शनिवार, 29 नवंबर 2014

भविष्य का प्रिंट मीडिया






          
प्रमोद भार्गव

 तीत का कोई भी समाज ऐसा नहीं रहा, जिसमें असमानता, अन्याय, शोषण, हिंसा और भूख न रहें हों और मानव जाति चाहे जितनी भी शिक्षित व जागरुक हो जाए ऐसा समाज बन नहीं सकता जिसमें समता, न्याय और भूख समाप्त हो जाएं। मानव समुदायों में भेदों को खत्म करने के लिए कृष्ण, बुध्द, महावीर, ईसा मसीह और महात्मागांधी जैसे महापुरुष वाणियां देते रहे हैं। इन वाणियों को लेखक शब्द के रुप में, गायक श्रुति परंपरा के स्वरुप में और कलाकार नाटकों के माध्यम से सामाजिक विषमताओं की तसवीर पेश करते रहे हैं। अर्थात श्रव्य, दृश्य और शब्द माध्यमों की सामाजिक सरोकारों से प्रागैतिहासिक जुड़े रहने की सनातन परंपरा रही है और भविष्य में भी ये सरोकार बरकरार रहेंगे।
                  आसान होतीं तकनीकी उपलब्धियों के कारण इनके स्वरुप में बदलाव की निरंतरता जरुर तेजी से सामने आती रहेगी। अनेक और बहुविधायी टीवी चैनलों की आसान और आकर्षक घर में उपलब्धता के बावजूद समाचार-पत्रों की प्रसार व पाठक संख्या में जो आशातीत बढ़त दर्ज की जा रही है वह इसलिए कि आज भी हम छपे शब्दों पर दृश्य व श्रव्य समाचार माध्यमों की अपेक्षा ज्यादा भरोसा करते हैं। अखबार के साथ हमें यह सुविधा भी हासिल है कि हम इसे कहीं भी और कभी भी पढ़ सकते हैं, कई दिन का बासा और वाचनालयों में कई साल पुराना अखबार भी पढ़ सकते हैं। इसे सहेजकर रखने की सुविधा है। इसलिए प्रिंट मीडिया का भविष्य खतरे से बाहर है। हां सवाल यह जरुर कौंधता रहेगा कि भविष्य में प्रिंट मीडिया का स्वरुप कैसा होगा ? व्यावसायिकता की होड़ में वह आम आदमी के सरोकारों से कितना जुड़ा रह पायेगा ? सूचनाएं तो उसमें रहेंगी ही लेकिन क्या ऐसी या इतनी दृष्टि भी बची रह पायेगी जो पाठक का नैतिक बल मजबूत करने के साथ उसे कत्तव्यपालन का भी बोध कराती रहे ? क्योंकि समाचार-पत्र समूहों के मालिक पत्रकार को कठपुतली बनाए रखते हुए उसकी सीमाएं वाणिज्य अभिकर्ता मार्केटिंग एजेंट के दायरे में बांध देने की कुटिल कोशिशों में हैं।
               कुछ समय पहले तक इलेक्टोनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव के चलते इस मुगालते का विस्तार हो रहा था कि समाचार का मुद्रित माध्यम खतरे में है। क्योंकि भारत सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक हिन्दी-अंग्रेजी समेत अन्य सभी भारतीय भाषाओं के 197 समाचार चैनल और 160 असमाचारीय चैनल हैं। इन समाचार चैनलों की संख्या बीते एक साल में और भी बढ़ गई होती यदि वॉयस ऑफ इंडिया और वॉच टीवी डूब नहीं गए होते। वीओआई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों के समूह के साथ जिस प्रभावी ढंग से उतरा था, उतनी व्यावसायिक निपुणता नहीं अपनाने के कारण डूब भी गया। वीओआई के इस हश्र को देख इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जो घराने क्षेत्रीय व भाषाई चैनल शुरु करने जा रहे थे उन सबने अपनी परियोजनाएं ठंडे बस्ते में डाल दीं। इधर अंग्रेजी के लगातार बढ़ते प्रभाव के बावजूद अंग्रेजी अखबारों का प्रसार व महत्व यथास्थिति में है। प्रसार व पाठक संख्या की दृष्टि से अंग्रेजी अखबार बहुत पिछड़े हैं। मीडिया रिसर्च कौंसिल ;एमआरयूसी द्वारा जारी रीडर सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार दैनिक जागरण 5 करोड़ 45 लाख 83 हजार की पाठक संख्या के आधार पर पहले स्थान पर है। अंग्रेजी के सबसे ज्यादा पढ़े व बिकने वाले अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रसार संख्या एक करोड़ 33 लाख 47 हजार है जो जागरण की तुलना में चार गुना कम है। दूसरे पायदान पर तीन करोड़ 35 लाख की पाठक संख्या के बूते दैनिक भास्कर है। तीसरे क्रम में दो करोड़ 67 लाख 69 हजार पाठक संख्या के आधार पर अमरउजाला, चौथे पर एक करोड़ 50 लाख 59 हजार की पाठक संख्या के आधार पर राजस्थान पत्रिका, पांचवे पर एक करोड़ 6 लाख 45 हजार की पाठक संख्या के बूते पंजाबकेसरी, छठे पर 'आज', सातवें पर 'नवभारत टाइम्स' आठवें पर प्रभात खबर, नौवें पर नवभारत और दसवें क्रम पर नईदुनिया' है।
               अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया के बाद दूसरे पायदान पर 63 लाख 49 हजार पाठक संख्या के साथ हिन्दुस्तान टाइम्स, तीसरे पर 53 लाख 73 हजार पाठक संख्या के साथ द हिन्दू, चौथे पर 28 लाख 18 हजार की पाठक संख्या के साथ द टेलीग्राफ और पांचवें पर 27 लाख 67 हजार की पाठक संख्या के 'डेक्कन क्रोनिकल' है। अपने-अपने क्षेत्रों में अंग्रेजी के इन अखबारों को भाषाई अखबार जबरदस्ती चुनौती देते हुए पाठक संख्या व प्रसार की दृष्टि से आगे निकलते जा रहे है। इनकी तुलना में अंग्रेजी अखबारों का प्रसार कई जगह स्थिर बना हुआ है तो कई जगह घट भी रहा है। यह संख्या बल तय करता है कि अभी कुछ दशकों तक प्रिंट मीडिया के सामने इलेक्टोनिक मीडिया चुनौती बनकर उभरने वाला नहीं है। हां इंटरनेट अर्थात ऑन लाइन पत्रकारिता कालांतर में प्रिंट मीडिया के लिए चुनौती बनकर उभर सकती थी, हालांकि भारत में समाचार-पत्र का ही आभासी रुप ही इंटरनेट मीडिया का जनक है। पहले अखबार तैयार होता है फिर उसके उसी रुप को इंटरनेट पर अपलिंक कर डाउनलोड किया जाता है। कंप्युटर साक्षरता के साथ इसका विस्तार होना तय है। लेकिन कंप्युटर अथवा लेपटॉप पर अवतरित होने वाला यह माध्यम मंहगा व विद्युत आधारित होने के कारण कभी भी समाचार-पत्र का सुविधायुक्त संपूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। इसलिए मीडिया के इंटरनेट माध्यम से भी भविष्य का प्रिंट मीडिया खतरा मुक्त है।
              निसंदेह मुद्रित पत्रकारिता तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन उतनी ही तेजी से उसका लोकतांत्रिक अथवा जनपक्षीय चरित्र घट रहा है। आज अखबार से गांव लगातार गायब होने से तात्पर्य है 70 फीसदी आबादी की अवहेलना ? आमजन की आवाज को नकारना! दरअसल मुनाफे का बाजार जब जीवन-मूल्य, रहन-सहन, आचार-विचार व दिनचर्या को प्रभावित करने लगता है तो निजी लाभ की यह अर्थव्यवस्था लोकहित की चाशनी में परोसी जाने लगती है, यहां खुद पत्रकारिता एक उत्पाद में बदल जाती है और पाठक का उपभोक्ता के रुप में इस्तेमाल करने लगती है। भविष्य की पत्रकारिता में यह ठग-विद्या अंगद का पैर बनने जा रही है।
           अखबार निकालने का मूल उद्देश्य सामाजिक जड़ता को दूर कर समाज में बदलाव लाना था, इसलिए पहले पत्रकारिता मार्केट ओरिएण्टेड न होते हुए उद्देश्यपरक पत्रकारिता हुआ करती थी। पिछले एक दशक में ऐसे विचित्र हालात निर्मित हुए हैं कि देश के बड़े हितों को प्रस्तुत की जाने वाली पत्रकारिता जैसे समाप्त ही हो जाएगी। जबकि क्षेत्रीय बोलियों और देशज भाषा से ही पत्रकारिता मजबूत होती है। पहले पत्रकारिता में संस्कृत शब्दों का प्रयोग उसे कठिन बना देता था लेकिन अब अंग्रेजी के कठिन और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग उसे आधुनिक बनाने का भ्रम पैदा कर रहा है। बल्कि अब तो कार्पोरेट जगत के पैरोकार अखबारों ने ऐसी शब्दावली गढ़ ली है जिसके दो हजार शब्द हिन्दी समेत भाषाई पत्रकारिता में ठूसे जा रहे हैं। पत्रकारिता के माध्यम से यह भाषा को बिगाड़ने का षडयंत्र है। इससे सजग रहने की जरुरत है।
                हिन्दी व भाषाई अखबारों के साथ भविष्य की एक विडंबना यह भी है कि इन अखबारों के संस्करण प्रसार और पाठक संख्या जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे-वैसे ये अंग्रेजी स्तंभकारों के अनुवादों से भरे जा रहे हैं। ये लेख राष्ट्रीय व स्थानीय समस्याओं के बुनियादी स्वरुप से रुबरु कराने की बजाए बहुराष्टीय कंपनियों के उत्पाद खपाने के लिए बाजार कैसे तैयार हो इसकी पैरबी करते दिखाई देते हैं। जबकि बड़े होते इन अखबारों का दायित्व बनता कि ये उन्हीं हिन्दी व अन्य भाषाई लेखकों को मौलिक लेखन लिखने के लिए संदर्भ सामग्री जुटाने में मदद करते जो इनके संक्रमण काल में रीढ़ रहे थे। इस सिलसिले में खासतौर से हिन्दी अखबारों को 'धर्मयुग' और 'जनसत्ता' से प्रेरित होना चाहिए, जिन्होंने अंग्रेजी अनुवादों को कभी बेवजह तरजीह नहीं दी। भारत का भविष्य का प्रिंट मीडिया पश्चिम की इस तर्ज पर चलता रहा तो भविष्य की भारतीय पत्रकारिता की विश्वसनीयता तो संकट में आएगी ही सामाजिक सरोकारों से भी वह दूर होती चली जाएगी। अखबार मालिकों को यहां यह ध्यान रखने की जरुरत है कि मनुष्यता से बढ़ी कोई और पूंजी नहीं हो सकती ?

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