शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

हिन्दी पत्रकारिता का विदेशों में उत्थान और विकास

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प्रस्तुति-- स्वामी शरण, उपेन्द्र कश्यप


जिस प्रकार से भारत में हिन्दी-पत्रकारिता विभिन्न चरणों में विकसित हुई है, ठीक उसी प्रकार से विदेशों में भी प्रवासी भारतीयों के द्वारा उसके विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। विश्व के ऐसे अनेक देश हैं जहाँ शताब्दियों पूर्व भारतीय जाकर बस गये थे और उनके वंशज आज भी वहाँ निवास करते हैं, इनमें से बहुत से ऐसे भी है जो अपने धर्म, संस्कार और भाषा से भावात्मक रूप में जुड़े हुए हैं। उन्हीं के द्वारा समय-समय पर हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरम्भ किया गया था, जो अनेक रूपों में आज भी हो रहा है।

ब्रिटेन से

ऐतिहासिक दृष्टि से विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता का जन्म सन १८८३ में हुआ था। इस वर्ष लंदन से ‘हिन्दोस्थान’ नामक त्रैमासिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ था। किसी भी विदेश से प्रकाशित होनेवाले सर्वप्रथम हिन्दी पत्र के रूप में इसकी मान्यता है। इसके संस्थापक राजा रामपाल सिंह थे। यह त्रिभाषी रूप में प्रकाशित होता था और इसमें हिन्दी के साथ ही उर्दू तथा अंग्रेजी के अंश भी रहते थे। दो वर्ष तक वहाँ से प्रकाशित होते रहने के पश्चात १८८५ में यह राजा रामपाल सिंह द्वारा ही कालाकांकर (अवध) से प्रकाशित होना प्रारम्भ हुआ। पंडित मदन मोहन मालवीय इसके प्रधान सम्पादक थे। यहाँ से यह साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था। १८८७ में यह दैनिक के रूप में प्रकाशित होने लगा। अमृतलाल चक्रवर्ती, शशि भूषण चटर्जी, प्रताप नारायण मिश्र, बाल मुकुन्द गुप्त, गोपाल राम गहमरी, लाल बहादुर, गुलाबचन्द चैबे, शीतल प्रसाद उपाध्याय, राम प्रसाद सिंह तथा शिवनारायण सिंह इसके सम्पादक रहे थे। हिन्दी पत्रकारिता के विकास में इसका ऐतिहासिक महत्व है।
कालांतर में इंगलैण्ड की राजधानी लंदन से ही कतिपय अन्य हिन्दी पत्र भी प्रकाशित हुए। इसमें शांता सोनी द्वारा सम्पादित ‘नवीन’ शीर्षक पत्र भी उल्लेखित किया जा सकता है। यह साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था। इसी प्रकार एस.एन. गौरीसरिया के सम्पादकत्व में ‘सन्मार्ग’ शीर्षक से भी एक पत्र लंदन से प्रकाशित हुआ था। पी.जे. पेंडर्स ने भी एक पत्र यहीं से प्रकाशित किया था, इसका शीर्षक ‘केसरी’ था। इसी प्रकार सुकुमार मजूमदार के सम्पादकत्व में ‘प्रवासी’ शीर्षक से प्रकाशित एक पत्र भी उल्लेखनीय है। लंदन से जो पत्र-पत्रिकाएं हिन्दी में प्रकाशित हुई, उनमें जगदीश कौशल द्वारा सम्पादित ‘अमरदीप’ का नाम भी उल्लेखनीय है। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसी प्रकार लंदन में भारत से प्रकाशित ‘आज’ के प्रतिनिधि धर्मेन्द्र गौतम ने भी ‘प्रवासिनी’ शीर्षक से एक पत्र का सम्पादन आरम्भ किया था जो त्रैमासिक प्रकाशित होता था।

सोवियत संघ

सोवियत संघ’ शीर्षक से एक पत्र मास्को से प्रकाशित होता है। इसके प्रधान सम्पादक निकोलोई गिबाचोव तथा चित्रकार अलेक्सांद्र जितो मिस्कीं हैं। इसका प्रकाशन १९७२ में आरम्भ हुआ था।

जापान

जापान से प्रकाशित हिन्दी पत्रों में ‘सर्वोदय’ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसका सम्पादन त्रोश्यो तनाका द्वारा किया जाता है। जापान से ही एक अन्य हिन्दी पत्रिका ‘ज्वालामुखी’ शीर्षक से भी प्रकाशित होती है। इसकी विशेषता यह है कि यह जापानी नागरिकों द्वारा ही संपादित की जाती है और इसमें उन्हीं के द्वारा हिन्दी में लिखे लेख प्रकाशित होते हैं।

फ्रांस

फ्रांस से भी हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में कतिपय उल्लेखनीय प्रयत्न परिलक्षित होते हैं। फ्रांस की राजधानी पेरिस से ‘यूनेस्को कूरियर’ नामक पत्र का प्रकाशन उल्लेखनीय है।

मारीशस

मॉरीशस से भी हिन्दी में अनेक पत्र-पत्रिकाएं समय-समय पर प्रकाशित हुई। जिसमें ‘हिन्दुस्तानी’, ‘जनता’, ‘आर्योदय’, ‘कांग्रेस’, ‘हिन्दू धर्म’, ‘दर्पण’, ‘इण्डियन टाइम्स’, ‘अनुराग’, ‘महाशिवरात्रि’ एवं ‘आभा’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मारीशस से प्रकाशित होने वाला हिन्दी का सर्वप्रथम पत्र ‘हिन्दुस्तानी’ था। इसका प्रकाशन १९०९ है। इसके प्रथम सम्पादक मणिलाल थे।
मारिशस से प्रकाशित अन्य हिन्दी पत्रिकाओं में आत्माराम विश्वनाथ द्वारा संपादित ‘जागृति’ भी उल्लेखनीय है। काशीराम किष्टो ने भी मारीशस से प्रकाशित एक हिन्दी पत्र ‘आर्यवीर’ का सम्पादन किया था। इसी क्रम में लक्ष्मण दत्त द्वारा संपादित ‘आर्यवीर’ तथा ‘जागृति’ शीर्षक पत्र भी महत्व रखते हैं। ‘ओरियंट गजट’ नामक पत्र मारीशस से प्रकाशित हुआ। इसका प्रकाशन आरम्भ १९३० से हुआ। ‘जागृति’ नाम से एक पत्र का प्रकाशन १९४० में हुआ। इसके सम्पादक आत्माराम थे। इसका पूर्व नाम ‘आर्य पत्रिका’ था। ‘मारीशस इण्डियन टाइम्स’ शीर्षक से एक साप्ताहिक पत्र पोर्ट लुई से प्रकाशित हुआ। यह बहुभाषी पत्र था, जिसमें हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं के अंश भी रहते थे। सोमदत्त बरबौरी ने पोर्ट लुई से १९६८ में त्रैमासिक ‘अनुराग’ का सम्पादन करके हिन्दी पत्रकारिता का उन्नयन किया।

सूरीनाम

सूरीनाम में भी अनेक पत्र हिन्दी में दैनिक, साप्ताहिक और मासिक रूप में प्रकाशित हुए। ये पत्र जहाँ इस देश में हिन्दी पत्रकारिता के अस्तित्व के द्योतक हैं वहाँ दूसरी ओर प्रवासी भारतीयों की हिन्दी के प्रति रुचि को भी दर्शाते हैं। इनमें दैनिक कोहिनूर अखबारसाप्ताहिकप्रकाश’ और ‘शांतिदूत’ तथा मासिक ‘ज्योति’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

दक्षिण अफ्रीका

अमृतसिंधु नामक’ एक मासिक पत्र नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक भवानी दयाल थे। इसका प्रकाशन १९९० से आरम्भ हुआ था। इसी क्रम में दक्षिण अफ्रीका के डरबन नामक शहर से ‘धर्मवीर’ नामक पत्र का प्रकाशन १९१६ में आरम्भ हुआ था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसका सम्पादक रल्लाराम गांधीलामल भल्ला ने अमर धर्मवीर पंडित लेखराम की स्मृति में आरम्भ किया था। यह पत्र हिन्दी में प्रकाशित होता था। रल्लाराम गांधीलामल भल्ला उर्दू भाषा में मूल सामग्री प्रस्तुत करते थे तथा उनके सहायक मेहर चन्द भल्ला उसका अनुवाद हिन्दी में करके उसे छपने को देते थे। १९१७ से इसका सम्पादन स्वामी भवानी दयाल सन्यासी ने किया। १९१९ तक इस दायित्व को सफलतापूर्वक निर्वाह करने के पश्चात इसका प्रकाशन बंद हो गया। इसमें कुछ लेख अंग्रेजी में भी प्रकाशित होते थे।
‘हिन्दी’नामक मासिक पत्रिका मई १९२२ में डरबन (दक्षिण अफ्रिका) से प्रकाशित हुई थी। इसका सम्पादन भी स्वामी भवानी दयाल सन्यासी करते थे। यह अपने समय का प्रवासी भारतीयों का लोकप्रिय पत्र था। इस प्रकार ‘आर्य संदेश’ शीर्षक से एक पाक्षिक ट्रिनिडाड से प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक एल. शिव प्रसाद थे। इसका प्रकाशन १९५० से आरंभ हुआ था। एक अन्य पत्र ‘आर्यमिक्र’ शीर्षक से भी दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित हुआ था। यह आर्य प्रतिनिधि सभा का मुख पत्र था। १९०४ में अफ्रीका के डरबन नामक स्थान से ‘इण्डियन ओपिनयन’ नामक पत्र प्रकाशित हुआ था। इसका सम्पादन मदन जीत द्वारा आरम्भ किया गया। कुछ समय पश्चात यह गांधीजी के संरक्षण में फिनिक्स से भी प्रकाशित हुआ था। इस पत्र ने राष्ट्रीय आंदोलन के प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। उस पत्र से जो अन्य पत्रकार जुड़े हुए थे उनमें मदनजीत, मनसुख लालभवानी दयाल प्रमुख थे। इसका आरम्भ १९०४ में तथा स्थगन १९१४ में हुआ। इस पत्र की एक प्रति का मूल्य 12 शिलिंग था। यह द्विभाषी पत्र था।

बर्मा

बर्मा से भी समय-समय पर हिन्दी की अनेक पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती रही है। इनमें ‘प्राची प्रकाश’जागृति’ तथा ‘ब्रह्म भूमि’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ‘प्राची प्रकाश’ दैनिक पत्र रंगून से प्रकाशित होता है। यह बर्मा से हिन्दी में प्रकाशित होने वाला दैनिक पत्र है।

विभाजनपूर्व बंगलादेश

अविभाजित भारत में ढाका (संप्रति बंगलादेश) से भी हिन्दी की अनेक महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएँ १९वीं और बीसवीं शताब्दियों में प्रकाशित हुई हैं। इनमें प्राचीनतम ‘बिहार बन्धु’ हैं। यह पत्रिका मासिक रूप में प्रकाशित होती थी। इसका आरंभ १८७१ में हुआ। इसी क्रम में १८८० में एक अन्य मासिक पत्रिका ‘धर्म नीति तत्व’ शीर्षक से भी प्रकाशित हुई थी। इसका प्रकाशन वर्ष भी १८८० है। इसके आठ वर्ष पश्चात १८८८ में ‘विद्या धर्म दिपिका’ नामक पत्रिका ढाका से ही प्रकाशित हुई थी। १८८९ में ढाका से ही एक अन्य हिन्दी पाक्षिक पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी। इसका नाम ‘द्वित्र’ था। इसी प्रकार १९०४ में ‘नारद’ नाम से भी एक पत्र का प्रकाशन ढाका से आरम्भ हुआ था। १९०५ में ‘नागरी हितैषी’ पत्रिका का प्रकाशन भी हुआ। १९११ में ‘तत्व दर्शन’ शीर्षक पत्र का उल्लेख भी आवश्यक है। इस प्रकार १९३९ में ‘मेल-मिलाप’ शीर्षक से एक मासिक पत्रिका भी ढाका से ही प्रकाशित हुई थी।

नेपाल

हिन्दी पत्रकारिता में नेपाल से प्रकाशित पत्रों का भी उल्लेखनीय स्थान है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से ‘नेपाल’ शीर्षक से एक हिन्दी पत्र प्रकाशित होता है। ज्ञातव्य है कि यह पत्र दैनिक रूप में प्रकाशित होने वाला एक विशिष्ट पत्र है। काठमांडू से ही प्रकाशित जो अन्य पत्र उल्लेखनीय है उनमें ‘हीमोवत संस्कृत’ पत्र भी है। इसी प्रकार ‘हिमालय’ शीर्षक से भी एक पत्र बीरगंज से प्रकाशित हुआ था। इसी क्रम में ‘नव नेपाल’ शीर्षक से एक साप्ताहिक पत्र काठमांडू (नेपाल) से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक मणिराज उपाध्यक्ष थे। इसका प्रकाशन १९५५ से आरम्भ हुआ था।

विभाजनपूर्व पाकिस्तान

विभाजनपूर्व के भारत एवं तत्पश्चात पाकिस्तान के अन्तर्गत चले गये लाहौर से भी बहुसंख्यक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं। इनमें ‘भारतीय’, ‘विश्वबन्धु’, ‘आर्यबन्धु’, ‘आर्यजगत’, ‘शान्ति’, ‘सुधाकर’, ‘क्षत्रिय पत्रिका’, ‘मित्र विलास’, ‘बूटी दर्पण’ व ‘आकाशवाणी’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त ‘आर्य प्रभा’ शीर्षक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी सन् १९१४ में लाहौर से आरम्भ हुआ था। इसके आदि सम्पादक संत राम तथा सहायक सम्पादक महानन्द थे। १९१८ से यह पत्रिका साप्ताहिक रूप से प्रकाशित हुई थी। १९१४ में ही लाहौर से ‘उषा’ नामक पत्रिका भी प्रकाशित हुई थी। इसके सम्पादक भी संतराम थे। जमानत न देने की असमर्थता के कारण यह पत्र दो वर्ष बाद बन्द हो गया। इसी क्रम में ‘हिन्दी मिलाप’ नामक पत्र का प्रकाशन ११ सितम्बर १९२७ को खुशहाल चन्द सुखचन्द (महात्मा आनन्द स्वामी) ने लाहौर से किया था। इसका सम्पादन सुदर्शन तथा बद्रीनाथ वर्मा करते थे। बाद में इसके प्रधान सम्पादक रणबीर तथा सम्पादक यश बने। हरिकृष्ण ‘प्रेमी’, रूपनाथ मलिक और संतराम भी इसके सम्पादकीय विभाग से जुड़े रहे थे। भारत विभाजन काल में इसके सम्पादक आत्म स्वरूप शर्मा थे जिन्होंने १५ अगस्त १९४७ को अपना बलिदान कर दिया। २३ सितम्बर १९४९ से यश के सम्पादकत्व में यह जालंधर से पुनः प्रकाशित हुआ। इसका उर्दू संस्करण रणवीर के सम्पादकत्व में प्रकाशित हुआ तथा एक अन्य संस्करण युद्धवीर के सम्पादकत्व में हैदराबाद से प्रकाशित होता है। इसका एक अन्य संस्करण लंदन से भी प्रकाशित होता है।

फिजी

हिन्दी पत्रकारिता के विकास में विदेशों मे जो कार्य हुआ है उसको दृष्टि में रखते हुए फीजी से प्राकशित हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का महत्व अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यहाँ से बहुसंख्यक पत्रों का प्रकाशन हुआ है जो सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक विषयों के साथ-साथ कृषि विज्ञान आदि से भी सम्बन्धित रहे है। ‘अखिल फीजी कृषक संघ’ शीर्षक से एक ऐसे ही पत्र का प्रकाशन दीनबन्धु के सम्पादन में फीजी से हुआ था। इसी प्रकार ‘किसान’ शीर्षक से भी एक पत्रिका का प्रकाशन बी.बी. लक्ष्मण के द्वारा किया गया था। कृषि विषयक एक अन्य पत्रिका नन्द किशोर के सम्पादन में ‘किसान मित्र’ शीर्षक से भी प्रकाशित हुई थी। फीजी द्वीप समूह से जो अन्य पत्र-पत्रिकाएँ समय-समय पर प्रकाशित होती रही है, उनमें कमला प्रसाद मिश्र द्वारा ‘जय फीजी’ विवेकानन्द शर्मा द्वारा सम्पादित ‘सनातन संदेश’ संस्कृति तथा ‘फीजी संदेश’ जय नारायण शर्मा द्वारा सम्पादित ‘शांति दूत’ राघवनन्द शर्मा द्वारा ‘जागृति’, चन्द्रदेव सिंह द्वारा सम्पादित ‘फीजी समाचार’ आदि प्रमुख है। इसी क्रम में ‘फीजी सरकार’ तथा ‘पुस्तकालय’ आदि पत्रिकाएँ भी उल्लेखनीय हैं। फीजी द्वीप समूह से ही प्रकाशित जिन अन्य बहुसंख्यक पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक है, उनमें ‘इण्डियन टाइम्स’ शीर्षक मासिक पत्रिका भी प्रमुख है। यह रामसिंह के सम्पादकत्व में प्रकाशित हुई थी। यह एक द्विभाषी पत्रिका थी, जिसमें हिन्दी के साथ अंग्रेजी का अंश भी रहता था। ‘इण्डियन सेटेलर्स’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन १९१७ में हुआ था। इसके संपादक डा.मणिलाल तथा बाबू रामसिंह थे। १३ वर्ष तक प्रकाशित होने के पश्चात १९८० में यह पत्रिका बन्द हो गयी। यह सुवा से प्रकाशित होती थी। लिथो में मुद्रित यह बहुभाषी पत्रिका थी जिसमें हिन्दी का अंश भी रहता था।
सन १९२३ में ‘फीजी समाचार’ का प्रकाशन आरम्भ हुआ था। यह पत्र बाबू राम सिंह के सम्पादन में प्रकाशित होता था। यह एक साप्ताहिक पत्र था। इसका सम्पादन राम खिलावन शर्मा ने भी किया था। इसकी एक प्रति का शुल्क ३ पेनी और वार्षिक शुल्क १० शिलिंग था। इसका प्रकाशन १९७५ में स्थागित हो गया था। यह इंडियन पब्लिशिंग कम्पनी माक्र्स स्ट्रीट सुवा (फीजी) से प्रकाशित होता था। यह एक द्विभाषी पत्र था जिसमें हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी का अंश भी रहता था। गुरुदयाल शर्मा ने सन १९२८ में ‘वृद्धि’, १९३० में ‘पैसेफिक’ तथा सन १९३२-३३ में ‘वृद्धि वाणी’ का सम्पादन एवं प्रकाशन करके फीजी में हिन्दी पत्रकारिता का प्रसार किया। १९३५ में सुवा से प्रकाशित‘शान्ति दूत’की स्थापना का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है।
फीजी द्वीप समूह से ही ‘तारा’ नामक एक मासिक पत्रिका १९४१ में प्रकाशित हुई थी। इसका सम्पादन ज्ञानी दास करते थे। इस पत्रिका की एक प्रति का षुल्क 3 शिलिंग और वार्षिक १२ शिलिंग था। यह कुछ समय तक पाक्षिक रूप में ही प्रकाशित हुई थी। इसका त्रैमासिक संस्करण भी प्रकाशित होता था। इसका प्रकशन कार्यालय नसीनू (सुवा) में था। इसी प्रकार सिगातोंका (फीजी) से राघवानन्द ने १९७६ से ‘जागृति’ शीर्षक का प्रकाशन करके हिन्दी पत्रकारिता के विकास में योगदान दिया। फीजी हिन्दी पत्रकार संघ के उप प्रधान के रूप में भी उनका क्रिया कलाप उल्लेखनीय है। इसी संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि ‘फीजी’ संदेश शीर्षक से एक पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन बी.एल. मानिस के द्वारा किया गया था।

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