रविवार, 30 नवंबर 2014

ख़बरों की अधर्मिता बनाम चैनलों की प्रयोगधर्मिता




हिन्दी न्यूज़ टेलीविजन में प्रयोगों को सक्रियता देखने लायक है। हिन्दी में फार्मेट को लेकर प्रयोग अंग्रेजी से पहले होने लगे हैं। पहले अंग्रेजी से शुरूआत होती थी और फिर हिन्दी में पहुंचती थी। अब हिन्दी न्यूज़ चैनल फार्मेट के मामले में अंग्रेजी को भी अनुसरण करने पर मजबूर कर रहे हैं। फटाफट हो या सटासट। कभी न्यूज़ बुलेटिन के आखिर में आने वाला न्यूज़ रैप को शुरूआत में सरकाने का श्रेय हिन्दी न्यूज़ चैनलों को जाता है। स्पीड न्यूज के कई वेरायटी आपको मिल जायेंगी। वॉयस ओवर को लेकर भी कई तरह के बदलाव किये जा रहे हैं। कंटेंट को लेकर इनकी सराहना-आलोचना अलग मसला है पहले यही नोटिस में लिया जाना चाहिए कि फार्मेट कैसे और कितनी तेजी से बदले जा रहे हैं। गनीमत है कि फार्मेट ही बदल रहे हैं,ख़बरें नहीं। फार्मेट को आप कनस्तर से तुलना कर सकते हैं। इसमें आटा ही भरा जा रहा है। कोई कनस्तर को पीट-पीट को ठूंस रहा है तो कोई हिला-हिला कर।
आज सुबह हेडलाइनन्स टुडे देख रहा था। बहुत ज़माने बाद फिर से न्यूज चैनलों को देखने की कोशिश की है। हेडलाइन्स टुडे में स्क्रोल्स जिसे आप हिन्दी में सरकत पट्टिका कह सकते हैं,स्क्रीन के ऊपरी हिस्से में चल रहा था। उसके ऊपर एक ठहरा हुआ ट़ॉप बैंड भी था। आमतौर पर ऊपर दो बैंड नहीं होते हैं। हिन्दी न्यूज चैनलों में सरकत पट्टिका नीचे आई थी। आई तो अंग्रेजी से ही थी लेकिन इसमें मौलिक बदलाव हिन्दी न्यूज़ चैनलों में ज्यादा हुआ। पहले ये सरकत पट्टियां बेनामी चला करती थीं अब सबके नाम हैं। न्यूज़ टॉप टेन या फटाफट जैसे नाम हैं। सबसे पहले हिन्दी चैनलों ने ही ऊपर और नीचे एक साथ यानी टॉप एंड बॉडम बैंड शुरू किया था। कई तरह की पट्टियां हैं। अलग-अलग साइज़ की।
न्यूज़ चैनलों के डेस्क पर जो लोग काम करते हैं उन्हें कम से कम पचास एलिमेंट याद रखने पड़ते हैं। मसलन टॉप बैंड का नंबर अलग है तो बॉटम बैंड का अलग। हर खांचे का एक नंबर होता है जिससे याद रखना होता है। खबरों के बीच में वाइप चलता है उसका अलग नंबर होता है। वाइप शब्द कार के शीशे पर लगे वाइपर से आया है। जैसे बारिश के वक्त वाइपर स्क्रीन को साफ करता है और चला जाता है उसी तरह स्क्रीन पर वाइप ख़बरों की बारिश को साफ करता रहता है। वाइप जिस पर फटाफट या स्पीड न्यूज़ लिखा होता है। जो किसी भी ख़बर में मच्छरों की भनभनाहट सी आवाज़ लिये चला आता है और गायब हो जाता है। जब तक आपको लगता है कि चला गया कमबख्त,वो वापस आ जाता है और कान के नीचे भन्नाते मच्छर जैसी आवाज़ निकालने लगता है। ये आवाज़ गाड़ियों की भागती आवाज़ से भी मिलती जुलती है। हमारे पास स्पीड की प्रतिनिधि ध्वनि यही है।
इतना ही नहीं इन खांचों में शब्द अंटाने में काफी मेहनत लगती है। आउटपुट एडिटर लघुतम शब्दों को खोजता रहता है। स्पेस बार की मदद से शब्दों के भीतर वर्णों को सटाते रहता है ताकि एक शब्द औऱ अंट जाए। हिन्दी में एब्रीविएशेन का कल्चर नहीं है। इसलिए लघुत्तम शब्दों को खोजना चुनौती भरा काम हो जाता है। पता नहीं अभी तक न्यूज़ चैनलों में अनुप्रास संपादक भर्ती क्यों नहीं हुए जो अ से शुरू होने वाले समानार्थी शब्दों की खोज कर इन खांचों में भर देगा। वैसे जो लिखा जा रहा है वो भी इस अंदाज़ में कि कोई चुनौती दे रहा है कि का रे..पढ़ा कि नहीं..अंखवे फोड़ देंगे। व्याकरण की तो कब की तेरहवीं हो चुकी है।
जब आजतक ने ट्रेन दुर्घटनाओं की बनी-बनाई एनिमेशन दिखाना शुरू किया तब लोग हंसते थे। ये वो लोग हैं जो अंग्रेजी में काम करते रहे हैं और उनके अनुसार तब तक कोई सम्मानित प्रयोग नहीं हो सकता जब तक वो अंग्रेजी न करें। आज सभी अंग्रेजी चैनलों में दुर्घटना के वक्त बनी-बनाई एनिमेशन ग्राफिक्स का इस्तमाल होता है। एक और प्रयोग हुआ है, घेरा बनाकर तीर से दिखाने का। इंडिया टीवी ने इसका खूब इस्तमाल किया है। कैमरे में कैद किसी छोटी सी चीज़ को लाल डोरे से घेर दिया और तीर मार-मार कर दिखाना शुरू कर दिया। पहले इस तरह के लाल डोरे सिर्फ बदचरित्रों के गर्दन के आस-पास बनाये जाते थे। टाइम्स नाऊ ने एक बदलाव किया। जिस तरह से हम फेसबुक या इंटरनेट पर भेजी गई तस्वीरों को क्लिक करते हैं तो नाम भी उभर आता है,उसी तरह टाइम्स नाऊ ने वीडियो में दर्ज तमाम लोगों के नाम लिखने की शुरूआत की। यह दावे के साथ नहीं कह सकता कि टाइम्स नाऊ ने ही की। लेकिन उसके तुरंत बाद कुछ अंग्रेजी चैनलों को भी नकल करते देखा।इंडिया टीवी ने ओवर दि सोल्डर शॉट को भी एनिमेटेड कर दिया है। आदमखोर चमगादड़ में पूरी स्क्रीन पर चमगादड़ उड़ रहे हैं। खटिया पर एक आदमी घायलावस्था में पड़ा है। उसके ऊपर से खून के धब्बे उड़ रहे हैं। कई चैनल इस तरह का एनिमेशन इस्तमाल करते हैं।
बहुत पहले मैंने अपने ब्लॉग कस्बा पर लिखा था कि टीवी अख़बार हो रहा है। लेकिन ध्यान से देखें तो अखबार भी इतना क्लटर या बजबजाया हुआ नहीं लगता। हिन्दी टेलीविजन अपना ही रूप गढ़ रहे हैं। जिस तरह से बाज़ार फ्लेक्स होर्डिंग से भरे दिखते हैं वैसे ही अब न्यूज़ चैनल नज़र आने लगे हैं। समझ नहीं आता कि उसी तीस सेकेंड में पढ़ें,देखें या सुनें। दर्शक को तीन क्रियाएं एक साथ करनी पड़ती हैं। जब दर्शक के पास वक्त कम है तो उसे एक साथ तीन काम करने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है। यह एक सवाल है। लेकिन यह बदलाव आ चुका है और इसे सभी ने स्वीकार भी किया है।
इंग्लिश न्यूज चैनलों में भी आप स्पीड न्यूज़ का जलवा देखेंगे। मैं नहीं मानता कि हिन्दी न्यूज़ चैनलों में सारे बदलाव नकल से हो रहे हैं। बहुत कुछ मौलिक हैं। वो भद्दे हैं या नहीं,यह दर्शक,आलोचक तय करेंगे। वैसे ज़्यादर आलोचकों को टीवी की तमीज़ भी नहीं। समझ नहीं आता कि वो ख़बरों की साहित्यिक समीक्षा कर रहे हैं या टीवी के फार्मेट की। उनकी समीक्षा ख़बरों के सरोकार टाइप के पुरातन फार्मेट से आगे नहीं बढ़ पाती। हालांकि वो भी एक गंभीर और ज़रूरी काम है। ख़ैर,टाइम्स नाऊ में कश्मीर की खबर आ रही है। सात तरह की सूचनाएं स्क्रीनपर हैं। बायीं ओर के ऊपरी कोने में कश्मीर क्राइसीस का लोगो है जो स्क्रीन बदलते ही ऊपर नीचे होते रहता है। जब रिपोर्टर का चेहरा आता है तो कश्मीर क्राइसीस का बैंड ऊपर कोने में होता है। जब कोई ग्राफिक्स प्लेट आती है तो नीचे आ जाता है। बंदर की तरह बेचैन लगता है। कभीं खंभे के ऊपर होता है तो कभी खंभे के नीचे। इसके अलावा रिपोर्टर जितना बोल रहा है उससे ज्यादा लिखा हुआ आ रहा है। ये सब स्क्रीन को ऊर्जावान बनाने के लिए किया जा रहा है। टाइम्स नाऊ ने संप्रेषण के क्षेत्र में कई प्रयोग किये हैं। कई चीज़े पहली बार पेश की हैं। पहले ब्रांड का ‘लोगो’ होता था अब हर ख़बर में एक ‘लोगो’ लगता है। ‘लोगो’ को ‘लोगीकरण’ हो गया है।
आप ध्यान से देखिये तो पायेंगे कि ब्रेकिंग न्यूज़ के सुपर बैंड किसी सामंत या गुंडे से कम नहीं हैं। इनके आते ही बाकी सारी सरकत पट्टिकाएं कहीं कोने में दब जाती हैं तो कुछ गायब भी हो जाती हैं। ब्रेकिंग न्यूज़ का लाल आतंक सबको खदेड़ देता है। ब्रेक में भी ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी चलती रहती है। बचपन में एक पेंसिल देखी थी। एक तरफ ब्लू और दूसरी तरफ लाल। ऐसी ही पेसिंल से मिलती जुलती है आईबीएन सेवन की पट्टी। नीले में नक्सली लिखा होता है और लाल में हमला। टीवी के प्रोड्यूसर और ग्राफिक्स डिज़ाइनरों के हुनर को सम्मानित करने का वक्त आ गया है। आईबीएन सेवन लिखता है कि पांच मिनट में आपके काम की पंद्रह ख़बरें। एक्सप्रेस न्यूज़ नौ बज कर सत्ताईस मिनट पर। हिन्दी चैनलों ने ही सबसे पहले न्यूज देखने के वक्त की कल्पना बदल ली। ठीक सात बजे या ठीक नौ बजे जैसे जुमले गायब हो गए। छह सत्ताईस या छह उनसठ जैसे जुमले आ गए। इंडिया टीवी पर सरकत पट्टी बता रही है कि 9:30 की 5 हेडलाइन 9:27 पर। समय को भी हिन्दी न्यूज़ चैनलों ने पुनर्परिभाषित किया है। जल्दी ही लोग अपनी घड़ी में अलार्म हिन्दी चैनलों के गढ़े इस समय बोध के अनुसार लगायेंगे। वो अब सवा पांच बजे का अलार्म नहीं बल्कि 5:16 मिनट का लगाया करेंगे।
इंडिया टीवी ने जितने फार्मेट में बदलाव किये हैं उतने किसी चैनल ने नहीं किये हैं। इंडिया टीवी की निरंतर आलोचना में उसके इस योगदान पर किसी का ध्यान नहीं जाता। इंडिया टीवी के कैमरा वर्क को भी कभी ध्यान से देखियेगा। उसके शॉट अलग होते हैं। अमूमन कई हिन्दी चैनलों के कैमरा कार्य में कई बदलाव आ रहे हैं। शॉट इस तरह से लिये जा रहे हैं जैसे कैमरा से टकरा कर ऑबजेक्ट टूटने ही वाला हो। इस तरह के बदलाव टाइम्स नाऊ में देखियेगा। तभी कभी-कभी लोग यह भी कहते हैं कि टाइम्स नाऊ अंग्रेज़ी का हिन्दी चैनल है। ग्राफिक्स टेक्सट और विजुअल का मिक्सचर बनाकर नया माल परोसने में इंडिया टीवी का जवाब नहीं। स्टार न्यूज़ ने 24 घंटे 24 रिपोर्टर में नया फार्मेट लाया था। रिपोर्टर की पीटूसी से खबर शुरू होती थी और उस खबर की विजुअल चलती थी। एक तरह से रिपोर्टर मैदान से एंकर की तरह दिखने लगा। बाद में इस फार्मेट की अनुसरण आईबीएन सेवन और इंडिया टीवी ने भी किया। सब एक दूसरे का अनुसरण कर रहे हैं। अब यह भी एक मान्य फार्मूला हो गया है। हैरान हूं कि अभी तक इंडिया टीवी या स्टार ने यह प्रोमो क्यों नहीं चलाया कि देखो देखो हमारी स्पीड न्यूज का कर रहे हैं सब नकल। ओरिजनल हैं हम। देखो देखो नकलची है वो। ठीक उसी तरह से जैसे इंडिया टीवी नंबर वन होने पर बाकी चैनलों की भी टीआरपी दिखा देता है। एक जनाब ने सूरत से फोन किया और कहा कि एनडीटीवी इंडिया की टीआरपी कम हो गई है क्या। मैंने कहा आपको कैसे मालूम। तो जवाब मिला कि इंडिया टीवी दिखा रहा है। हद है भाई। ये कैसा टॉपर है जो फेलियर का भी रिज़ल्ट लेकर मार्केट में उधम मचा रहा है। फेल होने वाले को मुंह छुपाने का वक्त और जगह की गुज़ाइश भी नहीं छोड़ता। बड़ा निर्दयी है मुआ। इससे पहले कि आप फेल होकर मोहल्ले में पहुंचे,बचते-बचाते,इंडिया टीवी हल्ला कर चुका होता है। बाप रे। आज तक पर क्या गुजरी होगी। वैसे गुज़रती तो हम पर भी है। इसीलिए तीन-तीन घंटे लगाता हूं फेसबुक पर। ऐ भाई,मेरी रिपोर्ट देख लेना। ऐ भइया…देखे कि नहीं। नहीं देखे तो देख लो न। जवाब मिलता है अरे आप और टीआरपी। लगता है उनका कपार फोड़ दें।
कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की तरह बात करते हैं टीआरपी के विरोधी। इंडिया में रहकर संविधान का पालन तो करना ही होगा। टीआरपी टीवी का संविधान है,जिसका असफल विरोध सिर्फ अलगाववादी पत्रकार कर रहे हैं। टीआरपी का विरोध एम्पलॉयर नहीं करते हैं। अफसोस इसी बात का रह गया कि तथाकथित अच्छे पत्रकारों ने टीआरपी से लड़ने के लिए श्रम नहीं किया। वो लेख ही लिखते रहे और अपनी नैतिकता को इंडिया टीवी,आजतक,न्यूजड 24 और आईबीएन सेवन से श्रेष्ठ बताते रहे। जब एक मीटर पर खराब रिपोर्ट को अच्छी रेटिंग मिल रही है तो अच्छी रिपोर्ट को क्यों नहीं मिलेगी। क्या तथाकथित अच्छी रिपोर्ट के लिखने और पेश करने में कमी नहीं होती होगी? क्या अच्छी रिपोर्ट के समर्थन में कोई कारगर फार्मेट की खोज नहीं की जा सकती है? क्या अच्छी ख़बरों के नाम पर लोकार्पण की खबरें आप देखना चाहेंगे? उसमें भी तो सरोकार होता है। तथाकथित आलसी परन्तु अच्छे पत्रकारों ने बिना लड़े ही लड़ाई का मैदान छोड़ दिया। हिन्दी पत्रकारिता का संकट तथाकथित अच्छे पत्रकारों के नकारेपन का संकट है। जब अच्छे लोग घर बैठ जाएंगे तो बंदर और भूतों का कब्जा किसी भी हवेली पर हो ही जाएगा। आलोचकों की माने तो सारे प्रयोग तथाकथित पत्रकारिता के बदनाम करने वालों की गली में ही क्यों हो रहे हैं? शरीफों के मोहल्ले में भी तो कुछ होना चाहिए। हर क्लासिकल गीत सुनने लायक तो नहीं होता न। कोई तो नुसरत अली बनकर ज्यादा लोगों तक पहुंचाएगा या फिर तार पर रेगियाने या टुनटुनाने से ही काम चल जाएगा।
हिन्दी न्यूज़ चैनलों में बदलाव का कोई अलग सा दौर नहीं चल रहा है। बल्कि हर दिन और हर सेकेंड बदलाव हो रहे हैं। अब आप देखेंगे कि पहले शाम के वक्त सभी न्यूज बुलेटिन में तैयार रिपोर्ट हुआ करती थी। विज़ुअल,वीओ,बाइट,विजुअल,वीओ और फिर बाइट और उसके बाद सार स्वरूप दो तीन पंक्तिया लिखकर पीटूसी। जिसे रिपोर्टर ग्राउंड जीरों से अपनी टिप्पणी के रूप में पेश करता है। इसे वीडियो ऑन टेप यानी वीटी कहते हैं। अब वीटी का चलन खत्म हो गया और अगर कहीं है भी तो कम से कम मात्रा में। इसके लिए जिम्मेदार रिपोर्टर ही हैं। उन्हें तस्वीर और शब्द के इस्तमाल से कथा कहने का सलीका ही नहीं आया। न ही उनमें से किसी ने सीखने की कोशिश नहीं की। लिहाज़ा सचमुच कई रिपोर्ट बोरियत सी भरी लगती थी। धीरे-धीरे इस तरह की रिपोर्ट को डीडी टाइप कहा जाने लगा। इसकी एक वजह यह भी है कि टीवी में वो लोग लिए गए जिनको लिखने और बोलने और पेश करने की कला मालूम नहीं थी। आखिर आप भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर में हिन्दी के साहित्यकार को कैसे नौकरी दे सकते हैं। वो वहां क्या करेगा। टेलीविजन की दुनिया ऐसे अनमने से रिपोर्टरों को देखती रही। रिपोर्टर पान चबाते हुए आते रहे। जर्दा खाते रहे। लिखने का मन नहीं किया। पीटूसी की इस लाइन से आगे नहीं बढ़ सके कि आने वाला वक्त ही बताएगा कि आगे क्या होगा। आज भी बड़ी तादाद में रिपोर्टर अपनी पीटूसी नहीं लिख पाते हैं। लिहाज़ा कई चैनलो में डेस्क से लोग रिपोर्टर को पीटूसी लिखाते हैं। हद है जिस काम के लिए आप आए हैं वही नहीं मालूम।
यही कारण है कि आप ज्यादातर प्रयोग डेस्क से देखेंगे। मैदान में गया रिपोर्टर अपनी तस्वीरों और तत्वों से प्रयोग नहीं करता। वो कथा कहने की नई तरकीबें नहीं ढूंढ रहा है। कुछ रिपोर्टर हैं लेकिन सौ में नब्बे खराब हों तो दस की बात क्या मतलब रह जाता है। तो मैं कह रहा था कि रिपोर्टर की छाप वाली रिपोर्ट की अब मौत हो चुकी है। सारी खबरे विज़ुअल और एंकर वीओ के साथ चल रही है। एंकर वीओ भी गायब हो चुका है। वॉयस ओवर करने वाला वीओ कर देता है। स्पीड न्यूज़ ने एंकर को भी बेकार कर दिया है। वो सिर्फ इसलिए खड़े रहते हैं कि लिंक टूटने पर रूकावट के लिए खेद है का बोर्ड न लगाना पड़े। इसलिए आप देखेंगे कि पहले की तरह आप कम ही एंकरों को नाम से जानते होंगे। उनका चेहरा जब तक आता है तब तक चला भी जाता है। इंडिया टीवी और आजतक ने तो एंकर को स्क्रीन के कोने में खड़ा कर दिया जहां से उनका चेहरा भी नज़र नहीं आता था। फिर एंकरों से स्टैंड अप कहा गया। स्टार न्यूज़ ने न्यूज़ रूम में स्काई टीवी की तर्ज में दौड़ने का मैदान बनाया। एनडीटीवी इंडिया पर भी न्यूज़ रूम से एंकरिंग शुरू हुई। कई इंग्लिश चैनलों में भी शुरूआत हुई। स्टार ने एंकर को लेकर फिर एक कोशिश की है। टाइट क्लोज़ अप में उनका चेहरा आता है। कभी-कभी तो इतना टाइट होता है कि मेरी आंखों पर ज़ोर पड़ने लगता है। इस तरह के फ्रेम कई बार सीएनएन या फ‍ॉक्स पर किये जाते रहे हैं।
दर्शक का ध्यान अब विकेंद्रित हो चुका है। इसे केंद्रित करने के लिए सारे प्रयोग हो रहे हैं। रविवार को जब कॉमनवेल्थ गांव में कोबरा जी आ गए तो स्टार न्यूज ने कलमाडी को सपेरा बना दिया। आम तौर पर इस तरह की चीज़ को बग कहा जाता है। जो स्क्रीन के एक कोने में पड़ा रहता है। ध्यानाकर्षण के लिए। स्टार ने सपेरे कलमाडी के बग को स्क्रीन पर घुमाना शुरू कर दिया ताकि चैनल बदलने वाले एक मिनट के लिए रूक जायें। अगर कोई रूक गया तो टीआरपी दर्ज हो जाती है। टीआरपी दर्ज कराने के लिए एक मिनट तक रोकना ज़रूरी है। इस तरह के प्रयोग पहले भी हो चुके हैं। ज्यादातर प्रयोग स्क्रीन पर लिखे गए शब्दों की प्रस्तुति और वीडियो से बनाए गए स्टिल्स के मैनुपुलेशन को लेकर हो रहे हैं। विज़ुअल कैसे ली जाए, कैसे शाट बेहतर हों इस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।
हाल ही में मोहल्ला, जनतंत्र और यात्रा ने सिनेमा पर बहसतलब का आयोजन किया था। अनुराग कश्यप ने कहा कि उन्हें मोबाइल के लिए तीन मिनट की फिल्म बनाने के ऑफर मिले। तीन मिनट की दो फिल्में बनाकर उन्होंने अपनी कुल फीचर फिल्मों से ज्यादा कमाई की है। अब आप सोचिये। तीन मिनट की फिल्में बन रही हैं तो तीन मिनट की रिपोर्ट मर रही है। कोई फार्म खत्म नहीं होता। एक जगह से भगाया जाता है तो दूसरी जगह रूप बदल कर अपना रास्ता बना लेता है। जब फिल्म मोबाइल फोन के लिए बनेगी तो रिपोर्ट भी बनेगी। लेकिन दो मिनट वाली लंबी रिपोर्ट का क्या भविष्य होगा कहना मुश्किल है। लेकिन यह तो कह ही सकते हैं कि हिन्दी के पत्रकारों ने अपने कौशल को दिखाने का एक मौका गंवा दिया। उन्हें यह मौका दस साल तक मिलता रहा। वो अपनी दो मिनट की रिपोर्ट को कूड़े जैसा बनाते रहे। जब अनुराग कश्यप इसी तीन मिनट में रोचक फिल्म बना सकते हैं तो क्या रिपोर्ट नहीं बन सकती थी। इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ रिपोर्टरों की है। वो बंदिशों को बहाना बनाकर पानपराग खाते रहे। चेक शर्ट पहनते रहे। किसी भी ट्रेनिंग में यही सीखाया जाता है कि न्यूज रिपोर्टिंग में चेक शर्ट से बचिये। आप हिन्दी के पत्रकारों की कमीज़ देखिये। इसमें उनकी ग़रीबी नहीं बल्कि लापरवाह नज़रिया दिखता है अपने माध्यम को लेकर। मैंने एनडीटीवी इंडिया के बारे में नहीं लिखा है। कोई और लिखे तो बेहतर है। वैसे कई चैनलों के बारे में नहीं लिखा है। इस लेख का मकसद आलोचना नहीं है,बल्कि फार्मेट में आ रहे बदलावों को नोटिस में लेना भर है। कंटेंट की आलोचना हम अलग से करते ही रहते हैं। बहरहाल हिन्दी चैनलों की प्रयोगधर्मिता पर भी बात होनी चाहिए। उनके ख़बरों की अधर्मिता पर तो हो ही रही है। जिसका कोई नतीजा आज तक नहीं निकल सका।

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