रविवार, 30 नवंबर 2014

शैशन और वीवर का गणितीय संचार प्रारूप


 

 

प्रस्तुति-- इरा सिन्हा, श्रुति जारूहार



 संचार के गणितीय प्रारूप का प्रतिपादन 1949 में अमेरिका के क्लाउड ई.शैशन और वारेन वीवर ने संयुक्त रूप से किया, जो मूलत: टेलीफोन द्वारा संदेश सम्प्रेषण की प्रक्रिया पर आधारित है। शैशन मूलत: गणितज्ञ व इलेक्ट्रानिक इंजीनियर थे, जिनकी दिलचस्पी संचार शोध के क्षेत्र में थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित वेल टेलीफोन लेबोरेट्री में अङ्गिन नियंत्रक तथा क्रिप्टोग्राफर के पद की जिम्मेदारियों को संभालने वाले क्लाउड ई.शैशन ने पहली बार 1948 में टेलीफोन संचार प्रक्रिया को प्रारूप के रूप में दुनिया को समझाया तथा 1949 में अमेरिका के ही वैज्ञानिक शोध एवं विकास विभाग में कार्यरत अपने साथी वारेन वीवर के साथ मिलकर संचार के गणितीय सिद्धांत नामक पुस्तक प्रकाशित किया। इस पुस्तक में शैशन और वीवर ने पूर्व के संचार प्रारूप को संशोधित करके प्रस्तुत किया। इस प्रकार, शैशन और वीवर द्वारा प्रतिपादित संचार के गणितीय प्रारूप में मुख्यत: छह तत्वों- सूचना स्रोत, सूचना प्रेषक, संचार मार्ग, शोर, प्रापक व गन्तव्य स्थल का उल्लेख किया गया है। इसे निम्नलिखित रेखाचित्र के माध्यम से समझा जा सकता है:- 

        उक्त प्रारूप में संचार का प्रारंभ सूचना स्रोत से होता है जो संदेश को उत्पन्न करता है। सूचना प्रेषक के रूप में कार्य करने वाला वाचिक यंत्र के माध्यम से अपने संदेश को सूचना स्रोत (संचारक) सम्प्रेषित करता है। संचार मार्ग में संदेश का प्रवाह प्रापक के सुनने तक होता है, जिससे संदेश अपने गन्तव्य स्थल तक पहुंचता है। इस प्रक्रिया में शोर एक प्रकार का व्यवधान है, जो संचार के प्रभाव को विकृत या कमजोर करने का कार्य करता है। शैशन और वीवर के गणितीय संचार प्रारूप को अभियांत्रिक व सूचना सिद्धांत प्रारूप भी कहते हैं। 

         सूचना और शोर : किसी भी सूचना का स्रोत व्यक्ति या संस्थान (संचारक) होते हैं, जो प्रतिदिन भारी संख्या में सूचनाओं को संकलित करने तथा समाज (प्रापक) के लिए महत्व सूचनाओं को सम्प्रेषित करने का कार्य करते हैं। सूचना सम्प्रेषण प्रक्रिया के दौरान संचार मार्ग में किसी न किसी कारण से शोर उत्पन्न होता है, जिससे सूचना विकृत व प्रभावित होती है। सूचना सम्प्रेषण प्रक्रिया में शोर की अवधारणा को सर्व प्रथम शैशन-वीवर ने प्रस्तुत किया। इनके गणितीय संचार प्रारूप की सबसे बड़ी विशेषता भी शोर ही है। शोर से तात्पर्य संचार मार्ग में आने वाले व्यवधान से है, जिसके प्रभाव के कारण संदेश अपने वास्तविक अर्थों में प्रापक तक नहीं पहुंचता है। यदि सूचना प्रेषक द्वारा सम्प्रेषित सूचना संकेत संचार मार्ग से होते हुए अपने वास्तविक रूप में प्रापक तक पहुंच जाती है तो माना जाता है कि संचार मार्ग में कोई व्यवधान नहीं है, लेकिन ऐसा कम ही होता है। सामान्यत: सम्प्रेषित सूचना संकेत के साथ कोई न कोई शोर अवश्य ही जुड़ जाता है। शोर जितना अधिक होता है, व्यवधान भी उसी अनुपात में उत्पन्न होता है। इसके विपरीत, शोर के कम होने की स्थिति में व्यवधान भी कम होता है तथा संचार प्रक्रिया बेहतर रूप में सम्पन्न होती है। शैशन और वीवर ने शोर के कारण उत्पन्न होने वाले व्यवधान को कम करने के लिए शब्द-बहुलता के सिद्धांत पर जोर दिया है, जिसका तात्पर्य है- किसी संदेश को बार-बार बोलना या दुहराना। दूसरे शब्दों में, जिस सूचना या संदेश के विकृत होने की संभावना होती है, लोग उसे बार-बार बोलते या दुहराते हैं। यदि संचारक एक ही वाक्य को बार-बार बोलता है या दुहराता है तो उसका उद्देश्य संदेश को उसके वास्तविक अर्थो में प्रापक तक पहुंचाना है।

          शैशन और वीवर ने संचार के गणितीय प्रारूप का प्रतिपादन संचार प्रक्रिया के दौरान संचार मार्ग में आने वाले सूचना संकेतों में से उन संकेतों को अलग करने के लिए किया, जिसका उद्देश्य कूटबद्ध संकेतों को कम से कम अशुद्धियों के साथ प्रापक तक पहुंचाना था। शैशन और वीवर ने संदेश सम्प्रेषण के दौरान व्यवधान उत्पन्न करने वाले शोर को दो प्रकारों में विभाजित किया है- संचार मार्ग शोर और शब्दार्थ शोर।

1. संचार मार्ग शोर : भौतिक माध्यमों से सूचना सम्प्रेषण के दौरान उत्पन्न होने वाले व्यवधान को संचार मार्ग शोर कहते हैं, जिनके बहुत से संकेतार्थ होते हैं। इन संकेतार्थो को संचार मार्ग शोर का महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। विभिन्न माध्यमों के संचार मार्गो को तकनीकी अवस्था व कार्य निष्पादन, संचार मार्गो की सामाजिक व भौतिक उपलब्धि तथा वास्तविक संदेशों की जनसमुदाय तक पहुंच के द्वारा पहचाना जा सकता है। अंतर-वैयक्तिक संचार के संदर्भ में संचार मार्ग शोर को संचारक और प्रापक के मध्य उपस्थित किसी भी प्रकार के व्यवधान से समझा जा सकता है। शब्द-बहुलता के सिद्धांत का उपयोग कर संचार मार्ग में व्याप्त शोर को कम या अप्रभावी किया जा सकता है।         
                              

2. शब्दार्थ शोर :  जब प्रेषक अपनी स्थिति तथा मनोदशा के कारण सूचना को गलत समझ लेता है, जिसके कारण उत्पन्न होने वाले व्यवधान को शब्दार्थ शोर कहते हैं। ऐसी स्थिति में प्रापक सम्प्रेषित सूचना को संचारक की आवश्यकता व इच्छा के अनुरूप अर्थ प्रदान नहीं करता है। शब्दार्थ शोर का दूसरा कारण संचारक द्वारा सामान्य शब्दों का प्रयोग न करना भी है, क्योंकि सूचना सम्प्रेषण के दौरान यदि संचारक कठीन या दो अर्थो वाले शब्दों का प्रयोग करता है तो उसके वास्तविक अर्थ को समझने में प्रापक को परेशानी होती है। यदि प्रापक वास्तविक अर्थ को समझ लेता है तो किसी भी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न नहीं होता है। इसके विपरीत, यदि प्रापक वास्तविक अर्थ को समझ नहीं पाता है, जिसके चलते शब्दार्थ शोर उत्पन्न होता है। 

           शैशन-वीवर का गणितीय संचार प्रारूप में उल्लेख किया गया है कि -
  1.  सूचना स्रोत के पास एक संदेश होता है।
  2. सूचना प्रेषक की मदद से सूचना स्रोत संदेश को सम्प्रेषित करता है।
  3. सूचना प्रेषक संदेश को संकेत में परिवर्तित करता है। 
  4. परिवर्तित संकेत को संचार मार्ग से होकर गुजरना पड़ता है।
  5. संचार मार्ग में शोर के कारण व्यवधान उत्पन्न होता है, जिससे सम्प्रेषित संकेत प्रभावित होता है। 
  6. प्रापक संचार मार्ग में सम्प्रेषित संकेत को ग्रहण करता है।


          कमियां : शैशन और वीवर का गणितीय संचार प्रारूप मुख्यत: दो प्रश्नों पर आधारित है। पहला, संचार मार्ग में सम्प्रेषित सूचना को किस प्रकार उसके वास्तविक रूप में प्रापक तक पहुंचाया जाए तथा दूसरा, संचार मार्ग में शोर के कारण सूचना कितना विकृत होती है। इस प्रक्रिया में कहीं भी फीडबैक का उल्लेख नहीं किया है। इसी कमी के कारण शैशन और वीवर के गणितीय संचार प्रारूप की एक-तरफा कहा जाता है।  

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