बुधवार, 26 नवंबर 2014

ग्रामीण पत्रकारिता यानी गांवों तक पहुंच




 प्रस्तुति-- दिनेश कुमार सिन्हा,आशा सिन्हा



गांवों तक पहुंच ग्रामीण पत्रकारिता यानी गांवों तक पहुंच प्रभात खबर की दूसरी सफलताओं में से एक है. दरअसल देशज पत्रकारिता का कार्य भी यही है कि सूचना सबसे अंतिम, सबसे पिछड़ा और उपेक्षित नागरिक तक पहुंचायीजाये. उसकी समस्या को प्रमुखता दी जाये. प्रभात खबर आरंभिक समय से ही इस दिशा में सजग रहा है.अखबार गावों तक पहुंचे, इसके लिए जरूरी था कि वहां संवाददाता नियुक्त किये जायें कार्यालय खोले जायें और फिर अखबार को वहां बेचा भी जाये. कम संसाधान में यह बेहद कठिन था. इसके लिए रणनीति बनायी गयी. उप महाप्रबंधक आरके दत्ता बताते हैं- हमने गांवों का दौरा शुरू किया. रिटायर्ड शिक्षक, पान-परचून की दुकानवाले छोटे-मोटे लोगों को ढूंढ़ते. उनसे समाचार लिख कर भेजने के लिए कहते और फिर अखबार बेचने ( बहुत कम प्रतियां ) की व्यवस्था करते. गांवों, कस्बों और अंचल में संवाददाता और जहां हॉकर नहीं थे, वहां हॉकर की पूर्ति इसी तरह से होती रही. हम इन स्टिंगरों के साथ मीटिंग करते. उनकी समस्याएं सुनते फिर उन्हेंसमाचार लिखने के लिए प्रशिक्षित भी करते. यही नहीं, उन्हें व्यवसाय की जटिलताओं को भी बताया जाता.पूरी पारदर्शिता बरती जाती. इससे छोटे-छोटे कस्बों से विज्ञापन मिलने में सहायता मिलती. यह क्रम वर्षो चला बाद में सब व्यवस्थित हुआ. कस्बों को मॉडम से जोड़ने वाला दक्षिण बिहार का यह पहला अखबार था. जब पहचान बनी तो अखबार बेचने को इच्छुक हॉकर भी मिलने लगे. ग्रामीण पत्रकारों के साथ वार्षिक, सम्मेलन की शुरुआत बहुत आरंभिक चरण में हुई. यह क्रम आज तक जारी है. इसी तरह अंचल और शहरी, दोनों जगह के संवादताताओं के लिए आचार संहिता बनायी गयी. इसका सख्ती से पालन किया जाता है. मसलन एक प्रेस कांफ्रेंस में एक ही संवाददाता का जाना, किसी पक्ष या व्यक्ति से उपहार या गिफ्ट न लेना, ठेकेदारी नहीं करना इत्यादि. संवाददाता के विरुद्ध ऐसी शिकायत मिलने पर कड़ी कार्रवाई की जाती है. संचार साधनों से बदला ग्रामीण पत्रकारिता का चेहरा झारखंड में ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के श्रेय की अगर बात हो, तो इसमें सबसे पहलानाम प्रभात खबर का होगा, वर्षो से उपेक्षित और सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाके की आवाज बनने का काम किया हैइस अखबार ने. वैसी स्थिति में जब पत्रकारिता कुछ खास वर्ग और इलाकों में सिमटी हुई थी, प्रभात खबर नये तेवर व कलेवर के साथ सामने आया. कलम-कागज और डाक से खबर भेजने की परंपरागत परंपरा सेबाहर निकलते हुए आधुनिक तकनीक की बात की. शहर के चौक-चौराहों से निकल कर गांवों, गलियों कीबात शुरू की. यह सब संभव कैसे हुआ ? जिन गांवों, कस्बों, ब्लॉक या जिला मुख्यालय से खबरें दो-तीन दिनों के बाद पहुंचती थीं, जीप, बस डाक या किसी आदमी के माध्यम से, वहां पर पहली बार फ़ैक्स की शुरुआत की गयी. आज रांची और आसपास के 11 जिलों में प्रभात खबर के 22 कंप्यूटर, मॉडम, स्कैनरव फ़ैक्स से युक्त अत्याधुनिक सेंटर है, वहीं 22 फ़ैक्स सेंटर भी कार्यरत हैं. वह भी सूदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में.झारखंड राज्य का मानचित्र अगर आप देखें, तो उसमें प्रभात खबर के सशक्त नेटवर्क की झलक पायेंगे.इस दौरान एक ओर जहां इस अखबार ने लोगों के दिलों से अपने आप को जोड़ा, वहीं दूसरी ओर अपने आपको आधुनिक तकनीक के साथ बनाये रखने का हरसंभव प्रयास किया. नतीजतन वैसे तकनीक सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में लगने लगें, जिससे दूरियां घटती चली गयीं. पहले जहां किसी सूचना के आने-छपने मेंसप्ताह या कई दिन लग जाते थे, वहीं अब कुछ सेकेंडों में रांची स्थिति मुख्यालय को न सिर्फ. खबरें मिल जानेलगी, बल्कि दूसरे दिन उस इलाके के पाठक उसे पढ़ने भी लगे, तत्कालीन बिहार उसके इस महत्वपूर्ण अंगयानी छोटानागपुर के ग्रामीण इलाके में पहली बार कंप्यूटर, मॉडम लगाने का श्रेय भी इसी अखबार को जाता है. परिवर्तन के इस दौर में, जब कि अन्य अखबार यह सोच कर चल रहे थे कि वे खास हैं और उनको विशिष्टया मध्य वर्ग के लोग पढ़ेंगे ही, प्रभात खबर ने न सिर्फ. आम लोगों की बातें, आम लोगों की भाषा में कहीं,बल्कि अपनी गरिमा भी बरकरार रखी. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए वैसेइलाकों में इस अखबार को पहुंचाया, जहां पहले कोई अखबार नहीं जाता था, इसमें तत्कालीन पलामू जिले ( अब गढ़वा जिला ) का नगरऊंटारी अनुमंडल भी शामिल है. एक तरफ. से बिहार, दूसरी ओर छत्तीसगढ़ औरतीसरी ओर उत्तर प्रदेश से सटे इस इलाके में पहली बार पांच कॉपी प्रभात खबर भेज कर इस अखबार नेतत्कालीन अखबारों के प्रबंधनों की भाषा में रिस्क लिया, पर आज स्थिति उलट है. आज इन इलाकों में प्रभात खबर पहली पसंद है. इसी प्रकार बीहड़ जंगल के बीच स्थित चतरा जिले के हंटरगंज जैसे उग्रवाद प्रभावित इलाके में जब इस अखबार की कापी गयी, तो किसी को यकीन नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है. गांव की बात, गांव की भाषा में उनके पास पहुंचना उनके लिए आश्चर्यजनक था. तब कस्बेनुमा शहरों में खुले प्रभात खबर के कार्यालयों में जब कंप्यूटर पर काम होता, तो लोगों को आश्चर्यहोता. इसके साथ ही एक और प्रयोग किया इस अखबार ने, स्थानीय ग्रामीण युवाओं को ही इन कार्यालयों कीपूरी जिम्मेदारी दी और उन्हीं से कंप्यूटर पर काम कराना शुरू किया. गुमला जिले का ओमप्रकाश चौरसिया,सिमडेगा का रविकांत, हजारीबाग का सलाउद्दीन, लोहरदगा का संजय या फिर गिरिडीह जिले के एक छोटे से कस्बे बगोदर का रामानंद न सिर्फ. अपने इलाके में लोकप्रियता का ग्राफ. बनाया है, बल्कि उस इलाके मेंअखबारी दुनिया से संबंधित लोगों में उनकी एक अलग पहचान है और यह हुआ एक सार्थक प्रयास के बल पर ये कार्यालय आज कंप्यूटर, मॉडम, फ़ैक्स, स्कैनर व डिजिटल कैमरा से युक्त है. इनके अलावा इलाके के फ़ैक्स सेंटर इन मॉडम सेंटरों से जुड़े हुए हैं और इस कारण बिना किसी विलंब के सेकेंडों में छोटी सी छोटी घटना से अवगत हो जाते हैं लोग धीरे-धीरे इस इलाके में भी अखबारी दुनिया में पूंजी का बोलबाला हुआ और वर्ष 2000 के बाद लगा कि सिर्फ साम, दाम, दंड, भेद के बल पर इस क्षेत्र में पत्रकारिता के सभी मानदंड बदल जायेंगे. देश के दो बड़े घरानों के बड़े हिंदी अखबार आये. पूंजी व ताकत के बल पर उन लोगों ने झारखंड में एक आंधी चलानी चाही,पर ऐसी स्थिति में भी प्रभात खबर ने एक युवा और कर्मठ टीम के साथ अपना झंडा बुलंद रखा. टेक्नोलॉजी में परिवर्तन के साथ-साथ झारखंड के सभी 24 जिलों में कंप्यूटर, मॉडम का जाल बिछा दिया. सभी ग्रामीण इलाकों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया गया. सिमडेगा जिले के कोलेबिरा जैसे जंगलीइलाके में भी अपना ऑफिस खोला, सुविधाएं दीं. ग्रामीण युवाओं को अखबार से जोड़ा, उन्हें मानदेय दिया और एक नयी परंपरा डाली. इससे एक नयी जागरुकता पैदा हुई और गांवों में शुरू इस क्रांति ने इस क्षेत्र में ग्रामीण पत्रकारिता को एक आयाम दिया. इससे जहां एक ओर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को फायदा हुआ, वहां दूसरी ओर अखबार की प्रसार संख्या दिन पर दिन बढ़ती गयी. अब झारखंड के किसी भी गांव का युवा अपना अधिकार जानता है और इसे संभव किया है इस अखबार ने. एक ओर दूसरे अखबार बाजार में एजेंटों, हॉकरों पर पैसा बांट रहे थे. बैनरों, पोस्टरों से इलाकों को पाट रहे थे, तरह-तरह के लुभावने स्कीमों की मदद से तौलिया से लेकर कार तक देने का दावा ठोक रहे थे, वैसी स्थिति में भी प्रभात खबर गांव के लोग, गांव की बातें और लोगों के अधिकार की बात करता रहा. किसी की जमीन छिन गयी, तो वह इस अखबार के दफ्तर भागा आया, किसी पर विपदा आयी, तो उसने मदद मांगी. इन सब में अपनी भूमिका निभाते हुए इस अखबार ने अपनीसही राह दिखाने का भी काम किया. अपने इसी प्रयास के बल पर प्रभात खबर ने रांची जिले के अनगड़ा प्रखंड के कई ग्रामीणों को उनकी जमीन दिलायी, जिसके मिलने की वे आस छोड़ बैठे थे. सुदूर पहाड़ों की तलहटी में आज भी इस अखबार के पत्रकार प्रभात खबर आपके द्वार कार्यक्रम के बल पर लोगों के बीच चेतना की ज्योति जला रहे हैं. उन इलाकों में, जहां आज तक कोई सरकारी पदाधिकारी या राजनीतिक दल के लोग नहीं गये हैं, प्रभात खबर के पत्रकार जा रहे हैं और वहां के लोगों को अपनी बातें कहने के लिए प्रेरित करते हैं. अद्भुत लगता है, जब फटे-पुराने कपड़ों में लिपटी महिलाएं इन कार्यक्रम में आकर रो पड़ती हैं. उनका कहना होता है कि यह अखबार ही उनका अपना है,उनके दुख-दर्द का साथी है. इसी प्रकार शराबबंदी के खिलाफ. महिलाओं के आंदोलन को भी प्रभात खबर नेजान फ़ूंका और क.ई ऐसे गांवों को स्वच्छ वातावरण उपलब्ध क.राया, जहां नशा का राज था. और यह काम किया उन महिलाओं ने जिनका काम ही वहां पहले पिटना होता था, बस उन्हें बल दिया प्रभात खबर ने. इसके अलावा इस अखबार ने सुदूर ग्रामीण इलाकों के वैसे गरीब युवाओं को चुना, जो बेरोजगार थे और समाज की नजर में बेकार भी. प्रभात खबर ने उन्हें बिना किसी सिक्यूरिटी मनी के अपना एजेंट, हॉकर बनाया और इस तरह न सिर्फ वे समाज की मुख्य धारा में जुड़े, बल्कि. प्रतिदिन उनकी कमाई भी होने लगी. शुरुआती दिनों में प्रभात खबर के इस कदम को अन्य अखबारों ने आत्मघाती कदम बताया था, आज वही युवा जब एसेट बन गये, तो गांव तक पहुंच के लिए अन्य अखबार उनके पीछे भाग रहे हैं. इसी प्रका र लोगों के दुख को, उनकी समस्याओं को समझा प्रभात खबर ने और उनकी समस्याओं को सरकारी पदाधिकारियों के समक्ष रखने का काम भी इस अखबार ने किया है और इस आधार पर कई मामलों का निपटारा भी हुआ है. अपने इसी राह केबल पर प्रभात खबर वैसी स्थिति में जब जब इसके पतन का दावा अन्य अखबार ठोक रहे थे, अपने प्रसार संख्या में लगातार वृद्धि करता गया और बड़े घरानों के आने के बाद भी, बड़ी पूंजी की लड़ाई से अपने आपको अलग रखते हुए लगातार अपनी प्रसार संख्या में इजाफा करता जा रहा है. इसका प्रमाण है एनआरएस औरएबीसी की रिपोर्ट. आज एक साथ न सिर्फ. रांची से, बल्कि धनबाद, जमशेदपुर व देवघर से दर्जनों संस्करण निकाल कर इस अखबार ने पूरे झारखंड का न सिर्फ. सर्वाधिक प्रचारित-प्रसारित अखबार बनने का गौरव प्राप्तकिया है, बल्कि ओड़िशा के राउरकेला सहित सिल्लीगुड़ी और अन्य ग्रामीण इलाकों में भी अपनी जगह बनायी है. पत्रकारिता को अंतिम आदमी तक पहुंचाने का संकल्प प्रभात खबर ने समय की मांग को तो ध्यान में रखा ही है लेकिन इसके साथ अपने तेवर के प्रति भी यह हमेशासे संजीदा रहा है. यह के.वल खबरों का संग्रह नहीं बने, बल्कि. पाठक. वर्ग की विचार-तुष्टि का साधन तथावैचारिक. सुगबुगाहट का माध्यम भी साबित हो, इसकी कोशिश रही है. इस अखबार से जुड़े लोगों ने इसकी कोशिश को कार्यरूप में ढालने का सफल प्रयास भी कि.या है. इसी का परिणाम है कि ग्रामीणों क्षेत्रों में, जहां अखबार दिन चढ़ने पर पहुंचते हैं, वहां भी लोग सुबह की कि.रण के साथ अखबार की बाट जोह रहे होते हैं. सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में प्रभात खबर लोगों की पहली पसंद है. लोग इसे क्यों पसंद करते हैं, लोगों के.दिलों तक. प्रभात खबर कैसे पहुंचा, इसकी जानकारी के. लिए इससे जुड़े क.र्मियों की कार्यशैली विवरण होगा जरूरी होगा. अखबार की गांवों तक. पहुंच की यात्रा को समझने के लिए इस दिशा में आनेवाली आरंभिक.बाधाओं को जानना भी जरूरी है. वषों वर्ष 1990 से पहले तक. रांची से निक.लने वाले कुछ क्षेत्रीय अखबार काफी मजबूत स्थिति में थे. इनमें रांची एक्सप्रेस, आज के नाम प्रमुख थे. यही नहीं धनबाद से निकलनेवाले आवाज, चमकता आइना, आज, बिहार आबजर्वर और जनमत तथा जमशेदपुर से निक.लनेवाले आज, उदितवाणी की गांवों तक. जबर्दस्त पहुंच थी. शुरुआती दिनों में प्रभात खबर उनसे होड़ लेने की स्थिति में भी नहीं था. लेकिन 1989 में नये प्रबंधन ( ऊषा मार्टिन ) को आते ही इस अखबार के. क.लेवर में परिवर्तन आना आरंभ हो चुका था. अखबार का पन्ना गांवों, मुहल्लों की समस्याओं तथा ग्रामीण जनता से सीधे जुड़े सामयिक विषयों के लिए आरक्षित-सा हो गया. जाहिर है कि. जन समस्या से जुड़ कर इसने समाज के प्रत्येक तबके के.बीच अपनी संप्रेषणीयता कायम की. क्रमवार विभिन्न जिलों में के. दफ्तर खोले गये और अलग-अलग ऐडिशन निकलने शुरू हुए. हजारीबाग में भी प्रभात खबर का दफ्तर खुला. राष्ट्रीय खबरों के. समतुल्य क्षेत्रीय ही नहीं गांवों की समस्याओं को भी स्थान दिया गया. इस तरह अखबार ने जन-जागरूकता लाने के साथ-साथ प्रशासन-तंत्र को चौकन्ना करने का काम शुरू कि.या. नतीजनत गांवों में इसकी बुनियाद मजबूत हुई. सामाजिक.-राजनीतिक. विसंगतियों के खिलाफ इस अखबार ने आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की. इससे बढ़कर जनाधिकारों के प्रति लोगों में सजगता लाने की पहल हुई. जिला मुख्यालय, प्रखंड मुख्यालय, पंचायत और गांव स्तर के. बाद मुहल्ला स्तरपर सिलसिलेवार ढंग से प्रभात खबर आपके. द्वार शीर्षक. से समाचार प्रकाशित करने की प्रक्रिया शुरू हुई. इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रभात खबर के प्रतिनिधि, जो कमोवेश उसी पंचायत और गांव को होते थे, ने अपने गांव और मुहल्ले की समस्याओं को न सिर्फ. सीधे तौर पर प्रकाशित कि.या बल्कि. सैंक.ड़ों गांव प्रभात खबर का बैनर भी लगाया. गांववालों को प्रभात खबर के बैनर के. सामने खड़ा कि.या गया. इस बैनर तले गांववालों के बड़े, युवा, बुजुर्ग, महिला, पुरुष सभी दिखाई दिये. प्रभात खबर ने उस स्थान में रहनेवाले सभी जाति, धर्म के शिक्षित, अशिक्षित को एक. साथ इकट्ठा किया. इस भीड़ में वह व्यक्ति भी था, जो सरककारी अधिककारियों के सामने डर से बोल नहीं सकता था. सरकारी वर्दी को देखकर वे घरों मे ही रह जते थे. ये सारे ग्रामीण प्रभात खबर के. बैनर के. तले उपस्थित हुए और खुलकर अपनी समस्याएं रखीं. गांववालों ने बताया कि. कैसे थानेदार उन्हें प्रताड़ित करता है. कैसे उनके आवेदन कार्यालयों में धूल चाटते रहते हैं. और यह कि जिस विधायक और सांसद को उन्होंने चुनकर संसद-विधानसभा में भेजा वे गांव मे एक. बार भी नहीं आये. मुहल्ले में पानी,बिजली, सड़क., स्वास्थ्य, लड़कि.यों की शिक्षा, गर्भवती महिलाओं की दक्कतें समेत सैकड़ौं समस्याओं को वहां के बाशिंदों ने बताया और प्रभात खबर ने अगले दिन इन समस्याओं से जुड़ी खबर को सुर्खी बनाया. इसका असर यह हुआ कि. जनता की आवाज सत्ता के गलियारों तक. पहुंचने लगी. इस तरह प्रशासन और जनता के बीच संवाद का माध्यम प्रभात खबर बना. प्रभात खबर के. इस पहल के. बाद सुदूरवर्ती गांव, जहां सरकारी अधिकारी और मुलाजिम नहीं जाते थे, उन्हें भी पता चला कि गांव की हालत क्या है. उन्हें यह भी समझ आया कि लोगों के. सोच और मांग पर पहल नहीं हुआ तो आंदोलन होगा. प्रखंड मुख्यालय से ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचने के लिए सड़क की जरूरत होती है, प्रभात खबर ने अपनीप्राथमिकता में गांव की सड़कों को शामिल किया. सड़क से जुड़ी खबरों को संबंधित गांव की आबादी के ब्यौरे के साथ छापा गया. इससे आमलोगों के. साथ-साथ सरकार में बैठे लोगों एवं अधिकारियों को जानकारी मिली कि किस सड़क. को बनाने से कि.तने लोगों को फायदा होगा. दूसरे चरण में प्रभात खबर ने गांव में बिजली और कि राशन तेल आदि पर सिलसिलेवार ढंग से समाचार प्रकाशित किये. इस तरह की रिपोर्टिग लगभग पूरे राज्य 38 के गांवों में की गयी. इस कार्य को अभियान की तरह किया गया. सिर्फ यह नहीं कि. फलां प्रखंड या गांव मेंबिजली नहीं है, कि राशन की कालाबाजारी हो रही है. बल्कि. स्थान विशेष को चिन्हित कर क्रमवार सर्वे किया गया. सूची बनायी गयी, जिसमें गांव-मुहल्ले का नाम और बिजली है या नहीं, दर्शाया गया. बिजली नहीं हैतो कारण भी लिखे गये. इसका सीधा असर बिजली विभाग पर हुआ. गांववालों ने ऐसे समाचार का अपनेसे जोड़कर देखा. दरअसल इसके पीछे गांधी के अंत्योदय और जयप्रकाश नारायण के सर्वेदय की परिकल्पना काम कर रही थी. दूसरे शब्दों में यह पत्रकारिता को अंतिम आदमी तक पहुंचाने का संकल्प था. और इसके पीछे की दृष्टि निसंदेह हरिवंश जी की थी. सरकारी विद्यालयों, अस्पतालों की स्थिति कैसी है इसका ब्यौरा भी समय-समय पर प्रकाशित होता रहा. अखबार के हजारीबाग कार्यालय ने विभिन्न सिंचाई-योजनाओं की क्रियान्वयन की सही तस्वीर सामने रखी सूखाड़ पर कई-कई पन्नों खर्च कि.ये और जमीन पर उतर कर ऐसी समस्याओं को समझने का प्रयास किया गया. इस तरह गांव सुर्खियों में आये और अखबार से जुड़े लोगों का गांवों तक. पहुंचना तय हुआ. बाद में इस परिपाटी को दूसरे अखबारों ने भी अपनाया. इसके साथ ही राज्य के गांवों में पांव जमाते उग्रवाद को गंभीरता से लिया गया. प्रभात खबर ने उग्रवाद की समस्या पर मानवीय पहलुओं को सबसे अधिक उजागर किया गांव के युवक उग्रवादी क्यों बन रहे हैं. गांववालों की जुबानी ही लगातार इसकी कहानी प्रकाशित होती रही. उग्रवाद के. बढ़ने से आमलोगों की परेशानियों को समाचार में महत्व दिया गया. उग्रवादियों ने जब भी निर्दोष ग्रामीणों को सताया, प्रभात खबर उनके साथ खड़ा हुआ. इससे नकस्ल प्रभावित क्षेत्रों में प्रभात खबर के प्रति विकास जगा. पुलिस-प्रशासन की विफलता को भी अखबार में प्रकाशित किया गया. इससे गांवों तक अखबार की पहुंच और मजबूत हुई. प्रतिनिधियों के ग्रामीणों से लगाव के कारण उग्रवादियों की गतिविधियों की जानकारी सबसे पहले प्रभात खबर में छपती रही. इससे सरकारी एवं मानवीय नुकसान की भरपाई हुई. अखबार समय-समय पर सामाजिक आंदोलन का वाहक बना. हजारीबाग जिले के मुकुंदगंज गांव की महिलाओं ने जब शराब-विरोधी आंदोलन शुरू किया तो इस आंदोलन का स्वागत अखबार ने गर्मजोशी के साथ किया. इस चरणबद्ध आंदोलन को अखबार ने रोज-ब-रोज पूरे विस्तार से प्रकाशित किया. आंदोलनजारी रहने तक प्रतिदिन एक पेज समाचार चित्र के साथ छापा गया. नतीजा यह हुआ कि. एक. छोटे-से गांव शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे जिले के सैकड़ों गांव में फैल गया. गांवो की बेहतरी के लिए अखबार ने समय-समय पर उत्प्रेरक का भी काम किया. मसलन यदि किसी किसान ने उत्पादन के क्षेत्र में प्रयोगात्मक. तरीके से कुछ किया, अखबार ने इसे पूरा महत्व दिया. इस क्षेत्र मेंकि.सानों को प्रोत्साहित करने के लिए सफल किसान कॉलम शुरू किया, जिससे सफल किंतु गुमनाम किसानों को सुर्खियों में लाया जा सका. इस क्रम में एक जिले के सैकड़ों किसानों को और उनके प्रयोगों को दुनिया के सामने लाया गया. वर्तमान समय में भी कृषि नाम का एक साप्ताहिक पन्ना किसानों को समर्पित होता है. सफल किसान कालम में निर्धारित फसलों के अतिरिक्त यदि किसी ने विशेष उत्पादन कि.या है, तो उसका सचित्र विवरण अखबार में आया. फलों-सब्जियों के. विशेष उत्पादन हुए तो उसका विवरण अखबार में आया. और अखबार जहां प्रसिद्ध किसानों के बारे में छापते रहे और सिर्फ. आधुनिक. जानकारियां को जगह देते रहे वहींप्रभात खबर ने जमीन से जुड़ी कृषि पत्रकारिता की नींव डाली. और गांव के रिपोर्टर ने ही गांव में उत्पादित होनेवाली नयी फसल के बारे में लिखा तो कि.सानों ने इसे खुद से जोड़कर देखा. बड़कागांव में ईख की खेती, इचाक में धनिया पत्ता का उत्पादन, जो राष्ट्रीय स्तर तक के बाजारों में पहुंच रहा है, के बारे में बताया गया तो क्रांति का-सा माहौल बना. वैज्ञानिक व पूर्व राष्टपति एपीजे अबुल कलाम आजद और नारायणमूर्ति की अखबारों से शिकायत थी कि अखबार सिर्फ़ नकारात्मक खबरों को तरजीह देते हैं. इस संदेश पर अमल करते हुए प्रभात खबर ने गुड न्यूज की परिकल्पना की, जिसमें बकायदा कॉलम बनाकर अच्छी और सकारात्मक खबरों को पहले पृष्ठ पर छापने की परंपरा का विकास हुआ. गुड न्यूज के जरिये भी जिले के उन्नत गांव सुर्खियों में जगह पाते रहे. शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क.-निर्माण आदि के क्षेत्र में अथवा ग्रामीणों को जागरूक. बनाने के. क्षेत्र में यदि किसी ग्रामीण ( महिला-पुरूष ) ने प्रयास किया तो अखबार में उसका खैरमकदम हुआ. इस तरह के. पृष्ठ का इंतजार आज भी गांवों में बेसब्री से होता है. समय-समय पर गांव, प्रखंड और जिला स्तर के. अनछूए पहलुओं को सामने लाने के. लिए हलचल नाम से पृष्ठ बनायेगये. प्रभात खबर ने शिक्षा से संबंधित समाचार को शुरू से प्राथमिकता दी. गांव के विद्यालय, पढ़नेवाले व शिक्षक. और संबंधित समस्याओं के बारे में लगातार सचेत रहा है. शायद ही किसी गांव का ( हजारीबाग जिला ) कोई विद्यालय हो जो अब प्रभात खबर के पन्नों पर नहीं आया. जिला मुख्यालय के शिक्षण संस्थानों से संबंधित सूचना को प्रकाशित किया गया, जिससे गांव क छात्रों को मदद मिली. स्वास्थ्य मुद्दों पर समाचार प्रकाशित कर समस्या से जूझने व गांववालों से जुड़ने का प्रयास किया गया. गांव के लोग कैसे और कैसी स्वास्थ्य सुविधा प्राप्त कर रहे हैं- इस पर वर्षो समाचार प्रकशित किया गया. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली और सरकारी चिकित्सकों के गांव में पहुंच के साथ ही झोला छाप डाक्टरों को केंद्रित कर श्रंखलाएं प्रकाशित की गयीं. इसी तथ्य की भी पड़ताल की गयी कि सरकारी अस्पताल निर्धारित समय खुलते और बंद होते हैं या नहीं. इन अस्पतालों में वांछित सुविधाएं हैं या नहीं और यह कि गांववालो का इनके बारे में क्या सोचना है. गांवो के स्वयं सेवी संस्थाओं के कार्यक्रम को समाचार का रूप दिया गया. स्वयं सहायता समूह की महिलाओं की उपलब्धियों को भी समय-समय पर प्रकाश में लाया गया. इसी तरह ब्लड बैंक, एंबुलेंस सेवा, सिनेमा की जानकारी देकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में अखबार की बुनियाद को मजबूत बनाया गया. विभिन्न आयोजनों के द्वारा प्रभात खबर ने समय-समय पर जिला, प्रखंड और पंचायत स्तर पर लोगों को जोड़ने का प्रयास किया हजारीबाग महोत्सव के दरम्यान और बाद में भी हजारीबाग के. विभिन्न पर्यटन स्थलों के. शब्द-चित्र अखबारमें आते रहे. ग्रामीण क्षेत्रों के गुमनाम पर्यटन स्थलों की पहचान कर उन्हें सरकार की नजर में लाया गया.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें