सोमवार, 3 नवंबर 2014

भाषायी पत्रकारिता: उत्थान या अवसान की ओर













रमेश शर्मा 


/पत्रकारिता एक तरफा बहता पानी नहीं है। इसका स्वभाव प्रकृति की भांति उभयांगी है पहले प्रकृति वर्षा करके धरती के पोर-पोर की प्यास बुझाती है और फिर सागर आदि धरती के जल-संग्राहकों से वाष्प लेकर बादलों का पेट भर देती है। प्रकृति का यही संतुलन धरती के जीवन का आधार है। जिस दिन प्रकृति का यह संतुलन बिगड़ेगा बस उसी दिन धरती से जीवन के विनाश का आरंभ होगा। पत्रकारिता भी पहले समाज और शासन के समक्ष जनभावनाओं को प्रस्तुत करती है और फिर शासन की विशेषताओं अथवा विवशताओं से जनमानस को अवगत कराकर सार्वजनिकता का संतुलन बनाए रखती है। आजादी के पहले और बाद के इन 60 वर्षों में भाषायी पत्रकारिता ने यह काम बहुत जिम्मेदारी से किया है किन्तु अब कुछ वर्षों से यह संतुलन गड़बड़ाने लगा है। यह गड़बड़ी भाषायी पत्रकारिता में आए उन दोषों के कारण आरंभ हुई जो उसे अंग्रेजी की पत्रकारिता से मिले हैं। जब हम कोई यात्रा आरंभ करते हैं, अपने कदमों को आगे बढ़ाते है तब यह आवश्यक नहीं कि हम संसार की किसी महानतम ऊंचाई की ओर बढ़ रहे हों। हमारी यात्रा विनाश की दिशा में किसी ब्लैक होल की ओर भी जा सकती है। हमारे विकासात्मक प्रयासों से ओजोन की परत कमजोर भी हो सकती है और फिर समूचे प्राणी संसार के सामने उसके अस्तित्व का प्रश् उपस्थित कर सकती है। भाषायी पत्रकारिता के साथ भी यही हो रहा है। योजनापूर्वक उसका मार्ग बदल दिया गया है। बदला हुआ मार्ग लुभावना है, मनमोहक है, उसमें साधनों, सुविधाओं और संपन्नता की प्रचुरता है और इसी प्रचुरता ने उसके संतुलन को बिगाड़ा है, उसकी यात्रा का मार्ग बदला है। भाषायी और अंग्रेजी पत्रकारिता में एक आधारभूत अंतर है। भाषायी पत्रकारिता जनता से जुड़ी रहती है और अंग्रेजी पत्रकारिता शासन से। प्रत्येक विदेशी शासन अपने शासितों के स्वत्व का दमन करता है। यह दमन उनके भाव, भाषा, मान और स्वत्व के बोध आदि किसी भी प्रकार से हो सकता है। अंग्रेजों ने भारत में यही किया था। आज हम अतीत की प्रत्येक घटना का विशेषण कर सकते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में जनमत की जाग्रति, जनमत का संगठन और जनमत के निर्णायक अभियान में भाषायी संपर्क और भाषायी पत्रकारिता का ही योगदान रहा है। तत्कालीन शासन ने शक्ति से इन पत्रकारों का दमन भी किया है। भाषायी पत्रकारों पर मुकदमें चले और प्रतिष्ठान बंद किए गए। 'प्रताप' का कीर्तिमान तो यह है कि उसका प्रत्येक संपादक गिरफ्तार हुआ। 'लोकवाणी' का योगदान यह है कि समय रहते सरकार को सूचना मिली और जैसलमेर रियासत पाकिस्तान में जाते-जाते रह गई। हमारे परमाणु परीक्षण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान पोखरन इसी रियायत का हिस्सा है। स्वतंत्रता के बाद भाषायी पत्रकारिता का दमन तो कम हुआ, लेकिन उसका संघर्ष बढ़ा और चुनौतियां बढ़ीं। शासन तो पीछे हुआ, उसके आगे अंग्रेजी हो गई जिसके पोषण और प्रोत्साहन के लिए शासन पूरी शक्ति से प्रतिबद्ध रहा। आज प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचकर आश्चर्य होता है कि स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र सत्ता ने स्वतंत्रता प्राप्ति के आरंभिक 15 वर्षों में भाषा के प्रश्न को अनिर्णीत रखा और इन पन्द्रह वर्षों में स्थानीय भाषाएं एक-दूसरे की शत्रु हो गई। क्या यह स्वभाविक है? क्या यह परिस्थिति सामान्य है कि जो भाषा-भाषी लोग स्वतंत्रता के लिए कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे वे स्वतंत्रता के मात्र 15 वर्षों में एक-दूसरे के प्रति शत्रुओं का सा व्यवहार करें। इन पन्द्रह वर्षों में भाषायी वैमनस्य पनपते ही अंग्रेजी का राज हो गया। वह प्रतिष्ठा की भाषा हो गई। श्रेष्ठता का संदेश हो गई। शासन की प्रियतमा हो गई। इसका सीधा दबाव भाषायी पत्रकारिता पर पड़ा। उसे साधनों के लिए, अपने जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ा तो प्रत्यक्ष और प्रतिष्ठा के युद्ध के लिए अंग्रेजी की पत्रकारिता सामने थी फिर भी भाषायी पत्रकारिता डटी रही। वह शासन भी नहीं जन सामान्य की प्रिय बनी रही। प्रसार संख्या की दृष्टि से भाषायी समाचार पत्र और पत्रिकाएं सदैव आगे रहीं। लेकिन जब शासन का सहारा लेकर भी अंग्रेजी पत्रकारिता भाषायी पत्रकारिता को परास्त न कर सकी तब उसने पैंतरा बदला और हमला भीतर घुसकर शुरू किया। अंग्रेजी पत्रकारिता ने भाषायी पत्रकारिता को अपनी ओढ़नी से ढकना शुरू कर दिया। इसका आंरभ वर्ष 1991 से लागू खुली अर्थ व्यवस्था से हुआ। अर्थव्यवस्था का उद्देश्य पूरी दुनिया को एक गांव बनाना था। स्थानीय प्रतिष्ठानों में विदेशी पूंजी का निवेश इसका अगला कदम था। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। धन-प्रभुओं को भाषायी पत्रकारिता की जरूरत दो प्रकार से पड़ी। एक तो अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए और दूसरा अपने औद्योगिक साम्राज्य की सुरक्षा के लिए पत्रकारिता के प्रभाव का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपने उत्पादों के प्रचार के नाम पर एक बड़ी धनराशि का लालच दिया। 2001 में भारत में कुल एड.रेवेन्यू लगभग पांच हजार करोड़ था, 2007 में बीस हजार करोड़ था जो 2008 में बढ़कर एक लाख करोड़ हो गया। जो काम अंग्रेजों का दमन सौ साल में भी नहीं कर पाया वह काम इस पूंजी ने मात्र दस वर्षों में कर दिया। भाषायी अखबारों ने भी अपने स्वरूप को अंग्रेजी जैसाबनाना शुरू कर दिया। भाषा से वाक्य रचना, शब्द चयन, और वाक्य सौन्दर्य गायब हो गया। इसका स्थान उनवादात्मक शैली ने लिया। हिन्दी और स्थानीय भाषा में अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं के शब्द जोड़े जाने लगे वह भी इस तर्क के साथ कि हिन्दी या स्थानीय भाषा को बोलचाल की भाषा बनाना है। भाषाई पत्रकारिता और भारतीय भाषाओं के शब्दों को प्रचलन से हटाने के लिए भारत में एक योजना पूर्वक प्रचार हुआ। कहा गया कि भाषा बोलचाल की होना चाहिए। वे शब्द प्रयुक्त होने चाहिए जो लोगों की समझ में आएं। यह ठीक है कि संस्कृत के शुद्ध और मौलिक शब्द अब प्रचलन में नहीं हैं, उनका स्थान संस्कृत के अपभ्रंश शब्दों ने ले लिया है लेकिन बोलचाल की शब्दावली के मायने क्या हैं? क्या इसका मतलब अंग्रेजी है या उन भाषाओं के शब्द हैं जो हमलावरों ने भारतीय मानस पर थोपी थी। भारत में बोलचाल की भाषा बनाने के लिए अंग्रेजी में हिन्दी शब्द डालना जरूरी है, क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द डालना जरूरी है न कि भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी के। यदि संस्कृतनिष्ठ हिन्दी अथवा साहित्यिक शैली की क्षेत्रीय भाषा को बोलचाल की भाषा बनानी है तब इसमें लोकभाषा के प्रचलित प्रसिद्ध शब्दों का समावेश होना चाहिए किन्तु योजना पूर्वक अंग्रेजी को स्थापित करने के लिए बोलचाल की भाषा के नाम पर क्षेत्रीय भाषाओं के विरुद्ध अभियान चला जिसका शिकार भाषायी पत्रकारिता हुई। भाषायी पत्रकारिता पर आधुनिक तकनीकि का मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाया गया। इसके दो कारण हैं एक तो मीडिया प्रतिष्ठानों को उस पैसे ने बहुत आकर्षित किया जो शहरों से आना था, अंतराष्ट्रीय उद्योग जगत से आना था, और दूसरा क्षेत्रीय समाचार पत्रों में भी संपादक की कुर्सी पर कहीं-कहीं ऐसे महानुभाव विराजमान हुए जिनकी आस्था भाषा, भाव, भारत और भारतीय भाषाजी पत्रकारिता के बजाए अपने स्वयं के व्यक्तित्व के विकास तथा प्रतिष्ठान के प्रभुओं की प्रसन्नता पर आकर टिक गई। यूं भी संपादक के पद का निरन्तर हृास हुआ है। संपादक के पद की प्राथमिकताओं में संपादकीय गुणों से ज्यादा प्रबंधकीय और प्रशासन से प्रभावी संपर्क बनाने को वरीयता दी गई। यह भाषायी पत्रकारिता का नैतिक हृास है, वृत्तीय हृास है और उसकी विश्वसनीयता का हृास है। एक समय था जब किसी भी समाचार पत्र में प्रकाशित किसी एक समाचार से संपूर्ण जन मानस आंदोलित हो उठता था। लेकिन अब किसी विषय पर सर्वाधिक प्रसार वाले समाचार पत्रों में प्रकाशित पन्ने की खबर भी प्रभाव नहीं डालती। पत्रकारिता जितनी स्थानीयता से दूर होगी, भाषायी पहुंच से दूर होगी उतनी ही सच्चाई से दूर होगी। इसका उदाहरण पिछले एक वर्ष के बीच हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम में देखा जा सकता है। तथाकथित राष्ट्रीय पत्रकारिता जो अंग्रेजी के आश्रित है, अंग्रेजी में सोती और उठती है, उसने करोड़ों रुपये लगाकर विशेषज्ञों की सेवाएं लीं। एजेन्सियों से मतदान पूर्व सर्वे करवाए किन्तु उनके आकलन जमीन पर औंधे मुंह गिरे, इसमें पहला आकलन कर्नाटक विधानसभा चुनाव, दूसरा आकलन गुजरात विधानसभा चुनाव, तीसरा आकलन उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव और चौथा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव का था। इन चारों प्रांतों में जो दल चुनाव जीते हैं, उनकी जीत अंग्रेजी अखबारों को दिखी ही नहीं थी जबकि क्षेत्रीय समाचार पत्रों, भाषायी समाचार पत्रों के आकलन में संभावित जीत के दिए गए संकेत सौ प्रतिशत सही निकले। यही कर्नाटक में हुआ यही गुजरात में, यही उत्तरप्रदेश में और यही मध्यप्रदेश में मीडिया के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित घराने यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में भले ही अभिजात्य वर्गों का दंभ अंग्रेजी में ही प्रतिध्वनित होता हो, प्रशासनिक शीर्ष पर भले ही अंग्रेजी विराजमान हो लेकिन जन भावनाएं क्षेत्रीय भाषाओं में ही प्रतिबिम्बित हैं इसलिए वे इन्हीं क्षेत्रीय भाषाओं के पत्रों में और भाषाई टी.वी.न्यूज चैनलों की शुरूआत कर रहे है। आज भारत में लगभग 200 भाषायी न्यूज चैनल हैं और भाषायी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं की संख्या भी लाख का आंकड़ा पार कर गई है। अकेले मध्यप्रदेश में लगभग एक हजार दैनिक और सोलह हजार मासिक-साप्ताहिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। भाषायी समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों की ओर बड़े मीडियाघरानों का रुझान भाषायी पत्रकारिता के लिए प्रशंसा की नहीं बल्कि चिंता की बात है। वे क्षेत्रीय भाषा पर अंग्रेजी को लाद देंगे जैसा कि कुछ वर्ष पूर्व हुआ जब दिल्ली की एक अतिप्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका ने अपना हिन्दी संस्करण शुरू किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया गया था। किन्तु उस हिन्दी संस्करण की भाषा में अंग्रेजी शब्द ठूंसे जा रहे हैं और हिन्दी पत्रकारिता की भाषा बिगाड़ने में वह पत्रिका एक माध्यम का काम करने लगी। जो लोग भाषायी पत्रकारिता से रेवेन्यू कमा रहे हैं उन्हें इतना करना ही चाहिए कि आभार स्वरूप वे भाषायी पत्रकारिता को अवसान की ओर न धकेलें।  













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