीपक चौरसिया, संजय पुगलिया, आशुतोष, दिबांग और अंजू गुलेरिया आदि शामिल हैं।
27 जून, 1997 को 49 वर्ष की छोटी आयु में एस.पी. के निधन से पूरा मीडिया जगत स्तब्ध रह गया। 13 जून, 1997 को बॉर्डर फ़िल्म के शो के दौरान दिल्ली के उपहार सिनेमा में आग लगी। इस हादसे में अनेक लोग जलकर मर गए। एस.पी. ने इस घटना पर दिल को छू लेने वाली एंकरिंग की। सुना है, इस त्रासदी से आहत एस.पी. फफककर रो पड़े थे। बुलेटिन की समाप्ति पर एस.पी. ने कहा- ...ज़िंदगी तो अपनी रफ़्तार से चलती ही रहती है। जैसे एस.पी. अपने न होने पर टिप्पणी कर रहे थे। यह उनका आख़िरी बुलेटिन था। उस दिन उनके साथ मौजूद लोग बताते हैं कि वे इस घटना से बहुत दुःखी थे। ये उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण है कि अत्यधिक पीड़ा और तनाव के कारण उनके दिमाग़ की नस फट गई। 16 जून, 1997 को उन्हें विमहेंस में एडमिट कराया गया। हालत बिगड़ने पर दोपहर में उन्हें अपोलो अस्पताल ले जाया गया। 26 जून की देर रात उस आदमी के दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया, जो दिमाग की वजह से लोकप्रिय था। 27 की सुबह उनके दिल ने भी काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। एस.पी. के रूप में पत्रकारिता के क्षितिज का एक नक्षत्र विलुप्त हो गया। साथ ही पत्रकारिता का एक स्वर्णिम अध्याय भी ख़त्म हो गया।
एस.पी. के कुछ आलोचक भी हैं। इंसान होने के नाते एस.पी.में कुछ कमज़ोरियाँ भी रही होंगी, लेकिन एक बात तो तय है कि उनके गुण उन कमज़ोरियों की तुलना में कहीं अधिक हैं और उन कमज़ोरियों पर हावी हैं। आज भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता का जो स्वरूप है, उसे गढ़ने में एस.पी. की महती भूमिका रही, हालांकि इसकी अनेक विकृत प्रस्तुतियों से वे अवश्य ही असहमत होते।

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