बुधवार, 26 नवंबर 2014

गांधीजी की दृष्टि में पत्रकारिता




प्रस्तुति--- स्वामी शरण, राहुल मानव, समिधा


गांधीजी बोले हुए और लिखे हुए शब्दों के शक्तियों से परिचित थे। वे अपने जीवन को सत्य से एक गंभीर साक्षात्कार के रूप में व्याख्यायित करते थे। उनके लेखन और उद्बोधन के जरिये उनके अनुभव जन-जन तक पहुंचते थे। गांधीजी तीन भाषाओं के जानकार थे। वे अंग्रेजी, गुजराती और हिन्दी में लिखते थे। उन्होंने स्वतंत्र रूप से किताबों के लेखन के साथ-साथ तीन प्रकाशन समूहों से सीधे जुड़कर काम किया। ये समूह थे इंडियन ओपिनियन, जनसेवक और हरिजन। विभिन्न कालखण्डों में इन प्रकाशनों के अलग-अलग प्रकाशक और संपादक हुए, लेकिन मुख्य रूप से गांधीजी ही इन प्रकाशनों के लेखक थे।
पत्रकारिता एक मिशन
गांधीजी अपने प्रारंभिक दिनों में पत्र व्यवहार को ज्यादा महत्व देते थे। इन्हीं दिनों गांधीजी की यह मान्यता दृढ़ हुई कि किसी बात को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समाचार-पत्र सर्वाधिक असरदायक माध्यम है। गांधीजी के लिए पत्रकारिता आम आदमी और ओहदेदारों से संवाद करने का एक माध्यम थी, न कि जीवन-यापन के लिए कमाई का एक जरिया। वे समाचार-पत्र के प्रकाशन की प्रक्रिया के प्रत्येक अंग से सीधे जुड़े रहे। चाहे वह आर्थिक व्यवस्था हो, मुद्रण हो, न्यूज पेपरों के बंडलों की पेकिंग या संवाददाताओं की नियुक्ति। वे फोटोग्राफ भी स्वयं चुनते थे और प्रत्येक अंक में एकाधिक अंश स्वयं लिखते थे।
‘इंडियन ओपिनियन के प्रथम मास में ही मैं समझ गया था कि पत्रकारिता का एकमात्र ध्येय सेवा होना चाहिए। समाचार-पत्रों के पास बड़ी भारी शक्ति है, लेकिन जिस प्रकार अनियंत्रित बाढ़ का पानी पूरी बस्तियों को डूबा देता है और फसलों को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार अनियंत्रित लेखनी की सेवा भी विनाशकारी होती है। यदि उसका नियंत्रण बाहर से किया जाये तो यह नियंत्रणहीनता से भी अधिक अनिष्टकर सिध्द होता है। प्रेस का नियंत्रण तभी लाभकारी हो सकता है, जब प्रेस उसे स्वयं अपने ऊपर लागू करे। अगर यह तर्क सही है तो दुनिया के कितने पत्र इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? लेकिन जो पत्र-पत्रिकाएं निकम्मी हैं, उन्हें कौन रोके? अच्छाई और बुराई की तरह, निकम्मी और उपयोगी भी साथ-साथ चलेंगी और मनुष्य को अपना चुनाव खुद करना होगा।’
आत्मकथा, पृष्ठ 211
मैंने पत्राकारिता के क्षेत्र में प्रवेश स्वयं पत्रकारिता की खातिर नहीं किया है, बल्कि यह मेरे जीवन के ध्येय की पूर्ति में सहायक है, ऐसा मानकर किया है। मेरा ध्येय समय के साथ, उदाहरण और उपदेश देते हुए, सत्याग्रह के अस्त्र के प्रयोग की शिक्षा देना है- सत्याग्रह जो अहिंसा तथा सत्य का प्रत्यक्ष परिणाम है, इसलिए यदि मुझे अपने धर्म पर आरूढ़ रहना है तो निष्प्रयोजन नहीं लिखना है। मुझे केवल उत्तेजना फैलाने के लिए नहीं लिखना है।
पाठक इस बात को समझ ही नहीं सकते कि मुझे हफ्ते-दर-हफ्ते शीर्षकों और शब्दों के चुनाव में कितना संयम बरतना पड़ता है। यह मेरे लिए एक प्रशिक्षण है। इससे मुझे अपने अंदर झांकने और अपनी कमजोरियों का पता लगाने का मौका मिलता है। कई बार मेरा दंभ मुझे चुभने वाली भाषा का प्रयोग करने या मेरा क्रोध मुझे कोई सख्त विशेषण लगाने का आदेश देता है। यह बड़ी विकट परीक्षा है पर दुर्भावनाओं को दूर करने का यह एक उत्तम उपाय है।
– यंग इंडिया, पृष्ठ 232
लिखते समय मेरी अंतरात्मा मुझसे जो लिखाती है, मैं लिखता जाता हूं। मैं निश्चित रूप से यह जानने का दावा नहीं करता कि मेरे सभी सचेतन विचार और कार्य अंतरात्मा द्वारा निर्देशित होते हैं, लेकिन अपने जीवन में जो बड़े से बड़े कदम मैंने उठाये हैं- और छोटे से छोटे भी उनकी परीक्षा करने पर मैं समझता हूं कि यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे सभी अंतरात्मा द्वारा निर्देशित थे।
– आत्मकथा, पृष्ठ 206
आधुनिक पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन, पक्षपात, अ-यथार्थता और यहां तक कि बेईमानी भी घुस आयी है, वह उन ईमानदार लोगों को बराबर गलत रास्ते पर ले जाती है, जो केवल यह चाहते हैं कि न्याय की विजय हो।
– यंग इंडिया 28,5,1931, पृष्ठ 131
साथी पत्रकारों से अपील
प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जा सकता है। उसके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं है, लेकिन उस शक्ति का दुरुपयोग करना एक अपराध है। मैं स्वयं एक पत्रकार हूं और अपने साथी पत्रकारों से अपील करता हूं कि वे अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना काम करते समय केवल इस विचार को प्रश्रय दें कि सच्चाई को सामने लाना है और उसी का पक्ष लेना है।
– हरिजन, 27,5,1947, पृष्ठ 128
पत्रकारित का सही काम लोकमानस को शिक्षित करना है, उसे वांछित-अवांछित विचारों से भरना नहीं, इसलिए अखबार में क्या बात देनी है और कब देनी है, इसका निर्णय पत्रकार को अपने विवेक से करना चाहिए। आज स्थिति यह है कि पत्रकार केवल तथ्य देकर संतोष का अनुभव नहीं करते। पत्रकारिता ‘घटनाओं की प्रबुध्द पूर्वपेक्षा’ की कला बन गयी है।
– हरिजन 29,4, 1946, पृष्ठ 334
पश्चिम की तरह पूर्व में भी अखबार लोगों की बाइबिल, कुरान-जेंद-अस्वेता और भगवद्गीता बनते जा रहे हैं। अखबारों में जो कुछ छपता है, उसे लोग ईश्वरीय सत्य मान लेते हैं।
– हरिजन 28,4,1946, पृष्ठ 101
लोग किसी भी छपी हुई चीज को दैवी सत्य मान लेते हैं। इस कारण संपादकों और समाचार लेखकों का उत्तरदायित्व बहुत अधिक बढ़ जाता है।
– हरिजन 21,1,1947, पृष्ठ 391
मैं स्वयं कभी अखबारों की रिपोर्टिंग पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करता और अखबारों के पाठकों को भी चेतावनी देना चाहता हूं कि वे उनमें छपी कहानियों से आसानी से प्रभावित न हों। अच्छे से अच्छे अखबार भी अतिरंजन और भाषा के अलंकरण से मुक्त नहीं होते।
हरिजन 30, 11, 1947 पृष्ठ 447
अखबारों का बड़ा जबरदस्त असर होता है। संपादकों का यहर् कत्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके अखबारों में कोई झूठी रिपोर्ट प्रकाशित न हो और न ही कोई ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित हो, जिससे जनता के भड़कने की आशंका हो। संपादकों और उनके सहायकों को खबरों और उनके देने के ढंग के बारे में विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।
स्वाधीनता की स्थिति में सरकार के लिए प्रेस पर नियंत्रण रखना लगभग असंभव है। यह काम जनता का है कि वह अखबारों पर कड़ी नजर रखे और उन्हें सही रास्ते पर चलाये। प्रबुध्द जनता भड़काने वाले या अश्लील अखबारों को संरक्षण देने से इनकार कर देगी।
– हरिजन 18, 10, 1947, पृष्ठ 378
कोई कापीराइट नहीं
मेरा विश्वास है कि ऐसा संघर्ष जो मुख्य रूप से आंतरिक शक्ति पर भरोसा करता है, अखबार के बिना पूरी तरह नहीं चलाया जा सकता। यह भी मेरा अनुभव है कि हम ‘इंडियन ओपिनयन’ के बगैर उतनी सुगमता और सफलता के साथ स्थानीय भारतीय समुदाय को शिक्षित नहीं कर सकते थे और न ही दुनिया भर में फैले भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका के घटनाक्रम से परिचित करा सकते थे जैसे हमने किया। इसलिए ‘इंडियन ओपिनियन’ निश्चित रूप से हमारे संघर्ष का एक बहुत ही उपयोगी और कारगर हथियार था।
– सत्याग्रह इन साउथ
अफ्रीका, पृष्ठ 142
तुम्हें ‘इंडियन ओपिनियन’ में वही लिखना चाहिए, जो सत्य हो। पत्रकारिता में सत्य क्या है? यह तथ्यात्मकता से अलग कैसे है? क्या ये दोनों एक ही चीज हैं? सत्य सिर्फ ज्ञान का विषय नहीं है। यह इसके अलावा कुछ और है। इसका अर्थ है पूर्णत: तटस्थ तरीके से निर्णय का संतुलन। इसे एक साप्ताहिक में तो हासिल किया जा सकता है, लेकिन दैनिक समाचार पत्र में सत्यनिष्ठ होना बहुत ही कठिन है जब हम उस स्थिति पर विचार करते हैं जिसमें वह तैयार किया जाता है। एजेंसियों की संख्या जिनसे होकर समाचार गुजरता है तथा जिस गति से वह दुनिया के सभी हिस्सों में संग्रहित किया जाता है, अनुवादित होता है, प्रेषित होता है, चुना जाता है, संपादित ंहोता है तथा छापा जाता है।
– पुत्र मणिलाल को पत्र,
किसी भी विषय पर जनता को मुफ्त साहित्य उपलब्ध कराने में मेरा विश्वास नहीं है। वह बहुत ही सस्ता हो सकता है पर मुफ्त कभी भी नहीं। इस पुरानी संस्कृत उक्ति में मेरा विश्वास है कि ‘ज्ञान उनके लिए है, जो उसके पात्र हैं।’ लेकिन ये मेरे निजी विचार हैं। मैं संगठनों और संगठनों को सिर्फ अपनी सलाह ही दे सकता हूं। ‘हरिजन’ में कोई कापीराइट नहीं है। उद्यमी भाषाई समाचार-पत्र ‘हरिजन’ का अपना संस्करण प्रकाशित करेंगे। कुछ ने ऐसा करने की अपनी इच्छा के बारे में मुझे लिखा भी है। मैं किसी को रोक नहीं सकता। मैं सिर्फ हर एक से यह आग्रह ही कर सकता हूं कि मैंने जो सलाह दी है और जो काफी अनुभव पर आधारित है, उसका अनुकरण किया जाये।
हरिजन 25,2 1933
यदि प्रेस सलाहकार को सत्याग्रह के बारे में मेरे द्वारा लिखित हरेक लाइन नयी दिल्ली भेजनी पड़े तो मैं खुलकर काम नहीं कर सकता। तीनों साप्ताहिक सत्य के हित में चलाये गये हैं, इसीलिए सभी पार्टियों के हित में किन्तु मैं उस हित की सेवा नहीं कर सकता, यदि संपादक को दंड की धमकी के तहत मुझे काम करना पड़े। प्रेस की स्वतंत्रता एक प्रिय विशेषाधिकार है। मैं सरकारी नोटिस के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ हूं, जिसकी प्रकृति सलाह जैसी है किन्तु वास्तव में जो एक आदेश है, जिसके उल्लंघन के अपने परिणाम होंगे। पत्र का स्थगन एक सत्याग्राही द्वारा गलत सरकारी नीतियों के विरोध का सम्मानजनक तरीका है।
– हरिजन 24, 10, 1939 (विभूति फीचर्स)

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