गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मीडिया में पैकेज रैकेट का खेल:



 

 

 कोई करोड़पति तो कोई कौड़ीपति

आज मीडिया पूरी तरह बदलाव के दौर में है.  मिशन शब्द उसकी डिक्शनरी से लगभग गायब हो चुका है. वैश्वीकरण के दौर ने इसे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. समाज-देश  पर नजर रखने वाला चौथा खंभा, बाजारवाद की भेंट चढ़ चुका है. बाजार ने मीडिया के हर स्वरूप को बदल डाला है. बदलाव के बाईस बरस को खंगालने से साफ पता चलता है कि मीडिया के अंदर व बाहर जो जबरदस्त बदलाव हुआ है, वह वैश्वीकरण की ही देन है. कंटेंट, तकनीक, प्रस्तुति व प्रबंधन में जमीन-आसमान का अंतर दिखता है. पत्रकार पर दलाल और संपादक पर प्रबंधक की भूमिका में आने के कथित आरोप को, जीवंत देखा जा सकता है.   मीडिया (प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक) कंटेंट, तकनीक, प्रस्तुति व प्रबंधन के मामले में उस दौर को पीछे छोड़ चुका है, जहाँ  वापस जाना अब नामुमकिन है. कंटेंट, तकनीक, प्रस्तुति के साथ-साथ पत्रकारों में भी बदलाव आया है. फिल्मी दुनिया की तरह मीडिया की अपनी चमकीली दुनिया स्थापित होने से अब जुझारू पत्रकार(कंसेप्चुअल जर्नलिस्ट) ढूंढने पर शायद मिलें ? बदलाव के दौर में प्रबंधन ने पत्रकारों को बदल डाला है. आज वही पत्रकार मीडिया हाउस में टिक पाता है जो मीडिया हाउस के लिए व्यवसाय कर सके या फिर उसके अनुरूप काम करें. कहा जा सकता है कि  अच्छे पत्रकारों का दौर लद चुका है. लेखन के लिए जीने वाले पत्रकारों को अब प्रबंघन करना पड़ता है. पिछले 22 साल में जो बड़ा बदलाव मीडिया में आया उसमें पत्रकारों का मासिक वेतन, पैकेज में तब्दील हो गया.
पैकेज के खेल ने आज पत्रकारों को करोड़पति, लखपति, हजारपति और कौड़ीपति बनाया दिया है. पत्रकारों की बड़ी जमात सरकारी चपरासी के लायक वेतन पाने से भी वंचित है. यही नहीं, बिना पैकेज, मानदेय के भी मीडिया हाउस में भारी संख्या में पत्रकार काम कर रहे हैँ. मतलब उन्हें एक कौड़ी नहीं मिलती है. बड़े पत्रकार करोडों में खेल रहे हैँ. छोटे पत्रकार बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में मानदेय एक मजाक बन कर रह गया है. छोटे पत्रकारों का मानदेय उन्हें रूलाता है तो वहीं बड़े पत्रकारों का मानदेय उन्हें आह्लादित करता है. हालांकि, उनकी गर्दन पर हमेशा तलवार लटकी रहती है. मीडिया हाउस का ग्राफ गिरा या उसके हित में काम से मुंह मोड़ा, बस नौकरी गई.
प्रिंट मीडिया की बात करें तो हालात बद-से-बदतर है. वेतन अब पैकेज बन चुका है. संपादक या यों कहे उंचे पद पर आसीन मीडियाकर्मी जो अखबार के नीति र्निधारक हैं उन्हें 50 हजार से ढ़ाई लाख से ज्यादा के मासिक पैकेज पर रखा जाता है. छोटे अखबार समूह में संपादक का पैकेज जहां 50 हजार मासिक होता है वहीं बड़े अखबार में संपादक ढ़ाई लाख प्रतिमाह से ज्यादा के पैकेज पर काम कर रहे हैं. हालांकि, मीडिया में पैकेज का कोई नियम निर्धारित नहीं है. जो जितने में मालिक को पटा लें या फिर मालिक जितने में संपादक को पटा लें या मीडियाकर्मी को. संपादक, वरीय रिर्पोटर, संपादकीय और रिर्पोटिंग के क्षेत्र में पत्रकारों का मानदेय अलग-अलग होता है. सबसे बुरा हाल जिला मुख्यालयों में कार्यरत पत्रकारों का है. एक बड़ा अखबार अपने जिला ब्यूरो प्रमुख को साढ़े चार हजार से आठ हजार अधिकतम मासिक पैकेज देता है जबकि छोटा अखबार अपने जिला ब्यूरो प्रमुख को 1500 से चार हजार रुपये देता है. वहीं, स्टाफर को जिले में 10 से 12 हजार रुपये मासिक पैकेज पर रखा जाता है. एक अखबार में दो से तीन लोग ब्यूरो में रहते हैं उसके बाद आठ से दस सुपरस्ट्रींगर और स्ट्रींगर को प्रति खबर के हिसाब से भुगतान किया जाता है. दैनिक हिन्दुस्तान बिहार के जिला मुख्यालयों में 12 रुपये प्रति खबर जबकि दैनिक जागरण पांच रुपये प्रति कालम के हिसाब से पत्रकारों को भुगतान करता है.
मामला केवल नियुक्ति तक का ही नहीं है. बल्कि वेतन को लेकर भी पारदर्शिता नजर नहीं आती. संपादक या फिर उच्च पदों पर गोपनीय नियुक्ति का मामला थोड़ी देर के लिये समझ में आता है लेकिन निचले स्तर पर यानी उपसंपादक/ संवाददाता या फिर प्रशिक्षु पत्रकार की गोपनीय नियुक्ति का मामला सवाल खड़े करते मिलते हैं.
बीस साल पहले पत्रकारों को जांच-परख कर रखा जाता था. संपादक के समक्ष उसे कई परीक्षाओं से गुजरना होता था. भाषा पर पकड़ और अच्छा व्यक्तित्व का होना अहम होता था. लेकिन आज ऐसा नहीं है. कोई भी पत्रकार बन सकता है. हाल ही में बिहार के एक बड़े अखबार के एक संपादक जब एक जिले में अपने रिर्पोटर, स्ट्रींगर, संवाद सूत्र के साथ बैठक कर रहे थे तभी एक पत्रकार ने मानदेय का सवाल उठाया और  मानदेय बढ़ाये जाने का आग्रह किया. इस पर संपादक महोदय ने साफ कह दिया कि काम करना है तो करो वरना पत्रकारों की कमी नहीं है. हम जिसे ‘‘अखबार की टोपी’’ पहना दें, वह पत्रकार बन जायेगा.
उर्दू अखबारों की स्थिति तो और भी बदतर है. 20 साल पहले संपादकीय विभाग में काम करने वाले को 200 से 400 रूपये प्रति माह दिये जाते थे. उर्दू अखबारों में मालिक ही संपादक है. संपादक की तरह काम करने वाले पत्रकारों को आज ज्यादा से ज्यादा 15 हजार महीना मिलता है. जबकि, संपादकीय या रिर्पोटिंग में पत्रकारों को 4 हजार से 8 हजार ही मिलते है.
सेटेलाइट चैनलों के जिला मुख्यालयों में स्ट्रींगरों की स्थिति बद से बदतर है, उन्हें कोई मानदेय नहीं दिया जाता है. कुछ ही चैनल अपने जिला स्ट्रींगरों को प्रति खबर के हिसाब से भुगतान करते हैं. हालात यह है कि चैनलस के स्ट्रींगरों के पास न तो पत्रकारिता का अनुभव होता है और न ही कोई डिग्री. बिहार में एक क्षेत्रीय चैनल ने जिला, अनुमंडल, प्रखंड, पंचायत स्तर पर संवाद सूत्र रख रखा है. ये एसएमएस/फोन के माध्यम से खबर भेजते हैं. इनमें गिने-चुने के पास ही पत्रकारिता का अनुभव या फिर डिग्री होती है. इनकी  खबरें ब्रेकिंग न्यूज भी बनती हैं लेकिन कई मामलों में गलत साबित होते हैं.
मीडिया में मानदेय पैकेज का परिचलन ब्रांड व नाम से आया है,जो मीडियाकर्मियों के नाम और ब्रांड से तय होता है. मीडियाकर्मी भी एक प्रोडक्ट और फिल्मी हीरो की तरह है, जिस प्रोडक्ट और हीरो का बाजार पर कब्जा हो जाता है यानी ब्रांड और नाम बिकने लगता है ऐसे में यह फार्मूला मीडियाकर्मियों पर भी लागू हो चुका है. दीपक चैरसिया, पुण्य प्रसून वाजपेयी, आषुतोश, राजदीप सरदेसाई, अजीत अंजुम, बिनोद कापड़ी, निशांत, विनोद दुआ, रविश कुमार, बरखा दत्त सहित कई नाम इनमें शामिल हैं.
वेतन, पैकेज में बदला और पत्रकारों का प्रोफेशन भी बदल गया. वेतन आयोग को लागू करने से बचने के लिए मीडिया हाउस ने वेतन को पैकेज में और पत्रकारों के पेशा को दूसरे पेशे में बदलवा दिया. मजेदार बात यह है कि अब मीडिया हाउस जब किसी को अपने यहाँ रखता है तो उससे एक बाँड  भरवाया जाता है जिसमें उसका पेशा पत्रकारिता नहीं बल्कि खेती बाड़ी, व्यवसाय आदि भरवाया जाता है. मीडिया हाउस से जुड़ाव के बारे में लिखवाया जाता है कि वह पत्रकारिता शौक के चलते कर रहे हैं. दूसरों के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार स्वयं कितने शोषित है. इससे पता चलता हैं. पत्रकारों की जिंदगी रोज संघर्षों से भरी है. अमूमन हर मीडिया हाउस द्वारा पत्रकारों का आर्थिक शोषण जारी है. लेकिन कहीं भी विरोध की गूंज सुनाई नहीं पड़ती है. फिर, छोटे और बड़े मीडिया हाउसों में पत्रकारों से 12 से 14 घंटे काम कराया जाता है. महीनों उनके साप्ताहिक छुट्टी को रद्द कर दिया जाता है. बदले में कोई मानदेय नहीं दिया जाता है. इन पत्रकारों को मीडिया हाउस कोई अनुबंध पत्र/नियुक्ति पत्र नहीं देता. प्रबंधन की मर्जी जब नौकरी पर रखे या जब चाहे नौकरी से निकाल दें. भुगतान दिहाड़ी मजदूरों की तरह मस्टर रौल जैसा. कई मीडिया हाउस महीने के आखिर में एक मस्टर रौल पर हस्ताक्षर करवा, भुगतान करते हैं और हस्ताक्षरयुक्त मस्टर रौल को बाद में फाड़ कर फेंक देते हैं.
पैकेज के खेल में सबसे बड़ा सवाल नियुक्ति का है. मीडिया हाउस के बंद होने और पत्रकारों के निकाले जाने की खबर किसी न किसी रूप में तो मिल जाती है. लेकिन मीडिया में एक बात है जो सामने नहीं आती. वह है नियुक्ति की. प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक इसके संपादक या फिर उपसंपादक/ संवाददाता या यों कहें कि मीडिया के अंदर किसी पद की नियुक्ति का पता ही नहीं चल पाता है. संपादक के पद के लिये तो विज्ञापन आता ही नहीं. अचानक पता चलता है कि फलाने अखबार के संपादक की जगह फलाने ने ले ली है. यहां तक कि मीडिया हाउस में कार्य कर रहे लोगों तक को पता नहीं चल पाता है और रातों रात संपादक बदल जाते हैं.
मामला केवल नियुक्ति तक का ही नहीं है. बल्कि वेतन को लेकर भी पारदर्शिता नजर नहीं आती. संपादक या फिर उच्च पदों पर गोपनीय नियुक्ति का मामला थोड़ी देर के लिये समझ में आता है लेकिन निचले स्तर पर यानी उपसंपादक/ संवाददाता या फिर प्रशिक्षु पत्रकार की गोपनीय नियुक्ति का मामला सवाल खड़े करते मिलते हैं. देश भर के विश्वविद्यालयों में आज पत्रकारिता की पढ़ाई होने लगी है. हर साल हजारों छात्र पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में मीडिया हाउसों के चक्कर लगाते मिलते हैं. कई जुगाड़ व जातीय संस्कृति की वजह से नौकरी पाने में सफल हो जाते हैं और जिन्हें नहीं मिल पाती है, उनमें मीडिया को लेकर एक गतिरोध उत्पन्न हो जाता है. ऐसा नहीं है कि अच्छे पत्रकारों की कमी है बल्कि उन्हें मौका नहीं मिल पाता.

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